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This section includes 7 InterviewSolutions, each offering curated multiple-choice questions to sharpen your Current Affairs knowledge and support exam preparation. Choose a topic below to get started.

1.

भारत में किस विश्वविद्यालय में सर्वप्रथम समाजशास्त्र को एक स्वतंत्र विषय के रूप में प्रांरभ किया गया?

Answer»

भारत में समाजशास्त्र का स्वतंत्र विषय के रूप में अध्ययन बंबई विश्वविद्यालय में प्रारंभ हुआ।

2.

क्या आप सोचते हैं कि अच्छे जीवन की जो परिभाषा है वह केवल आर्थिक रूप से ही परिभाषित है? 

Answer»

अच्छे जीवन की परिभाषा केवल आर्थिक रूप से ही नहीं दी जा सकती। यह जीवन की गुणवत्ता तथा मानव के सामाजिक-सांस्कृतिक पक्ष को अनदेखा करती है। प्रति व्यक्ति आय एवं राष्ट्रीय आय में वृद्धि सदैव जीवन की गुणवत्ता से जुड़ी हुई नहीं होती। आज विकास को जीवन की, गुणवत्ता की दृष्टि से देखा जाने लगा है। किसी भी देश के नागरिकों का स्वास्थ्य, उपलब्ध पोषक भोजन की मात्रा, शिक्षा एवं रोजगार की सुविधाएँ इत्यादि से जीवन की गुणवत्ता की परख करने का प्रयास किया जाता है। हो सकता है अधिक आय के बावजूद व्यक्ति अपने स्वास्थ्य, भोजन इत्यादि के प्रति सचेत न हो। इसलिए आर्थिक रूप से अच्छे जीवन की परिभाषा अधूरी मानी जाती है।

3.

गरीबी की प्रकृतिवादी एवं समाजशास्त्रीय व्याख्या किस प्रकार से की जा सकती है?

Answer»

गरीबी की प्रकृतिवादी एवं समाजशास्त्रीय व्याख्या में स्पष्ट अंतर पाया जाता है। प्रकृतिवादी व्याख्या के अनुसार लोग गरीब इसलिए हैं क्योंकि वे काम से जी चुराते हैं, समस्यामूलक परिवारों से आते हैं, पारिवारिक बजट बनाने में अयोग्य हैं, उनमें बुद्धिमता की कमी है तथा कार्य के लिए स्थानांतरण से डरते हैं। यदि वे स्थानांतरण कर लेते तो हो सकता है उन्हें उचित रोजगार मिल जाता जो । उनकी निर्धनता के निराकरण में सहायक सिद्ध होता। समाजशास्त्रीय व्याख्या के अनुसार गरीबी का कारण समाज में असमानता की संरचना है और वे लोग इससे ज्यादा प्रभावित होते हैं जिनकी कार्य की अनियमितता दीर्घकालिक है, जबकि उन्हें मिलने वाली मजदूरी कम होती है।

4.

“मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है।” इस कथन की समीक्षा कीजिए।

Answer»

शताब्दियों पूर्व कहा गया अरस्तू का यह वाक्य पूर्णतया सत्य है, “मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है।” एक व्यक्ति जो समाज में अन्य व्यक्तियों के साथ तथा उनके मध्ये नहीं रहता, वह या तो देवता है। अथवा पशु।” अन्य शब्दों में, व्यक्ति के समाज से अलग रहकर जीवन व्यतीत करने की कल्पना नहीं की जा सकती। मनुष्य का जीवन, उसकी समृद्धि तथा प्रगति समाज में ही संभव हैं। परस्पर मिलकर सहयोग के साथ रहने की मनुष्य में जन्मजात प्रवृत्ति होती है। समाज में उसका जन्म, विकास और आवश्यकताओं की पूर्ति होती है और समाज में ही वह अंततः मृत्यु को प्राप्त हो जाता है। समाज के बिना व्यक्ति का अस्तित्व संभव नहीं है, क्योंकि अपनी वश्यकताओं की पूर्ति वह स्वयं नहीं कर सकता। समाज ही समाजीकरण की प्रक्रिया द्वारा उसे एक जैविक प्राणी से सामाजिक प्राणी बनाता है। मनुष्य में प्रेम, आदेश देना, खेलना-पितृभाव, घृणा, क्रोध, मोह आदि भावनाएँ स्वाभाविक रूप से विद्यमान रहती है। इन सब भावनाओं की पूर्ति मनुष्य समाज में रहकर ही कर सकता है। मनुष्य समाज में रहकर सहयोग, सहिष्णुता, प्रेम आदि गुणों की प्राप्ति करता है। व्यक्ति के व्यक्तित्व का विकास समाज में रहकर ही संभव है। मनुष्य समाजीकरण के माध्यम से सांस्कृतिक मूल्यों को ग्रहण करता है। तथा सांस्कृतिक विरासत को आगे बढ़ाने का कार्य करता है। उसके ज्ञान में वृद्धि समाज में रहकर ही संभव है।

5.

किसी परंपरागत गाँव एवं कारखाने (या कॉल सेंटर) में कार्य किस प्रकार नियोजित किया जाता है? 

Answer»

किसी परंपरागत गाँव में कार्यों को समयबद्ध रूप से नियोजित नहीं किया जाता है। यह निर्धारित तो होता है कि परिवार के किस सदस्य को क्या कार्य करना है परंतु समय पड़ने पर एक सदस्य का कार्य दूसरी सदस्य कर सकता है। इस दृष्टि से परंपरागत गाँव में कार्यों के निष्पादन में कठोर नियंत्रण नहीं पाया जाता है। व्यावसायिक विशेषीकरणका भी अभाव पाया जाता है तथा समय पड़ने पर एक ही व्यक्ति मालिक, श्रमिक, बढ़ई, लोहार आदि बन सकती है। कार्य के बदले निश्चित पारिश्रमिक अथवा मेहनताने का प्रावधान भी नहीं होता है। इसके विपरीत, कारखाने को एक आर्थिक कठोर नियंत्रण के रूप में देखा जाता है तथा माक्र्स जैसे विद्वान तो इसे दमनकारी मानते हैं। कारखानों में काम करने वालों के लिए निश्चित कार्य, समय की पाबंदी, कार्य करने के निश्चित घंटे, हफ्ते के दिन इत्यादि निर्धारित हो जाते हैं। साथ ही, कार्य के बदले निश्चित पारिश्रमिक का भी प्रावधान होता है। नियोक्ता एवं कर्मचारी दोनों के लिए समय अब धन है, यह व्यतीत नहीं होता बल्कि खर्च हो जाता है।

6.

औद्योगिक पूँजीवाद ने गाँव और शहरों में भारतीय जनजीवन को किस प्रकार बदल डाला?

Answer»

औद्योगिक पूँजीवाद ने गाँव एवं शहरों में भारतीय जनजीवन को काफी सीमा तक प्रभावित किया है। भारत जैसे देश में इससे न केवल जाति पर आधारित व्यावसायिक संरचना परिवर्तित हुई है, अपितु जातीय दूरी एवं जाति के आधार पर खान-पान के प्रतिबंध भी लगभग समाप्त हुए हैं। लोगों के ग्रामीण क्षेत्रों से शहरी क्षेत्रों की ओर स्थानांतरण से संयुक्त परिवार का विघटन प्रारंभ हुआ है तथा एकाकी परिवारों को प्रोत्साहन मिला है। पारिवारिक संबंध भी प्रभावित हुए हैं तथा उनमें औपचारिकता के अंश का समावेश हो गया है। सामाजिक नियंत्रण के परंपरागत साधन शिथिल हुए हैं तथा व्यापारिक मनोरंजन का महत्त्व बढ़ गया है। शिक्षा का प्रचलन हुआ है तथा व्यावसायिक गतिशीलता के अवसरों में वृद्धि हुई है। परंपरागत मूल्यों एवं प्रतिमानों के साथ-साथ जीवन-पद्धति में भी काफी परिवर्तन हुए हैं। इस प्रकार, औद्योगिक पूँजीवाद ने गाँव और शहरों में भारतीय जनजीवन को पूरी तरह से परिवर्तित कर दिया है।

7.

असम के चाय बागानों में काम करने वाले संथाल जाति के श्रमिकों के पूर्वज भारत में कसँ से आए थे? 

Answer»

असम में चाय बागानों में काम करने वाले लोगों में संथालों की संख्या अत्यधिक है। असम के चाय बागानों में कार्य करने हेतु संथाल पश्चिम बंगाल अथवा बिहार से श्रमिकों के रूप में जाते हैं। संथाल; भारत में पाई जाने वाली सबसे बड़ी जनजातियों में से एक है। संथाल लोगों को प्रोटो-आस्ट्रेलॉयड प्रजाति का माना जाता है क्योंकि उनमें अधिकांश लक्षण इसी प्रजाति के पाए जाते है। ये लोग अत्यधिक परिश्रमी एवं उद्यमी हैं। संथाले जनजाति के श्रमिकों के पूर्वज भारत में अफ्रीका से आए हुए माने जाते हैं। अनेक मानवशास्त्रियों का मानना है कि संथाल 65,000 से 55,000 वर्ष पहले अफ्रीका से एशिया के देशों में आए। कुछ लोग संथालों को नेपाल के थकाली लोगों से मिलते-जुलते हुए मानते हैं तथा उन्हें भारत में नेपाल से आए हुए भी मानते हैं।

8.

क्या शाप सोचते हैं कि खर्च और बचत की आदतें सांस्कृतिक रूप से बनती हैं? 

Answer»

‘खर्च’ और ‘बचत’ की आदतें अधिकांशतया सांस्कृतिक रूप से ही निर्मित होती है। इसलिए जीवन को सुगम एवं आरामदायक बनाने हेतु पश्चिमी संस्कृति में खर्च को महत्त्व दिया जाता है, न कि बचत को। चूँकि पश्चिमी समाजों में उपभोक्तावाद एवं भौतिकवादी विचारधाराओं की प्रमुखता पाई जाती है इसलिए व्यक्ति अपनी सुख-सुविधाओं हेतु अपने धन का व्यय करता है। विलासितापूर्ण जीवन व्यतीत करने की लालसा उनका ध्यान बचत पर केंद्रित नहीं होने देती। भारत जैसे देश में भौतिकवादी विचारधारा का अभाव रहा है तथा आध्यात्मिक विचारधारा प्रमुख रही है। अंग्रेजी शासनकाल से पूर्व एवं अंग्रेजी शासनकाल के दौरान भी भारत में प्राकृतिक प्रकोप एवं महामारियाँ अधिक होती थीं। इसलिए व्यक्ति अपनी आय का काफी अंश इन विपत्तियों के समय के लिए बचाकर रखता था। पारिवारिक एवं नातेदारी संबंधी दायित्व भारतीयों को व्यर्थ के खर्चे से रोकते हैं तथा उनके विलासितापूर्ण जीवन-शैली पर काफी सीमा तक अंकुश लगाते हैं।

9.

समाजशास्त्र को परिभाषित कीजिए तथा इसके विकास की संक्षिप्त विवेचना कीजिए।

Answer»

किसी भी विज्ञान अथवा शास्त्र के विषय में पूर्ण ज्ञान प्राप्त करने से पूर्व आवश्यक होता है कि उस विज्ञान अथवा शास्त्र की एक समुचित परिभाषा निर्धारित कर ली जाए। परिभाषा के निर्धारण से शास्त्र अथवा विज्ञान की सीमाएँ निश्चित हो जाती हैं। निश्चित सीमाओं के अंतर्गत अध्ययन करना सरल होता है। साथ ही, सीमित क्षेत्र का अध्ययन अपेक्षाकृत अधिक व्यवस्थित तथा शुद्ध भी होता है। समाजशास्त्र भी इस सामान्य नियम का अपवाद नहीं है।

समाजशास्त्र के इतिहास पर दृष्टिपात करने से ज्ञात होता है कि यह एक नवविकसित सामाजिक, विज्ञान है। सर्वप्रथम इस शब्द का प्रयोग फ्रांसीसी विद्वान ऑगस्त कॉम्टे (Auguste Comte) ने 1838 ई० में किया। इसलिए कॉम्टे को समाजशास्त्र का पिता’ कहा जाता है। इन्होंने सर्वप्रथम इस विषय को ‘सामाजिक भौतिकी’ कहा। अन्य विद्वानों द्वारा इस शब्द को स्वीकार न किए जाने पर कॉम्टे ने ‘सामाजिक भौतिकी’ के स्थान पर ‘समाजशास्त्र’ शब्द का प्रयोग किया और इसी नाम से यह विषय आज भी जाना जाता है। इसका इतिहास केवल 167-68 वर्ष का है। नवविकसित विज्ञान होने के कारण समाजशास्त्र का क्षेत्र पूर्ण रूप से स्पष्ट नहीं हो सकता है। विभिन्न विद्वानों में इस विषय को लेकर मतभेद है। इसी मतभेद के कारण भिन्न-भिन्न विद्वानों ने समाजशास्त्र को अलग-अलग प्रकार से परिभाषित किया है।

समाजशास्त्र का अर्थ एवं परिभाषाएँ

‘समाजशास्त्र’ को अंग्रेजी में ‘sociology’ कहा जाता है, जो दो शब्दों ‘सोशियो’ (Socio) तथा ‘लोजी’ (Logy) से मिलकर बना है। ‘सोशियो’ लैटिन भाषा के socius’ शब्द से बना है जिसका अर्थ ‘समाज’ है और ‘लोजी’ ग्रीक भाषा के logos’ शब्द से बना है जिसका अर्थ ‘विज्ञान’ या ‘शास्त्र’ है। इस प्रकार, शाब्दिक अर्थ में समाजशास्त्र वह विषय या विज्ञान है, जिसमें समाज का अध्ययन किया जाता है, परंतु समाजशास्त्र के अर्थ को पूर्ण रूप से समझने के लिए समाज’ और ‘विज्ञान’ का अर्थ समझना आवश्यक है।

⦁    समाज का अर्थ–प्रायः व्यक्तियों के समूह को समाज माना जाता है, परंतु यह धारणा त्रुटिपूर्ण है। केवल व्यक्तियों के समूह को ही समाज नहीं कहा जा सकता, वरन् व्यक्तियों का वह समूह समाज है जिसके सदस्यों के मध्य पारस्परिक मानसिक या सामाजिक संबंध होते हैं और ये संबंध अमूर्त होते हैं। इस प्रकार विभिन्न व्यक्तियों के मध्य स्थापित होने वाले सामाजिक संबंधों * की अमूर्त व्यवस्था को समाज कहा जाता है।
⦁    विज्ञान का अर्थकिसी भी विषय के व्यवस्थित और क्रमबद्ध ज्ञान को विज्ञान कहा जाता है। विज्ञान में निरीक्षण और पर्यवेक्षण के द्वारा विभिन्न समानताओं की खोज की जाती है तथा प्राप्त परिणामों के आधार पर सिद्धांतों का प्रतिपादन किया जाता है और उन्हें ज्ञान के क्षेत्र में व्यवस्थित और संगठित किया जाता है। इस प्रकार, समाज और विज्ञान के अर्थों का स्पष्टीकरण करने के पश्चात् हम इस निष्कर्ष पर पहुँचते हैं कि समाजशास्त्र वह विज्ञान है, जिसमें सामाजिक संबंधों का क्रमबद्ध, व्यवस्थित और वैज्ञानिक रूप में अध्ययन किया जाता है। अध्ययन का अर्थ है कि इसकी विषय-वस्तु को समझा और समझाया जा सकता है तथा किसी प्रकार का संदेह होने पर नवीन प्रमाण एकत्र करके उसे दूर किया जा सकता है। विभिन्न विद्वानों द्वारा दी गई परिभाषाओं से समाजशास्त्र के स्वरूप को ठीक प्रकार से समझा
जा सकता है। समाजशास्त्र की कोई एक सर्वमान्य परिभाषा नहीं है। विभिन्न विद्वानों ने इसे भिन्न-भिन्न दृष्टिकोणों से परिभाषित किया। इसी परिभाषाओं को हम अपनी सुविधा के लिए निम्नांकित श्रेणियों में विभाजित कर सकते हैं-

