This section includes 7 InterviewSolutions, each offering curated multiple-choice questions to sharpen your Current Affairs knowledge and support exam preparation. Choose a topic below to get started.
| 1. |
राजनीतिक स्वतन्त्रताओं के दो उदाहरण दीजिए। |
|
Answer» ⦁ मत देने का अधिकार तथा |
|
| 2. |
लॉस्की ने ‘समानता की क्या परिभाषा दी है? |
|
Answer» लॉस्की के अनुसार, समानता प्रत्येक व्यक्ति को अपनी शक्तियों का उपयोग करने हेतु यथाशक्ति समान अवसर प्रदान करने का प्रयत्न है। |
|
| 3. |
कानून के समक्ष समानता का क्या अर्थ है? |
|
Answer» जब सभी के लिए बिना किसी भेदभाव के एक-से कानून तथा एक-से न्यायालय होते हैं, तब नागरिकों को कानूनी समानता प्राप्त हो जाती है। |
|
| 4. |
समानता का वास्तविक अर्थ लिखिए। |
|
Answer» समानता प्रत्येक व्यक्ति को अपनी शक्तियों के उपयोग करने का यथाशक्ति समान अवसर प्रदान करने का प्रयत्न है। |
|
| 5. |
स्वतन्त्रता के दो भेद या प्रकार बताइए। |
|
Answer» ⦁ नागरिक स्वतन्त्रता तथा |
|
| 6. |
कर्तव्य का अर्थ बताइए तथा उसका वर्गीकरण कीजिए। यानागरिकों के कर्तव्यों का उल्लेख करते हुए स्पष्ट कीजिए कि लोकतन्त्र में किन कर्तव्यों पर अधिक बल देना चाहिए ? याएक आदर्श नागरिक के अधिकार तथा कर्तव्यों का विवेचन कीजिए।यानागरिकों के अधिकारों एवं कर्तव्य का संक्षेप में उल्लेख कीजिए। |
|
Answer» कर्तव्य – भारतीय प्राचीन विचारकों ने अधिकार की अपेक्षा कर्तव्यपालन पर अधिक जोर दिया है। कौटिल्य ने कर्तव्य को स्वधर्म कहा है। कर्त्तव्य अंग्रेजी भाषा के शब्द ‘ड्यूटी’ (Duty) का हिन्दी अनुवाद है। ‘ड्यूटी’ शब्द की उत्पत्ति ‘Due’ से हुई है, जिसका अर्थ ‘उचित होता है। अतः कर्त्तव्य से तात्पर्य ऐसे कार्य से है जिसे कोई व्यक्ति स्वाभाविक, नैतिक तथा कानूनी दृष्टि से करने हेतु बाध्य हो। लैड के शब्दों में, “करना चाहिए की भावना ही कर्तव्य है।” राष्ट्रपिता महात्मा गाँधी के शब्दों में, “कर्त्तव्य अधिकार का सच्चा स्रोत है। यदि हम अपने कर्तव्यों का पालन करते रहें तो अधिकार हमसे दूर न रहेंगे।” कर्तव्यों का वर्गीकरण अथवा प्रकार 2. कानूनी कर्तव्य अथवा राज्य के प्रति कर्तव्य – ये नागरिक के वे कर्तव्य होते हैं जिन्हें राज्य निर्धारित करता है। नागरिक को इनका पालन अनिवार्य रूप से करना होता है। इनके उल्लंघन करने पर राज्य द्वारा दण्ड दिया जाता है। नागरिक के प्रमुख कानूनी कर्तव्य निम्नलिखित हैं- |
|
| 7. |
अधिकार से क्या तात्पर्य है? लोकतन्त्र में उपलब्ध नागरिकों के अधिकारों का वर्णन कीजिए।याअधिकारों का वर्गीकरण कीजिए।याअधिकारों के विभिन्न प्रकार बताइए और सामाजिक तथा राजनीतिक अधिकारों में अन्तर स्पष्ट कीजिए। याकिन्हीं चार राजनीतिक अधिकारों का वर्णन कीजिए। |
