This section includes 7 InterviewSolutions, each offering curated multiple-choice questions to sharpen your Current Affairs knowledge and support exam preparation. Choose a topic below to get started.
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कबीर ने ‘काल की पास’ बताया है(क) सांसारिक सुखों को .(ख) जप-तप-आराधना को(ग) राम के अतिरिक्त किसी अन्य के चिंतन को(घ) मृत्यु को |
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Answer» (ग) राम के अतिरिक्त किसी अन्य के चिंतन को |
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ज्ञान की आँधी’ का आशय है(क) ढेर सारा ज्ञान प्राप्त होना(ख) ज्ञानियों की बाढ़ आ जाना(ग) आँधी आने का पूर्व ज्ञान हो जाना।(घ) चित्त में ज्ञान का उदय होना। |
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Answer» (घ) चित्त में ज्ञान का उदय होना। |
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कबीर किस की कृपा से डूबने से बचे ? |
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Answer» कबीर गुरु कृपा से भवसागर में डूबने से बच गए। |
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कबीर किसके पीछे लगे जा रहे थे ? |
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Answer» कबीर लोक प्रचलित मान्यताओं और वैदिक आचार-विचार का अनुकरण कर रहे थे। |
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“काहे री नलिनी तू कुम्हिलानी” पंक्ति में नलिनी प्रतीक है|(क) कमल के सभी फूलों की(ख) जल में उगने वाले फूलों की(ग) दु:खी लोगों की(घ) जीवात्मा की |
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Answer» (घ) जीवात्मा की |
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राम अर्थात् ईश्वर के चिन्तन के अतिरिक्त किसी और का चिन्तन करने का क्या परिणाम होता है? |
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Answer» ईश्वर के अतिरिक्त किसी और के चिंतन में लीन होने पर मनुष्य जन्म-मृत्यु के जाल में फंस जाता है। |
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चारों ओर लगी त्रये तापों (सांसारिक कष्टों) की आग से कबीर के अनुसार कैसे बचा जा सकता है? |
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Answer» कबीर के अनुसार ईश्वर के स्मरण रूपी घड़े के जल से आग को बुझाकर बचा जा सकता है। |
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कबीर ने ‘माया का कूड़-कपट’ किसे कहा है और इससे कैसे मुक्ति मिल सकती है? संकलित पाठ के आधार पर लिखिए। |
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Answer» “संतो भाई आई रे ग्यान की आँधी।” पद में काया अर्थात मन संहिते शरीर का कूड़ा-करकट भ्रम, मायाग्रस्त होना, द्विविधा, मोह तृष्णा, कुबुद्धि आदि विकारों को काया को कूड़े-कपट कहा है। इससे छुटकारा पाने का उपाय भी कबीर ने पद में बताया है। वह कहते हैं- जब व्यक्ति ईश्वर की गति अर्थात् परमात्मा के स्वरूप और स्वभाव को ज्ञान प्राप्त कर लेता है, तो उसके सारे दुर्गुण नष्ट हो जाते हैं। मेन निर्मल हो जाता है। उसका हृदय ईश्वर-प्रेम में सरोबार हो जाता है। ईश्वर की गति ज्ञान के आगमन से ही सम्भव है। अत: ज्ञानोदय से ही समस्त मनोविकार नष्ट हो सकते हैं। |
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कबीर ने इस संसार को किसके फूल के समान बताया है? |
