This section includes InterviewSolutions, each offering curated multiple-choice questions to sharpen your knowledge and support exam preparation. Choose a topic below to get started.
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जल-प्रदूषण से किन-किन रोगों के होने की सम्भावना रहती है ? |
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Answer» प्रदूषित जल के उपयोग से अनेक रोगों के होने की सम्भावना रहती है; जैसे-पक्षाघात, पोलियो, पीलिया (Jaundice), मियादी बुखार (Typhoid), हैजा, डायरिया, क्षय रोग, पेचिश, इन्सेफेलाइटिस, कन्जंक्टीवाइटिस आदि। यदि जल में रेडियोसक्रिय पदार्थ और लेड, क्रोमियम, आर्सेनिक जैसी विषाक्त धातु हों तो कैंसर तथा कुष्ठ जैसे भयंकर रोग हो सकते हैं। वर्ष 1988 में केवल दिल्ली में प्रदूषित जल सेवन से एक हजार से अधिक लोगों की मृत्यु हुई। |
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जल-प्रदूषण की रोकथाम के सन्दर्भ में ‘अवशिष्ट जल के उपचार’ एवं ‘पुनः चक्रण का वर्णन कीजिए। |
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Answer» अवशिष्ट जल का उपचार – कल-कारखानों के अवशिष्ट जल को नदी में भेजने से पहले उसका उपयुक्त उपचार करना आवश्यक होता है जिससे प्रदूषक नदी, झील या तालाब के जल को प्रदूषित न कर सकें, क्योंकि हमारे वाटर वर्ल्स इन्हीं से जल लेकर हमें पीने को देते हैं। सीवर के जल को भी शहर के बाहर दोषरहित बनाकर ही नदियों में छोड़ना चाहिए। कारखानों के जल से विषैले पदार्थ को ही नहीं बल्कि ऊष्मा को निकालकर ही उसे नदी में डालना चाहिए। पुनः चक्रण – शहरी और औद्योगिक गन्दे जल को नदियों में मिलाने से पहले साफ करना और निथारना एक बड़ा खर्चीला काम है। अत: ठोस अवशिष्ट पदार्थों; जैसे-कूड़ा-करकट, सीवेज (मल-मूत्र) और अवशिष्ट जल से रासायनिक विधियों द्वारा अन्य उपयोगी पदार्थ बनाये जा सकते हैं। इस प्रकार हानि को लाभ में बदला जा सकता है। उदाहरणार्थ-पटना में मल-मूत्र व गन्दे जल से बायोगैस बन रही है जिससे पूरा मुहल्ला प्रभावित हो रहा है। बंगलुरू शहर में भी प्रदूषित जल से बायोगैस बनायी जा रही है। |
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पर्यावरणीय प्रदूषण क्या है? |
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Answer» पर्यावरणीय प्रदूषण से आशय जैवमंडल में ऐसे तत्त्वों के समावेश से है, जो जीवनदायिनी शक्तियों को नष्ट कर रहे हैं। उदाहरणार्थ-रूस में चेरनोबिल के आणविक बिजलीघर से एक हजार किलोमीटर क्षेत्र में रेडियोधर्मिता फैल गई, जिससे मानव जीवन के लिए ही अनेक संकट पैदा हो गए। आज इस दुर्घटना के बाद लोग आणविक बिजलीघर का नाम सुनते ही सिहर उठते हैं। इसी तरह रासायनिक खाद, लुगदी बनाने, कीटनाशक दवाओं के बनाने और चमड़ा निर्माण करने आदि के कुछ ऐसे दुसरे उद्योग हैं, जो वायु प्रदूषण फैलाते हैं। इतना ही नहीं, कई उद्योग तो वायु प्रदूषण के साथ-साथ मिट्टी और पानी का भी प्रदूषण करते हैं। अमेरिका के राष्ट्रपति की विज्ञान सलाहकार समिति के अनुसार, “पर्यावरणीय प्रदूषण मनुष्यों की गतिविधियां द्वारा ऊर्जा स्वरूपों, विकिरण स्तरों, रासायनिक तथा भौतिक संगठनों, जीवों की संख्या में प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से परिवर्तन के परिणामस्वरूप उत्पन्न उप-उत्पाद है, जो हमारे परिवेश में पूर्ण अथवा अधिकतम प्रतिकूल परिवर्तन उत्पन्न करता है।” |
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उस बाह्य शक्ति को क्या कहते हैं जो हमें प्रभावित करती है? |
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Answer» उस बाह्य शक्ति को पर्यावरण कहते हैं जो हमें प्रभावित करती है। |
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कार्बन मोनोऑक्साइड का वायुमण्डल में बढ़ता प्रवाह किस प्रकार की सामाजिक समस्याओं को जन्म दे रहा है ? स्पष्ट कीजिए। |
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Answer» वायुमण्डल को प्रदूषित करने में वाहनों से छोड़े जाने वाली कार्बन मोनोऑक्साइड गैस का प्रमुख हाथ है। नगरों में बसों, मोटरों, ट्रकों, टैम्पों तथा स्कूटर-मोटर साइकिलों से इतना अधिक कार्बन मोनोऑक्साइड धुआँ निकलता है कि सड़क पर चलने वाले लोगों का दम घुटने लगता है। यही कारण है कि बड़े नगरों में लोग विशेषकर बच्चे, श्वास रोगों से पीड़ित पाये जाने लगे हैं। इस प्रकार कार्बन मोनोऑक्साइड गैस स्वास्थ्य सम्बन्धी समस्याएँ उत्पन्न करती है। स्वास्थ्य सम्बन्धी समस्याओं के अतिरिक्त, कार्बन मोनोऑक्साइड निम्नलिखित सामाजिक समस्याओं को जन्म दे रहा है 1. पारिवारिक विघटन कार्बन मोनोऑक्साइड के कारण पर्यावरण प्रदूषण अप्रत्यक्ष रूप से हमारे जीवन को विघटित करने वाला एक प्रमुख स्रोत है। जैसे-जैसे पर्यावरण प्रदूषण में वृद्धि होती है, व्यक्ति की कार्यक्षमता तथा उसके स्वास्थ्य पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ने लगता है। इससे परिवार में आर्थिक समस्याएँ पैदा हो जाती हैं तथा आजीविका अर्जित करने वाले व्यक्तियों में मानसिक तनाव बढ़ने लगता है। परिवार के सदस्यों में सम्बन्ध मधुर नहीं रहते, बल्कि वे तनावग्रस्त हो जाते हैं। धीरे-धीरे परिवार में बढ़ते हुए तनाव पारिवारिक विघटन का कारण बन जाते हैं। 2. अपराधों में वृद्धि-मनोवैज्ञानिकों तथा समाजशास्त्रियों के सर्वेक्षण से यह भी स्पष्ट हुआ है कि जो व्यक्ति अधिक मानसिक तनाव में रहते हैं, वे सरलता से अपराधों की ओर बढ़ जाते हैं। यही कारण है कि गाँव की अपेक्षा बड़े नगरों में अपराध की दर अधिक होती है। |
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प्रदूषण के प्रमुख दो सामाजिक प्रभावों को लिखिए। |
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Answer» प्रदूषण मानव तथा अन्य जीवों के जीवन-चक्र पर हानिकारक प्रभाव डालता है। अतः यह मानव तथा समाज दोनों के लिए हानिकारक है। प्रदूषण के दो प्रमुख हानिकारक प्रभाव निम्नलिखिते हैं – ⦁ मानव के जीवन-स्तर पर प्रभाव – मानव-जीवन पर प्राकृतिक सम्पदाओं का प्रभाव पड़ता है। यह प्राकृतिक सम्पदाएँ भूमि; पेड़-पौधे, खनिज पदार्थ, जल, वायु आदि के रूप में मनुष्य को उपलब्ध हैं। प्रदूषण के कारण इन सभी पर बहुत बुरा प्रभाव पड़ता है। प्रदूषण के कारण फसलों, फलों, सब्जियों आदि पर बुरा प्रभाव पड़ता है, जलीय जीव (मछलियाँ आदि) नष्ट हो जाते हैं। इससे वस्तुओं के मूल्यों में वृद्धि हो जाती है तथा लोगों को आर्थिक संकटों का सामना करना पड़ता है। |
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पर्यावरण प्रदूषण से आप क्या समझते हैं ? |
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Answer» पर्यावरण के घटकों; जैसे-वायु, जल, भूमि, ऊर्जा के विभिन्न रूप के भौतिक, रासायनिक या जैविक लक्षणों का वह अवांछनीय परिवर्तन जो मानव और उसके लिए लाभदायक है, दूसरे जीवों, औद्योगिक प्रक्रमों, जैविक दशाओं, सांस्कृतिक विरासतों एवं कच्चे माल के साधनों को हानि पहुँचाता है, पर्यावरण प्रदूषण कहलाता है। |
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जल-प्रदूषण के क्या कारण हैं |
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Answer» औद्योगीकरण, नगरीकरण, समुद्रों में अस्त्रों का परीक्षण, नदियों में अधजले शवों, जानवरों की लाश व अस्थि-विसर्जन करना, रासायनिक उर्वरक व कीटनाशकों का जल में मिलना, घरों से निकलने वाले विभिन्न प्रकार से दूषित जल का जलाशयों व नदियों आदि में मिलना जलप्रदूषण के प्रमुख कारण हैं। |
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भौगोलिक पर्यावरण किन तत्त्वों से बनता है?(क) मनुष्य(ख) प्राकृतिक दशाएँ(ग) धार्मिक विश्वास(घ) प्रथाएँ। |
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Answer» सही विकल्प है (ख) प्राकृतिक दशाएँ |
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सामाजिक पारिस्थितिकी से क्या अभिप्राय है? |