(अ) समाजशास्त्र समाज का अध्ययन है।
कुछ विद्वानों के अनुसार समाजशास्त्र समाज को विज्ञान है। इन विद्वानों ने समाजशास्त्र की परिभाषा समाज को प्रमुख आधार मानकर इस प्रकार दी है-

⦁    ओडम (Odum) के अनुसार–“समाजशास्त्र वह विज्ञान है, जो समाज का अध्ययन करता है।”
⦁    वार्ड (Ward) के अनुसार-“समाजशास्त्र समाज का विज्ञान है।”
⦁    जिंसबर्ग (Ginsberg) के अनुसार-“समाजशास्त्र समाज के अध्ययन के रूप में परिभाषित | किया जा सकता है।
⦁    गिडिंग्स (Giddings) के अनुसार-“समाजशास्त्र समग्र रूप से समाज का क्रमबद्ध वर्णन तथा व्याख्या है।”
उपर्युक्त परिभाषाओं में समाजशास्त्र को समाज के अध्ययन के रूप में प्रतिपादित किया गया है। समाजशास्त्र का शाब्दिक अर्थ ही समाज का अध्ययन नहीं है अपितु अनेक विद्वानों ने इसे इसी आधार पर परिभाषित भी किया है। ये परिभाषाएँ समाजशास्त्र के मूल अर्थ के निकट होते हुए भी पर्याप्त स्पष्ट एवं वैज्ञानिक नहीं है, क्योंकि इन परिभाषाओं में कहीं भी ‘समाज’ की संकल्पना को स्पष्ट नहीं किया गया है।

( ब ) समाजशास्त्र सामाजिक संबंधों का अध्ययन है
कुछ विद्वानों ने समाजशास्त्र की परिभाषा सामाजिक संबंधों के अध्ययन के रूप में की है। इन विद्वानों के अनुसार समाजशास्त्र सामाजिक संबंधों का वैज्ञानिक अध्ययन है। सामाजिक संबंधों के ताने-बाने को ही समाज कहते हैं; अत: समाज को समझने के लिए सामाजिक संबंधों को समझना आवश्यक है। ऐसी प्रमुख परिभाषाएँ निम्नलिखित हैं-

⦁    मैकाइवर एवं पेज (Maclver and Page) के अनुसार-–“समाजशास्त्र सामाजिक संबंधों के विषय में है (तथा) इन संबंधों के जाल को हम ‘समाज कहते हैं।”
⦁    रोज (Rose) के अनुसार–“समाजशास्त्र मानव संबंधों का विज्ञान है।”
⦁    ग्रीन (Green) के अनुसार-“समाजशास्त्र संश्लेषणात्मक और सामान्यीकरण करने वाला वह विज्ञान है जो मनुष्यों और सामाजिक संबंधों का अध्ययन करता है।”
⦁    क्यूबर (Cuber) के अनुसार-“समाजशास्त्र को मानव-संबंधों के वैज्ञानिक ज्ञान के ढाँचे के रूप में परिभाषित किया जा सकता है।”
⦁    सिमेल (Simmel) के अनुसार-“समाजशास्त्र मानव-अंतर्सम्बन्धों के स्वरूपों का विज्ञान है।”
उपर्युक्त विभिन्न परिभाषाओं में समाजशास्त्र को उस सामाजिक विज्ञान के रूप में प्रतिपादित किया गया है, जिसके अंतर्गत सभी प्रकार के सामाजिक संबंधों का व्यवस्थित अध्ययन किया जाता है। सामाजिक संबंधों को आधार मानकर दी गई परिभाषाएँ समाजशास्त्र के अर्थ को पर्याप्त सीमा तक स्पष्ट करती हैं।

(स) समाजशास्त्र सामाजिक जीवन और घटनाओं का अध्ययन है।
कुछ समाजशास्त्रियों के अनुसार समाजशास्त्र सामाजिक जीवन, व्यवहारों, कार्यों तथा घटनाओं का अध्ययन है। ये विद्वान समाजशास्त्र को अग्रलिखित रूपों में परिभाषित करते हैं-

⦁    किम्बल यंग (Kimball Young) के अनुसार-“समाजशास्त्र समूहों में मनुष्य के व्यवहार का अध्ययन करता है।
⦁    बेनेट एवं ट्यूमिन (Beanet and Tumin) के अनुसार-“समाजशास्त्र सामाजिक जीवन के ढाँचे और कार्यों का विज्ञान है।”
⦁    ऑगर्बन एवं निमकॉफ (Ogburn and Nimkoff) के अनुसार-“समाजशास्त्र सामाजिक जीवन का वैज्ञानिक अध्ययन है।’
उपर्युक्त परिभाषाओं में समाजशास्त्र को मुख्य रूप से सामाजिक जीवन और सामाजिक घटनाओं के वैज्ञानिक अध्ययन के रूप में प्रस्तुत किया गया है।

(द) समाजशास्त्र की अन्य परिभाषाएँ
समाज, सामाजिक संबंधों, सामाजिक जीवन तथा सामजिक घटनाओं के अतिरिक्त भी अनेक आधारों को समाजशास्त्र को. परिभाषित करने के लिए अपनाया गया है। ऐसी प्रमुख परिभाषाएँ निम्नलिखित हैं-

⦁    वेंबर (Weber) के अनुसार-“समाजशास्त्र वह विज्ञान है जो कि सामाजिक क्रियाओं की . अर्थपूर्ण व्याख्या करते हुए उन्हें समझने का प्रयास करता है।”
⦁    जॉनसन (Johnson) के अनुसार-समाजशास्त्र वह विज्ञान है, जो सामाजिक समूहों, उनके
आन्तरिक स्वरूपों या संगठन के स्वरूपों तथा उन प्रक्रियाओं को जो इस संगठन के स्वरूपों को बनाए रखती हैं या परिवर्तित करती है और समूहों के बीच पाए जाने वाले संबंधों का अध्ययन करता है।”
⦁    पारसन्स (Parsons) के अनुसार-“समाजशास्त्र वह विज्ञान है, जो सामाजिक कार्यों का व्याख्यात्मक अध्ययन करने का प्रयास करता है।”
उपर्युक्त परिभाषाओं से यह स्पष्ट हो जाता है कि समाजशास्त्र समाज, सामाजिक संबंधों, सामाजिक जीवन, सामाजिक घटनाओं, सामाजिक क्रियाओं, सामाजिक समूहों तथा सामाजिक कार्यों इत्यादि का क्रमबद्ध अध्ययन करने वाला विज्ञान है।

समाजशास्त्र का उद्गम एवं विकास

व्यक्ति अपने स्वभाव के कारण एक जिज्ञासु प्राणी है और इसी जिज्ञासु प्रवृत्ति के कारण उसने प्रारंभ से ही अपने समय में प्रचलित विविध प्रकार की सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक समस्याओं को समझने का प्रयास किया है। भारत के प्राचीन ग्रंथों में समाज के विभिन्न पहलुओं का उल्लेख विविध प्रकार से किया गया है। उदाहरणार्थ-वैदिक साहित्य एवं हिंदू शास्त्रों (जैसे उपनिषदों, महाभारत एवं गीता आदि ग्रंथों) में वर्ण एवं जाति व्यवस्था, संयुक्त परिवार प्रणाली, आश्रम व्यवस्था, विभिन्न संस्कारों तथा ऋण व्यवस्था जैसे अनेक महत्त्वपूर्ण सामाजिक पहलुओं का विधिवत् विवरण मिलता है। जो कि आज के समाजशास्त्रीय विश्लेषणों के किसी भी मापदंड से कम नहीं है। अरस्तू की पुस्तक ‘पॉलिटिक्स’, प्लेटो की ‘रिपब्लिक’ तथा कौटिल्य का अर्थशास्त्र’ आदि ऐसे ग्रंथ हैं जिनमें समाज के विभिन्न पहलुओं की चर्चा की गई है।

यद्यपि सामाजिक पहलुओं के अध्ययन की एक लंबी परंपरा रही है, फिर भी समाजशास्त्र विषय का एक संस्थागत विषय के रूप में उद्भव एवं विकास 19वीं शताब्दी में हुआ जबकि ऑगस्त कॉम्टे ने सर्वप्रथम 1838 ई० में ‘समाजशास्त्र’ शब्द का प्रयोग किया। इनका विचार था कि कोई भी विषय ऐसा नहीं है जो कि समाज के विभिन्न पहलुओं का समग्र रूप में अध्ययन कर सकता हो। इस कमी को दूर करने के लिए इन्होंने इस नवीन विषय का निर्माण किया। उन्नीसवीं शताब्दी के समाजशास्त्र को यद्यपि निश्चयात्मक (Positive) विज्ञान माना गया है जिसका प्रभाव प्राकृतिक विज्ञानों के समान था, फिर भी यह इतिहास के दर्शन एवं जैविक सिद्धांतों के प्रभाव के कारण उविकासवादी था। साथ ही इसमें मनुष्य के संपूर्ण जीवन एवं संपूर्ण इतिहास से संबंधित अध्ययन किए जाते थे अर्थात् इसकी प्रकृति विश्वकोशीय थी। 19वीं शताब्दी में समाजशास्त्र के विकास में अनेक बौद्धिक एवं भौतिक परिस्थितियों ने सहायता प्रदान की, जिनमें से चार बौद्धिक परिस्थितियों को टी० बी० बॉटोमोर (T.B. Bottomore) ने महत्त्वपूर्ण माना है। ये परिस्थितियाँ निम्नलिखित हैं-

⦁    राजनीति का दर्शन (Political philosophy)
⦁    इतिहास का दर्शन (The philosophy of history)
⦁    उविकास के जैविक सिद्धांत (Biological theories of evolution) तथा
⦁    सामाजिक एवं राजनीतिक सुधारात्मक आंदोलन (The movements for social and political reform)

इनमें से दो, इतिहास के दर्शन तथा सामाजिक सर्वेक्षण (जो कि आंदोलनों के परिणामस्वरूप शुरू हुए), ने प्रारंभ में महत्त्वपूर्ण योगदान दिया है। एक विशिष्ट शाखा के रूप में इतिहास का दर्शन अठारहवीं शताब्दी की देन है जिसे अबे डे सेंट-पियरे (Abbe de saint-Pieare) तथा ग्यिम्बाटिसटा विको (Giambattista Vico) ने शुरू किया। प्रगति के जिस सामान्य विचार को निर्मित करने का इन्होंने प्रयत्न किया उसने मानव की इतिहास संबंधी धारणा को गंभीर रूप से प्रभावित किया। फ्रांस में मॉण्टेस्क्यू (Montesquieu) और वॉल्टेयर (Voltaire), जर्मनी में हर्डर (Herder) तथा स्कॉटिश इतिहासज्ञों एवं दार्शनिकों; जैसे फग्र्युसन (Ferguson), मिलर (Millar), रॉबर्टसन (Robertson) इत्यादि की रचनाओं में इतिहास के दर्शन का प्रभाव स्पष्ट रूप से देखा जा सकता है। 19वीं शताब्दी के प्रारंभ में हीगल (Hegel) तथा सेंट साइमन (Saint Simon) के लेखों के परिणामस्वरूप इतिहास का दर्शन एक प्रमुख बौद्धिक प्रभाव बन गया। इन्हीं दोनों विचारकों से कार्ल माक्र्स (Karl Marx) तथा ऑगस्त कॉम्प्टे (Auguste Comte) की रचनाएँ विकसित हुईं। समाज की नवीन धारणा, जो कि राज्य की धारणा से भिन्न है, दार्शनिक इतिहासकारों की ही देन है। आधुनिक समाजशास्त्र के विकास में सहायक दूसरा महत्त्वपूर्ण तत्त्व सामाजिक सर्वेक्षण कहा जा सकता है जिसके दो प्रमुख स्रोत थे—प्रथम, यह विश्वास के प्राकृतिक विज्ञान की पद्धतियों को सामाजिक घटनाओं एवं मानव क्रियाकलापों के अध्ययन में प्रयुक्त किया जा सकता है और दूसरा, यह विश्वास कि गरीबी प्रकृति या दैवीय प्रकोप नहीं है अपितु मानव प्रयास द्वारा इसे दूर किया जा सकता है। इन दोनों विश्वासों के परिणामस्वरूप समाज-सुधारक के लिए किए गए इन आंदोलनों का 18वीं तथा 19वीं शताब्दी के पश्चिमी यूरोप की सामाजिक परिस्थितियों से प्रत्यक्ष संबंध था। सामाजिक परिवर्तन में रुचि के कारण ऐतिहासिक तथा सामाजिक आंदोलनों की ओर ध्यान दिया जाने लगा। अनेक विद्धानों; जैसे बाल्डरीज (Baldridge) ने उन सामाजिक, आर्थिक तथा राजनीतिक दशाओं का भी वर्णन किया है जिन्होंने समाजशास्त्र के विकास को प्रेरित किया है। ये दशाएँ निम्नलिखित हैं-