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Answer» कबीर ने इस संसार को सेवल के फूल के समान बताया है। |
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संतो, भाई आई ज्ञान की आँधी रे। पद में कबीर क्या संदेश देना चाहते हैं? स्पष्ट कीजिए। |
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Answer» कबीर भले ही घोषणा करते हों कि उन्होंने मसि-कागद तौ छुओ नहिं, कलम गही ना हाथ’ परन्तु उन्होंने अपनी बात सटीक प्रतीकों और रूपकों द्वारा कहने में पूर्ण निपुणता दिखाई है। उपर्युक्त पद में कवि कबीर ने ज्ञान की महत्ता को अलंकारिक शैल में प्रस्तुत किया। उनकी मान्यता है स्वभावगत सारे दूषणों से मुक्ति पाने के लिए ज्ञान से बढ़कर और कोई औषध नहीं है। जब हृदय में ज्ञानरूपी आँधी आती है तो सारे दुर्गुण एक-एक करके धराशायी होते चले जाते हैं और अंत में साधक को हृदय प्रेम की रिमझिम से भीग उठता है। ज्ञान-सूर्य का उदय होते ही अज्ञान की अंधकार विलीन हो जाता है। यही ज्ञान-प्राप्ति की साधना का संदेश इस पर पद द्वारा कबीर ने दिया है। |
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कबीर के काव्य की मुख्य विशेषताएँ बताइए। |
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Answer» कबीर को काव्य अत्यन्त उत्कृष्ट कोटि का है । कबीर के समाज सुधारक थे। इनकी कविताओं में भी समाज सुधार की स्पष्ट झाँकी प्रस्तुत है। इन्होंने साहित्य के माध्यम से सभ ज में फैली कुरीतियों को दूर करने का प्रयास किया। इन्होंने बाह्याडम्बर का जमकर विरोध किया। इनके साहित्य में ज्ञानात्मक रहस्यवाद के दर्शन होते हैं। |
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कबीर के समाज-सुधार पर अपने विचार संक्षेप में लिखिए। |
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Answer» कबीरदास जी स्पष्ट वक्ता एवं समाज-सुधारक थे। उन्होंने हिन्दू और मुसलमान दोनों को फटकार लगायी है। वे दोनों के मध्य झगड़ो समाप्त करने के लिए कहते थे- ”हिन्दू कहै मोहि राम पिआरा, तुरक कहै रहमाना। कबीर ने विभिन्न वर्ग, जाति, धर्म एवं सम्प्रदायों के बीच भेद मिटाने का प्रयास किया । पाखण्ड और ढोंगों के विरुद्ध हिन्दू और मुसलमान दोनों को फटकार लगायी। |
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कबीर ने संसार को सेमल के फूल के समान क्यों कहा है? |
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Answer» कबीर का मत है कि यह संसार सेमल के फूल के समान सुन्दर तो लगता है; किन्तु उसी के समान गन्धहीन और क्षणभंगुर भी है। उसमें वास्तविक सुख प्राप्त नहीं हो सकता। |
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कबीर के अनुसार जीवन में गुरु के महत्त्व को स्पष्ट कीजिए। |
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Answer» कबीर की साखियों में गुरु की महिमा अनेक रूपों में वर्णित है। कबीर गुरु को ईश्वर के समकक्ष मानते हैं। उनका मत है कि सच्चे गुरु की कृपा के बिना ज्ञान की प्राप्ति नहीं होती है। गुरु से प्राप्त ज्ञान के द्वारा मनुष्य सांसारिक मोह-माया से छुटकारा पा सकता है और ईश्वर के दर्शन प्राप्त करने में समर्थ हो सकता है। |
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कबीर की भाषा का उल्लेख कीजिए। |