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Answer» सामाजिक पारिस्थितिकी वह विचारधारा है जो यह बताती है कि सामाजिक संबंध, मुख्य रूप से संपत्ति तथा उत्पादन के संगठन, पर्यावरण की सोच तथा कोशिश को एक आकार देते हैं। पारिस्थितिकी की चुनौतियों का सामना करने हेतु विकसित ‘सामाजिक पारिस्थितिकी’ समाज पर पड़ने वाले प्रभावों के मद्देनजर पर्यावरण को नियंत्रित करने पर बल देती है। समाज के विभिन्न वर्ग पर्यावरण से संबंधित मुद्दों को भिन्न प्रकार से देखने एवं समझने का प्रयास करते हैं। उदाहरणार्थ-वन विभाग अधिक राजस्व प्राप्ति हेतु अधिक मात्रा में बाँस का उत्पादन करता है। बाँस का कारीगर इसका उपयोग कैसे करेगा। यह वन्य विभाग की चिंता का विषय नहीं है। दोनों द्वारा बॉस से संबंधित होने के बावजूद दोनों के दृष्टिकोण अलग-अलग हैं। इसीलिए विभिन्न रुचियाँ एवं विचारधाराएँ पर्यावरण संबंधी मतभेद उत्पन्न कर देती हैं। इस अर्थ में पर्यावरण संकट की जड़ें सामाजिक असमानताओं में देखी जा सकती हैं। वस्तुत: आज की परिस्थितिकी से संबंधित सभी समस्याएँ कहीं-न-कहीं सामाजिक समस्याओं से उत्पन्न हुई हैं। इसलिए आर्थिक, नृजातीय, सांस्कृतिक, लैंगिक मतभेद तथा अन्य बहुत-सी समस्याओं के केंद्र में पर्यावरण की व्यवस्था स्थित है। पर्यावरण से संबंधित समस्याओं को सुलझाने का एक तरीका पर्यावरण तथा समाज के आपसी संबंधों में परिवर्तन है और इसका अर्थ है– विभिन्न समूहों (स्त्री तथा पुरुष, ग्रामीण तथा शहरी लोग, जमींदार तथा मजदूर आदि) के बीच संबंधों में बदलाव। सामाजिक संबंधों में परिवर्तने विभिन्न ज्ञान व्यवस्थाओं और भिन्न ज्ञान तंत्र को जन्म देगा जो पर्यावरण का प्रबंधन सुचारु रूप से कर सकेगा। |
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पारिस्थितिकी सिर्फ प्राकृतिक शक्तियों तक ही सीमित क्यों नहीं है? |
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Answer» सामान्य अर्थों में पारिस्थितिकी को भौतिक या प्राकृतिक शक्तियों तक ही सीमित रखा जाता है। यह सही नहीं है। पारिस्थितिकी केवल प्राकृतिक शक्तियों तक सीमित न होकर प्राकृतिक एवं जैविक व्यवस्थाओं में अंत:संबंध पर बल देती है। क्योंकि मानवीय समाज पर पारिस्थितिकी का गहरा प्रभाव पड़ता है इसलिए इसे केवल प्राकृतिक शक्तियों तक सीमित करना उचित नहीं है। बहुत बड़ी सीमा तक किसी समाज की संस्कृति मानवीय विचारों तथा व्यवहार पर पारिस्थितिकी के गहन प्रभाव को प्रतिबिंबित करती है। व्यवसाय, भोजन, वस्त्र, आवास, धर्म, कला, आचार, विचार एवं इसी प्रकार के मानव निर्मित अनेक सांस्कृतिक निर्माण पारिस्थितिकी से ही प्रभावित होते हैं। किसी स्थान की पारिस्थितिकी पर वहाँ के भूगोल तथा जलमंडल की अंत:क्रियाओं को भी प्रभाव पड़ता है। उदाहरणार्थ-मरुस्थलीय प्रदेशों में रहने वाले जीव-जंतु अपने आपको वहाँ की परिस्थितियों (न्यून वर्षा, पथरीली अथवा रेतीली मिट्टी तथा अत्यधिक तापमान) के अनुरूप अपने आप को ढाल लेते हैं। इसी प्रकार, पारिस्थितिकीय कारक स्थान विशेष पर व्यक्तियों के रहने का निर्धारण भी करते हैं। इससे यह स्पष्ट होता है कि पारिस्थितिकी केवल प्राकृतिक शक्तियों तक ही सीमित नहीं है। |
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कार्बन मोनो-ऑक्साइड का वायुमंडल में बढ़ता प्रवाह किस प्रकार की सामाजिक समस्याओं को जन्म दे रहा है? स्पष्ट कीजिए। |
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Answer» कार्बन मोनो-ऑक्साइड का वायुमंडल में बढ़ता प्रवाह वायु प्रदूषण से संबंधित है। वायु में गैसों की अनावश्यक वृद्धि (केवल ऑक्सीजन को छोड़कर) या उसके भौतिक व रासायनिक घटकों में परिवर्तन वायु प्रदूषण उत्पन्न करता है। वायु में विभिन्न गैसों में संतुलन पाया जाता है, परंतु मोटरगाड़ियों से निकलने वाला धुआँ, कुछ कारखानों से निकलने वाला धुआँ तथा वनों व वृक्षों के काटे जाने से वायु में ऑक्सीजन, नाइट्रोजन व कार्बन डाइऑक्साइड का संतुलन बिगड़ जाता है तथा यह मनुष्यों व अन्य जीवों पर प्रतिकूल प्रभाव डालने लगता है। अनेक कारण वायु प्रदूषण के लिए उत्तरदायी माने जाते हैं परंतु इन सभी कारणों में कार्बन मोनो-ऑक्साइड का वायुमंडल में बढ़ती प्रवाह महत्त्वपूर्ण माना जाता है क्योंकि इससे स्वास्थ्य पर बहुत बुरा प्रभाव पड़ता है। छाती, सॉस, आँखों तथा हड्डियों से संबंधित अनेक बीमारियाँ इसी के परिणामस्वरूप होती हैं। इतना ही नहीं, जब व्यक्ति का स्वास्थ्य ही ठीक नहीं होगा तो निर्धनता एवं बेरोजगारी जैसी समस्याओं में वृद्धि होगी। |
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पर्यावरण प्रदूषण का सर्वप्रथम कारण मानव सभ्यता का विकास ही है।’ स्पष्ट कीजिए। या‘पारिस्थितिक-तन्त्र का पतन एवं पर्यावरण प्रदूषण’ पर एक संक्षिप्त टिप्पणी लिखिए।यापर्यावरण प्रदूषण के कारणों को व्यक्त कीजिए। यावायु-प्रदूषण में मानव-जनित प्रदूषण की भूमिका पर प्रकाश डालिए। प्रदूषण के दो कारकों का उल्लेख कीजिए। |
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Answer» जैसे-जैसे मानव सभ्यता का विकास होता गया, वैसे-वैसे मानव की आवश्यकताएँ भी बढ़ती गयीं। अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए मनुष्य ने जंगल काटकर खेती करना प्रारम्भ किया। जनसंख्या की तीव्र वृद्धि के कारण अब इस खेती को नष्ट करके मनुष्य उस पर मकान बनाने लगा है और फैक्ट्रियों में कार्य करके आज अपनी आजीविका कमा रहा है। विकास की तेज गति से मनुष्य को जहाँ लाभ पहुंचे हैं, वहाँ दूसरी ओर कई नुकसान भी हुए हैं। प्रकृति का सन्तुलन डगमगाने लगा है, उसकी सादगी और पवित्रता नष्ट हो रही है। अपनी बढ़ती जरूरतों को पूरा करने के लिए मकान बनाने, खेती करने, ईंधन प्राप्त करने, पैसा बनाने तथा अन्य उपयोगों के लिए पेड़ों और जंगलों का सफाया आज भी लगातार हो रहा है। प्रतिदिन नयी-नयी सड़कें, गगनचुम्बी इमारते, मिल, कारखाने आदि बन रहे हैं और इस प्रक्रिया में प्राकृतिक साधनों का बहुत अधिक दोहन हो रहा है, हानिकारक रसायनों, गैसों व अन्य चीजों का बहुत इस्तेमाल हो रहा है। इससे पर्यावरण की प्राकृतिकता नष्ट हो रही है और प्रदूषण पनप रहा है। हजारों वर्षों से मानव-जीवन पर्यावरण के सन्तुलन के सहारे चलता रहा है। मानव ने अपनी सुख-सुविधाओं में वृद्धि हेतु पर्यावरण में इतना अधिक परिवर्तन कर दिया है कि इससे पर्यावरणीय प्रदूषण की समस्या उत्पन्न हो गयी है। निम्नलिखित बिन्दुओं पर विचार करने से यह स्पष्ट हो जाता है कि पर्यावरण प्रदूषण का सर्वप्रमुख कारण मानव सभ्यता का विकास ही है 1. दहन – लकड़ी व विभिन्न प्रकार के खनिज ईंधनों (पेट्रोल, कोयला, मिट्टी का तेल आदि) की भट्टियों, कारखानों, बिजलीघरों, मोटरगाड़ियों, रेलगाड़ियों आदि में जलाने से कार्बन डाइऑक्साइड, सल्फर डाई-ऑक्साइड, कार्बन मोनोऑक्साइड, धूल तथा अन्य यौगिकों के सूक्ष्म कण प्रदूषक के रूप में वायु में मिल जाते हैं। मोटरगाड़ियाँ या ऑटोमोबाइल एक्सहॉस्ट (Automobile Exhaust) को सबसे बड़ा प्रदूषणकारी माना गया है। इससे कार्बन मोनोऑक्साइड, नाइट्रिक ऑक्साइड तथा अन्य विषैली गैसें निकलती हैं। ये विषैली गैसें सूर्य के प्रकाश की उपस्थिति में परस्पर क्रिया करके अन्य पदार्थ बनाती हैं, जो अत्यन्त हानिकारक होते हैं। 2. औद्योगिक अवशिष्ट – बड़े नगरों में कल-कारखानों से निकलने वाली अनेक गैसें, धातु के कण, विभिन्न प्रकार के फ्लुओराइड, कभी-कभी रेडियोसक्रिय पदार्थों के कण, कोयले के अज्वलनशील खनिज आदि वहाँ की वायु को इतना प्रदूषित कर देते हैं कि लोगों का जीना मुश्किल हो जाता है। यह इसलिए होता है क्योंकि विभिन्न प्रकार के उद्योगों में अनेक प्रकार के रसायन प्रयोग में लाये जाते हैं। 3. धातुकर्मी प्रक्रम – खान से निकाले गये खनिजों (अयस्कों) से धातु प्राप्त करना धातु कर्म कहलाता है। इस प्रक्रम से जो धूल व धुआं निकलता है, उसमें क्रोमियम, बेरीलियम, आर्सेनिक, बैनेडियम, जस्ता, सीसा, ताँबा आदि के कण होते हैं, जो वायु को प्रदूषित करते हैं। 4. कृषि रसायन – कीटों व खरपतवारों को नष्ट करने के लिए फसलों पर जो रसायन (ऐल्ड्रीन, गैमेक्सीन आदि) छिड़के जाते हैं, उनमें से भी अनेक विषाक्त पदार्थ वायु में पहुँचते हैं, जो उसे विषाक्त कर देते हैं। 