|
Answer» प्रजातान्त्रिक राज्यों में अधिकार को मानव-जीवन का आधार माना जाता है, क्योंकि व्यक्ति के आर्थिक, सामाजिक तथा राजनीतिक और व्यक्तिगत जीवन का विकास अधिकारों पर ही निर्भर करता है। सामान्य शब्दों में हम कह सकते हैं कि “अधिकार समाज द्वारा स्वीकृत तथा राज्य द्वारा मान्यता प्राप्त व्यक्ति को दी जाने वाली वे सुविधाएँ हैं जो उसके व्यक्तित्व के विकास के लिए आवश्यक होती हैं। अधिकार की परिभाषा अधिकारों का वर्गीकरण 1. नैतिक अधिकार (क) सामाजिक अधिकार – सामाजिक अधिकार वे अधिकार हैं जो मानवीय आधार पर प्रायः राज्य के नागरिक तथा विदेशी सभी को प्राप्त होते हैं। प्रमुख सामाजिक अधिकार निम्नलिखित हैं- (ख) राजनीतिक अधिकार – राजनीतिक अधिकार नागरिक को देश के शासन में भाग लेने का अवसर प्रदान करते हैं। ये निम्नलिखित हैं- |
|
| 8. |
नागरिकों के कोई दो सामाजिक अधिकार लिखिए। |
|
Answer» ⦁ जीवन का अधिकार तथा |
|
| 9. |
भारतीय संविधान में नागरिकों को कितने मौलिक कर्तव्य निर्धारित किये गये हैं? (क) 10(ख) 11(ग) 9(घ) 15 |
|
Answer» सही विकल्प है (ख) 11 |
|
| 10. |
नागरिकों के दो राजनीतिक अधिकार लिखिए। |
|
Answer» राजनीतिक अधिकार नागरिकों के दो राजनीतिक अधिकार निम्नवत् हैं- ⦁ मतदान का अधिकार – किसी भी प्रजातान्त्रिक या लोकतान्त्रिक राष्ट्र में राज्य के सभी वयस्क (भारत में 18 वर्ष) नागरिकों को प्रतिनिधित्वमूलक संस्थाओं के लिए अपना मत देने का अधिकार होता है, जिसके माध्यम से जनता अपना प्रतिनिधि चुनती है। |
|
| 11. |
समानता के दो प्रकार या भेद बताइए। |
|
Answer» ⦁ आर्थिक समानता तथा |
|
| 12. |
अधिकार के किन्हीं दो सिद्धान्तों के नाम लिखिए। |
|
Answer» ⦁ प्राकृतिक सिद्धान्त तथा |
|
| 13. |
राज्य के प्रति नागरिक के दो कर्तव्य बताइए। |
|
Answer» ⦁ राज्य के कानूनों का पालन करना तथा |
|
| 14. |
मौलिक अधिकार से क्या आशय है? |
|
Answer» वे अधिकार जो मानव-जीवन के लिए मौलिक तथा अपरिहार्य होने के कारण संविधान द्वारा नागरिकों को प्रदान किये जाते हैं, मौलिक अधिकार कहे जाते हैं। इन अधिकारों का राज्यों के संविधान में वर्णन कर दिया जाता है। न्यायपालिका इन अधिकारों की रक्षा करती है। सर्वप्रथम मौलिक अधिकार अमेरिकी संविधान में सम्मिलित किये गये। भारतीय संविधान द्वारा भी मौलिक अधिकार प्रदान किये गये हैं। |
|
| 15. |
लॉक द्वारा बताये गये कोई दो प्राकृतिक अधिकार बताइए। |
|
Answer» ⦁ जीवन का अधिकार तथा |
|
| 16. |
कानूनी अधिकार से क्या अभिप्राय है? |
|