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Answer» कबीर की भाषा एक संत की भाषा है जो अपने में निश्छलता लिये हुए है। यही कारण है कि उनकी भाषा साहित्यिक नहीं हो सकी। उसमें कहीं भी बनावटीपन नहीं हैं। उनकी भाषा में अरबी, फारसी, भोजपुरी, राजस्थानी, अवधी, पंजाबी, बुन्देलखण्डी, ब्रज एवं खड़ीबोली आदि विविध बोलियों और उपबोलियों तथा भाषाओं के शब्द मिल जाते हैं, इसीलिए उनकी भाषा ‘पंचमेल खिचड़ी’ या सधुक्कड़ी’ कहलाती हैं। सृजन की आवश्यकता के अनुसार वे शब्दों को तोड़-मरोड़कर प्रयोग करने में भी नहीं चूकते थे। भाव प्रकट करने की दृष्टि से कबीर की भाषा पूर्णत: सक्षम है। |
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‘लोहा जल न तिराई।’ यह बात किस सन्दर्भ में कही गई है? |
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Answer» यह बात मूर्खा की संगति ने करने के सम्बन्ध में कही गई है। |
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कबीर मनुष्य को गर्व न करने का उपदेश क्यों देते हैं? |
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Answer» कबीर मनुष्य को गर्व न करने का उपदेश इसलिए देते हैं क्योंकि मनुष्य धने, बल, महल आदि जिन वस्तुओं पर गर्व करता है वे सब नश्वर हैं। मनुष्य का शरीर स्वयं नश्वर है। उसके महल बने-बनाये रह जाते हैं, वह स्वयं भूमि पर लेटता है और ऊपर घास जमती है। फिर गर्व किस बात का? |
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कबीर की भाषा-शैली की मुख्य विशेषताएँ बताइए। |
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Answer» कबीर की भाषा मिली-जुली भाषा है, जिसमें खडीबोली और ब्रजभाषा की प्रधानता है। इनकी भाषा में अरबी, फारसी, भोजपुरी, पंजाबी, बुन्देलखण्डी, ब्रज, खड़ीबोली आदि विभिन्न भाषाओं के शब्द मिलते हैं। कई भाषाओं के मेल के कारण इनकी भाषा को विद्वानों ने ‘पंचरंगी मिली-जुली’, ‘पंचमेल खिचड़ी’ अथवा ‘सधुक्कड़ी’ भाषा कहा है। कबीर ने सहज, सरल व सरस शैली में उपदेश दिये। यही कारण है कि इनकी उपदेशात्मक शैली क्लिष्ट अथवा बोझिल है । इसमें सजीवता, स्वाभाविकता, स्पष्टता एवं प्रवाहमयता के दर्शन होते हैं। इन्होंने दोहा, चौपाई एवं पदों की शैली अपनाकर उनका सफलतापूर्वक प्रयोग किया। व्यंग्यात्मकता एवं भावात्मकता इनकी शैली की प्रमुख विशेषताएँ हैं । |
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‘साखी’ किस छन्द में लिखा गया है? |
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Answer» ‘साखी’ दोही छन्द में लिखा गया है। |
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कबीर का जन्म एवं मृत्यु संवत् बताइए। |
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Answer» कबीर का जन्म संवत् 1455 विक्रमी तथा मृत्यु संवत् 1575 विक्रमी में हुई थी। |
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निम्नलिखित शब्दों के तत्सम रूप लिखिएग्यान, अंधियार, सैंबल, भगति, दुक्ख, व्योहार |
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Answer» ग्यान – ज्ञान |
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कबीर की रचनाओं की सूची बनाइए। |
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Answer» साखी, सबद और रमैनी। |
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कबीर कैसी वाणी बोलने के लिए कहते हैं? |
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Answer» कबीरजी कहते हैं कि मनुष्य को ऐसी वाणी बोलनी चाहिए जिससे अपना शरीर तो शीतल हो ही दूसरों को भी सुख और शान्ति मिले। |