5. वृक्षों तथा वनों को काटा जाना – हरे पेड़-पौधे वायुमण्डल से कार्बन डाइऑक्साइड को लेकर उसके बदले ऑक्सीजन छोड़ते हैं जिससे वायुमण्डल में इन गैसों का सन्तुलन बना रहता है। अतः वनस्पतियों द्वारा पर्यावरण की शुद्धि होती है। आज हमने वनों तथा अन्य स्थानों के वृक्षों व झाड़ियों को अन्धाधुन्ध काटा है जिससे वायुमण्डल में उपस्थित गैसों का सन्तुलन बिगड़ गया है। 6. मृत पदार्थ – मरे हुए वनस्पति, जानवर या मनुष्य आदि वायुमण्डल में खुले छोड़ दिये जाएँ तो उन पर अनेक प्रकार के रोगों के कीटाणु, जीवाणु व विषाणु उगेंगे जो वायु-प्रदूषण उत्पन्न करेंगे। 7. जनसंख्या विस्फोट – पर्यावरण प्रदूषण का यदि एक सबसे प्रमुख कारण देना हो तो हम जनसंख्या विस्फोट कह सकते हैं। यदि संसार की जनसंख्या इतनी अधिक नहीं हुई होती तो आज प्रदूषण की बात भी नहीं उठती। यह अनुमान किया जाता है कि गत 100 वर्षों में केवल मनुष्य ने ही वायुमण्डल में 36 करोड़ टन कार्बन डाइऑक्साइड छोड़ी है। यह मात्रा दिन-प्रति-दिन बढ़ती ही जा रही है। 8. परमाणु ऊर्जा – परमाणु ऊर्जा की प्राप्ति हेतु अनेक देश परमाणु विस्फोट कर रहे हैं और बहुत-से देश ऐसा करने के प्रयत्न में लगे हुए हैं। इस प्रयास के प्रक्रम में रेडियोसक्रिय पदार्थों को उठाने, चूरा करने, छानने, पीसने से कुछ वायु प्रदूषक (जैसे—यूरेनियम, बेरीलियम, क्लोराइड, आयोडीन, ऑर्गन, स्ट्रीशियम, सीजियम, कार्बन आदि) वायु में आ – मिलते हैं। 9. युद्ध – छोटे या बड़े देशों के मध्य जहाँ कहीं भी युद्ध होता है वहाँ का वातावरण गोलियाँ चलने, बम फटने एवं विषैले अस्त्र-शस्त्रों के प्रयोग से दूषित हो जाता हैं। |
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बेकारी के तीन स्वरूपों के नाम बताइए। |
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Answer» बेकारी के तीन स्वरूपों के नाम हैं-मौसमी, चक्रीय तथा आकस्मिक बेकारी। |
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“पर्यावरण प्रदूषण का सर्वप्रथम कारण मानव सभ्यता का विकास ही है।” स्पष्ट कीजिए। |
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Answer» पहले जब मानव सभ्यता का विकास प्रारंभ नहीं हुआ था तो व्यक्ति प्राकृतिक जीवन व्यतीत करता था। मानव सभ्यता के शनैः शनैः विकास के परिणामस्वरूप मानव ने अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति हेतु पर्यावरण से छेड़छाड़ करना प्रारंभ कर दिया। जैसे-जैसे मानव सभ्यता का विकास होता गया, मानव की आवश्यकताएँ बढ़ती गईं तथा पर्यावरण से छेड़छाड़ भी उसी अनुपात में अधिक होने लगा। इसी का परिणाम प्रदूषण के रूप में सामने आया है। इसीलिए पर्यावरणीय प्रदूषण को एक नवीन संकल्पना माना जाता है। भौतिक विकास को अत्यधिक महत्त्व दिया जाने लगा जिसके परिणामस्वरूप फ्रकृति का भंडार समाप्त होने लगा। मानव सभ्यता के विकास के फलस्वरूप ही भारी उद्योगों एवं बड़े-बड़े बाँधों के निर्माण में तेजी आई तथा इनसे प्रकृति के घटकों का संतुलन बिगड़ना प्रारंभ हो गया। ऐसा लगता है कि प्रदूषण वह कीमत है जो मानव सभ्यता के विकास हेतु सभी समाजों को चुकानी पड़ती है। ऊर्जा के स्रोतों के रूप में आज आणविक एवं ताप बिजलीघरों का निर्माण किया जा रहा है जिनसे निकलने वाली गैसें अधिक खतरनाक होती हैं। भोपाल गैस कांड जैसे कई कांड इसके दुष्परिणामों के उदाहरण हैं। कई विद्वान ऐसा भी मानते हैं कि पर्यावरण प्रदूषण मानव सभ्यता के विकास की वह कीमत है जो उसे विकास के नाम पर चुकानी पड़ती है। |
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बेकारी दूर करने के चार उपाय लिखिए। |
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Answer» बेकारी दूर करने के चार उपाय निम्नलिखित हैं ⦁ सरकार द्वारा उचित योजनाएँ बनाकर बेकारी की समस्या का समाधान किया जा सकता है। |
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बेकारी को दूर करने में राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार कार्यक्रम की क्या भूमिका रही है ? |
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Answer» ग्रामीण गरीबी, बेकारी एवं अर्द्ध-बेकारी को समाप्त करने के लिए यह योजना प्रारम्भ की गयी है। इसका उद्देश्य ग्रामीण लोगों को रोजगार के अवसर प्रदान कर गरीब वर्ग में आय एवं उपभोग का पुनर्वितरण करना है। यह योजना अक्टूबर, 1980 ई० से प्रारम्भ की गयी है। इसमें केन्द्र और राज्य सरकारें आधा-आधा खर्च उठाती हैं। इसके अन्तर्गत नये रोजगार के अवसर पैदा करना, समुदाय में स्थायी सम्पत्ति का निर्माण करना तथा ग्रामीण गरीबों के पोषाहार के स्तर को ऊँचा उठाना तथा प्रत्येक ग्रामीण भूमिहीन श्रमिक परिवार के कम-से-कम एक सदस्य को वर्ष में 100 दिन का रोजगार देने की गारण्टी देना आदि लक्ष्य रखे गये हैं। इसमें 50 प्रतिशत धन कृषि मजदूरों एवं सीमान्त कृषकों के लिए एवं 50 प्रतिशत ग्रामीण गरीबों पर खर्च किया जाता है। इस योजना के अन्तर्गत काम करने वाले मजदूरों को न्यूनतम वेतन अधिनियम के आधार पर भुगतान किया जाता है तथा कुछ भुगतान नकद वे कुछ अनाज के रूप में किया जाता है। इससे ग्रामों में रोजगार के अवसर बढ़े, लोगों के पोपहार स्तर में सुधार हुआ तथा गाँवों में सड़कों, स्कूल एवं पंचायत के भवनों आदि का निर्माण हुआ। बाद में, इस कार्यक्रम को जवाहर रोजगार योजना में मिला दिया गया। वर्तमान में इस योजना को जवाहर ग्राम समृद्धि योजना के रूप में संचालित किया जा रहा है। |
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बेकारी का प्रत्यक्ष परिणाम क्या है ?(क) एक विवाह(ख) नगरीकरण(ग) संयुक्त परिवार(घ) निर्धनता |
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Answer» (घ) निर्धनता |
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बेकारी के चार प्रमुख लक्षण क्या हैं ? |
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Answer» बेकारी के चार प्रमुख लक्षण निम्नलिखित हैं। ⦁ इच्छा – किसी भी व्यक्ति को बेकार उस समय कहेंगे जब वह काम करने की इच्छा रखता हो और उसे काम न मिले। साधु, संन्यासी और भिखारी को हम बेकार नहीं कहेंगे, क्योंकि वे शारीरिक दृष्टि से योग्य होते हुए भी काम करना नहीं चाहते।। ⦁ योग्यता – काम करने की इच्छा ही पर्याप्त नहीं है, वरन् व्यक्ति में काम करने की शारीरिक एवं मानसिक योग्यता भी होनी चाहिए। यदि कोई व्यक्ति बीमार, वृद्ध या पागल होने के कारण कार्य करने योग्य नहीं है तो उसे काम करने की इच्छा होते हुए भी बेकार नहीं कहेंगे। ⦁ प्रयत्न – व्यक्ति को कार्य पाने के लिए प्रयत्न करना भी आवश्यक है। प्रयत्न के अभाव में योग्य एवं इच्छा रखने वाले व्यक्तियों को भी बेकार नहीं कह सकते। ⦁ योग्यता के अनुसार पूर्ण कार्य – व्यक्ति जिस पद एवं कार्य के योग्य है वह उसे मिलना चाहिए। उससे कम मिलने पर उसे हम आंशिक रोजगार प्राप्त व्यक्ति कहेंगे। जैसे-डॉक्टर को कम्पाउण्डर का या इन्जीनियर को ओवरसीयर का काम मिलता है तो यह आंशिक बेकारी की स्थिति है। |
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वह कौन-सा सिद्धान्त है जो सम्पूर्ण मानवीय क्रियाओं को भौगोलिक पर्यावरण के आधार पर स्पष्ट करने का प्रयास करता है?(क) भौगोलिक निर्णायकवाद(ख) तकनीकी निर्णायकवाद(ग) सांस्कृतिक निर्णायकवाद(घ) इनमें से कोई नहीं |
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Answer» (क) भौगोलिक निर्णायकवाद |
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| 117171. |
निम्नांकित में से कौन भारत में गरीबी का कारण नहीं है?(क) अशिक्षा(ख) भाषाई संघर्ष(ग) बेरोजगारी(घ) प्राकृतिक विपत्तियाँ |
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Answer» (ख) भाषाई संघर्ष |
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भारत में बेरोजगारी के दो कारणों का विश्लेषण कीजिए। |