⦁    वैज्ञानिक क्रांति-वैज्ञानिक क्रांति के परिणामस्वरूप वैज्ञानिक पद्धति की श्रेष्ठता सिद्ध हो चुकी थी और पश्चिमी यूरोप में नित्य नए आविष्कार हो रहे थे। अध्ययन के लिए तथ्यों के अवलोकन, वर्गीकरण एवं विश्लेषण की यह पद्धत समाज एवं सामाजिक जीवन के अध्ययन के लिए भी उपयोगी एवं आवश्यक समझी जाने लगी थी।
⦁    प्रौद्योगिकीय क्रांति-वैज्ञानिक आविष्कारों का उत्पादन के यंत्रों के क्षेत्र में प्रयोग होने लगा था। कपड़े की बुनाई के क्षेत्र में वृहत् मशीनों के प्रयोग ने एक नई क्रांति को जन्म दिया। इसी प्रकार, यंत्रों को चलाने के लिए शक्ति के नए साधन भी खोज निकाले गए थे; जैसे-भाप, डीजल आदि। इससे उत्पादन के क्षेत्र में प्रौद्योगिकीय क्रांति का सूत्रपात हुआ और पुराने तरीके बेकार सिद्ध होने लगे तथा प्रौद्योगिकीय क्रांति के प्रभावों को समझने की आवश्यकता महसूस की जाने लगी।
⦁    औद्योगिक क्रांति-विज्ञान और तकनीकी के प्रयोग ने औद्योगिक क्रांति को जन्म दिया और बड़ी मशीनों द्वारा वृहत् स्तर पर उत्पादन प्रारंभ हुआ। परिणामतः पुरानी लघु उत्पादन व्यवस्था समाप्त होने लगी। सामाजिक व्यवस्था चरमराने लगी। औद्योगिक केंद्रों में बड़ी संख्या में श्रमिकों का संकेंद्रण बढ़ गया। कृषि के स्थान पर उद्योग धन का स्रोत बन गए। नई सामाजिक संरचना की आवश्यकता महसूस होने लगी। बढ़ती हुई बेकारी और गरीबी तथा श्रमिकों की निम्न दशा ने सामाजिक विचारकों को प्रेरित किया कि वे तत्कालीन सामाजिक व्यवस्था पर पुनर्विचार करें।
⦁    बाजारों का विस्तार एवं साम्राज्यवाद–इंग्लैंड, फ्रांस, जर्मनी, स्पेन आदि देशों में बने माल की खपत के लिए और कच्चे माल की तलाश में, विदेशों में व्यापार के क्षेत्र खोजने की होड़ लग गई। भाप द्वारा चालित जहाजों के द्वारा विदेशी व्यापार सरल हो गया। अनेक व्यापारिक कंपनियाँ स्थापित की गई जो अमेरिका, एशिया तथा अफ्रीका के देशों में पहुँची। ये व्यापारिक कंपनियाँ अपने माल की सुरक्षा के लिए अपनी फौज भी रखती थी। धीरे-धीरे साम्राज्यवाद की प्रवृत्ति बढ़ गई। साथ ही साम्राज्य को बनाए रखने के लिए विजित देश के मूल निवासियों की भाषा, रीति-रिवाज आदि का अध्ययन भी किया गया। परिणामतः विभिन्न समाजों के संबंध में बहुमूल्य सामाजिक तथ्य एकत्र हो गए और एक पृथक् सामाजिक विज्ञान की आवश्यकता महसूस होने लगी।
⦁    राजनीतिक क्रांति-इंग्लैंड और फ्रांस में बढ़ते हुए उद्योगवाद ने सामंतवादी व्यवस्था को चुनौती दी और वहाँ प्रजातांत्रिक क्रांतियाँ घटित हुईं। राजा और सामंतों के विरुद्ध मानव के समानता, भ्रातृत्व, स्वतंत्रता और मूल अधिकारों के लिए घटित हुई इन खूनी क्रांतियों ने पुरानी सामाजिक व्यवस्था की जड़े हिला दी। नई संरचना क्या हो?—यह प्रश्न, चिंतकों के लिए मूल प्रश्न बन गया। समाजशास्त्र का विकास इस प्रश्न से जुड़ा है।
⦁    समाज सुधार आंदोलन–स्पष्ट है कि यूरोप और अमेरिका के देशों में, जहाँ इतनी क्रांतिकारी घटनाएँ हो रही हों, अनेक सामाजिक समस्याएँ पैदा हो गई थीं। भूखमरी और बेकारी सबसे बड़ी समस्याएँ थीं। इन समस्याओं को हल करने के लिए अनेक समाज सुधार आंदोलन हुए। ये आंदोलन नई विचारधारा एवं लक्ष्य सामने रख रहे थे। इनके नेता अपने पक्ष-पोषण में, तथ्यों के रूप में प्रमाण प्रस्तुत कर रहे थे। समाज के प्रति एक नया दृष्टिकोण विकसित हो रहा था। उपर्युक्त समसामयिक दशाओं ने फ्रांस के सेण्ट साइमन, जर्मनी के कार्ल मार्क्स जैसे विचारकों को जन्म दिया, जिन्होंने एक नए सामाजिक विज्ञान की रूपरेखा प्रस्तुत की। ऑगस्त कॉम्टे ने इस नए विज्ञान का नामकरण किया, जबकि स्पेंसर और दुर्णीम ने उसे प्रतिष्ठित किया।

बॉटोमोर (Bottomore) का कहना है कि इस प्रकार समाजशास्त्र का पूर्व इतिहास सौ वर्षों की उम्र अवधि से संबंधित है जो लगभग 1740 ई० से 1850 ई० तक की है। इन्होंने 19वीं शताब्दी में विकसित समाजशास्त्र की तीन विशेषताओं का भी उल्लेख किया है-

⦁    यह विश्वकोशीय (Encyclopaedic) था;
⦁    यह उविकासवादी (Evolutionary) था तथा
⦁    यह निश्चयात्मक (Positive) था।

समाजशास्त्र के विकास में प्रारंभिक विद्वानों की समाज-सुधार में रूचि ने भी महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई है। 1880 ई० से 1920 ई० के काल में तीव्र औद्योगीकरण के कारण सामाजिक परिवर्तन के अध्ययनों में रुचि विकसित हुई तथा 20वीं शताब्दी के प्रारंभ तक इसे विज्ञान की स्थिति प्राप्त हो गई। समाज-सुधार तथा सामाजिक अनुसंधान के घनिष्ठ संबंध के परिणामस्वरूप आनुभविक अनुसंधान को प्रोत्साहन मिला तथा नीति-निर्माण करने वालों ने समस्याओं के समाधान के लिए समाजशास्त्रियों की ओर देखना शुरू कर दिया जिससे व्यावहारिक अनुसंधान प्रारंभ हुए। हेरी एम० जॉनसन (Harry M.Johnson) के अनुसार, आज समाजशास्त्र निश्चित रूप से एक विज्ञान है यद्यपि यह अन्य विज्ञानों से थोड़ा पिछड़ा हुआ है। इसमें विज्ञान की निम्नलिखित विशेषताएँ पाई जाती हैं-

⦁    समाजशास्त्र आनुभविक (Empirical) है, क्योंकि यह तार्किक चिंतन पर आधारित है।
⦁    यह सैद्धांतिक (Theoretical) है, क्योंकि इसमें घटनाओं के कार्य-कारण संबंधों के आधार पर नियम बनाए जाते हैं।
⦁    यह संचयी (Cumulative) है अर्थात् समाजशास्त्रीय सिद्धांत एक के आधार पर दूसरे बनते हैं।
⦁    यह नैतिकता मुक्त (Nonethical) है अर्थात् समाजशास्त्री का कार्य तथ्यों की व्याख्या करना है, उन्हें अच्छा या बुरा बताना नहीं।

फ्रांस के पश्चात् अमेरिका में समाजशास्त्र का अध्ययन-कार्य सर्वप्रथम 1876 ई० में ‘येल विश्वविद्यालय से प्रारंभ हुआ और इस विषय का सर्वाधिक विकास अमेरिका में ही हुआ है। अमेरिकी समाजशास्त्रियों में समनर, रॉस, सोरोकिन, ऑगबर्न एवं निमकॉफ, मैकाइवर एवं पेज, यंग, लुंडबर्ग, जिमरमैन, पारसंस, मर्टन, किंग्स्ले डेव्रिस आदि प्रमुख हैं। आज यद्यपि फ्रांस, अमेरिका, इंग्लैंड तथा जर्मनी में समाजशास्त्र एक सर्वाधिक लोकप्रिय विषय है, फिर भी संसार में शायद ही कोई ऐसा देश हो जिसमें आज समाजशास्त्र का अध्ययन न हो रहा हो।

10.

समाजशास्त्र को सामाजिक संबंधों का अध्ययन करने वाला विषय क्यों कहा गया है?

Answer»

समाजशास्त्र समाज का विज्ञान है तथा समाज को सामाजिक संबंधों का ताना-बाना माना जाता है। इसलिए कुछ समाजशास्त्री समाजशास्त्र की परिभाषा समाज के अध्ययन के रूप में न देकर सामाजिक संबंधों के अध्ययन के रूप में देते हैं। उदाहरणार्थ-मैकाइवर एवं पेज के अनुसार, समाजशास्त्र सामाजिक संबंधों के विषय में हैं (तथा) इन संबंधों के जाल को हम समाज कहते हैं।” इसी प्रकार, क्यूबर के अनुसार, “समाजशास्त्र को मानव संबंधों के वैज्ञानिक ज्ञान के ढाँचे के रूप में परिभाषित किया जा सकता है।”

वस्तुतः सामाजिक संबंध ही समाजशास्त्र की मुख्य विषय-वस्तु है, इसलिए इसे सामाजिक संबंधों का अध्ययन करने वाला विषय कहा जाता है। सामाजिक संबंधों का अर्थ है कि कम-से-कम दो व्यक्ति ऐसे हैं जिन्हें एक-दूसरे का आभास है तथा जो एक-दूसरे के प्रति कुछ-न-कुछ कार्य कर रहे हैं।

11.

इतिहासकारों ने कला, क्रिकेट, कपड़े, फैशन, वास्तुकला एवं भवन विन्यास के इतिहास को किस प्रकार से लिखा है? 

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इतिहासकारों ने कला, क्रिकेट, कपड़े, फैशन, वास्तुकला एवं भवन विन्यास जैसे विषयों के इतिहास को अतीत के ठोस विवरणों, जो कि मुख्यतः राजाओं से संबंधित रहे हैं, के संदर्भ में लिखा है। इतिहास मुख्य रूप से अतीत का अध्ययन ही माना जाता है। परंपरागत इतिहास तो राजाओं और युद्धों के अध्ययन, शासकों के कार्यों, राजनीतिक व्यवस्थाओं के प्रकारों इत्यादि से ही भरा हुआ है। इसमें अपेक्षाकृत कम चकाचौंध एवं कम रोमांचक घटनाओं का अध्ययन अल्प मात्रा में ही हुआ है। इसी का परिणाम है कि इतिहास में कला, वास्तुकली एवं भवन विन्यास जैसे विषयों को भी राजसी परंपरा में ही देखा गया है।

12.

समाजशास्त्र के विषय-क्षेत्र के संबंध में स्वरूपात्मक एवं समन्वयात्मक संप्रदाय संबंधी विचारों को समझाइए।यासमाजशास्त्र की परिभाषा दीजिए तथा इसके अध्ययन-क्षेत्र की विवेचना कीजिए।यासमाजशास्त्र की परिभाषा दीजिए। इसके विषय-क्षेत्र के किसी एक संप्रदाय की व्याख्या कीजिए।या‘समाजशास्त्र सामाजिक संबंधों का अध्ययन है।’ इस कथन के परिप्रेक्ष्य में समाजशास्त्र के अध्ययन-क्षेत्र की विवेचना कीजिए।

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प्रत्येक विषय का अपना-अपना विषय-क्षेत्र होता है। इस विषय-क्षेत्र के आधार पर ही प्रत्येक विषय दूसरे विषयों से अलग हो जाता है। अन्य विषयों के समान ही समाजशास्त्र का भी अपना क्षेत्र है, परंतु एक आधुनिक एवं विस्तृत विज्ञान होने के कारण इसका विषय-क्षेत्र निर्धारित करना कठिन हैं। * यह कठिनाई विद्वानों के विचारों में मतभेद के कारण और अधिक बढ़ जाती है। कुछ विद्वान इसे समस्त सामाजिक विज्ञानों का मूल आधार मानते हैं तो कुछ इसे अनेक विषयों का भंडार या स्वामी बनाने की भूल करते हैं। कालबर्टन (Calberton) ने इस संदर्भ में उचित ही लिखा है, “समाजशास्त्र एक लचीला विज्ञान है, इसकी सीमाओं का आदि और अंत निर्धारित करना कठिन है। कहीं समाजशास्त्र सामाजिक मनोविज्ञान बन जाता है और कहीं आर्थिक सिद्धांत समाजशास्त्रीय विचारधारा बन जाता है। या प्राणिशास्त्रीय विचारधारा बन जाता है; अतः इसकी सीमा निश्चित करना असंभव है।” 

समाजशास्त्र का विषय-क्षेत्र

मतभेदों के बावजूद, समाजशास्त्र के विषय-क्षेत्र को दो प्रमुख संप्रदायों द्वारा स्पष्ट करने का प्रयास किया गया है जो कि इस प्रकार हैं–
(अ) विशेषात्मक संप्रदाय तथा
(ब) समन्वयात्मक संप्रदाय।

इन दोनों संप्रदायों को विस्तारपूर्वक समझकर, समाजशास्त्र के विषय-क्षेत्र का अनुमान लगाया जा सकता है।

(अ) विशेषात्मक या विशिष्टवादी या यथारूपेण संप्रदाय
विशेषात्मक विचारधारा के प्रमुख समर्थक सिमेल (Simmel), रिचार्ड (!Richard), टॉनीज (Tonnies), स्टेमलर (Stemmler), रॉस (Rose), वेबर (Weber), वीरकांत (Vierkant), पार्क (Park), बर्गेस (Burgess) तथा वॉन वीज (Von wiese) हैं। ये विद्वान समाजशास्त्र को विशेष विज्ञान के रूप में मानते हैं। इस संप्रदाय के समर्थक समाजशास्त्र का विषय-क्षेत्र वैसा ही निश्चित तथा परिसीमित कर देना चाहते हैं जैसा कि प्राकृतिक विज्ञान तथा अन्य सामाजिक विज्ञानों का है। इस संप्रदाय की प्रमुख विशेषताएँ निम्नलिखित हैं-

⦁    इस संप्रदाय के समर्थकों के अनुसार समाजशास्त्र का क्षेत्र सामाजिक संबंधों के स्वरूपों का अध्ययन करना होना चाहिए।
⦁    समाज के विभिन्न पक्षों का अध्ययन विभिन्न सामाजिक विज्ञान (जैसे-राजनीतिशास्त्र, इतिहास, अर्थशास्त्र आदि) करते हैं; अतः समाजशास्त्र में इनके अध्ययन की आवश्यकता नहीं है।
⦁    समाजशास्त्र का एक विशिष्ट एवं निश्चित क्षेत्र होना चाहिए।
⦁    समाजशास्त्र एक स्वतंत्र विज्ञान है।
⦁    समाजशास्त्र एक विश्लेषणात्मक विज्ञान है।