Answer» ये वे अधिकार हैं जिन्हें राज्य मान्यता प्रदान करता है तथा जिनकी रक्षा राज्य के कानूनों द्वारा होती है। कानूनी अधिकारों का उल्लंघन करने वाले को राज्य द्वारा दण्डित किया जाता है। लीकॉक के शब्दों में, “कानूनी अधिकार वे विशेषाधिकार हैं जो एक नागरिक को अन्य नागरिकों के विरुद्ध प्राप्त होते हैं तथा जो राज्य की सर्वोच्च शक्ति द्वारा प्रदान किये जाते हैं तथा रक्षित होते हैं।” |
|
| 17. |
विदेशियों को राज्य में प्राप्त होने वाले कोई दो अधिकार लिखिए। |
|
Answer» ⦁ जीवन-रक्षा का अधिकार तथा |
|
| 18. |
अधिकारों के आदर्शवादी सिद्धान्त के किन्हीं दो समर्थकों के नाम बताइए। |
|
Answer» ⦁ थॉमस हिल ग्रीन एवं |
|
| 19. |
दो मानव अधिकार बताइए। |
|
Answer» ⦁ जीवन का अधिकार तथा |
|
| 20. |
प्राकृतिक अधिकारों के सिद्धान्त का समर्थन किसने किया था? (क) हीगल ने(ख) बर्क ने।(ग) लॉक ने(घ) बेन्थम ने |
|
Answer» सही विकल्प है (ग) लॉक ने |
|
| 21. |
अधिकारों का कौन-सा सिद्धान्त सबसे अधिक मान्य है? |
|
Answer» अधिकारों का आदर्शवादी सिद्धान्त सबसे अधिक मान्य है। |
|
| 22. |
अधिकारों के वैधानिक सिद्धान्त पर टिप्पणी लिखिए। |
|
Answer» इस सिद्धान्त की मान्यता है कि अधिकार राज्य की इच्छा के परिणाम हैं और राज्य ही अधिकारों का स्रोत है। यह सिद्धान्त प्राकृतिक सिद्धान्त के एकदम विपरीत है। इस सिद्धान्त को मानने वालों में बेन्थम, हॉलैण्ड, ऑस्टिन आदि विद्वान् हैं। इन विद्वानों के अनुसार व्यक्ति राज्य के संरक्षण में रहकर भी अधिकारों का प्रयोग करता है और राज्य ही अधिकारों को मान्यता प्रदान करता है। इस सिद्धान्त में निम्नलिखित दोष पाये जाते हैं- |
|
| 23. |
“अधिकार सामाजिक जीवन की वे परिस्थितियाँ हैं जिनके अभाव में सामान्यतया कोई व्यक्ति अपने व्यक्तित्व का विकास नहीं कर पाता है।” यह कथन किस विचारक का है? (क) लॉस्की(ख) प्लेटो(ग) बेन्थम(घ) जे० एस० मिल |
|
Answer» सही विकल्प है (क) लॉस्की |
|
| 24. |
अधिकारों से सम्बन्धित विभिन्न सिद्धान्तों की विवेचना कीजिए। |
|
Answer» अधिकार सम्बन्धी विभिन्न सिद्धान्त आलोचना- इस सिद्धान्त में कतिपय दोष निम्नलिखित हैं- 2. अधिकारों का कानूनी या वैधानिक सिद्धान्त – इस सिद्धान्त के प्रवर्तक बेन्थम, हॉलैण्ड, आँ स्टिन आदि विचारक हैं। इस सिद्धान्त के अनुसार, अधिकार राज्य की इच्छा के परिणाम हैं और राज्य ही अधिकारों का जन्मदाता है। यह सिद्धान्त प्राकृतिक सिद्धान्त के विपरीत है। व्यक्ति राज्य के संरक्षण में रहकर ही अधिकारों का प्रयोग कर सकता है। राज्य ही कानून द्वारा ऐसी परिस्थितियों को उत्पन्न करता है, जहाँ व्यक्ति अपने अधिकारों का स्वतन्त्रतापूर्वक प्रयोग कर