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Answer» भारत में बेरोजगारी के दो कारण निम्नलिखित हैं ⦁ तीव्र गति से बढ़ती जनसंख्या – भारत में जनसंख्या 2.5% प्रतिवर्ष की दर से बढ़ रही है, जब कि रोजगार के अवसरों में इस दर से वृद्धि नहीं हो रही है। जनसंख्या वृद्धि-दर के अनुसार भारत में प्रतिवर्ष लगभग 50 लाख व्यक्तियों को रोजगार के अवसर सुलभ ” होने चाहिए। जनसंख्या की स्थिति विस्फोटक होने के कारण हमारे देश में बेरोजगारी विद्यमान है। ⦁ दोषपूर्ण शिक्षा-प्रणाली – हमारे देश की शिक्षा-पद्धति दोषपूर्ण है। यह शिक्षा रोजगारमूलक नहीं है, जिससे शिक्षित बेरोजगारी बढ़ती जा रही है। प्रतिवर्ष लगभग 10 लाख शिक्षित व्यक्ति बेरोजगारी की पंक्ति में सम्मिलित हो जाते हैं। |
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| 117173. |
निम्नलिखित में से किस एक दशा को बेरोजगारी का सामाजिक परिणाम नहीं कहा जाएगा?(क) परिवार में तनाव(ख) राजनीतिक भ्रष्टाचार(ग) मानसिक तनाव(घ) नैतिक पतन की सम्भावना |
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Answer» (ख) राजनीतिक भ्रष्टाचार |
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यदि कारखाने के दोषपूर्ण प्रबन्ध के कारण कारखाना बन्द हो जाने से हजारों श्रमिक बेरोजगार हो जाते हैं, तो ऐसी बेरोजगारी को कहा जाएगा(क) आकस्मिक बेरोजगारी(ख) प्रबन्धकीय बेरोजगारी(ग) नगरीय बेरोजगारी(घ) औद्योगिक बेरोजगारी |
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Answer» (घ) औद्योगिक बेरोजगारी |
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| 117175. |
पर्यावरण दिवस मनाया जाता है।(क) 5 जून को(ख) 24 जून को(ग) 6 जून को(घ) 20 जून को |
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Answer» सही विकल्प है (क) 5 जून को |
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सरकार द्वारा निर्धनता को कम करने के लिए किये गये दो प्रयत्नों का उल्लेख कीजिए। |
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Answer» भारत सरकार ने निर्धनता को समाप्त करने के लिए विशेष प्रयत्न किये हैं, जिनमें से दो प्रमुख निम्नलिखित हैं ⦁ पंचवर्षीय योजना – देश में अब तक दस पंचवर्षीय योजनाएँ पूरी हो चुकी हैं। इन योजनाओं में मुद्रास्फीति को रोकने, खाद्य-सामग्री के अभाव को दूर करने, जीवन-स्तर को उन्नत करने, कृषि में सुधार करने, औद्योगिक उत्पादन बढ़ाने, कुटीर एवं लघु उद्योगों को प्रोत्साहन देने एवं रोजगार के अवसर बढ़ाने से सम्बन्धित अनेक प्रयास किये गये हैं। ⦁ राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार कार्यक्रम – गरीबी समाप्त करने के लिए सरकार ने काम के बदले अनाजे योजना हाथ में ली, लेकिन अक्टूबर, 1980 ई० से काम के बदले अनाज योजना का स्थान राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार कार्यक्रम ने ले लिया है। बाद में इस योजना को जवाहर रोजगार योजना में सम्मिलित कर दिया गया। अब जवाहर रोजगार योजना के स्थान पर 1 अप्रैल, 1999 से ‘जवाहर ग्राम समृद्धि योजना चल रही है। |
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निर्धनता दूर करने के उपाय के रूप में कुटीर उद्योगों के विकास की चर्चा कीजिए। |
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Answer» निर्धनता को समाप्त करने के लिए जहाँ सरकार ने एक और बड़े-बड़े उद्योगों की स्थापना की है, वहीं दूसरी ओर कुटीर एवं ग्राम उद्योगों को भी प्रोत्साहन दिया है। इन उद्योगों से लाखों लोगों को रोजगार प्राप्त होता है। |
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| 117178. |
पर्यावरण दिवस मनाया जाता है। (क) 5 जून को(ख) 24 जून को(ग) 6 जून को(घ) 20 जून को |
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Answer» (क) 5 जून को |
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| 117179. |
निर्धनता किस प्रकार पारिवारिक विघटन की समस्या उत्पन्न करती है ? |
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Answer» गरीबी की अवस्था में परिवार के सभी लोगों को काम करना पड़ता है। माता-पिता एवं बच्चे पृथक्-पृथक् काम पर जाते हैं। ऐसे में बच्चों पर परिवार का नियन्त्रण शिथिल हो जाता है। गरीबी से मुक्ति पाने के लिए कभी-कभी स्त्रियाँ वेश्यावृत्ति भी अपना लेती हैं। गरीब परिवार की सामाजिक प्रतिष्ठा भी गिर जाती है, बच्चे आवारा एवं भगोड़े हो जाते हैं। गरीबी के कारण हीनता एवं निराशा पैदा होती है, जिससे कई परिवार टूट जाते हैं। |
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निर्धनता के प्रभाव के रूप में अपराध की चर्चा कीजिए। |
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Answer» गरीबी के कारण लोग अपराध भी करते हैं। अपराध और बाल-अपराध के अनेक अध्ययनों ने उक्त तथ्य को स्पष्ट किया है। जब लोगों के पास खाने को भोजन, पहनने को वस्त्र, रहने को मकान और चिकित्सा के लिए पैसा नहीं होता है तो वे चोरी, डकैती, सेंधमारी, रिश्वत, गबन, मिलावट, वेश्यावृत्ति, आत्महत्या आदि अपराध करते हैं। |
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निर्धनता के शारीरिक एवं मानसिक प्रभावों की चर्चा कीजिए। |
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Answer» गरीबी में जी रहे लोगों को सन्तुलित आहार तो दूर रहा पेट भर भोजन भी नहीं मिल पाता है। विटामिनयुक्त भोजन के अभाव में अनेक बीमारियाँ आ घेरती हैं, शरीर कमजोर हो जाता है और व्यक्ति की कार्यक्षमता घट जाती है। क्षयरोग (टीबी) को गरीबों की बीमारी माना गया है। धन के अभाव में व्यक्ति पूरा इलाज भी नहीं करा पाता। इससे मृत्यु-दर में भी वृद्धि होती है। इस प्रकार गरीबी कुपोषण के लिए भी उत्तरदायी है। गरीबी के कारण उचित शिक्षा–दीक्षा न होने पर बौद्धिक विकास भी प्रभावित होता है, जिससे हीनता की भावना पैदा होती है। |
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“निर्धनता सभी बुराइयों की जड़ है।” इस कथन को स्पष्ट कीजिए। यानिर्धनता के सामाजिक दुष्परिणामों की विवेचना कीजिए। |
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Answer» निर्धनता एक सामाजिक-आर्थिक समस्या है और निर्धनता के दुष्परिणामों के फलस्वरूप समाज में विभिन्न बुराइयाँ जन्म लेती हैं। इन बुराइयों का विवरण निम्नवत् है 1. अपराधों में वृद्धि – निर्धनता से समाज में तरह-तरह के अपराधों में वृद्धि हुई है। साधारणतया कोई व्यक्ति जब ईमानदारी से पर्याप्त साधन प्राप्त नहीं कर पाता तो वह चोरी, डकैती तथा हत्या आदि के द्वारा अपनी आवश्यकताओं को पूरा करने का प्रयत्न करता है। अपने बच्चों व आश्रितों को भूखे देखकर अच्छे-से-अच्छा व्यक्ति इन समाज-विरोधी कार्यों की ओर प्रवृत्त हो सकता है। निर्धनता मानसिक तनावों को बढ़ाकर भी व्यक्ति में अपराध की भावना पैदा करती है। 2. बाल-अपराधों में वृद्धि – निर्धन परिवारों में माता-पिता अपने बच्चों की प्रमुख आवश्यकताओं को पूरा नहीं कर पाते। साधारणतया ऐसे बच्चे शिक्षा और स्वस्थ मनोरंजन से वंचित रह जाते हैं। अक्सर निर्धन परिवारों में बच्चों से कम आयु में ही नौकरी करवायी जाने लगती हैं। इसके फलस्वरूप बच्चे आरम्भ से ही अनुशासनहीन हो जाते हैं, उनकी संगति बिगड़ जाती है और इस प्रकार उन्हें अपराधी कार्य करने का प्रोत्साहन मिलता है। एक बार अपराधियों के गिरोह में फँस जाने के बाद ऐसे बच्चे कठिनता से उस वातावरण से बाहर निकल पाते हैं। 3. दुर्व्यसनों में वृद्धि – निर्धनता की समस्या ने व्यक्ति में अनेक प्रकार के दुर्व्यसन उत्पन्न किये हैं। निर्धनता के कारण व्यक्ति जब अनेक प्रकार के तनावों और चिन्ताओं में फंस जाता है तो वह अक्सर मद्यपान करने लगता है। बहुत-से व्यक्ति जुआ खेलना प्रारम्भ कर देते हैं अथवा सट्टा लगाने लगते हैं, जिससे वे जल्दी ही अधिक धन प्राप्त कर सकें, यद्यपि ऐसे लोभ से उनकी स्थिति पहले से भी अधिक दयनीय हो जाती है। निर्धनता से उत्पन्न तनाव वेश्यावृत्ति को भी प्रोत्साहन देते हैं, क्योंकि इन तनावों के कारण व्यक्ति उचित और अनुचित को ध्यान ही नहीं रख पाता।। 4. परिवार का विघटन – निर्धनता का एक बड़ा दुष्परिणाम परिवारों का विघटन होना है। निर्धनता की स्थिति में परिवार के सभी सदस्य एक-दूसरे पर अविश्वास करने लगते हैं। घर में कलह का वातावरण बना रहता है और कभी-कभी परिवार अनैतिकता का भी केन्द्र बन जाता है। ऐसी स्थिति में सदस्यों में पारस्परिक प्रेम समाप्त हो जाता है और सभी लोग अपने-अपने स्वार्थों को पूरा करने में लग जाते हैं। परिवार में निर्धनता के कारण पति-पत्नी के बीच विवाह-विच्छेद हो जाने की सम्भावना भी बढ़ जाती है। 