इस संप्रदाय के विचारकों के दृष्टिकोण को ठीक प्रकार से समझने के लिए निम्नलिखित प्रमुख समाजशास्त्रियों के विचारों पर प्रकाश डालना आवश्यक है-
1. सिमेल (Simmel) के विचार-जॉर्ज सिमेल के अनुसार समाजशास्त्र में प्रत्यक्ष और वास्तविक व्यवहारों के स्थान पर स्वरूपकीय व्यवहारों का अध्ययन करना चाहिए। उनके अनुसार समाजशास्त्र का अन्य विज्ञानों से वहीं संबंध है जो भौतिक विज्ञानों से रेखागणित का है। जिस प्रकार रेखागणित में भौतिक वस्तुओं की अंतर्वस्तु (Content) का नहीं वरन उसके। स्थान संबंधी स्वरूपों का अध्ययन किया जाता है, उसी प्रकार समाजशास्त्र का क्षेत्र भी। सामाजिक संबंधों और क्रियाओं का नहीं वरन् उनके स्वरूपों का अध्ययन है। सिमेल के अनुसार, सामाजिक संबंध के दो रूप होते हैं-(i) सूक्ष्म तथा (ii) स्थूल। इसके अनुसार समाजशास्त्र में सूक्ष्म संबंधों की विवेचना की जाती है। विभिन्न विज्ञानों में समाजशास्त्र के जो सूक्ष्म सिद्धांत काम कर रहे हैं, उन सिद्धांतों को उन विज्ञानों से अलग करके उनका स्वतंत्र रूप में अध्ययन करना ही समाजशास्त्र का प्रमुख अधिकार-क्षेत्र है। इस प्रकार हम देखते हैं कि विभिन्न सामाजिक विज्ञानों में तो सामाजिक संबंधों का अंतर्वस्तु का अध्ययन करते हैं, परंतु समाजशास्त्र में स्वरूप (Form) का अध्ययन किया जाता है। उदाहरण के लिए–आर्थिक क्रियाओं में उत्पादक, श्रमिक, विक्रेता, क्रेता, अर्थ मंत्री, मिल मालिक आदि सभी का योग रहता है; इन सबकी आर्थिक क्रियाएँ और उनके नियम वह अंतर्वस्तु हैं जिनका कि अध्ययन अर्थशास्त्र में किया जाता है, परंतु इन आर्थिक क्रियाओं में भाग लेने वाले व्यक्तियों में जो परस्पर संबंध है उसके स्वरूप का अध्ययन समाजशास्त्र में किया जाता है।
2. वीरकांत (Vierkant) के विचार-जर्मन समाजशास्त्री वीरकांत के अनुसार समाजशास्त्र का कार्य समाज के उन तत्त्वों का अंवेषण करना है जिनकी उत्पत्ति सामाजिक संबंधों के कारण होती है; उदाहरण के लिए–प्रेम, द्वेष, लज्जा, सहकारिता आदि। ये वे तत्त्व हैं जिनसे सामाजिक एकता उत्पन्न होती है। अन्य शब्दों में, ये संबंध व्यक्तियों को एक-दूसरे से बाँधते । हैं। समाजशास्त्र में इन मूल तत्त्वों या संबंधों का ही अध्ययन किया जाता है। वीरकांत ने समाजशास्त्र के विषय-क्षेत्र को इन शब्दों में स्पष्ट किया है, “समाजशास्त्र उन मानसिक संबंधों के अन्तिम स्वरूपों का अध्ययन है जो कि मनुष्य को एक-दूसरे से बाँधते हैं।”
3. वेबर (Weber) के विचार-मैक्स वेबर के अनुसार समाजशास्त्र सामाजिक क्रिया को समझने और व्याख्या करने में सहायक होता है। उनके अनुसार, सामाजिक व्यवहार दो व्यक्तियों के मध्य तब होता है जबकि वे एक-दूसरे के संपर्क में आते हैं और परस्पर कोई व्यवहार करते हैं। इस पर भी यह आवश्यक नहीं है कि प्रत्येक सामाजिक संबंध सामाजिक व्यवहार ही हो। उदाहरण के लिए दो व्यक्ति साइकिल से टकरा जाते हैं। इस प्रकार का टकराना एक प्राकृतिक घटना है, परंतु उन व्यक्तियों में से एक का दूसरे की चोट पर हाथ फेरना और क्षमा माँगना एक सामाजिक क्रिया है। इस प्रकार, वेबर के अनुसार, समाजशास्त्र का कार्य सामाजिक क्रिया की व्याख्या करना है।
4. टॉनीज (Tonnies) के विचार–टॉनीज भी समाजशास्त्र को एक विशिष्ट विज्ञान की श्रेणी में रखने के पक्षपाती थे। उनका कहना था कि समाजशास्त्र को विशिष्ट विज्ञान बनाने के लिए आवश्यक है कि इसके अंतर्गत सामाजिक संबंधों के केवल विशेष स्वरूपों का ही अध्ययन किया जाए। टॉनीज समाजशास्त्र को एक विशुद्ध विज्ञान बनाने के पक्ष में थे।
5. वॉन वीज (Von wiese) के विचार-वॉन वीज भी स्पष्ट रूप से सामाजिक संबंधों के स्वरूपों के अध्ययन को ही समाजशास्त्र का विषय-क्षेत्र मानते हैं। उन्होंने समाजशास्त्र के विषय-क्षेत्र को स्पष्ट करने के लिए सामाजिक संबंधों को 650 प्रकारों में वर्गीकृत किया है।
विशेषात्मक संप्रदाय की आलोचना-विशेषात्मक संप्रदाय की आलोचना प्रमुख रूप से फ्रांसीसी तथा अंग्रेज समाजशास्त्रियों ने निम्नलिखित प्रकार से की हैं-

1. समाजशास्त्र सामाजिक संबंधों के सूक्ष्म तथा अमूर्त स्वरूपों के अध्ययन तक ही सीमित नहीं है-इस संप्रदाय के प्रतिपादक समाजशास्त्र को सामाजिक संबंधों के सूक्ष्म तथा अमूर्त रूपों के अध्ययन तक सीमित कर देते हैं, परंतु किसी भी घटना का अध्ययन हम तब तक नहीं कर सकते जब तक कि उसके वास्तविक स्वरूपों का अध्ययन न कर लें। इस प्रकार, सिमेल का मत अपूर्ण है। समाजशास्त्र के छात्र का मुख्य उद्देश्य तो सामाजिक घटनाओं के सजीव रूप तथा उसकी वास्तविक परिस्थितियों दोनों को ही अध्ययन करना है।
2. स्वरूप (Form) और अंतर्वस्तु (Content) दो पृथक् वस्तुएँ नहीं हैं—इस संप्रदाय के समर्थकों के अनुसार स्वरूप’ और ‘अंतर्वस्तु’ एक-दूसरे से अलग हैं, परंतु यथार्थ में सामाजिक संबंधों में स्वरूप और अंतर्वस्तु को अलग नहीं किया जा सकता। वे एक-दूसरे पर आश्रित है और एक-दूसरे से घनिष्ठ रूप से संबंधित हैं। जब सामाजिक संबंधों की अंतर्वस्तु में कोई परिवर्तन आता है तो उनके स्वरूपों में भी परिवर्तन आ जाता है। इस तथ्य को ध्यान में रखते हुए सोरोकिन (Sorokin) ने इन शब्दों में आलोचना की है, “हम एक गिलास को | उसके स्वरूप को बदले बिना शराब, पानी या शक्कर से भर सकते हैं, परंतु मैं एक ऐसी सामाजिक संस्था की कल्पना भी नहीं कर सकता जिसका स्वरूप सदस्यों के बदलने पर भी न बदले।”
3. स्वरूपों का अध्ययन अन्य विज्ञानों में भी होता है-इस संप्रदाय के समर्थकों का यह कहना सत्य नहीं है कि केवल समाजशास्त्र में ही सामाजिक संबंधों के स्वरूपों का अध्ययन किया जाता है। समाजशास्त्र के अतिरिक्त और भी ऐसे विज्ञान हैं जिनमें सामाजिक संबंधों के अनेक स्वरूपों का अध्ययन किया जाता है। उदाहरण के लिए राजनीतिशास्त्र में युद्ध, शांति, संघर्ष, समझौता आदि सामाजिक संबंधों के अनेक स्वरूपों का अध्ययन किया जाता है। इसी प्रकार विधिशास्त्र में शक्ति दासता, आज्ञापालन, अधिकार आदि सामाजिक संबंधों के स्वरूपों का अध्ययन सदा होता आया है।
4. शुद्ध समाजशास्त्र की धारणा अव्यावहारिक हैं—विशेषात्मक संप्रदाय के समाजशास्त्रियों की शुद्ध समाजशास्त्र की धारणा अव्यावहारिक है क्योंकि प्रत्येक विज्ञान दूसरे विज्ञान से संबंधित हैं, अतः किसी भी विज्ञान को अन्य विज्ञानों से पूर्णतया अलग करके अध्ययन नहीं किया जा सकता। सामाजिक घटनाओं की तो प्रकृति ही ऐसी हैं कि इसे समझने के लिए विभिन्न दृष्टिकोणों द्वारा इसका अध्ययन करना अनिवार्य है।
5. समाज के सदस्यों को कम महत्त्व देना उचित नहीं है—विशेषात्मक संप्रदाय समाज के सदस्यों को कम महत्त्व देता है, परंतु यथार्थ में सभी सदस्य सामाजिक संबंधों की अंतर्वस्तु हैं।
6. समाजशास्त्र के क्षेत्र को अत्यधिक संकुचित कर दिया है-इस संप्रदाय ने समाजशास्त्र के क्षेत्र को अत्यधिक संकुचित कर दिया है। कोई भी विज्ञान वास्तविकता के बिना उचित प्रकार से विकसित नहीं होता। इसके लिए आवश्यक है कि समस्या के प्रत्येक पहलू का अध्ययन किया जाए, परंतु विशेषात्मक विचारधारा समाजशास्त्र को एक पक्ष विशेष तक ही सीमित कर देती है।
7. सूक्ष्म और अमूर्त स्वरूपों का अध्ययन लाभदायक नहीं इस विषय में राइट (Wright) का कथन है कि “विशुद्ध स्वरूपों के अध्ययन के परिणामस्वरूप हम ऐसे अमूर्त सिद्धांतों । का निर्माण कर लेते हैं, जो सामान्य होते हैं और हमारे मन में ये विचार उत्पन्न होते हैं कि इन सिद्धांत का ज्ञाने तो हम अपनी सामान्य बुद्धि से भी कर सकते हैं। इन्हें जानने के लिए इतने लंबे विचार, तर्क-शक्ति और विभिन्न परिभाषाओं के शब्दाडम्बरों की कोई आवश्यकता नहीं है। अनेक बार ये सिद्धांत इतने अस्पष्ट और धुंधले होते हैं कि पाठक झुंझला जाता है। और सोचने लगता है कि इनका कोई अर्थ है या नहीं। अतः राइट ने ठीक ही कहा है कि यदि सामाजिक संबंधों का सूक्ष्म और अमूर्त रूप से अध्ययन किया जाएगा तो वह समाजशास्त्र के लिए लाभदायक नहीं होगा।’
8. समाजशास्त्र की मौलिक प्रकृति के विरुद्ध विशेषात्मक विचारधारी समाजशास्त्र की प्रकृति के पूर्णतया प्रतिकूल है, जैसा कि गिडिंग्स (Giddings) लिखते हैं कि “समाजशास्त्र का मुख्य विषय सामाजिक संबंधों का अध्ययन है। संबंध सामाजिक जीवन में ही पाए जाते हैं। सामाजिक जीवन की प्रकृति इस प्रकार की है कि इसके समस्त भागों को एक-दूसरे के साथ गहरा संबंध है। ये सब एक-दूसरे पर प्रभाव डालते हैं और एक-दूसरे से प्रभावित होते हैं। ये भाग मिलकर कार्य करते हैं; अतः यदि इनको पृथक् करके इनका सूक्ष्म अध्ययन करें तो हम सामाजिक संबंधों के पारस्परिक प्रभावों का कोई ज्ञान प्राप्त न कर सकेंगे, हमारा ज्ञान बिल्कुल अपूर्ण रहेगा।”

(ब) समन्वयात्मक संप्रदाय
समन्वयात्मक संप्रदाय के अनुसार समाजशास्त्र एक सामान्य विज्ञान है तथा यह अन्य विशिष्ट साम्राजिक विज्ञानों का समन्वय मात्र है। इस संप्रदाय के प्रमुख समर्थक फ्रांसीसी और अंग्रेज समाजशास्त्री हैं। इनके अनुसार समाजशास्त्र को अपना क्षेत्र सीमित तथा संकुचित न बनाकर विस्तृत और व्यापक बनाना होगा। समाजशास्त्र के क्षेत्र को कुछ विषयों तक सीमित न करके उसे अन्य सभी विज्ञानों में भी समन्वित करना चाहिए। अन्य विज्ञानों से पृथक् रखने पर समाजशास्त्र एक जड़ विषय हो जाएगा। दुर्वीम, हॉबहाइस, सोरोकिन, जिंसबर्ग तथा मोटवानी आदि इसी मत के समर्थक हैं। इन विद्वानों के मत में समाजशास्त्र एक विज्ञानों का विज्ञान’ है। सभी विज्ञान उसके क्षेत्र में आते हैं और वह सभी को अपने में समन्वित करता है। सामाजिक जीवन के समस्त भाग परस्पर संबंधित हैं। इस कारण किसी एक पक्ष का अध्ययन करने से हम संपूर्ण सामाजिक जीवन को नहीं समझ सकते। ऐसी दशा में आवश्यक है कि हम समाजशास्त्र में संपूर्ण सामाजिक जीवन का व्यवस्थित अध्ययन करें, केवल सूक्ष्म सिद्धांतों का अध्ययन करने से काम नहीं चलेगा। मोटवानी'(Motwani) के अनुसार, इस प्रकार, समाजशास्त्र जीवन को पूरी तरह और एक समग्र रूप में देखने का प्रयास करता है। इस प्रकार, समाजशास्त्र के क्षेत्र के अंतर्गत समाज के सामाजिक संबंधों को सामान्य अध्ययन होना चाहिए। इस संप्रदाय के प्रमुख समर्थकों के विचार निम्नांकित हैं-

दुर्वीम के विचार-दुर्वीम के अनुसार, प्रत्येक समाज में कुछ विचार, धारणाएँ एवं भावनाएँ होती हैं, जिनका पालन संबंधित समाज के अधिकांश सदस्य करते हैं। ये विचार एवं धारणाएँ संबंधित समाज के सामाजिक जीवन का सामूहिक प्रतिनिधित्व करते हैं। दुर्णीम के अनुसार, समाजशास्त्र का कार्य इसी सामूहिक प्रतिनिधित्व का अध्ययन करना है। इस स्थिति में स्पष्ट हैं कि समाजशास्त्र को एक सामान्य विज्ञान होना चाहिए।

हॉबहाउस के विचार-हॉबहाउस ने भी समाजशास्त्र को एक सामान्य विज्ञान माना है। इनके अनुसार समाजशास्त्र अन्य विज्ञानों द्वारा प्राप्त विभिन्न सिद्धांतों का अध्ययन करता है तथा कुछ सामान्य तत्त्वों को ज्ञात करता है। इन सामान्य तत्त्वों द्वारा समाज पर पड़ने वाले प्रभावों का अध्ययन भी समाजशास्त्र के अंतर्गत किया जाता है।

सोरोकिन के विचार–सोरोकिन ने भी समाजशास्त्र को एक सामान्य विज्ञान माना है तथा अपने मत की पुष्टि इन शब्दों में की हैं, “मान लीजिए, यदि सामाजिक घटनाओं को वर्गों में वर्गीकृत कर दिया जाए और प्रत्येक वर्ग का अध्ययन एक विशेष सामाजिक विज्ञान करें तो इन विशेष सामाजिक विज्ञानों के अतिरिक्त एक ऐसे विज्ञान की आवश्यकता होगी जो सामान्य हो एवं विभिन्न विज्ञानों के संबंधों का अध्ययन करें।”