सके। राज्य ही अधिकारों को वैधता प्रदान करता है। यह सिद्धान्त इस मान्यता पर आधारित है कि अधिकारों का अस्तित्व केवल राज्य के अन्तर्गत ही सम्भव है। आलोचना- इस सिद्धान्त में कतिपय दोष निम्नलिखित हैं- 3. अधिकारों का ऐतिहासिक सिद्धान्त – इस सिद्धान्त के अनुसार अधिकारों की उत्पत्ति प्राचीन रीति-रिवाजों के परिणामस्वरूप होती है। जिन रीति-रिवाजों को समाज स्वीकृति दे देता है, वे अधिकार का रूप धारण कर लेते हैं। इस सिद्धान्त के समर्थकों के अनुसार, अधिकार परम्परागते हैं तथा सतत विकास के परिणाम हैं। इसके अतिरिक्त इनका आधार ऐतिहासिक है। इंग्लैण्ड के संवैधानिक इतिहास में परम्परागत अधिकारों को बहुत अधिक महत्त्व रहा है। आलोचना- इस सिद्धान्त के आलोचकों का मत है कि अधिकारों का आधार केवल रीतिरिवाज तथा परम्पराएँ नहीं हो सकतीं, क्योंकि कुछ परम्पराएँ तथा रीति-रिवाज समाज के कल्याण में बाधक होते हैं। अतः इस दृष्टि से यह सिद्धान्त तर्कसंगत नहीं है। 4. अधिकारों का समाज – कल्याण सम्बन्धी सिद्धान्त-जे०एस० मिल, जेरमी बेन्थम, पाउण्ड, लॉस्की आदि ने इस सिद्धान्त का समर्थन किया है। इस सिद्धान्त का प्रमुख लक्ष्य उपयोगिता या समाज-कल्याण है। प्रो० लॉस्की के अनुसार-“अधिकारों का औचित्य उनकी उपयोगिता के आधार पर ऑकना चाहिए। इस सिद्धान्त के अनुसार अधिकार वे साधन हैं, जिनसे समाज का कल्याण होता है। लॉस्की का मत है-“लोक-कल्याण के विरुद्ध मेरे अधिकार नहीं हो सकते क्योंकि ऐसा करना मुझे उस कल्याण के विरुद्ध अधिकार प्रदान करता है जिसमें मेरा कल्याण घनिष्ठ तथा अविच्छिन्न रूप से जुड़ा हुआ है।” आलोचना- यह सिद्धान्त तर्कसंगत और उपयोगी तो है, किन्तु इसका सबसे बड़ा दोष यह है कि यह सिद्धान्त समाज-कल्याण की ओट में राज्य को व्यक्तियों की स्वतन्त्रता का हनन करने का अवसर प्रदान करता है, लेकिन समीक्षात्मक दृष्टि से यह दोष महत्त्वहीन है। 5. अधिकारों का आदर्शवादी सिद्धान्त – इस सिद्धान्त की मान्यता है कि अधिकार वे बाह्य साधन तथा दशाएँ हैं, जो व्यक्ति के सर्वांगीण विकास के लिए आवश्यक होती हैं। इस सिद्धान्त का समर्थन थॉमस हिल ग्रीन, हीगल, बैडले, बोसांके आदि विचारकों ने किया है। आलोचना- इस सिद्धान्त के कतिपय दोष निम्नलिखित हैं- निष्कर्ष- अधिकारों के उपर्युक्त सिद्धान्तों के अध्ययन के पश्चात् हम इस निष्कर्ष पर पहुँचते हैं कि अधिकारों का आदर्शवादी सिद्धान्त ही सर्वोपयुक्त है क्योंकि यह इस अवधारणा पर आधारित है कि अधिकारों की उत्पत्ति व्यक्ति के व्यक्तित्व के सर्वांगीण विकास के लिए है। राज्य तथा समाज तो केवल व्यक्ति के अधिकारों की सुरक्षा तथा व्यवस्था करने के साधन मात्र हैं। व्यक्ति समाज के कल्याण में ही अपने अधिकारों का प्रयोग कर सकता है। |