5. चरित्र का पतन – निर्धनता चरित्र को गिराने वाला सबसे प्रमुख कारण है। निर्धनता के कारण जब परिवार की आवश्यकताएँ पूरी नहीं हो पातीं, तो साधारणतया स्त्रियों को भी जीविका की खोज में घर से बाहर निकलना पड़ता है। बहुत-से व्यक्ति उनकी असमर्थता का लाभ उठाकर अथवा उन्हें तरह-तरह के प्रलोभन देकर अनैतिक कार्यों में लगा देते हैं। इस प्रकार समाज में अप्रत्यक्ष रूप से वेश्यावृत्ति को प्रोत्साहन मिलता है। वेश्यावृत्ति में लगी अधिकांश स्त्रियाँ भी आर्थिक कठिनाइयों के कारण ही यह व्यवसाय आरम्भ करती हैं। 6. भिक्षावृत्ति को प्रोत्साहन – भिक्षावृत्ति निर्धनता का एक गम्भीर दुष्परिणाम है। कोई व्यक्ति जब किसी भी साधन से जीविका उपार्जित करने में असफल हो जाता है तो उसके सामने भीख माँगने के अतिरिक्त कोई दूसरा मार्ग नहीं रह जाता। अक्सर ऐसे परिवारों में बच्चों को भीख माँगने के लिए बाध्य किया जाता है। एक बार जो व्यक्ति भीख माँगने लगता है, वह भविष्य में भी कोई दूसरा कार्य करने योग्य नहीं रह जाता। इस प्रकार उसका सम्पूर्ण व्यक्तित्व ही विघटित हो जाता है। 7. निर्धनता की संस्कृति का विकास – आधुनिक समाजशास्त्रियों का मानना है कि निर्धनता का सबसे बड़ा दुष्परिणाम समाज में निर्धनता की संस्कृति (Culture of poverty) का विकसित हो जाना है। यह एक विशेष संस्कृति है, जिसमें व्यक्ति अपने आपको अभाव की दशा में रहने के अनुकूल बना लेता है। ऑस्कर लेविस (Oscar Lewis) ने मैक्सिको के अध्ययन के आधार पर निष्कर्ष दिया कि निर्धनता की संस्कृति में व्यक्ति केवल वर्तमान के बारे में ही सोचने लगता है, वह भाग्यवादी हो जाता है, उसमें हीनता की भावना प्रबल बन जाती है तथा बच्चों को भी इन दशाओं में रहने का प्रशिक्षण दिया जाने लगता है। सामाजिक और राजनीतिक गतिविधियों में इस संस्कृति के लोगों का कोई सहभाग नहीं होता। फलस्वरूप निर्धनता की समस्या एक स्थायी रूप ले लेती है। 8. आन्दोलन और वर्ग-संघर्ष – निर्धनता का एक बड़ा दुष्परिणाम समाज में बढ़ते हुए आन्दोलन और वर्ग-संघर्ष हैं। निर्धनता के कारण अधिकांश आन्दोलन किसानों, मजदूरों और जनजातियों द्वारा ही चलाये जाते हैं। भारत में नक्सलवादी आन्दोलन वर्ग-संघर्ष का परिणाम है, जिसने आज हिंसक रूप ले लिया है। |
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निर्धनता की परिभाषा दीजिए। भारत में निर्धनता के कारणों का वर्णन कीजिए। याग्रामीण गरीबी से क्या आशय है? भारतीय संदर्भ में गरीबी के परिणामों की व्याख्या कीजिए।यानिर्धनता की परिभाषा दीजिए। भारत में निर्धनता के दुष्परिणामों का वर्णन कीजिए। या निर्धनता क्या है ? भारत में इसकी वृद्धि के कारणों पर प्रकाश डालिए। यानिर्धनता के दो सामाजिक कारण बताइए। याभारत में निर्धनता के कारणों का वर्णन कीजिए। याबेरोजगारी निर्धनता का आधारभूत कारण है।” इस कथन की व्याख्या कीजिए। |
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Answer» निर्धनता अथवा गरीबी एक सामाजिक समस्या है, जो आज भारत तथा अन्य विकासशील देशों में ही चिन्ता का विषय नहीं है, अपितु विकसित देशों में भी यह एक समस्या के रूप में विद्यमाने है। निर्धनता का सम्बन्ध निम्न जीवन-स्तर से है तथा जिसके पास अपनी मूल आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए भी धन नहीं है, उसे निर्धन कहा जा सकता है। गिलिन तथा गिलिन के अनुसार, “निर्धनता वह दशा है जिसमें एक व्यक्ति अपर्याप्त आय या विचारहीन व्यय के कारण अपने जीवन-स्तर को इतना ऊँचा नहीं रख पाता, जिससे उसकी शारीरिक व मानसिक कुशलता बनी रहे और वह तथा उसके आश्रित समाज के स्तर के अनुसार जीवन व्यतीत कर सकें। | गोडार्ड के अनुसार, “निर्धनता उन वस्तुओं का अभाव या अपर्याप्त पूर्ति है जो एक व्यक्ति तथा उसके आश्रितों के स्वास्थ्य और कुशलता को बनाये रखने के लिए आवश्यक है।” अतः निर्धनता वह स्थिति है जिसमें व्यक्ति अपनी तथा अपने आश्रितों की आवश्यकताओं की पूर्ति, स्वास्थ्य तथा शारीरिक व मानसिक क्षमता को बनाये रखने में धनाभाव के कारण असमर्थ है। निर्धनता के दो प्रकार हैं – प्राथमिक निर्धनता तथा द्वितीयक निर्धनता। प्राथमिक निर्धनता में धनाभाव के कारण व्यक्ति अपना तथा अपने आश्रितों का जीवन-स्तर बनाये नहीं रख पाता, जब कि द्वितीयक निर्धनता में व्यक्ति अपव्यय के कारण अपना जीवन-स्तर बनाये नहीं रख पाता है। (अ) सामाजिक कारण (वैयक्तिक कारण) ऐसा कहा जाता है कि निर्धनता का कारण स्वयं भारतीय समाज में विद्यमान है। निर्धनता को निम्नलिखित सामाजिक कारण प्रोत्साहन देते हैं ⦁ जाति-प्रथा – जाति – प्रथा भारतीय समाज में निर्धनता का प्रमुख कारण रही है। निम्न जातियों में व्यक्तियों को योग्यतानुसार अपना व्यवसाय चुनने का अधिकार नहीं था। उच्च जाति वाले उनका सामाजिक व आर्थिक रूप से शोषण भी करते थे। अत: जाति-प्रथा प्रगति में सदैव एक बाधा रही है। ⦁ संयुक्त परिवार प्रणाली – संयुक्त परिवार प्रणाली के दोष भी पर्याप्त सीमा तक निर्धनता के लिए उत्तरदायी रहे हैं। बाल-विवाह, बच्चे पैदा करने की होड़, व्यावसायिक गतिशीलता का अभाव तथा आलसी सदस्यों की संख्या में वृद्धि जैसे दोष निर्धनता के कारण माने जा सकते हैं। ⦁ दोषपूर्ण शिक्षा – पहले तो अशिक्षा और अज्ञानता ही निर्धनता का कारण है। दूसरे, जो शिक्षा-पद्धति हमारे देश में प्रचलित है वह दोषपूर्ण है तथा व्यावसायिक प्रशिक्षण व स्व रोजगार हेतु सहायक नहीं है। ⦁ सामाजिक बुराइयाँ – सामाजिक बुराइयाँ भी निर्धनता की जड़ हैं। दहेज-प्रथा, जाति-प्रथा, बाल-विवाह, महिलाओं का अशिक्षित होना तथा घर से बाहर नौकरी न करना आदि निर्धनता को बनाये रखने वाली बुराइयाँ हैं। ⦁ अज्ञानता व अन्धविश्वास – निर्धनता का एक अन्य कारण अज्ञानता वे अन्धविश्वास है। व्यक्ति गरीबी को भगवान का दिया हुआ अभिशाप समझ लेता है और इसे दूर करने का प्रयास ही नहीं करता। धार्मिक कर्मकाण्डों में होने वाला अपव्यय भी व्यक्ति की आर्थिक स्थिति को निम्न बनाये रखता है। ⦁ अत्यधिक जनसंख्या – भारत में निर्धनता का एक अन्य कारण जनसंख्या में तीव्र गति से वृद्धि होना है। उत्पादन के अनुपात में जनसंख्या की वृद्धिदर कहीं अधिक है, जब कि रोजगार (ब) आर्थिक कारण निर्धनता के अनेक आर्थिक कारण भी हैं, जिनमें से प्रमुख निम्नलिखित हैं 1. कृषि पर अत्यधिक निर्भरता – भारतीय समाज कृषि-प्रधान समाज है। ग्रामीण जनता कृषि तथा इससे सम्बन्धित व्यवसायों पर ही आश्रित रही है। कृषि प्राकृतिक साधनों पर आधारित है। संयुक्त परिवार प्रणाली के कारण सभी सदस्य कृषि पर निर्भर रहते हैं तथा यदि सूखा पड़ जाता है, बाढ़ आ जाती है या कोई प्राकृतिक प्रकोप हो जाता है तो उत्पादन वैसे भी कम होता है। ऊपर से देखने पर तो वे कृषक हैं, परन्तु उत्पादन उनकी आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए पर्याप्त नहीं है। 2. अपर्याप्त उत्पादन – कृषि के पिछड़ेपन के कारण तथा प्रकृति पर निर्भरता के कारण उत्पादन कम होता है। भारत में दो-तिहाई जनसंख्या कृषि करती है, फिर भी अनाज की कमी 3. उद्योगों को असन्तुलित विकास – निर्धनता का एक अन्य कारण उद्योगों का असन्तुलित विकास है। एक तो उद्योगों पर केवल 10-15 प्रतिशत जनसंख्या ही निर्भर है और दूसरे उद्योगों का संकेन्द्रण कुछ बड़े-बड़े नगरों में ही होता जा रहा है। यह असन्तुलित विकास ग्रामीणों को रोजगार देने में सहायक नहीं है। 4. धन का कुछ ही हाथों में संचय – निर्धनता का एक कारण धन का दोषपूर्ण संचय भी है। भारत में अमीर तो और अमीर होते जा रहे हैं, जब कि गरीब और अधिक गरीब। पिछले कुछ वर्षों में औद्योगिक घरानों की पूंजी में अत्यधिक वृद्धि हुई है। कुछ लोग धन होते हुए भी जेवरों इत्यादि की खरीद में इसे व्यय कर देते हैं, जिससे व्यापार या उद्योग में उस पैसे का उपयोग नहीं हो पाता। 5. प्राकृतिक प्रकोप – भारत में प्राकृतिक प्रकोप भी निर्धनता का कारण है। एक वर्ष सूखा पड़ता है तो दूसरे वर्ष बाढ़ जा जाती है। इससे निर्धनों का संचित धन इन प्रकोपों का सामना करने में ही व्यय हो जाता है। 