वार्ड के विचार-वार्ड ने समाजशास्त्र को ज्ञान की विभिन्न शाखाओं का समन्वय मात्र माना हैं। समाज का निर्माण करने वाले समूह एवं संस्थाएँ आदि परस्पर एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं, जिसके कारण एक में हुआ परिवर्तन दूसरों पर प्रभाव डालता है। इस प्रकार समाजशास्त्र का आधार अन्य सामाजिक विज्ञानों के परिणाम हैं और इसलिए समाजशास्त्र को विभिन्न सामाजिक विज्ञानों से प्राप्त केंद्रीय विचारों का समन्वय और अध्ययन करना चाहिए।

समन्वयात्मक संप्रदाय की आलोचना–जर्मन समाजशास्त्री समन्वयात्मक संप्रदाय की निम्नांकित बिदुओं के आधार पर आलोचना करते हैं-
⦁    इन विद्वानों के अनुसार, समाजशास्त्र के समन्वयात्मक दृष्टिकोण से किए गए अध्ययन या सामान्य अध्ययन में, समाज में पाए जाने वाले प्रत्येक प्रकार के सामाजिक संबंधों का ज्ञान प्राप्त करना पड़ेगा; परंतु ये संबंध इतने अधिक हैं कि उनका संपूर्ण अध्ययन करना प्रायः संभव नहीं है।
⦁    दूसरा दोष यह है कि यदि हम समन्वयात्मक अध्ययन को समाजशास्त्र का लक्ष्य बना लेते हैं तो समाजशास्त्र में भी प्रायः उन विषयों का अध्ययन करना पड़ेगा। जिनका कि अध्ययन अन्य सामाजिक विज्ञान करते हैं। इस प्रकार समाजशास्त्र और अन्य सामाजिक विज्ञानों की अध्ययन-वस्तु में कोई अंतर नहीं रह जाएगा।
⦁    दि समाजशास्त्र सभी प्रकार के तथ्यों एवं सामाजिक घटनाओं का अध्ययन करना शुरू कर देगा तो यह विशुद्ध शास्त्र न रहकर एक मिश्रित शास्त्र बन जाएगा।

निष्कर्ष–उपर्युक्त विवेवचन से स्पष्ट हो जाता है कि समाजशास्त्र की विषय-वस्तु के समुचित अध्ययन के लिए प्रस्तुत समन्वयात्मक तथा विशेषात्मक दोनों दृष्टिकोण एकपक्षीय हैं तथा दोनों दृष्टिकोणों में समन्वय की आवश्यकता है। केवल एक ही दृष्टिकोण अपनाने से हमारी समस्याओं का समाधान नहीं हो पाएगा। अन्य शब्दों में, समाजशास्त्र के पूर्ण अध्ययन के लिए विशिष्ट व सामान्य दोनों विचारधाराएँ आवश्यक हैं। यदि हम ऐसा नहीं करेंगे तो समाजशास्त्र को एक जटिल विज्ञान के रूप में परिणत कर देंगे। यथार्थ में विशेषात्मक और समन्वयात्मक विचारधाराएँ एक-दूसरे की विरोधी नहीं हैं वरन् एक-दूसरे की पूरक हैं। हॉबहाउस ने ठीक ही कहा है, “सामान्य समाजशास्त्र में जब तक विशिष्टता उत्पन्न नहीं होती, तब तक यह न तो स्वतंत्र तथा पूर्ण शास्त्र है और न यह अन्य सामाजिक संबंधों का समन्वय ही है, जो उनके द्वारा खोजे हुए सिद्धांतों में शाब्दिक संवर्द्धन करता है।”

13.

क्या एक जनसंचार के माध्यम के रूप में रेडियो खत्म हो रहा है? उदारीकरण के बाद भी भारत में एफ०एम० स्टेशनों के सामर्थ्य के चर्चा करें।

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⦁    टी०वी०, इंटरनेट तथा अन्य दृश्य-श्रव्य मनोरंजक माध्यमों के आने के बाद लोगों ने यह मानना शुरू कर दिया था कि रेडियो अब जनसंपर्क के साधन से अलग हो जाएगा। लेकिन यह अवधारणा गलत निकली।

⦁    वर्ष 2000 में आकाशवाणी के कार्यक्रम भारत के सभी दो-तिहाई घर-परिवारों में 24 भाषाओं और 146 बोलियों में 12 करोड़ से भी अधिक रेडियो सेटों पर सुने जा सकते थे। 2002 में गैर सरकारी स्वामित्व वाले एफ०एम० रेडियो स्टेशनों की स्थापना से रेडियो पर मनोरंजक कार्यक्रमों में बढ़ोतरी हुई।

⦁    श्रोताओं को आकर्षित करने के लिए ये निजी तौर पर चलाए जा रहे रेडियो स्टेशन अपने श्रोताओं का मनोरंजन करते थे।

⦁    चूंकि गैर सरकारी तौर पर चलाए जाने वाले एफ०एम० चैनलों को राजनीतिक समाचार बुलेटिन प्रसारित करने की अनुमति नहीं है, इसलिए इनमें बहुत से चैनल अपने श्रोताओं को लुभाए रखने के लिए किसी विशेष प्रकार के लोकप्रिय संगीत में अपनी विशेषता रखते हैं। एक एफ.एम. चैनल का दावा है कि वह दिन भर हिट गानों को ही प्रसारित करता है।

⦁    अधिकांश एफ०एम० चैनल जो कि युवा शहरी व्यावसायिकों तथा छात्रों में लोकप्रिय है, अक्सर मीडिया समूहों के होते हैं। जैसे रेडियो मिर्ची टाइम्स ऑफ इण्डिया समूह का है, ‘रेड एफ०एम०’ लिविंग मीडिया का तथा रेडियो सिटी-स्टार नेटवर्क के स्वामित्व में है। लेकिन नेशनल पब्लिक रेडियो (यू०एस०ए०) अथवा बी०बी०सी (यू०के०) जैसे स्वतंत्र रेडियो स्टेशन जो सार्वजनिक प्रसारण में संलग्न हैं, हमारे प्रसारण परिदृश्य से बाहर हैं।

⦁    रंग दे बसंती’ तथा ‘लगे रहो मुन्ना भाई’ जैसी फिल्मों में रेडियों का प्रयोग किया गया है।

⦁    एफ०एम० चैनलों के प्रयोग की संभावनाएँ अत्यधिक हैं। रेडियो स्टेशनों के और अधिक निजीकरण तथा समुदाय के स्वामित्व वाले रेडियो स्टेशनों के उद्भव के परिणामस्वरूप रेडियो स्टेशनों का और अधिक विकास होगा। स्थानीय समाचारों को सुनने की माँग बढ़ रही है। भारत में एफ०एम० चैनलों को सुनने वाले घरों की संख्या ने स्थानीय रेडियो द्वारा नेटवर्को के स्थान को लेने की विश्वव्यापी प्रवृत्ति को बल दिया है।

14.

कृषि मजदूरों की स्थिति तथा उनकी सामाजिक-आर्थिक उर्ध्वगामी गतिशीलता के अभाव के बीच एक सीधा संबंध है। इनमें से कुछ के नाम बताइए।

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⦁    भारतीय ग्रामीण समाज पूरी तरह से कृषि पर आश्रित है। यह उनकी आजीविका का एकमात्र साधन है। दुर्भाग्यवश भूमि का वितरण समान तथा संगठित रूप से ग्रामीण समाज के भूमिहीनों के बीच नहीं किया गया। • भारतीय ग्रामीण समाज में नाते-रिश्तेदारी की प्रथा प्रचलित है। कानून के मुताबिक महिलाओं को परिवार की संपत्ति पर समान रूप से अधिकार है। लेकिन व्यावहारिक रूप से कागजों पर ही सीमित है। पुरुषों के प्रभुत्व के कारण उन्हें इस अधिकार से वंचित कर दिया गया है।

⦁    ग्रामीण क्षेत्रों के अधिकांश लोग भूमिहीन हैं तथा वे अपनी आजीविका के लिए कृषि श्रमिक बन जाते हैं। उन्हें निर्धारित न्यूनतम मजदूरी से कम मजदूरी मिलती है। उनका रोजगार सुरक्षित नहीं होता। उन्हें नियमित रूप से काम भी नहीं मिलते। अधिकांश कृषि श्रमिक दैनिक मजदूरी पर काम करते हैं

⦁    पट्टेदारों को भी अधिक आमदनी नहीं होती क्योंकि उन्हें अपने उत्पादन का एक बड़ा हिस्सा भू-स्वामी को देना पड़ता है।

⦁    भूमि का स्वामित्व ही किसानों की सामाजिक-आर्थिक गतिशीलता का निर्धारक है। अतएव ग्रामीण समाज को एक वर्ग संरचना के रूप में जाति व्यवस्था के आधार पर देखा जा सकता है।

⦁    यद्यपि यह हमेशा सत्य नहीं होता। उदाहरण के तौर पर, ग्रामीण समाज में ब्राह्मण एक प्रभुत्वसंपन्न जाति है, किंतु यह प्रभुत्व भू-स्वामी नहीं है। इसलिए यह ग्रामीण समाज का अंग तो है, किंतु कृषि संरचना से बाहर है।

15.

समाजशास्त्र और राजनीतिशास्त्र में संबंध बताइए। अथवा समाजशास्त्र तथा राजनीतिशास्त्र के अंतर्संबंधों की व्याख्या कीजिए।

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समाजशास्त्र तथा राजनीतिशास्त्र ऐसे सामाजिक विज्ञान हैं जिनमें घनिष्ठ संबंध पाया जाता है। प्रमुख राजनीतिशास्त्री कैटलिन एवं अनेक अन्य विद्वानों ने इस बात पर बल दिया है कि “समाजशास्त्र व राजनीतिशास्त्र को अलग-अलग करना संभव नहीं है और वास्तव में ये दोनों एक ही चित्र के दो पहलू हैं।” समाजशास्त्र के लिए राजनीतिशास्त्र तथा राजनीतिशास्त्र के लिए समाजशास्त्र का ज्ञान होना आवश्यक है। इसी संबंध में गिडिंग्स का कथन है, “समाजशास्त्र के प्रारंभिक सिद्धांतों से अनभिज्ञ लोगों को राज्य के सिद्धांतों को पढ़ाना वैसे ही व्यर्थ है, जैसे न्यूटन द्वारा बताए गए गति-नियमों को न जानने वाले व्यक्ति को खगोलशास्त्र अथवा ऊष्मा विज्ञान पढ़ाना।” कोई भी राज्य समाज से पहले जन्म नहीं ले सकता, जबकि यह तो संभव है कि समाज हो और राज्य न हो। समाज ही राज्य को जन्म देता है और राज्य समाज के ढाँचे में कानूनों द्वारा परिवर्तन करता रहता है। समाजशास्त्र ने जिस सामाजिक विज्ञान को सर्वाधिक प्रभावित किया है वह राजनीतिशास्त्र ही है। इसी का एक परिणाम यह निकला है। कि आज राजनीतिशास्त्र में राजनीतिक व्यवस्था की बजाय राजनीतिक व्यवहार के अध्ययन पर अधिक बल दिया जा रहा है जिसके बारे में सामान्यीकरण भी किया जा सकता है।

16.

चुनावों के अध्ययन में राजनीति विज्ञान और समाजशास्त्र किस प्रकार आपस में अंतःक्रिया करते तथा परस्पर प्रभाव डालते हैं? 

Answer»

चुनावों का अध्ययन एक ऐसा विषय है जो राजनीति विज्ञान और समाजशास्त्र को परस्पर नजदीक लाता है। चूंकि राजनीति विज्ञान की मुख्य रुचि राजनीति में है तथा चुनाव राजनीति से ही संबंधित हैं, इसलिए उनका चुनावों के अध्ययन में ध्यान केन्द्रित होना स्वाभाविक है। समाजशास्त्र में भी चुनावों के अध्ययन में इसलिए दिलचस्पी ली जाती है क्योंकि बहुत-से सामाजिक-सांस्कृतिक कारक चुनावों एवं मतदान व्यवहार को प्रभावित करते हैं। ऐसे सामान्य विषयों को समझने में दोनों ही विज्ञान एक-दूसरे को सहयोग प्रदान करते हैं। यह भी सत्य है कि समाजशास्त्रीय पद्धतिशास्त्र तथा समाजशास्त्र एवं राजनीति विज्ञान के संयुक्त चिंतन को अपनाकर ही इस प्रकार के अध्ययन सफलतापूर्वक किए जा सकते हैं।

17.

समाजशास्त्र और अर्थशास्त्र के मध्य संबंध स्पष्ट कीजिए।

Answer»

समाजशास्त्र और अर्थशास्त्र का परस्पर घनिष्ठ संबंध है। अर्थशास्त्र भी एक सामाजिक विज्ञान है, क्योंकि उसमें मनुष्य की आर्थिक क्रियाओं का अध्ययन किया जाता है। अर्थशास्त्र वस्तुओं और सेवाओं के उत्पादन एवं वितरण का अध्ययन करता है तथा इसका मुख्य विषय आर्थिक क्रियाएँ हैं। इसमें मुख्य रूप से इस बात पर विचार किया जाता है कि उत्पादन के साधनों का अर्जन किस प्रकार किया जा सकता है और उससे संबंधित विभिन्न नियम क्या-क्या हैं परंतु उत्पादन के साधनों का संबंध मनुष्य से होता है और मनुष्य समाज का क्रियाशील सदस्य है। समाजशास्त्र के माध्यम से सामाजिक संबंधों को समझने का प्रयास किया जाता है और अर्थशास्त्र द्वारा समाज और व्यक्ति की आर्थिक गतिविधियों को समझने का प्रयास किया जाता है। अन्य शब्दों में हम कह सकते हैं कि अर्थशास्त्र संबंधों का अध्ययन करता है और समाजशास्त्र सामाजिक संबंधों का, परंतु आर्थिक संबंध सामाजिक संबंध पर आश्रित होते हैं। वास्तव में आर्थिक संबंध सामाजिक संबंधों के गुच्छे की एक कड़ी-मात्र हैं। इस प्रकार, अर्थशास्त्र और समाजशास्त्र दोनों एक-दूसरे के अत्यधिक निकट हो जाते हैं, दोनों एक-दूसरे को प्रभावित करते हैं।

18.

वे कौन से कारक हैं, जिन्होंने कुछ समूहों को नव धनाढ्य, उद्यमी तथा प्रबल वर्ग के रूप में परिवर्तन को संभव किया है? क्या आप अपने राज्य में इस परिवर्तन के उदाहरण के बारे में सोच सकते हैं?