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परब्रह्म के सम्बन्ध में कबीर ने ‘कहिबे कें सोभा नहीं, देख्या ही परमान’ ऐसा क्यों कहा है? स्पष्ट कीजिए। |
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Answer» कबीर निर्गुण भक्ति धारा के कवि हैं। उनकी मान्यता है कि ब्रह्म सर्वव्यापक और तेज स्वरूप है जो निराकार है, गुणरहित है, उसका वर्णन कर पाना सम्भव नहीं है। कबीर ने इस पंक्ति द्वारा यही बात इस पंक्ति में कही है। यदि कोई ब्रह्म के स्वरूप के बारे में बताना चाहेगा तो दूसरी कोई ऐसी वस्तु या स्वरूप नहीं है, जिसके समान ब्रह्म को बताया जा सके। अत: परमात्मा के स्मरण, चिंतन और भक्ति से उसका जो भी रूप साधक के अंत:करण में प्रकट हो, वही परब्रह्म का प्रामाणिक रूप है। |
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पद्यांशों की सन्दर्भ एवं प्रसंग सहित व्याख्याएँ ।बहुत दिनन की जोवती, बाट तुम्हारी राम।जिव तरसै तुझ मिलन कें, मनि नाहीं विश्राम।।मूरिख संग न कीजिए, लोहा जल न तिराह।कदली सीप भुवंग मुख, एक बूंद तिहूँ भाइ।। |
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Answer» कठिन शब्दार्थ – जोवती = देखती हूँ, प्रतीक्षा करती हूँ। बाट = मार्ग। राम = परमात्मा। जिव = जीव, प्राण, मन। तुझ = तुमसे। विश्राम= चैन, धैर्य। मूरिख = मूर्ख। तिराइ = तैरता है। कदली = केले का वृक्ष।सीप = सीपी, जिसमें मोती बनता है। भुजंग = सर्प। तिहूँ = तीन। भाइ = प्रकार, रूप। संदर्भ तथा प्रसंग – प्रस्तुत दोहे हमारी पाठ्यपुस्तक में संकलित कबीर के दोहों से लिए गए हैं। प्रथम दोहे में कबीर परमात्मारूपी प्रियतम के वियोग में व्याकुल विरहिणी आत्मा बनकर अपनी अधीरता का वर्णन कर रहे हैं। द्वितीय दोहे में कबीर मूर्खा का संग न करने का संदेश दे रहे हैं। संगति के प्रभाव को टाला नहीं जा सकता। अत: अज्ञानियों से दूर रहना ही अच्छा है। व्याख्या – परमात्मारूपी प्रियतम से आत्मारूपिणी प्रेयसी या पत्नी बिछुड़ी हुई है। वह निवेदन कर रही है कि उसे प्रियतम की बाट देखते-देखते बहुत दिन बीत गए हैं। किन्तु अभी तक प्रिय-मिलन की पावन घड़ी नहीं आई। आत्मा कहती है-हे राम! मेरा मन बड़ा व्याकुल और अधीर हो रहा है। वह तुमसे मिलने को तरस रहा है। अत: आप मुझे अपनाकर विरह वेदना से मुक्त कर दीजिए। संगति का प्रभाव पड़ना अनिवार्य है। अत: साधक या भक्त को उन लोगों से दूर रहना चाहिए जो मूर्खतावश मनुष्य जीवन को सांसारिक सुखों-विषयों के भोग में नष्ट कर रहे हैं। जैसे लोहा कभी जल पर नहीं तैर सकता, उसी प्रकार हठी अज्ञानियों को भी परमात्मा का प्रेमी नहीं बनाया जा सकता। संगति का फल स्वाति नक्षत्र की बूंद से प्रमाणित होता है। जब वह केले पर पड़ती है तो कपूर बन जाती है। सीप में गिरने पर मोती बन जाती है और सर्प के मुख में पड़ने पर वही बूंद प्राणघातक विष बन जाती है। अत: कदली और सीप जैसे सज्जनों और प्रभु भक्तों की संगति करना ही कल्याणकारी हो सकता है।
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कबीर ने संसार की तुलना ‘सेंबल’ के फल से क्यों की है ? स्पष्ट कीजिए। |