6. प्राकृतिक साधनों का अपूर्ण दोहन – भारत में विशाल प्राकृतिक सम्पदा है, परन्तु उसका पूरी तरह से दोहन न हो पाने के कारण लाखों-करोड़ों लोग रोजगार से वंचित रह जाते हैं। इससे भी निर्धनता बढ़ती है। 7. कालाबाजारी – भारत में निर्धनता का कारण कालाबाजारी भी है। इस कालाबाजारी के कारण निर्धनता को दूर करने के सरकारी उपाय सफल नहीं हो पाते हैं। निम्न वर्ग के लोगों पर (स) व्यक्तिगत कारण निर्धनता के कुछ व्यक्तिगत कारण भी हैं, जिनमें से प्रमुख निम्नलिखित हैं ⦁ आलस्य – जो व्यक्ति आलसी होते हैं तथा आलस्यपूर्ण जीवन व्यतीत करने के आदी हैं, वे प्रायः निर्धन ही होते हैं; क्योंकि ऐसे व्यक्ति कार्य करना ही नहीं चाहते। ⦁ मद्यपान – कुछ लोग मद्यपान में अपनी सारी आय खर्च कर देते हैं। उनकी तथा उनके आश्रितों की कोई मूल आवश्यकता पूरी हो या न हो, वे मद्यपान पर पैसा जरूर खर्च करते हैं। इससे व्यक्तिगत और पारिवारिक विघटन होने लगता है। अन्ततः मद्यपान भी निर्धनता का कारण बन जाता है। ⦁ बेरोजगारी – बेरोजगारी भी निर्धनती का व्यक्तिगत कारण है। व्यक्ति किसी काम को करने । के योग्य है, परन्तु उसे काम मिल ही नहीं पाता, जिससे वह निर्धन ही रहता है। ⦁ शारीरिक दोष व बीमारियाँ – शारीरिक व मानसिक दोष तथा बीमारी भी निर्धनता का कारण है। इन दोषों के कारण जीविकोपार्जन में बड़ी कठिनाई पैदा हो जाती है। अगर एक व्यक्ति परिवार में कमाने वाला हो और वह लम्बी अवधि के लिए बीमार हो जाता है तो भी निर्धनता का सामना करना पड़ता है। (द) प्राकृतिक व भौगोलिक कारण निर्धनता के लिए कुछ प्राकृतिक व भौगोलिक कारण भी उत्तरदायी हैं। इनमें से प्रमुख निम्नलिखित हैं ⦁ प्रतिकूल जलवायु – प्रतिकूल जलवायु भी निर्धनता का एक कारण है। जिन प्रदेशों में सदैव बर्फ पड़ी रहती है तथा रेगिस्तान या पहाड़ होते हैं, वहाँ पर निर्धनता अधिक पायी जाती है, क्योंकि वहाँ उत्पादन और रोजगार के अवसर कम होते हैं। ⦁ प्राकृतिक विपत्तियाँ – प्राकृतिक विपत्तियाँ; जैसे – भूकम्प, तूफान, बाढ़, सूखा, विस्फोट या महामारी इत्यादि; भी निर्धनता के कारण हो सकती हैं, क्योंकि ऐसे समय में बचाया हुआ पैसा तो खर्च हो जाता है और आगे कुछ धन इत्यादि मिलता ही नहीं है। ⦁ प्राकृतिक साधनों की कमी – प्रतिकूल जलवायु की तरह प्राकृतिक साधनों की कमी निर्धनता का एक कारण हो सकती है। जिन स्थानों पर प्राकृतिक साधनों की कमी होती है, वहाँ निर्धनता बहुत अधिक होती है, क्योंकि उत्पादन कम होता है। ⦁ निर्धनता अपराध को प्रोत्साहन देती है। निर्धन व्यक्ति अपनी तथा अपने आश्रितों की आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए गैर-कानूनी काम करने लगता है और इस प्रकार वह अपराध की ओर प्रवृत्त हो जाता है। ⦁ निर्धनता बाल-अपराध का भी कारण है। जिन परिवारों के बालक निर्धनता के कारण अपनी आवश्यकताएँ पूरी नहीं कर पाते, वह बाल-अपराध की ओर प्रवृत्त होने लगते हैं और बाल अपराधी बन जाते हैं। बचपन से अवैध ढंग से धन कमाने में लग जाने के कारण बाल अपराधों को बढ़ावा मिलता है। ⦁ निर्धनता अनेक दुर्व्यसनों की जननी है। मद्यपान, जुआ, सट्टा, वेश्यावृत्ति जैसे दुर्व्यसन भी निर्धनता के परिणाम हैं। ⦁ निर्धनता व्यक्ति को अथवा उसके आश्रितों को अनैतिक कार्य करने पर विवश कर देती है, जिससे व्यक्ति के चरित्र का पतन होता है। ⦁ निर्धनता भिक्षावृत्ति को प्रोत्साहन देती है, क्योंकि जब व्यक्ति अत्यन्त मजबूर हो जाता है तो वह भिक्षावृत्ति द्वारा अपना तथा अपने आश्रितों का पेट पालने लगता है। ⦁ निर्धनता से वैयक्तिक विघटन को प्रोत्साहन मिलता है तथा निराशा के कारण व्यक्ति मानसिक रोगी हो जाता है अथवा कई बार आत्महत्या तक कर लेता है। ⦁ निर्धनता के कारण पारिवारिक विघटन होते हैं, क्योंकि सदस्यों में अनैतिकता तथा अविश्वास की वृद्धि होती है तथा वातावरण कलहपूर्ण एवं दूषित बन जाता है। ⦁ वैयक्तिक तथा पारिवारिक विघटन का प्रभाव पूरे समुदाय पर पड़ता है और निर्धनता अन्ततः सामुदायिक विघटन को प्रोत्साहन देती है। समुदाय को बनाये रखने वाले आदर्श प्रभावहीन हो जाते हैं। ⦁ निर्धनता के कारण व्यक्ति में ग्लानि का बोध होता है। वह स्वयं को समाज पर भार मानकर आत्महत्या तक कर डालता है। ⦁ निर्धनता बेरोजगारी को जन्म देती है। साधनविहीन व्यक्ति आजीविका कमाने में असमर्थ रहकर बेरोजगार बना रहता है। ⦁ निर्धनता के कारण समाज में अनैतिकता और व्यभिचार का बोलबाला हो जाता है। अनेक महिलाएँ निर्धनता से तंग आकर अपने भरण-पोषण के लिए वेश्यावृत्ति तक करने पर विवश हो जाती हैं। ⦁ निर्धनता के कारण व्यक्ति को भरपेट भोजन ही नहीं मिल पाता। सन्तुलित भोजन के अभाव में उसे कुपोषण का शिकार होना पड़ता है तथा उसका शरीर अनेक रोगों का शिकार बन जाता है। |
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भारत में निर्धनता के जनसंख्यात्मक कारण के विषय में बताइए। |
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Answer» भारत में बढ़ती जनसंख्या ने गरीबी को जन्म दिया। सन् 1901 में देश की जनसंख्या 23.83 करोड़ थी, जो 2011 ई० में बढ़कर 1 अरब 21 करोड़ 2 लाख हो गयी है। तीव्र गति से बढ़ती जनसंख्या ने भी निर्धनता को बढ़ाने में योगदान दिया है। इसका कारण यह है कि देश में प्राप्त आय का पर्याप्त भाग उत्पादन कार्यों में लगने के स्थान पर लोगों के भरण-पोषण पर खर्च करना पड़ता है। जनसंख्या बढ़ने से प्रति वर्ष 20 लाख श्रमिकों की संख्या बढ़ जाती है, प्रति व्यक्ति आय घट जाती है, भूमि पर जनसंख्या का दबाव बढ़ जाता है और देश की आर्थिक विकास अवरुद्ध हो जाता है। वास्तव में, अति जनसंख्या ही भारत में निर्धनता का प्रमुख कारण है। |
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भारत में निर्धनता के चार कारण बताइए। |
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Answer» भारत में निर्धनता के चार कारण निम्नलिखित हैं 1. कृषि पर अत्यधिक निर्भरता – भारतीय समाज कृषि-प्रधान समाज है। ग्रामीण जनता कृषि तथा इससे सम्बन्धित व्यवसायों पर ही आश्रित रही है। कृषि प्राकृतिक साधनों पर आधारित है। संयुक्त परिवार प्रणाली के कारण सभी सदस्य कृषि पर निर्भर रहते हैं तथा यदि सूखा पड़ जाता है, बाढ़ आ जाती है या कोई प्राकृतिक प्रकोप हो जाता है तो उत्पादन वैसे भी कम होता है ऊपर से देखने पर वे कृषक हैं, परन्तु उत्पादन उनकी आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए पर्याप्त नहीं है। 2. संयुक्त परिवार प्रणाली – संयुक्त परिवार प्रणाली के दोष भी पर्याप्त सीमा तक निर्धनता के लिए उत्तरदायी रहे हैं। बाल-विवाह, बच्चे पैदा करने की होड़, व्यावसायिक गतिशीलता का अभाव तथा आलसी सदस्यों की संख्या में वृद्धि जैसे दोष निर्धनता के कारण माने जा सकते हैं। 3. उद्योगों का असन्तुलित विकास – निर्धनता का एक अन्य कारण उद्योगों का असन्तुलित विकास है। एक तो उद्योगों पर केवल 10-15 प्रतिशत जनसंख्या ही निर्भर है और दूसरे उद्योगों का संकेन्द्रण कुछ बड़े-बड़े नगरों में ही होता जा रहा है। यह असन्तुलित विकास ग्रामीणों को रोजगार देने में सहायक नहीं है। 4. प्राकृतिक साधनों की कमी – भारत में प्राकृतिक साधनों की कमी निर्धनता का एक बड़ा कारण है। जिन स्थानों पर प्राकृतिक साधनों की कमी होती है, वहाँ उत्पादन कम होने के कारण निर्धनता अधिक होती है। |
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भारत में निर्धनता उन्मूलन के उपाय सुझाइए। याभारत में निर्धनता उन्मूलन के लिए किये गये उपायों का आलोचनात्मक मूल्यांकन कीजिए। |
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Answer» निर्धनता एक सामाजिक और आर्थिक समस्या है। यह व्यक्ति और राष्ट्र दोनों के लिए घातक है। अतः इस समस्या का निश्चित समाधान खोजना आवश्यक है। निर्धनता के उन्मूलन के लिए अग्रलिखित सुझाव दिये जा सकते हैं ⦁ निर्धनता का मूल कारण बेरोजगारी है; अतः सरकार को बेरोजगारी दूर करने के लिए प्रयास करना चाहिए तथा बेरोजगारी भत्ता दिया जाना चाहिए जिससे ऐसे संकट के दिनों में भी व्यक्तियों की न्यूनतम आवश्यकताएँ पूरी हो सकें। भारत में निर्धनता की समस्या विकट है। राष्ट्र के आर्थिक विकास और सामाजिक कल्याण के लिए इस समस्या का निश्चित समाधान खोजा जाना आवश्यक है। |