Answer»

निम्नलिखित कारकों ने कुछ समूहों को नवधनाढ्य, उद्यमी तथा प्रबल वर्ग के रूप में परिवर्तन को संभव किया

(i) नयी तकनीक
(ii) यातायात के साधन
(iii) नए-नए क्षेत्रों में निवेश की सुविधा।
(iv) शिक्षा
(v) विकसित क्षेत्रों की तरफ पलायन
(vi) राजनीतिक गतिशीलता
(vi) बाह्य अर्थव्यवस्था से जुड़ाव
(vii) मिश्रित अर्थव्यवस्था।

हाँ, मैं अपने राज्य में इस प्रकार के परिवर्तन के बारे में सोच सकता हूँ। उपरोक्त कारकों के साथ किसी भी राज्य या कोई भी समूह उद्यमी तथा प्रबल वर्ग में परिवर्तित हो सकता है।

19.

‘दि सोशल आर्डर’ पुस्तक के लेखक का नाम लिखिए।

Answer»

‘दि सोशल आर्डर’ पुस्तक के लेखक का नाम रॉबर्ट बीरस्टीड है।

20.

समाजशास्त्र, राजनीतिशास्त्र, मनोविज्ञान तथा अर्थशास्त्र किस प्रकार के विज्ञान माने जाते हैं?

Answer»

समाजशास्त्र, राजनीतिशास्त्र, मनोविज्ञान तथा अर्थशास्त्र सामाजिक विज्ञान हैं।

21.

अपने आसपास वाले किसी भी व्यवसाय को चुनिए और उसका वर्णन निम्नलिखित पंक्तियों में दीजिएः(क) कार्य शक्ति का सामाजिक संगठन-जाति, लिंग, आयु, क्षेत्र।(ख) मज़दूर प्रक्रिया-काम किस तरह से किया जाता है।(ग) वेतन तथा अन्य सुविधाएँ(घ) कार्यावस्था – सुरक्षा, आराम का समय, कार्य के घंटे इत्यादि।

Answer»

⦁    1990 के दशक से सरकार ने उदारीकरण की नीति को अपनाया। निजी कंपनियों, विशेष तौर से विदेशी कंपनियाँ उन क्षेत्रों में निवेश करने के लिए आगे आईं, जो पहले सरकार के लिए आरक्षित थीं।

⦁    सामान्यतः लोगों को रोजगार प्राप्त हुआ। ऐसा विज्ञापन अथवा रोजगार कार्यालयों के माध्यम से संभव हो पाया। औद्योगिक क्षेत्रों में पुरुष तथा महिलाएँ दोनों ही काम करते हैं। जो लोग उद्योगों में काम करते हैं, वे वेतन के अतिरिक्त भी कुछ लाभ; जैसे-मकान भत्ता, चिकित्सा भत्ता आदि प्राप्त करते हैं।

⦁    कारखानों में काम करने वाले श्रमिकों की नियुक्ति की प्रक्रिया में परिवर्तन आया। पिछले कई वर्षों से श्रमिकों का काम ठेकेदारों के मार्फत प्राप्त होता था। कानपुर व कपड़ा मिल में इस तरह के लोगों को मिस्त्री कहा जाता था। वे लोग भी कामगार होते थे। वे कामगारों के क्षेत्र तथा समुदाय के लोग होते थे। किंतु मालिकों के कृपापात्र होने के कारण वे कामगारों पर अपना वर्चस्व दिखाते थे।

⦁    मिस्त्री कामगारों पर सामाजिक दबाव भी बनाते थे। अब इन लोगों का महत्व खत्म हो गया है। अब प्रबंधन तथा श्रम संगठनों के सहयोग से कामगारों की नियुक्ति होती है।

⦁    कामगारों की यह भी इच्छा रहती है कि वह अपने बाद अपने बच्चों को काम पर लगवा दें। बहुत सारी फैक्टरियाँ स्थायी कर्मचारियों के स्थान पर बदले कर्मचारियों की नियुक्ति करती हैं। बहुत सारे बदली कर्मचारी वस्तुतः कई वर्षों से एक ही कंपनी में काम करते हैं, किंतु फिर भी उन्हें, स्थायी नहीं किया जाता। इसे संगठित क्षेत्र में अनुबंध का काम। कहते हैं।

⦁    निर्माण क्षेत्रों में तथा ईंट भट्टा उद्योगों में ठेकेदारी व्यवस्था के अंतर्गत काम करने वाले अस्थायी कामगारों को देखा जा सकता है। ठेकेदार गाँव में जाकर वहाँ के लोगों से काम के बारे में पूछते हैं। वे उन्हें कुछ पैसे उधार दे देते हैं। इस उधार दिए गए पैसे में काम करने के स्थान पर आने-जाने का परिवहन व्यय भी शामिल होता है।

⦁    इन उधार दिए गए पैसों को अग्रिम मजदूरी के तौर पर माना जाता है तथा जब तक इस उधार को चुकता नहीं कर दिया जाता, तब तक मजदूरी नहीं दी जाती है। पहले भूस्वामियों के द्वारा कृषि श्रमिकों को ऋण के जाल में फँसाया जाता था। अब औद्योगिक क्षेत्र में अस्थायी मजदूर के रूप में वे पुनः ऋण के जाल में फँस गए। वे ठेकेदारों से किसी अन्य सामाजिक सरोकारों से नहीं जुड़े होते हैं। इस अर्थ में वे औद्योगिक समाज में ज्यादा स्वच्छंद हैं। वे अपना अनुबंध तोड़ सकते हैं तथा अपना रोजगार हूँढ सकते हैं। कभी-कभी तो पूरा परिवार ही काम की तलाश में बाहर चला जाता है। तथा बच्चे अपने माता-पिता ही मदद करते हैं।

⦁    आज जहाँ तक उद्योगों में श्रम शक्ति के सामाजिक बनावट का प्रश्न है, औद्योगिक क्षेत्र में 15-60 वर्ष तक के सभी जाति तथा लिंगों के लोग काम करते हैं। देश के कुछ हिस्सों में दूसरे-क्षेत्रों की तुलना में अधिक उद्योग हैं।

⦁    विभिन्न श्रमिकों को विभिन्न उद्योगों में उनकी योग्यता, अनुभव, उम्र तथा कार्य की जोखिम के दृष्टिगत कार्य का समय अलग-अलग निर्धारित होता है। अनुबंध की सेवा-शर्तों के अधीन ठेका श्रमिकों को एक निश्चित मज़दूरी दी जाती है। असंगठित क्षेत्रों की तुलना में संगठित क्षेत्र में वेतन तथा अन्य भत्ते ज्यादा मिलते हैं।

⦁    औद्योगिक श्रमिकों की कार्य-दशाओं में सुधार के लिए भारत सरकार ने कई कानून बनाए हैं। सन् 1952 के खान अधिनियम में एक सप्ताह में एक कामगार द्वारा किसी उद्योग में काम करने के कुल घंटों को परिभाषित किया गया है। औद्योगिक श्रमिकों को निर्धारित समयाविधि के बाद काम करने के बदले में अतिरिक्त भुगतान की व्यवस्था का प्रावधान है। इन नियमों का पालन बड़ी कंपिनयों के द्वारा तो किया जाता है किंतु छोटी कंपनियाँ इनकी अवहेलना करती हैं। इसके अलावा उप-अनुबंध भी आजकल फैल रहा है।

⦁    भूमिगत खानों में काम करने वाले मजदूर बेहद जोखिम भरी स्थितियों में काम करते हैं। इनके सामने बाढ़, आग, खान की दीवारों तथा छतों को गिरना, गैसों का उत्सर्जन तथा ऑक्सीजन की कमी का खतरा हमेशा रहता है। बहुत से कामगारों को साँस लेने में कठिनाई होती है तथा कई प्रकार की बीमारियों का खतरा रहता है।

22.

ईंटें बनाने के, बीड़ी रोल करने के, सॉफ्टवेयर इंजीनियर या खदान के काम जो बॉक्स में वर्णित किए गए हैं, के कामगारों के सामाजिक संघटन का वर्णन कीजिए। कार्यावस्थाएँ कैसी हैं और उपलब्ध सुविधाएँ कैसी हैं? मधु जैसी लड़कियाँ अपने काम के बारे में क्या सोचती हैं?

Answer»

⦁    सामाजिक संस्थाएँ; जैसे-जाति, रिश्तेदारी, संपर्क, लिंग तथा क्षेत्र कार्य के क्षेत्र का निर्धारण करते हैं। ये इस बात का भी निर्धारण करते हैं कि उत्पादन का विपणन किस प्रकार से होता है। कुछ रोजगार के क्षेत्रों तथा विभागों में महिलाएँ पुरुषों की तुलना में अधिक संख्या में काम करती हैं। उदाहरण के तौर पर शिक्षक तथा नर्स के रूप में महिलाएँ पुरुषों से अधिक संख्या में काम करती हैं, अपेक्षाकृत इंजीनियरिंग अथवा अन्य क्षेत्रों के।

⦁    भारत में 90% कार्य, चाहे वो कृषि का हो, उद्योग का हो या सेवा का हो-असंगठित अथवा अनौपचारिक क्षेत्र में है।

⦁    बहुत कम लोग बड़ी फर्मों में काम करते हैं जहाँ कि वे दूसरे क्षेत्रों और पृष्ठभूमि वाले लोगों से मिल पाते हैं।

⦁    नगरीय क्षेत्र में इस प्रकार के मौके मिल जाते हैं। नगरीय क्षेत्र में आपका पड़ोसी आपसे भिन्न क्षेत्र का हो सकता है। मोटे तौर पर अधिकतर भारतीय लोग छोटे पैमाने पर ही कार्य कर रहे स्थानों पर ही कार्य करना पंसद करते हैं। भारत में लगभग 60% लोग प्राथमिक क्षेत्र (कृषि तथा खान), 17% लोग द्वितीयक क्षेत्र (उत्पादक, निर्माण तथा उपयोगिता) तथा 23% लोग तृतीयक क्षेत्र (व्यापार, यातायात, वित्तीय, सेवाएँ इत्यादि) में
कार्यरत थे।

⦁    कृषि के क्षेत्र में तेजी से गिरावट आई है। इस क्षेत्र में होने वाले कार्य लगभग आधे रह गए हैं। यह स्थिति बहुत ही गंभीर है। इसका अर्थ यह हुआ कि जिस क्षेत्र में ज्यादा लोग कार्यरत हैं, वह उन्हें, अधिक आमदनी देने में सक्षम नहीं है।

⦁    भारत अभी भी एक बड़ा कृषि प्रधान देश है। सेवा क्षेत्र-दुकानें, बैंक, आई०टी० उद्योग, होटल तथा अन्य क्षेत्रों में ज्यादा लोग कार्यरत हैं। नगरीय मध्यम वर्ग का विकास उनके मूल्यों के साथ हो रहा है। ठीक उसी प्रकार से जिस प्रकार से हम टी०वी० के सीरियलों तथा फिल्मों में देखते हैं।

⦁    लेकिन हम यह भी देखते हैं कि भारत में बहुत थोड़े से लोग ही सुरक्षित रोजगार प्राप्त करने में सफल हो पाते हैं। इसके साथ ही वेतनभोगी वर्ग का एक छोटा-सा हिस्सा भी अनुबंध श्रम के प्रचलन के कारण असुरक्षित हो गया है।

⦁    सरकारी रोजगार ही अब तक जनसंख्या के अधिकांश लोगों का कल्याण करने का एकमात्र मार्ग था, लेकिन अब वह भी कम होता जा रहा है। मधु जैसी लड़कियाँ बीड़ी बनाने तथा तेंदु के पत्ते को गोल कर उसमें तंबाकू भरने का पूरा आनंद उठाती है।

⦁    वे अपने परिवार के साथ बैठकर अन्य महिलाओं के साथ गपशप करती हैं। वे अपना अधिकांश समय बीडी बनाने में लगाती हैं।

⦁    लंबे समय तक एक ही मुद्रा में बैठे रहने के कारण मधु की पीठ में दर्द हो जाता है। मधु फिर से विद्यालय जाना चाहती है।

23.

उदारीकरण ने रोजगार के प्रतिमानों को किस प्रकार प्रभावित किया है?

Answer»

⦁    उदारीकरण के कारण भारतीय बाजारों तथा दुकानों में विदेशी सामान बड़ी सहजता से मिलने लगे हैं। इसके कारण कुछ श्रमिकों को अपने रोजगार से हाथ धोना पड़ा है।

⦁    बहुत सारी भारतीय कंपनियों को बहुराष्ट्रीय कंपनियों ने खरीद लिया। किंतु इसके साथ ही बहुत सारी भारतीय कंपनियाँ बहुराष्ट्रीय कंपनी के रूप में भी उभरीं। उदाहरण के तौर पर पारले पेय को कोका
कोला ने खरीद लिया।

⦁    उदारीकरण का दूसरा क्षेत्र खुदरा व्यापार का क्षेत्र है। बड़ी विदेशी कंपनियों तथा व्यापारियों के भारत में आने से भारत के छोटे व्यापारी, दुकानदार, हस्तकला विक्रेता, हॉकर इत्यादि अपना रोजगार खो बैठे अथवा उनका छोटा व्यापार इससे बुरी तरह से प्रभावित हुआ। इसका कारण बड़े-बड़े मॉल, शोरूम, रिलायंस अथवा शुभिच्छा थे।

⦁    विश्व के बड़े व्यापारिक संस्थान; जैसे-वॉलमार्ट स्टोर्स, कैरेफोर तथा टिस्को भारत में प्रवेश की राह तलाश रहे हैं जबकि बाजार में सरकार ने प्रत्यक्ष विदेशी निवेश पर प्रतिबंध लगा रखा है।

⦁    वॉलमार्ट, कैरीफोर तथा टिस्को एक संयुक्त उपक्रम स्थापना करने वाली हैं। भारत का खुदरा व्यापार क्षेत्र लोगों को केवल इसलिए नहीं आकर्षित कर रहा है कि यह तेजी से संवृद्धि कर रहा है बल्कि इसलिए कि छोटी-छोटी दुकानों का व्यापार कुल राष्ट्रीय व्यापर का 97% है। लेकिन उद्यमों की इस विशेषता को देखते हुए सरकार विदेशियों को बाजार में प्रवेश करने से क्यों रोक रही है।

⦁    सरकार सार्वजनिक कंपनियों के अपने हिस्से को निजी क्षेत्र की कंपनियों को बेचने का प्रयास कर रही है। इसे विनिवेश कहा जाता है। कई सरकारी कर्मचारी इससे भयभीत हैं कि कहीं विनिवेश के कारण उनकी नौकरी न चली जाए।

⦁    कंपनियाँ अपने स्थायी कर्मचारियों की संख्या में कमी कर रही हैं तथा छोटी-छोटी कंपनियों के द्वारा अपना काम करवा रही हैं (बायस्रोत के रूप में)। बहुराष्ट्रीय कंपनियों के लिए बाहयस्रोतों से काम करवाना अब वैश्विक रूप धारण करता जा रहा है। ये कंपनियाँ भारत जैसे विकासशील देशों में, जहाँ कि श्रम काफी सस्ता है, बाह्यस्रोतों से काम करवा रही हैं, छोटे-छोटे धर्मों में संगठित होना श्रम संगठनों के लिए बेहद कठिन है।

24.

