1.

लोहे की एक मोटी छड़ को भट्ठी में गलाकर धनराम गोलाई में मोड़ने की कोशिश कर रहा था। एक हाथ में सँड़सी पकड़कर जब वह दूसरे हाथ से हथौड़े की चोट मारता तो निहाई पर ठीक घाट में सिरा न फँसने के कारण लोहा उचित ढंग से मुड़ नहीं पा रहा था। मोहन कुछ देर तक उसे काम करते हुए देखता रहा फिर जैसे अपना संकोच त्यागकर उसने दूसरी पकड़ से लोहे को स्थिर कर लिया और धनराम के हाथ से हथौड़ा लेकर नपी-तुली चोट मारते-अभ्यस्त हाथों से धौंकनी फूंककर लोहे को दुबारा भट्टी में गरम करते और फिर निहाई पर रखकर उसे ठोकते-पीटते सुघड़ गोले का रूप दे डाला।मोहन जब धनराम के आफर गया तब वह क्या कर रहा था ?धनराम अपने काम में सफल क्यों नहीं हो रहा था ?धनराम का अधूरा काम मोहन ने कैसे पूरा किया ?

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  1. मोहन जब धनराम के आफर गया तब धनराम लोहे की एक मोटी छड़ को भट्टी में गलाकर उसे गोलाई में मोड़ने का व्यर्थ प्रयास कर रहा था।
  2. धनराम अपने काम में इसलिए सफल नहीं हो पा रहा था क्योंकि वह एक हाथ से सँडसी पकड़कर दूसरे हाथ से हथौड़े की चोट मारता तो निहाई पर तीक घाट में सिरा न फँसने के कारण लोहा सही तरीके से मुड़ नहीं रहा था।
  3. कुछ देर तक मोहन धनराम के काम को देखता रहा। बाद में अचानक उठकर लोहे को स्थिर करके धनराम का हथौड़ा लेकर नपी-तुली चोट की। उसके बाद स्वयं धौंकनी फूंककर लोहे को दोबारा भट्ठी में गरम किया और फिर निहाई पर रखकर उसे ठोक-पीटकर सुघड़ गोल आकार में बदल देता है।


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