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गरीबी (निर्धनता) दूर करने के दो उपाय लिखिए। |
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Answer» 1. शिक्षा – प्रणाली को अधिक उपयुक्त बनाया जाए – सर्वप्रथम देश से अशिक्षा को दूर करने का प्रयत्न करना होगा। साथ ही प्रचलित शिक्षा-प्रणाली में इस प्रकार का सुधार करना होगा, जिससे कि विद्यार्थी व्यावहारिक जगत में उपयोगी हो सके। 2. कृषि में सुधार किये जाएँ – भारत एक कृषिप्रधान देश है। इस कारण इस देश से गरीबी को दूर करने के लिए कृषि-व्यवस्था में सुधार किये जाने चाहिए। इसके लिए भूमि की दशा में सुधार करना, सिंचाई की सुविधाएँ उपलब्ध कराना, कृषि औजारों को जुटाना, उत्तम बीज व खाद का प्रबन्ध करना, चकबन्दी, सहकारिता आदि को प्रोत्साहन देना आदि आवश्यक उपाय हैं। |
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साधनों का उचित वितरण निर्धनता को कैसे समाप्त कर सकता है ? बताइए। |
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Answer» केवल उत्पादन बढ़ाने से ही निर्धनता की समस्या का समाधान नहीं होगा, जब तक कि उत्पादन के साधनों और लाभों का समाज के सभी लोगों में उचित वितरण न किया जाए। वर्तमान व्यवस्था में मुनाफा और उत्पादन के साधन कुछ ही लोगों के हाथ में केन्द्रित हैं। ऐसी व्यवस्था उत्पन्न की जाए जिससे पूँजी एवं सम्पत्ति का समान रूप से वितरण हो तथा किसानों को सस्ते दामों पर वस्तुएँ उपलब्ध करायी जाएँ। सरकार व्यक्ति की कम-से-कम आय निर्धारित करे और जिनकी आय इस स्तर से कम हो, उन्हें सहायता प्रदान करे। |
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निर्धनता के निर्धारण में सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण तथ्य क्या है ? |
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Answer» निर्धनता के निर्धारण में सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण तथ्य आय है। |
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गरीबी के चार मुख्य कारण लिखिए। यानिर्धनता के दो सामाजिक कारण बताइए। |
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Answer» आर्थिक कारण निर्धनता के आर्थिक कारण निम्नलिखित हैं ⦁ उद्योग-धन्धों की कमी एवं अपर्याप्त उत्पादन के कारण निर्धनता व्याप्त है। निर्धनता के सामाजिक कारण निम्नलिखित हैं। ⦁ अशिक्षा के कारण व्यक्ति कार्यकुशलता का विकास नहीं कर पाता है। |
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निर्धनता का उन्मूलन करने के लिए 20-सूत्री कार्यक्रम की घोषणा किसके द्वारा की गयी थी ? |
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Answer» निर्धनता का उन्मूलन करने के लिए 20-सूत्री कार्यक्रम की घोषणा श्रीमती इन्दिरा गांधी द्वारा की गयी थी। |
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विश्व विकास रिपोर्ट 2002 के अनुसार भारत में प्रति व्यक्ति आय क्या है ? जापान में प्रति व्यक्ति आय क्या है ? |
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Answer» विश्व विकास रिपोर्ट 2002 के अनुसार भारत में प्रति व्यक्ति आय 460 अमेरिकी डॉलर है। जापान में प्रति व्यक्ति आय 2,350 अमेरिकी डॉलर है। |
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अन्त्योदय योजना का प्रारम्भ कब और कौन-सी राज्य सरकार द्वारा किया गया ? |
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Answer» अन्त्योदय योजना का प्रारम्भ 2 अक्टूबर, 1978 में राजस्थान सरकार द्वारा किया गया। |
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“बेरोजगारी एक समस्या है।” विवेचना कीजिए।याभारत के विशेष सन्दर्भ में ‘बेकारी के प्रकारों की विवेचना कीजिए।याबेरोजगारी किसे कहते हैं ? भारत में बेरोजगारी के कारण एवं निवारण के उपाय बताइए।याबेरोजगारी से आप क्या समझते हैं? बेरोजगारी समाप्त करने के सुझाव दीजिए।याभारत में बेरोजगारी दूर करने के उपाय बताइए। [2009, 10, 16]याभारत में बेकारी के कारणों का विश्लेषण कीजिए और इसके उन्मूलन के सुझाव दीजिए।याबेरोजगारी भारतीय निर्धनता को आधारभूत कारण है।” इस कथन की व्याख्या कीजिए। |
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Answer» बेरोजगारी का अर्थ तथा परिभाषाएँ प्रायः जब किसी व्यक्ति को अपने जीवन-निर्वाह के लिए कोई कार्य नहीं मिलता तो उस व्यक्ति को बेरोजगार और इस समस्या को बेरोजगारी की समस्या कहते हैं। अन्य शब्दों में, जब कोई व्यक्ति कार्य करने का इच्छुक हो और वह शारीरिक व मानसिक रूप से कार्य करने में समर्थ भी हो, लेकिन उसको कोई कार्य नहीं मिलता जिससे कि वह अपनी जीविका कमा सके, तो इस प्रकार के व्यक्ति को बेरोजगार कहा जाता है। जब समाज में इस प्रकार के बेरोजगार व्यक्तियों की पर्याप्त संख्या हो जाती है, तब उत्पन्न होने वाली आर्थिक स्थिति को बेरोजगारी की समस्या कहा जाता है। गिलिन तथा गिलिन के अनुसार, “बेकारी वह दशा है जिसमें एक समर्थ एवं कार्य की इच्छा रखने वाला व्यक्ति, जो साधारणतया स्वयं के लिए एवं अपने परिवार की आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए अपनी कमाई पर आश्रित रहता है, लाभप्रद रोजगार पाने में असमर्थ रहता है।” बेकारी के प्रकार बेकारी अनेक प्रकार की है। इसके कुछ प्रकार निम्नलिखित हैं ⦁ छिपी बेकारी – जो बेकारी प्रत्यक्ष रूप से दिखाई नहीं देती उसे छिपी बेकारी कहते हैं। इसका कारण किसी कार्य में आवश्यकता से अधिक लोगों का लगे होना है। यदि उनमें से कुछ व्यक्तियों को हटा लिया जाए, तो भी उस कार्य या उत्पादन में कोई अन्तर नहीं आएगा। ऐसी बेकारी छिपी बेकारी कहलाती है। भारत में बेरोजगारी के कारण भारत में बेरोजगारी के प्रमुख कारण निम्नलिखित हैं 1. तीव्र गति से बढ़ती जनसंख्या – भारत में जनसंख्या 25 प्रतिशत प्रतिवर्ष की दर से बढ़ रही है, जब कि रोजगार के अवसरों में इस दर से वृद्धि नहीं हो रही है। जनसंख्यावृद्धि दर के अनुसार भारत में प्रति वर्ष लगभग 50 लाख व्यक्तियों को रोजगार के अवसर सुलभ होने चाहिए। जनसंख्या की स्थिति विस्फोटक होने के कारण हमारे देश में बेरोजगारी विद्यमान है। 2. दोषपूर्ण शिक्षा-प्रणाली – हमारे देश की शिक्षा-पद्धति दोषपूर्ण है। यह शिक्षा रोजगारमूलक नहीं है, जिससे शिक्षित बेरोजगारी बढ़ती जा रही है। प्रतिवर्ष लगभग 10 लाख शिक्षित व्यक्ति बेरोजगारों की पंक्ति में सम्मिलित हो जाते हैं। 3. लघु एवं कुटीर उद्योगों का पतन – मशीनों का प्रयोग बढ़ने तथा देश में औद्योगीकरण के कारण हस्तकला तथा लघु एवं कुटीर उद्योगों का विकास मन्द हो गया है या प्रायः पतन हो गया है, जिससे बेरोजगारी में वृद्धि होती जा रही है। 4. त्रुटिपूर्ण नियोजन – यद्यपि भारत में सन् 1951 से आर्थिक नियोजन के द्वारा देश का आर्थिक विकास किया जा रहा है, परन्तु पाँचवीं पंचवर्षीय योजना तक नियोजन में रोजगारमूलक नीति नहीं अपनायी गयी, जिसके कारण बेरोजगारों की संख्या बढ़ती गयी। आठवीं पंचवर्षीय योजना में सरकार का ध्यान इस समस्या की ओर गया। अतः त्रुटिपूर्ण नियोजन भी बेरोजगारी के लिए उत्तरदायी है।। 5. पूँजी-निर्माण एवं निवेश की धीमी गति – हमारे देश में पूँजी-निर्माण की गति धीमी है। पूँजी निर्माण की धीमी गति के कारण पूँजी-निवेश भी कम ही हो पाया है, जिसके कारण उद्योग-धन्धों का विस्तार वांछित गति से नहीं हो पा रहा है। भारत में बचत एवं पूँजी निवेश में कमी के कारण बेरोजगारी की समस्या उत्पन्न हुई है। 6. आधुनिक यन्त्रों एवं मशीनों का प्रयोग – स्वचालित मशीनों एवं कम्प्यूटरों के प्रयोग से श्रमिकों की माँग कम होती जा रही है। उद्योग व कृषि के क्षेत्र में भी यन्त्रीकरण बढ़ रहा है। औद्योगीकरण के साथ-साथ यन्त्रीकरण एवं अभिनवीकरण में भी वृद्धि हो रही है, जिसके कारण बेरोजगारी में वृद्धि हो रही है। 7. व्यक्तियों में उचित दृष्टिकोण का अभाव – हमारे देश में शिक्षित एवं अशिक्षित सभी नवयुवकों का उद्देश्य नौकरी प्राप्त करना है। श्रम के प्रति निष्ठावान न होने के कारण वे स्वतः उत्पादन प्रक्रिया में भागीदार नहीं होना चाहते हैं। वे कोई व्यवसाय नहीं करना चाहते हैं। इस कारण भी बेरोजगारी बढ़ती जा रही है। 