संस्कृति पर भूमंडलीकरण के प्रभाव की संक्षेप में चर्चा कीजिए।

Answer»

⦁    भूमंडलीकरण के युग (1999-2000) में कई बड़े-बड़े सांस्कृतिक परिवर्तन हुए, जिससे यह डर उत्पन्न हो गया है कि हमारी भारतीय संस्कृति पीछे न रह जाए।

⦁    समय-समय पर हम गरमा-गरम बहस (चर्चाएँ) समाज के विषय में सुनते आ रहे हैं। इस तरह की बहसें केवल राजनीतिक अथवा आर्थिक ही नहीं होतीं; बल्कि पहनावे, जीवन-शैली, संगीत, नृत्य, फिल्म, भाषा तथा शारीरिक भाषा के संदर्भ में भी की जाती हैं।

⦁    19 वीं सदी के सुधारक तथा प्रारंभिक राष्ट्रवादी नेता भी संस्कृति तथा परंपरा पर विचार-विमर्श किया करते थे। वे मुद्दे आज भी कुछ दृष्टियों में वैसे ही हैं और कुछ अन्य दृष्टियों में भिन्न भी हैं। शायद अंतर यही है कि परिवर्तन की गहनता तथा व्यापकता भिन्न है।

⦁    कुछ विचारकों का मानना था कि भारत की सांस्कृतिक परंपरा कूपमंडूक यानी जीवनभर कुएँ के भीतर रहने वाले उस मेंढक के समान है, जो कुएँ से बाहर की दुनिया के बारे में कुछ भी नहीं जानता एवं हर बाहरी वस्तु के प्रति शंकालु बना रहता है। वह किसी से बात नहीं करता तथा किसी से किसी विषय पर तर्क-वितर्क भी नहीं करता। वह तो बस बाहरी दुनिया पर केवल संदेह करना ही जानता है। सौभाग्य से हम आज भी अपनी परंपरागत खुली अभिवृत्ति अपनाए हुए हैं।

⦁    सभी संस्कृतियाँ सजातीय हैं। संस्कृति के भूमंडलीकरण की प्रवृत्ति बढ़ती जा रही है। भूमंडलीकरण का अर्थ है-भूमंडलीय के साथ स्थानीयता का मिश्रण। यह भूमंडलीकरण के वाणि ज्यिक हितों से पूरी तरह से अलग नहीं होता।

⦁    यह एक ऐसी राजनीति है जो अक्सर विदेशी फर्मों के द्वारा अपने बाजार को बढ़ाने के लिए स्थानीय परंपराओं के साथ व्यवहार में लाई जाती है। भारत में हम देखते हैं कि सभी विदेशी टी०वी० चैनल जैसे-स्टार, एम टी०वी०, चैनल V तथा कॉर्टून नेटवर्क भारतीय भाषाओं का प्रयोग करते हैं। यहाँ तक कि मैक्डॉनाल्डस भी भारत में अपने निरामिष तथा चिकन उत्पाद ही बेचता है, विदेशों में लोकप्रिय गोमांस नहीं। नवरात्रि के समय मैक्डोनाल्डस निरामिष हो जाता है।

⦁    भारतीय संस्कृति की शक्ति उसकी उदारवादी अवधारणा है। संस्कृति को किसी ऐसे अपरिवर्तनशील एवं स्थिर सत्व के रूप में नहीं देखा जा सकता, जो किसी सामाजिक परिवर्तन के कारण या तो ढह जाएगी अथवा ज्यों-का-त्यों यानी अपरिवर्तित बनी रहेगी।

25.

अपनी रुचि का कोई भी विषय चुनें और यह चर्चा करें कि भूमंडलीकरण ने उसे किस प्रकार से प्रभावित किया है। आप सिनेमा, कार्य, विवाह अथवा कोई भी अन्य विषय चुन सकते हैं।

Answer»

⦁    सिनेमा पर भूमंडलीकरण का व्यापक प्रभाव पड़ा है। यह हमारी संस्कृति, हमारे आचार-विचार, सोचने के ढंग इत्यादि पर प्रभाव डालता है। किंतु इसका प्रभाव अलग-अलग लोगों अलग अलग प्रकार से पड़ा है। कुछ लोगों के लिए यह संगीत, नृत्य, संस्कृति के नए द्वार खोलने का एक अवसर है तो कुछ लोगों के लिए यह उनकी अपनी जीवन-शैली, संस्कृति, नृत्य-संगीत की परंपरा के लिए चुनौती की तरह है।

⦁    सूचना प्रौद्योगिकी का विकास, फोटोग्राफी, वाद्य-यंत्र, कैमरा इत्यादि में प्रकारों के विकास को देखकर हम निश्चित रूप से कह सकते हैं कि भूमंडलीकरण का सिनेमा पर सकारात्मक प्रभाव पड़ा है। इसने फिल्म निर्माताओं के लिए बड़े बाजार में संभावनाओं के द्वार खोल दिए हैं तथा लोगों को अपनी पसंद के अनुरूप फिल्में देखने का अवसर प्राप्त हो रहा है।

⦁    समाजशास्त्र भूमंडलीकरण के सामाजिक अथवा सांस्कृतिक प्रभावों का अध्ययन करता है। बाजारों को खुल जाने तथा आयात पर से प्रतिबंध हटा लेने के कारण विश्व के कोने-कोने की वस्तुएँ हम अपने बगल की दुकान से प्राप्त कर सकते हैं। भूमंडलीकरण के प्रत्यक्ष प्रभाव के कारण ही मीडिया (जिनमें सिनेमा भी शामिल हैं) में नाटकीय परिवर्तन हुए हैं। भारत के कुछ निर्माताओं, निर्देशकों, कलाकारों इत्यादि को दूसरे देशों तथा क्षेत्रों के फिल्म उद्योगों में स्वागत किया जा रहा है। विभिन्न देशों में अभिनेता, निर्देशक, अभिनेत्रियों तथा अन्य कलाकार दूसरे देशों में जाकर वहाँ के फिल्म उद्योग में अपनी सेवाएँ दे रहे हैं।

⦁    बच्चों की फिल्में, कॉर्टून फिल्म, हास्य फिल्म, सामाजिक तथा प्रेम पर आधारित फिल्में विभिन्न भाषाओं में बन रही हैं तथा विभिन्न देशों में उनका प्रदर्शन किया जा रहा है।

⦁    संगीत, नृत्य, प्रस्तुति की शैली, प्राकृतिक तथा अन्य | दृश्य इत्यादि का पर्यवेक्षण विभिन्न देशों के विशेषज्ञों के द्वारा अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर किया जा रहा है।

26.

एक भूमंडलीकरण अर्थव्यवस्था के विशिष्ट लक्षण क्या हैं? चर्चा कीजिए।

Answer»

एक भूमंडलीकरण अर्थव्यवस्था के विभिन्न लक्षण :

⦁    भूमंडलीकरण का तात्पर्य विश्व के लोगों, क्षेत्रों तथा देशों के बीच वैश्विक स्तर पर सामाजिक-आर्थिक अंतरर्निर्भरता में वृद्धि से है।

⦁    यद्यपि आर्थिक शक्तियाँ भूमंडलीकरण का एक
अभिन्न अंग हैं, लेकिन यह कहना गलत होगा कि अकेले वे शक्तियाँ ही भूमंडलीकरण को उत्पन्न करती हैं। भूमंडलीकरण में सामाजिक तथा आर्थिक संबंधों का विश्वभर में विस्तार सम्मिलित है। यह विस्तार कुछ
आर्थिक नीतियों के द्वारा प्रोत्साहित किया जाता है। इस प्रक्रिया को भारत में उदारीकरण कहा जाता है। उदारीकरण शब्द का तात्पर्य ऐसे नीतिगत निर्णय से है, जिसमें भारतीय अर्थव्यवस्था को विश्व बाज़ार के लिए खोल देने के उद्देश्य से किए गए थे। इसके साथ ही अर्थव्यवस्था पर अधिक नियंत्रण रखने के लिए सरकार द्वारा इससे पहले अपनाई जा रही नीति पर विराम लग गया।

⦁    भूमंडलीकरण के दौरान अनेक आर्थिक कारकों में से पार राष्ट्रीय निगमों (TNCs) की भूमिका विशेष रूप से महत्वपूर्ण होती है।

⦁    जुलाई, 1991 से भारतीय अर्थव्यवस्था ने अपने सभी प्रमुख क्षेत्रों (कृषि, उद्योग, व्यापार, विदेशी निवेश) और प्रौद्योगिकी, सार्वजनिक क्षेत्र, वित्तीय संस्थाएँ आदि में सुधारों की एक लंबी श्रृंखला देखी है। इसके पीछे मूलभूत अवधारणा यह थी कि भूमंडलीय बाजार में पहले से अधिक समावेश करनी भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए लाभकारी सिद्ध होगी।

⦁    उदारीकरण की प्रक्रिया में अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF) जैसी अंतर्राष्ट्रीय संस्थाओं से ऋण लेना भी शामिल है। ये ऋण कुछ निश्चित दरों पर दिए जाते हैं। सरकार को कुछ विशेष प्रकार से आर्थिक उपाय करने के लिए वचनबद्ध होना पड़ता है और इन आर्थिक उपायों के अंतर्गत संरचनात्मक समायोजन की नीति अपनानी पड़ती है। इन समायोजनों की अर्थ सामान्यतः सामाजिक क्षेत्रों; जैसे–स्वास्थ्य, शिक्षा एवं सामाजिक सुरक्षा में राज्य के व्यय की कटौती है। विश्व व्यापार संगठन (W.T.O) जैसी अंतर्राष्ट्रीय राष्ट्रीय संस्थाओं के लिए भी यह बात कही जा सकती है।

27.

साझेदारी व्यक्तिगत मालिकी की अपेक्षा किन-किन बातों में अधिक अनुकूल है ?

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साझेदारी व्यक्तिगत मालिकी की अपेक्षा निम्न बातों में अधिक अनुकूल है :

  1. व्यक्तिगत मालिकी की अपेक्षा अधिक पूँजी एकत्रित हो सकती है ।
  2. व्यक्तिगत मालिकी की अपेक्षा साझेदारों की कार्य-शक्ति अधिक होती है ।
  3. निर्णय सचोट, परिपक्व और संतुलित होने की संभावना रहती है ।
  4. विविध प्रकार की शक्ति, अनुभव, कुशलता का लाभ प्राप्त किया जा सकता है ।
  5. जिनके पास पूँजी न हो परंतु मात्र कुशलता हो वह भी इसका लाभ उठा सकते हैं ।
  6. श्रम-विभाजन हो सकता है, विशिष्टीकरण का लाभ लिया जा सकता है ।
  7. धंधे का जोखिम अनेक साझेदारों के बीच बाँट जाता है ।
28.

साझेदारी संस्था का अर्थ व लक्षण की सूची बनाइए ।

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साझेदारी संस्था का अर्थ : साधारण शब्दों में साझेदारी दो या दो से अधिक व्यक्तियों का एक समूह है, जो व्यापार द्वारा लाभार्जन करने के उद्देश्य से बनता है ।

दूसरे शब्दों में दो या अधिक व्यक्ति पारस्परिक लाभ के उद्देश्य से मिलकर जब वैध व्यापार करने के लिए सहमत होते हैं तब इसे साझेदारी कहा जाता है ।

साझेदारी संस्था की परिभाषाएँ (Definition of Partnership Firm) :

डॉ. ज्योन शुबिन : “दो या दो से अधिक व्यक्ति किसी व्यापार को चलाने का संयुक्त दायित्व अपने ऊपर लेकर लिखित या मौखिक करार करके साझेदारी की स्थापना कर सकते हैं ।”

श्री ल्युइस हेन्री : “करार करने में सक्षम हो तथा लाभ के उद्देश्य से संयुक्त रूप से किसी प्रकार का धन्धा करने के लिए सहमत हुए हों ऐसे मनुष्यों के बीच का सम्बन्ध अर्थात् साझेदारी संस्था ।”

किम्बाल तथा किम्बाल के मतानुसार : “साझेदारी जैसा कि प्रायः कहा जाता है कि उन व्यक्तियों का समूह है जिन्होंने किसी धन्धे को चलाने के लिए पूँजी तथा सेवाओं को संयुक्त रूप से लगाया है ।”

भारतीय साझेदारी अधिनियम 1932 के अनुसार : “साझेदारी यह ऐसे व्यक्तियों के मध्य का सम्बन्ध है, जो कि सभी द्वारा या सभी , की ओर से किसी एक द्वारा चलाए जानेवाले धन्धे का लाभ विभाजन हेतु सहमत हुए हो ।”

साझेदारी संस्था के लक्षण (Characteristics of Partnership Firm) :

(1) करार-जन्य सम्बन्ध : साझेदारी संस्था साझेदारी के बीच लिखित या मौखिक करार के आधार पर अस्तित्व में आती हैं । परस्पर एक-दूसरे के प्रति व्यवहार-बर्ताव तथा समझ द्वारा साझेदारी अस्तित्व में आती है ।

(2) लाभ का उद्देश्य एवं लाभ का वितरण : साझेदारी संस्था का उद्देश्य धन्धा करना एवं लाभ प्राप्त कर उसका वितरण करना होता है । इसके अलावा दूसरे किसी उद्देश्य के लिए एकत्रित हुए हों तो उसे साझेदारी नहीं कहा जायेगा । जैसे – दो या अधिक व्यक्ति धार्मिक या सेवा के उद्देश्य के लिये मंदिर, क्लब, जीमखाना या लायब्रेरी प्रारंभ करें तो साझेदारी नहीं कहलायेगी ।

(3) धंधा होना अनिवार्य : साझेदारी में कोई भी उद्योग, व्यापार, वाणिज्य, धन्धा, साहस या प्रत्यक्ष सेवा के द्वारा चलाया जा सकता है । अगर साझेदारी किसी धंधे के लिये न चलाई जाये तो उसे साझेदारी नहीं कहेंगे ।

(4) साझेदारों की संख्या पर नियंत्रण : साझेदारी में कम से कम दो और अधिक से अधिक बीस व्यक्तियों की संख्या होनी चाहिए । अगर शराफी कार्य करनेवाली बैंकिंग पेढ़ी हो तो अधिक से अधिक दस साझेदार हो सकते हैं । इस प्रकार एक व्यक्ति से साझेदारी प्रारंभ नहीं हो सकती । अगर साझेदारों की संख्या शराफी सेवा में 10 से बढ़ जाये तो वह साझेदारी कानून की दृष्टि से गैरकानूनी घोषित होती है ।

(5) सभी साझेदार या सभी की तरफ से किसी एक साझेदार के द्वारा संचालन : इसका अर्थ यह हुआ कि प्रत्येक साझेदार दूसरे साझेदार का एजेन्ट और अभिकर्ता (Agent) है । पेढ़ी की तरफ से कार्य करने का उन्हें गर्भित अधिकार है । इस तरह धन्धा चलानेवाले साझेदार जो कार्य करें या जो जिम्मेदारी उठाएँ वह सर्व साझेदारों को बंधनकर्ता है ।

