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‘गलता लोहा’ शीर्षक की सार्थकता सिद्ध कीजिए।

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‘गलता लोहा’ कहानी में समाज के जातिगत विभाजन और स्तरीकरण पर कई कोणों से टिप्पणी की गई है। यह कहानी लेखक के लेखन में अर्थ की गहराई को दर्शाती है। इस पूरी कहानी में लेखक की कोई मुखर टिप्पणी नहीं है। इसमें एक मेधावी, किन्तु निर्धन ब्राह्मण युवक मोहन किन परिस्थितियों के चलते उस मनोदशा तक पहुँचता है, जहाँ उसके लिए जातीय अभिमान बेमानी हो जाता है।

मोहन सामाजिक जातिगत भेदभावों को तोड़कर धनराम लोहार के आफर पर जाता है, बैठता है, साथ ही उसके काम में भी अपनी कुशलता भी दिखाता है। वैसे ब्राह्मणों का शिल्पकारों के मुहल्ले में उठना-बैठना नहीं होता था। किसी काम-काज के सिलसिले में यदि शिल्पकार होले में आना ही पड़ा तो खड़े-खड़े बातचीत निपटा ली जाती थी।

ब्राह्मण होले के लोगों को बैठने के लिए कहना भी उनकी मर्यादा के विरुद्ध समझा जाता था। मोहन इन जातिगत भेदभाव को भूलकर धनराम के हाथ से हथौड़ा लेकर नपी-तुली चोट मारते, अभ्यस्त हाथों से धौंकनी फूंककर लोहे को दुबारा भट्ठी में गरम करते और फिर निहाई पर रखकर उसे ठोकते-पिटते सुघड़ गोले का रूप दे डालता है । इस प्रकार मोहन जातिगत भेदभाव को गलाकर नया आकार दे देता है। इस प्रकार प्रस्तुत कहानी का शीर्षक ‘गलता लोहा’ सार्थक है।



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