|
| 25. |
“अधिकार वह माँग है जिसे समाज स्वीकार करता है और राज्य लागू करता है।” यह कथन निम्न में से किस विचारक का है? (क) टी०एच० ग्रीन(ख) अरस्तू(ग) बोसांके(घ) रूसो |
|
Answer» सही विकल्प है (ग) बोसांके |
|
| 26. |
‘अधिकार केवल समाज में ही सम्भव है, परन्तु असीमित नहीं।’ स्पष्ट कीजिए। |
|
Answer» अधिकार सिर्फ समाज में ही सम्भव–अधिकार की प्रथम विशेषता यह है कि इन्हें व्यक्ति सिर्फ समाज में ही प्राप्त कर सकता है। यदि समाज नहीं है तो व्यक्ति अधिकारों को प्राप्त नहीं कर सकता। एकाकी व्यक्ति को अधिकारों की आवश्यकता नहीं होती है। |
|
| 27. |
अधिकार के किन्हीं दो तत्त्वों का उल्लेख कीजिए। |
|
Answer» ⦁ सार्वभौमिकता तथा |
|
| 28. |
“यदि हम कर्तव्यपालन करें तो अधिकार स्वतः प्राप्त हो जाएँगे।” यह कथन किसका है? |
|
Answer» यह कथन गाँधी जी का है। |
|
| 29. |
मनु का राजत्व सिद्धान्त क्या था? उसके अनुसार राज्य के किन्हीं चार कार्यों की विवेचना कीजिए। यामनु और कौटिल्य की राज्य के प्रति क्या अवधारणा थी? तर्कसंगत विवेचना कीजिए। याराज्य के कार्यों के सम्बन्ध में मनु के दृष्टिकोण की विवेचना कीजिए। याराज्य के कार्यक्षेत्र से सम्बन्धित मनु के विचार लिखिए। मनु के अनुसार राजा निरंकुश क्यों नहीं हो सकता है? |
|
Answer» प्राचीन विचारकों- मनु, शुक्र, बृहस्पति और कौटिल्य आदि ने राज्य के कार्यों और राजा के कर्तव्यों पर विस्तार से विचार किया है। सामान्य रूप से उन्होंने प्राचीन भारत के राजनीतिक चिन्तन में राज्य को व्यापक कार्यक्षेत्र प्रदान किया है। मनु का राजत्व सिद्धान्त (क) मनु ने सदैव इस बात पर जोर दिया है कि राजा द्वारा कर्तव्यपालन किया जाना चाहिए और राजा का सर्वोच्च कर्तव्य है—प्रजा-पालन। मनु के शब्दों में, “राजा को अपनी प्रजा के प्रति पिता के समान व्यवहार करना चाहिए, क्योंकि प्रजा का पालन करना राजा का श्रेष्ठ धर्म है और प्रजा-पालन द्वारा शास्त्रोक्त फल को भोगने वाला राजा धर्म से युक्त होता है।” (ख) उसने राजा को निरंकुश शक्तियाँ प्रदान नहीं कीं, वरन् राजसत्ता को सीमित किया है। मनु के अनुसार, राजा को समझना चाहिए कि वह धर्म के नियमों के अधीन है। कोई भी राजा धर्म के विरुद्ध व्यवहार नहीं कर सकता, धर्म राजाओं और जनसाधारण पर एकसमान ही शासन करता है। इसके अतिरिक्त, राजा (राजनीतिक प्रभु) जनता के भी अधीन है। वह अपनी शक्तियों के प्रयोग करने में जनता की आज्ञा-पालन की क्षमता से सीमित होता है। सालेटोर के अनुसार, “मनु ने निस्सन्देह यह कहा है कि जनता राजा को गद्दी से उतार सकती है और उसे मार भी सकती है, यदि वह अपनी