8. शरणार्थियों का आगमन – भारत में बेरोजगारी में वृद्धि का एक कारण शरणार्थियों का आगमन भी है। देश-विभाजन के समय, बाँग्लादेश युद्ध के समय तथा श्रीलंका समस्या उत्पन्न होने से भारी संख्या में शरणार्थी भारत में आये हैं, साथ ही गत वर्षों में भारत के मूल निवासियों को कुछ देशों द्वारा निकाला जा रहा है। इन देशों में ब्रिटेन, युगाण्डा, कीनिया आदि प्रमुख हैं। वहाँ से भारतीय मूल के निवासी भारत आ रहे हैं, जिसके कारण बेरोजगारों की संख्या में वृद्धि होती जा रही है। 9. कृषि की अनिश्चितता – भारत एक कृषि-प्रधान देश है। अधिकांश व्यक्ति कृषि पर ही निर्भर हैं। भारतीय कृषि प्रकृति पर निर्भर है। प्रतिवर्ष कभी सूखा और कभी बाढ़, कभी अतिवृष्टि और कभी अनावृष्टि व अन्य प्राकृतिक प्रकोप आते रहते हैं, जिसके कारण लाखों श्रमिक बेरोजगार हो जाते हैं। कृषि की अनिश्चितता के कारण रोजगार में भी अनिश्चितता बनी रहती है। इस कारण बेरोजगारी बढ़ जाती है। 10. एक व्यक्ति द्वारा अनेक व्यवसाय – भारतीय श्रमिक कृषि-कार्य के साथ-साथ अन्य व्यवसाय भी करते हैं। इस कारण भी बेरोजगारी में वृद्धि होती है। 11. आर्थिक विकास की धीमी गति – भारत में बेरोजगारी में वृद्धि का एक कारण आर्थिक विकास की धीमी गति रही है। अभी भी देश के प्राकृतिक संसाधनों का पूर्ण दोहन नहीं हो पाया है। इस कारण रोजगार के साधनों का वांछित विकास नहीं हो पाया है। 1. जनसंख्या-वृद्धि पर नियन्त्रण – भारत में बेरोजगारी को कम करने के लिए सबसे पहले देश की जनसंख्या को नियन्त्रित करना होगा। परिवार नियोजन का राष्ट्रीय स्तर पर प्रचार, सन्तति निरोध की सरल, सुरक्षित तथा व्यावहारिक विधियाँ इस दिशा में महत्त्वपूर्ण कदम सिद्ध होंगी। 2. आर्थिक विकास को तीव्र गति प्रदान करना – देश का आर्थिक विकास तीव्र गति से करना चाहिए। प्राकृतिक संसाधनों का पूर्ण दोहन करके रोजगार के अवसरों में वृद्धि की जा सकती है। 3. शिक्षा – प्रणाली में परिवर्तन – शिक्षा में आमूलचूल परिवर्तन की आवश्यकता है। आज की शिक्षा व्यवसाय मूलक होनी चाहिए। शिक्षा को रोजगार से सम्बद्ध कर देने से बेरोजगारी की समस्या कुछ सीमा तक स्वतः ही हल हो जाएगी। देश की नयी शिक्षा-नीति में इस ओर विशेष ध्यान दिया गया है। 4. लघु एवं कुटीर उद्योग-धन्धों का विकास – आज की परिस्थितियों में यह आवश्यक हो गया है कि देश में योजनाबद्ध आधार पर लघु एवं कुटीर उद्योगों का विकास किया जाए, क्योंकि भारत एक कृषि प्रधान देश है। अत: कृषि से सम्बन्धित उद्योगों के विकास की अधिक आवश्यकता है। इसके द्वारा प्रच्छन्न बेरोजगारी तथा मौसमी बेरोजगारी दूर करने में सहायता मिलेगी। 5. बचतों में वृद्धि की जाए – देश के आर्थिक विकास के लिए पूँजी की आवश्यकता होती है। पूँजी-निर्माण बचतों पर निर्भर रहता है। अत: बचतों में वृद्धि करने के लिए हर सम्भव प्रयत्न किये जाने चाहिए। 6. उद्योग-धन्धों का विकास- भारत में पूँजीगत, आधारभूत एवं उपभोग सम्बन्धी उद्योगों का विस्तार एवं विकास किया जाना चाहिए। भारत में श्रमप्रधान उद्योगों का अभाव है, कार्यरत उद्योगों की स्थिति भी अच्छी नहीं है। अत: रोगग्रस्त उद्योगों का उपचार आवश्यक है। मध्यम व छोटे पैमाने के उद्योगों की ओर विशेष ध्यान दिया जाना चाहिए, क्योंकि अधिक बड़े उद्योगों की अपेक्षा मध्यम श्रेणी के उद्योगों में रोजगार के अवसर अधिक सुलभ हो सकते हैं। 7. विदेशी व्यापार में वृद्धि – भारत के निर्यात में वृद्धि करने की आवश्यकता है, क्योंकि वस्तुओं के अधिक निर्यात के द्वारा उत्पादन वृद्धि को प्रोत्साहन मिलेगी, जिससे बेरोजगारी की समस्या हल होगी। 8. मानव-शक्ति का नियोजन – हमारे देश में मानव-शक्ति का नियोजन अत्यन्त दोषपूर्ण है। अत: यह आवश्यक है कि वैज्ञानिक ढंग से मानव-शक्ति का नियोजन किया जाए, जिससे मॉग एवं पूर्ति के बीच समन्वय स्थापित किया जा सके। 9. प्रभावपूर्ण रोजगार – नीति – देश में बेरोजगारी की समस्या को हल करने के लिए प्रभावपूर्ण रोजगार-नीति अपनायी जानी चाहिए। स्वरोजगार कार्यक्रम का विकास एवं विस्तार किया जाना चाहिए। रोजगार कार्यालयों की कार्य-प्रणाली को प्रभावशाली बनाने की अधिक आवश्यकता है। भारत में आज भी बेरोजगारी से सम्बन्धित ठीक आँकड़े उपलब्ध नहीं हो पाते हैं, जिससे एक सबल और संगठित बेरोजगारी निवारण-नीति नहीं बन पाती है। अत: आवश्यकता यह है कि बेरोजगारी से सम्बन्धित सही आँकड़े एकत्रित किये जाएँ और उनके समाधान हेतु एक दीर्घकालीन योजना क्रियान्वित की जाए। 10. निर्माण-कार्यों का विस्तार – देश में निर्माण-कार्यो; जैसे – सड़कों, बाँधों, पुलों व भवन निर्माण आदि को प्रोत्साहन दिया जाना चाहिए, जिससे बेरोजगारों को रोजगार देकर बेरोजगारी को कम किया जा सके। निर्माण कार्यों के क्रियान्वयन से रोजगार के नये अवसर बढ़ेंगे तथा रोजगार के बढ़े हुए अवसर बेकारी उन्मूलन के कारगर उपाय सिद्ध होंगे। |
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महिला विकास निगम की स्थापना कब और किस उद्देश्य से की गयी थी ? |
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Answer» महिलाओं को उत्तम रोजगार सेवाएँ उपलब्ध कराने की दृष्टि से वर्ष 1986-87 में महिला विकास निगम की स्थापना की गयी थी। |
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“गरीबी हटाओ’ नारा सर्वप्रथम कौन-सी पंचवर्षीय योजना में दिया गया था?(क) दूसरी(ख) पाँचवीं(ग) सातवीं(घ) नवीं |
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Answer» सही जवाब है (ख) पाँचवीं |
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अनुसूचित जातियों की चार समस्याएँ बताइए। याअनुसूचित जातियों की दो समस्याएँ बताइए। |
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Answer» अनुसूचित जातियों की चार समस्याएँ निम्नवत् हैं ⦁ अस्पृश्यता की समस्या – अनुसूचित जातियों के सम्मुख सबसे बड़ी समस्या अस्पृश्यता कीरही है। उच्च जाति के कुछ व्यक्ति कुछ व्यवसायों; जैसे-चमड़े का काम, सफाई का काम, कपड़े धोने का काम आदि करने वालों को आज भी अपवित्र मानते हैं। ⦁ अशिक्षा की समस्या – अनुसूचित जाति के अधिकांश लोग अशिक्षित तथा अज्ञानी हैं। इस कारणे अनेक बुराइयों ने इन लोगों में घर कर लिया है। निर्धनता के कारण इनके बालक भी शिक्षा शुरू कर पाने में असमर्थ होते हैं। ⦁ रहन-सहन का नीचा स्तर – इनका जीवन स्तर निम्न होता है तथा वे आधा पेट खाकर तथा अर्द्धनग्न रहकर जीवन व्यतीत करते हैं। निर्धनता तथा बेरोजगारी इनके रहन-सहन के निम्न स्तर के लिए उत्तरदायी हैं। ⦁ आवास की समस्या – इनके आवास की दशा भी शोचनीय होती है। ये ऐसे स्थानों में रहते हैं जहाँ सफाई का नामोनिशान भी नहीं होता। बरसात में इनकी दशा दयनीय हो जाती है। ये लोग बहुधा झोंपड़ी या कच्चे मकानों में रहते हैं। |
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जनजातियों को ‘पिछड़े हिन्दू किसने कहा है ?(क) जी० एस० घुरिए(ख) एस० सी० दुबे(ग) एस० सी० राय(घ) जे० एच० हट्टन |
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Answer» (क) जी० एस० घुरिये |
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जनजातियों में जीवन-साथी चुनने के तरीके का उल्लेख कीजिए। |
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Answer» जनजातियों में ‘टोटम बहिर्विवाह’ का प्रचलन है जो कि बहिर्विवाह का ही एक रूप हैं। |
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जनजातियों की दो महत्त्वपूर्ण विशेषताएँ लिखिए। |
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Answer» जनजातियों की दो प्रमुख विशेषताएँ निम्नलिखित हैं ⦁ अन्तर्विवाही – एक जनजाति के सदस्य केवल अपनी ही जनजाति में विवाह करते हैं, जनजाति के बाहर नहीं। ⦁ सामान्य संस्कृति – एक जनजाति में सभी सदस्यों की सामान्य संस्कृति होती है, जिससे उनके रीति-रिवाजों, खान-पान, प्रथाओं, नियमों, लोकाचारों, धर्म, कला, नृत्य, जादू, संगीत, भाषा, रहन-सहन, विश्वासों, विचारों, मूल्यों आदि में समानता पायी जाती है। |
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