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Answer» सेंबल (शाल्मली) के वृक्ष पर लाल रंग के फूल या बौंडी आते हैं। ये देखने में सुन्दर होते हैं। कहा जाता है कि तोता इसे कोई मधुर फल समझकर इनके पकने की प्रतीक्षा करता है। पकने पर तोता जब इसे चखने को चोंच चलाता है तो इसके अन्दर से रूई जैसी नीरस पदार्थ निकल पड़ता है। बेचारा तोता ठगा सा रह जाता है और उड़ जाता है। कबीर के अनुसार सांसारिक सुख भी बाहर से बड़े आकर्षक और प्रिय लगते हैं, पर इनका परिणाम निराशाजनक और दु:खदायी होता है। |
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निम्नलिखित पंक्तियों में अलंकार एवं छन्द बताइए(अ) सतगुरु हम सँ रीझि कर, एक कह्या प्रसंग।(ब) माया दीपक नर पतंग, भ्रमि, भ्रमि इवै पड्त।(स) यहुँ ऐसा संसार है, जैसा सैंबल फूल । |
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Answer» (अ) इसमें रूपक अलंकार है तथा दोहा छन्द है। |
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ना हों देखों और कें, ना तुझ देख न देउँ। यह बात कबीर ने किस प्रसंग में कही है। पठित दोहों के आधार पर लिखिए। |
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Answer» एक अक्खड़ संत के अतिरिक्त कबीर के व्यक्तित्व का एक मृदुल और हृदयस्पर्शी पक्ष भी है। वह स्वयं को प्रियतम ‘राम’ (ईश्वर) की बहुरिया और विरहिणी के रूप में में प्रस्तुत करते हैं। उपर्युक्त पंक्ति कबीर ने इसी संदर्भ में कही है। वह अपने प्रियतम को अपनी आँखों में बसाना चाहते हैं, ताकि कोई और वहाँ न आ बसे । नेत्र बंद करके वह किसी और को नहीं देख पाएँगे, और उनके प्रियतम को भी किसी की नजर न लगेगी। |
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पठित दोहों के आधार पर गुरु के महत्व का वर्णन अपने शब्दों में कीजिए। |
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Answer» हमारी पाठ्यपुस्तक में संकलित संत कबीर दास के दोहों में गुरु की महिमा का प्रभावशाली वर्णन हुआ है। भारतीय संस्कृति सद्गुरु को ब्रह्मा, विष्णु, शिव यहाँ कि साक्षात् परब्रह्म के तुल्य मानती है। कबीर ने भी पूरी श्रद्धा और आस्था के साथ गुरु की इस अपार महत्ता को स्वीकार किया है। कबीर गुरु और गोविन्द (ईश्वर) में कोई अंतर ही नहीं मानते हैं। यदि व्यक्ति अहंकार से मुक्त होकर गुरु की शरण में जाये तो उसे अवश्य ही ईश्वर की प्राप्ति हो सकती है। गुरु केवल ईश्वर की कृपा होने पर ही प्राप्त होता है। अतः ज्ञान के भण्डार और प्रभु से मिलाने वाले गुरु को कभी भूलना नहीं चाहिए। सद्गुरु शिष्य को अंधविश्वास और भेड़चाल से बचाकर उसे ज्ञान का मार्ग दिखाता है। गुरु ही थोथे अहंकार में लिप्त शिष्य को भवसागर में डूबने से बचाता है। कबीर ने तो यहाँ तक कहा है कि परमात्मा रूठ जाएँ तो गुरु शिष्य की रक्षा कर सकता है। किन्तु गुरु के रूठने पर ईश्वर भी उसकी रक्षा नहीं करता। |
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संकलित दोहों में कबीर दास जी ने गुरु के किन-कन उपकारों का स्मरण किया है? स्पष्ट कीजिए। |
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Answer» कबीर ने इन दोहों में गुरु के अनेक उपकारों को गिनाया है। सद्गुरु सर्वसमर्थ होता है। वह सदैव शिष्य की हित कामना किया करता है। गुरु ने कबीर को ज्ञान का प्रकाश प्रदान किया है। इसी प्रकाश के सहारे वह ईश्वर प्राप्ति के पथ पर चलने में समर्थ हुए। हैं। गुरु कृपा से ही कबीर सांसारिक अंधविश्वासों से मुक्त हुए हैं। गुरु ने ही कबीर को भवसागर में डूबने से बचाया है। इस प्रकार कबीर ने स्वीकार किया है कि उन पर गुरु के अनंत उपकार हैं। |
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