मूर्खता से प्रजा को सताता है।” राज्य के कार्यक्षेत्र के सम्बन्ध में मनु के चिन्तन की महत्त्वपूर्ण बात यह है कि उसने मानवमात्र के कर्तव्यों और स्वधर्म-पालन पर बल दिया है जिसे अपनाकर सम्पूर्ण मानव-जाति सुखपूर्वक अपना जीवन व्यतीत कर सकती है। मनु ने ऐसी कानूनी पद्धति तथा राजधर्म का वर्णन किया है। जिसमें सभी वर्गों के व्यक्तियों के कर्तव्यों की व्याख्या की गयी है। मनु के अनुसार राज्य के कार्य 5. स्थानीय स्वशासन संस्थाओं का प्रबन्ध करना – मनु राज्य द्वारा स्थानीय स्वशासन संस्थाओं का प्रबन्ध किये जाने का समर्थन करता है। उसने अपनी प्रशासनिक व्यवस्था के अन्तर्गत स्थानीय स्वशासन संस्थाओं को महत्त्वपूर्ण माना है और स्थानीय विषयों का भार इन संस्थाओं को ही सौंपने का निर्देश दिया है। कौटिल्य की राज्य के प्रति अवधारणा तथा राज्य सम्बन्धी सप्तांग सिद्धान्त |
|
| 30. |
निम्नलिखित में से कौन-सा नागरिक का कर्तव्य है?(क) कानून का पालन करना(ख) करों का भुगतान करना(ग) राज्य के प्रति भक्ति(घ) ये सभी |
|
Answer» सही विकल्प है (घ) ये सभी |
|
| 31. |
कर्तव्यों के दो प्रमुख भेद बताइए। |
|
Answer» कर्तव्यों के दो प्रमुख भेद हैं- ⦁ नैतिक कर्तव्य तथा |
|
| 32. |
मूल कर्तव्य की धारणा भारत के परिप्रेक्ष्य में किस देश की संवैधानिक व्यवस्था से प्रेरित है? |
|
Answer» मूल कर्त्तव्य की धारणा भारत के परिप्रेक्ष्य में रूस की संवैधानिक व्यवस्था से प्रेरित तथा गृहीत है। |
|
| 33. |
राज्य के आवश्यक एवं ऐच्छिक कार्यों का वर्णन कीजिए। |
|
Answer» राज्य के कार्य (अ) राज्य के आवश्यक अथवा अनिवार्य कार्य राज्य के आवश्यक कार्य निम्नलिखित हैं- (ब) राज्य के ऐच्छिक अथवा सामाजिक कार्य राज्य के कार्य-क्षेत्र सम्बन्धी सिद्धान्त |
|
| 34. |
सामाजिक समझौता सिद्धान्त के प्रणेता हैं-(क) हॉब्स(ख) लॉक(ग) रूसो(घ) ये सभी |
|
Answer» सही विकल्प है (घ) ये सभी |
|
| 35. |
नागरिक के कोई दो प्राकृतिक अधिकार बताइए। |
|
Answer» ⦁ जीवन का अधिकार तथा |
|
| 36. |
अधिकारों के दो प्रमुख प्रकार बताइए। |
|
Answer» ⦁ सामाजिक या नागरिक अधिकार तथा |
|
| 37. |
पैतृक सिद्धान्त के प्रमुख व्याख्याकार कौन हैं?(क) जे० जे० वेशोफैन(ख) सर हेनरीमैन(ग) स्मिथ(घ) रूसो |
|
Answer» सही विकल्प है (ख) सर हेनरीमैन |
|
| 38. |
किसके मतानुसार ईश्वर ने स्वयं राज्य की स्थापना की है?(क) यहूदियों के(ख) हिन्दुओं के(ग) मुस्लिमों के(घ) सिक्खों के |
|
Answer» सही विकल्प है (क) यहूदियों के |
|
| 39. |
प्राकृतिक अवस्था में मानव-जीवन था(क) एकाकी(ग) सम्पत्तिहीन(ख) बर्बर(घ) ये सभी |
|
Answer» सही विकल्प है (घ) ये सभी |
|
| 40. |
सामाजिक समझौता (सोशल कॉण्ट्रेक्ट) नामक पुस्तक का लेखक कौन था? |
|
Answer» सामाजिक समझौता (सोशल कॉण्ट्रेक्ट) नामक पुस्तक का लेखक रूसो था। |
|
| 41. |
राज्य की उत्पत्ति का सबसे मान्य सिद्धान्त कौन-सा है?(क) विकासवादी सिद्धान्त(ख) सामाजिक समझौता सिद्धान्त(ग) मातृक तथा पैतृक सिद्धान्त(घ) दैवी सिद्धान्त |
|
Answer» सही विकल्प है (क) विकासवादी सिद्धान्त |
|
| 42. |
प्लेटो के अनुसार एक आदर्श राज्य की जनसंख्या कितनी होनी चाहिए? |
|
Answer» प्लेटो के अनुसार एक आदर्श राज्य की जनसंख्या दस हजार (10000) होनी चाहिए। |
|
| 43. |
राज्य के विकास के तीन तत्त्वों के नाम लिखिए। |
|
Answer» ⦁ रक्त सम्बन्ध, |
|
| 44. |
समाज को सुचारु रूप से चलाने के लिए किसकी आवश्यकता होती है? |
|
Answer» समाज को सुचारु रूप से चलाने के लिए कुछ नियमों की आवश्यकता होती है। |
|
| 45. |
राज्य की उत्पत्ति के दैवी सिद्धान्त के अनुसार राज्य का निर्माण किसने किया है? |
|
Answer» राज्य की उत्पत्ति के दैवी सिद्धान्त के अनुसार राज्य का निर्माण ईश्वर ने किया है। |
|
| 46. |
राज्य की उत्पत्ति के मुख्य सिद्धान्तों के नाम लिखिए। |
|
Answer» ⦁ सामाजिक समझौता सिद्धान्त |
|
| 47. |
क्या राज्य एक दीर्घ विकास का परिणाम है? |
|
Answer» यह सही है कि राज्य एक दीर्घ विकास का परिणाम है। धीरे-धीरे उसका विकास हुआ है। अनेक तत्त्वों ने इसके विकास में सहयोग दिया है; जैसे–रक्त सम्बन्ध, धर्म, वर्ग-संघर्ष तथा युद्ध, राजनीतिक चेतना, आर्थिक आवश्यकताएँ आदि। मनुष्य का आदिम सामाजिक संगठन सरल ढंग का था। वातावरण के प्रभाव से बदली हुई परिस्थितियों के कारण वह जटिल हो गया। इसी से आगे चलकर राजनीतिक संगठन का उदय हुआ। इसी ने विकसित होकर आधुनिक राज्य का रूप धारण कर लिया। |
|
| 48. |
सामाजिक समझौते के सिद्धान्त का सार किन तीन तत्त्वों में निहित है? |
|
Answer» ⦁ प्राकृतिक अवस्था, |
|
| 49. |
राज्य की उत्पत्ति के दैवी सिद्धान्त की विवेचना संक्षेप में कीजिए। |
|
Answer» राज्य की उत्पत्ति का दैवी सिद्धान्त संक्षेप में इस सिद्धान्त के अनुसार राज्य ईश्वरीकृत है, धरती पर ईश्वर का अवतार है, राज्य के पास दैवीय अधिकार हैं, राजा की आज्ञा का पालन करना जनता को कर्तव्य है और उसकी आलोचना करना महापाप है। ऑक्सबर्ग के अनुसार इस सिद्धान्त का मुख्य आधार है–संसार में समस्त सत्ता, सरकार तथा व्यवस्था ईश्वर ने उत्पन्न की है और स्थापित भी की है। |
|
| 50. |
राज्य की उत्पत्ति के मातृक तथा पैतृक सिद्धान्त का परीक्षण कीजिए। |
|
Answer» राज्य की उत्पत्ति का मातृक तथा पैतृक सिद्धान्त ⦁ इन सिद्धान्तों के पीछे ऐतिहासिक प्रमाणों का अभाव है। |
|