(6) साझेदारों की जिम्मेदारी अमर्यादित : व्यक्तिगत मालिकी के साहस की तरह सभी साझेदारों की जिम्मेदारी अमर्यादित है । अगर पेढ़ी का ऋण उसकी संपत्ति की अपेक्षा बढ़ जाये तो साझेदारों को उसकी निजी और व्यक्तिगत संपत्तियों का विक्रय कर पेढ़ी का ऋण चुकाना पड़ता है । भारतीय कानून के अनुसार पेढ़ी का ऋण चुकाने के लिये हरेक साझेदारों की जिम्मेदारी व्यक्तिगत तथा संयुक्त गिनी जाती है ।

(7) पूँजी : सामान्य रूप से प्रत्येक साझेदार पेढ़ी में निश्चित किये गये प्रमाण में साझेदार पूँजी लगाता है । हालांकि ऐसा बंधन नहीं है कि सभी साझेदार धंधे में पूँजी लगाएँ । कुछ निश्चित व्यक्ति साझेदार होने पर भी पूँजी न लगाएँ ऐसा भी हो सकता है । इसी तरह सभी साझेदार एकसमान पूँजी लगाएँ यह भी जरूरी नहीं है । प्रत्येक साझेदार कितनी पूँजी लगायेगा यह साझेदारी कानून में बताया गया होता है ।

(8) स्थापना-विधि : साझेदारी की स्थापना सरलता से हो सकती है । इसके लिये कानून की अटपटी विधि नहीं है । साझेदारी की स्थापना के लिये मात्र करार होना अनिवार्य है । यह करार लिखित, मौखिक या गर्भित भी हो सकता है ।

(9) मालिकी में परिवर्तन : साझेदारी में साझेदार को खुद के भाग का परिवर्तन करना हो तो सभी साझेदारों की संमति अनिवार्य । है । सभी की संमति के बिना साझेदारी के हिस्से का परिवर्तन नहीं हो सकता ।

(10) धंधे का आयुष्य : साझेदारी का आयुष्य व्यक्तिगत मालिकी की तरह छोटा है । साझेदारी को जोइन्ट स्टॉक कंपनी की तरह कानून के द्वारा अलग व्यक्तित्व नहीं दिया गया है । इससे किसी भी साझेदार की मृत्यु होने पर, दिवालिया होने पर या पागल होने पर साझेदारी का विसर्जन होता है । इसके बावजूद प्रत्येक साझेदार की संमति से किसी भी साझेदार का हिस्सा परिवर्तन किया जा सकता है । परिणामस्वरुप साझेदारी पेढ़ी लंबी आय रखती है।

(11) मालिकी और संचालन में एकता : साझेदारी में व्यक्तिगत मालिकी की तरह ही मालिक और संचालक होते हैं । इस तरह साझेदारी में मालिकी और संचालन में एकता देखने को मिलती है । संचालन कार्यों का वितरण साझेदारों के बीच किया जाता है । प्रत्येक साझेदार को ज्ञान, अनुभव और कुशलता के आधार पर कार्य सौंपा जाता है । इस तरह, विविध व्यक्तियों के ज्ञान, अनुभव और कुशलता का महत्तम लाभ मिलता है ।

(12) कानूनी नियंत्रण : साझेदारी के नियंत्रण के लिये 1932 का भारतीय साझेदारी कानुन अमल में है । इस कानून में साझेदारों के अधिकार, फर्ज, सत्ता, पंजीकरण वगैरह दिया गया है । सभी साझेदार संयुक्त रूप से पेढ़ी के रूप में जाने जाते हैं, इसके बावजूद पेढ़ी को साझेदारों से अलग अस्तित्व प्राप्त नहीं होता ।

(13) निर्णय-शक्ति : साझेदारी में सामान्य बातों के बारे में निर्णय बहुमति से लिया जाता है । इसके बावजूद कोई महत्त्वपूर्ण निर्णय जैसे धंधे में परिवर्तन करना, साझेदार को अलग करना वगैरह सभी साझेदार की संमति से लिया जाता है ।

29.

किन-किन बातों में साझेदारी व्यक्तिगत मालिकी की अपेक्षा कमजोर है ?

Answer»

निम्न बातों में साझेदारी व्यक्तिगत मालिकी से कमजोर है :

  1. निर्णय लेने में विलंब होता है, इससे त्वरित निर्णय का लाभ नहीं लिया जा सकता ।
  2. निर्णय सर्वसंमति से लेने से निर्णयों में एकसूत्रता नहीं रहती ।
  3. कोई भी एक साझेदार अधिक मेहनत कर लाभ अकेले नहीं प्राप्त कर सकता । खुद मेहनत करे और लाभ सभी में बँट जाये तो साझेदारों का लाभ करने का उत्साह कम रहता है ।
  4. धन्धे की गुप्तता नहीं रहती ।
  5. मतभेदों की वजह से साझेदारी की आय अस्थिर और कम है ।
  6. धंधे के महत्त्वपूर्ण निर्णय सर्वसंमति से लिये जाते हैं ।
30.

‘व्यक्तिगत मालिकी यह धन्धे की प्रशिक्षण की पाठशाला है ।’ समझाओ ।

Answer»

उपरोक्त कथन सत्य है, क्योंकि व्यक्तिगत मालिकी का धन्धा अधिक प्रमाण में देखने को मिलता है । प्रारम्भ में तो एकाकी व्यापार आरम्भ करते है । तथा धीरे-धीरे समय बीतने पर कुशलता प्राप्त करते है व अनुभवी बनते है । व्यक्तिगत मालिकी के व्यापार में मालिक क्रय का कार्य, विक्रय का कार्य, ग्राहकों के साथ सम्बन्ध स्थापित करने आदि के रूप में विशिष्ट ज्ञान ऐसे व्यापार से मिलता है । इस तरह कुशल व्यापारी बनने के लिए व्यक्तिगत मालिकी का धन्धा प्रशिक्षण की पाठशाला कहलाता है ।

31.

व्यक्तिगत मालिकी का स्वरूप किन संजोगों में अनुकूल गिना जाता है ?

Answer»

व्यक्तिगत मालिकी निम्न संयोगों में अधिक अनुकूल और योग्य है :

  1. जहाँ पूँजी का प्रमाण कम हो
  2. जहाँ व्यापार का संचालन सरल हो
  3. जहाँ जोखिम कम प्रमाण में हो
  4. जहाँ त्वरित निर्णय की आवश्यकता हो
  5. जहाँ ग्राहकों की आवश्यकता, अभिरुचि और फैशन महत्त्व के हो
  6. जहाँ बाजार स्थानिक हो ।
32.

व्यक्तिगत मालिकी स्वरोजगार की संस्था है ।

Answer»

व्यक्तिगत मालिकी की स्थापना-विधि सरल और सुगम होने के कारण पूँजी, व्यवस्था-शक्ति और जोखिम कम होने के कारण समाज का कोई भी व्यक्ति कम पूँजी से धंधा प्राप्त कर सकता है और अमुक अंश में समाज का भार कम करता है । इस तरह व्यक्तिगत मालिकी स्वरोजगार की संस्था है ।

33.

व्यक्तिगत मालिकी को धन्धाकीय प्रशिक्षण केन्द्र क्यों कहा जाता है ?

Answer»

व्यक्तिगत मालिकी में सामान्य व्यक्तियों का अधिक प्रमाण देखने को मिलता है । प्रारंभ में वह एकाकी व्यापार प्रारंभ करते हैं । समय बीतने पर कुशलता प्राप्त करते हैं और अनुभवी बनते हैं । इस तरह, कुशल व्यापारी बनने के लिये व्यक्तिगत मालिकी स्कूल के रूप में प्रशिक्षण देने का कार्य करती है ।

34.

व्यक्तिगत मालिकी संस्था किसे कहते हैं ?

Answer»

व्यक्तिगत मालिकी एक ऐसी संस्था है कि जिसमें मालिकी और संचालन एक ही व्यवस्था के द्वारा किया जाता है । एक ही व्यक्ति व्यापार का विचार कर, पूँजी का विनियोग कर, व्यापार का प्रारंभ करे और व्यापार के कार्य जैसे क्रय-विक्रय, वसूली वगैरह खुद ही सँभाल कर व्यापार के लाभ या हानि को खुद ही भोगे उसे व्यक्तिगत मालिकी संस्था कहा जायेगा ।

35.

व्यक्तिगत मालिकी की स्थापना क्यों सरल है ?

Answer»

व्यापारी व्यवस्था के दूसरे भी स्वरुप की अपेक्षा इस प्रकार की धंधादारी संस्था की स्थापना का कार्य खूब सरल है । किसी भी तरह के दस्तावेज तैयार नहीं करने पड़ते । किसी की संमति प्राप्त नहीं करनी होती । किसी कानूनी कार्रवाई से नहीं गुज़रना होता । कोई भी व्यक्ति सामान्य फीस देकर संमति प्राप्त कर कानूनन धन्धा कर सकता है ।

36.

व्यक्तिगत मालिकी में गलत निर्णय की संभावना क्यों है ?

Answer»

व्यक्तिगत मालिकी में व्यापारी को सभी निर्णय खुद ही करने होते हैं । उसे दूसरे का अनुभव या बुद्धि का लाभ नहीं मिल सकता । अर्थात् व्यक्ति चाहे कितना भी होशियार हो इसके बावजूद ऐसे व्यक्तिगत निर्णय भूल से भरे हुए उतावलापनवाले और खामीयुक्त होने से व्यापार के लिये खतरनाक भी होते हैं ।

37.

व्यक्तिगत मालिकी का धंधा विकसित नहीं किया जा सकता, क्यों ?

Answer»

व्यक्तिगत मालिकी में विकास के लिये आवश्यक पूँजी, बड़े पैमाने पर कार्यशक्ति, लंबा आयुष्य वगैरह के लाभ प्राप्त नहीं हो सकते तथा अमर्यादित जिम्मेदारी के कारण अन्य व्यक्ति रकम लगाने को तैयार नहीं होते । इस तरह, व्यक्तिगत मालिकी में विकास की संभावना खूब कम रहती है ।

38.

बहुराष्ट्रीय कंपनियों को (अल्पविकसित और विकसित) राष्ट्र आमंत्रित करते हैं ।

Answer»

बहुराष्ट्रीय कंपनियों को गरीब और अल्पविकसित देश आमंत्रित करते हैं । ऐसी कंपनियों के पास आधुनिक टेक्नोलॉजी होती है, उनकी खुद की प्रयोगशाला में श्रेष्ठ वैज्ञानिकों को लगाकर रोजबरोज नवीन आविष्कार करवाते हैं । ऐसे देशों को इस तरह के आविष्कारों की भूख रहती है । ऐसी कंपनियाँ लोगों को रोजगारी के अवसर देती हैं और गरीब देशों को खुद को तेज आर्थिक विकास पूर्ण करने की इच्छा होती है । इसलिए अल्पविकसित देश बहुराष्ट्रीय कंपनी को आमंत्रित करते हैं।

39.

भूस्थानीकरण क्या है? क्या यह बहुराष्ट्रीय कंपनियों द्वारा अपनाई गई बाज़ार संबंधी रणनीति है अथवा वास्तव में कोई सांस्कृतिक संश्लेषण हो रहा है, चर्चा करें।

Answer»

भूमंडलीयकरण क्या है

⦁    भूमंडलीकरण शब्द को केवल एक अर्थ अथवा परिभाषा में नहीं बाँधा जा सकता है। भिन्न-भिन्न विषय भूमंडलीकरण के भिन्न-भिन्न पक्षों पर ध्यान दिलाते हैं। उदाहरण के तौर पर, अर्थशास्त्र, आर्थिक
आयामों जैसे-पूँजी का प्रवाह आदि का अधिक विवेचन करता है। राजनीति-शास्त्र सरकार की बदली हुई भूमिका पर ध्यान केंद्रित कर सकता है।

⦁    भूमंडलीकरण की प्रक्रिया इतनी व्यापक है कि भिन्न-भिन्न विषयों से भूमंडलीकरण के कारणों और परिणामों को समझने के लिए, एक-दूसरे से अधि काधिक जानकारी लेनी पड़ती है।

⦁    समाजशास्त्रीय अध्ययन का क्षेत्र अत्यंत व्यापक होता है। यह अपने विश्लेषण को अलग-अलग व्यक्तियों, जैसे-दुकानदार और ग्राहक, अध्यापक और छात्र, दो मित्रों अथवा पारिवारिक सदस्यों के बीच की अंत:क्रियाओं पर केंद्रित कर सकती है।

⦁    यह अपने विश्लेषण को राष्ट्रीय मुद्दों; जैसे – बेरोजगारी अथवा जातीय संघर्ष अथवा वन संबंधी अधिकारों पर सरकार की नीति का प्रभाव अथवा ग्रामीण ऋणग्रस्तता पर अपना ध्यान केंद्रित कर सकता है।

⦁    भूमंडलीय सामाजिक प्रक्रियाओं; जैसे-कामगार वर्ग पर नए लचीले श्रम विनियमों अथवा नवयुवकों पर इलेक्ट्रॉनिक मीडिया अथवा देश की शिक्षा प्रणाली पर विदेशी विश्वविद्यालयों के प्रवेश के प्रभाव की जाँच कर सकता है।

⦁    समाजशास्त्र उन विषयों; (यानी परिवार या श्रम संगठन अथवा गाँव आदि) से परिभाषित नहीं होता जिनका यह अध्ययन करता है, बल्कि वह एक चुने हुए क्षेत्र का अध्ययन कैसे करता है, इसका अध्ययन करता है।

⦁    समाजशास्त्र क्या अध्ययन करता है ये नहीं, बल्कि कैसे अध्ययन करता है, से परिभाषित किया गया है। इसलिए यह कहना सही नहीं होगा कि समाजशास्त्र भूमंडलीकरण के केवल सामाजिक अथवा सांस्कृतिक परिणामों का ही अध्ययन करता है। यह व्यक्ति और समाज, व्यष्टि और समष्टि तथा स्थानीय एवं भूमंडलीय के बीच के संबंधों के भाव को समझने के लिए समाजशास्त्रीय कल्पना-शक्ति का प्रयोग करता है।
अंतराष्ट्रीय कंपनियाँ उनकी राजनीति तथा भारत का सांस्कृतिक संश्लेषण

⦁    अप्रैल 2001 से सभी प्रकार के परिमाणात्मक प्रतिबंध जो आयात पर लगाए गए थे, समाप्त कर दिए गए। अब पड़ोस के फलों की दुकानों में चीन की नाशपाती और आस्ट्रेलिया के सेब को देखकर आश्चर्य नहीं होता। अब पड़ोस की दुकानों में आस्ट्रेलियाई संतरे का रस और बर्फ में जमे हुए पैकेटों में तलने के लिए तैयार चिप्स मिल जाएंगे।

⦁    हम अपने परिवार के साथ जो खाते-पीते हैं, उनमें धीरे-धीरे परिवर्तन हो रहा है। इसी प्रकार के नीतिगत परिवर्तन ने उपभोक्ताओं तथा उत्पादकों को प्रभावित किया है।

⦁    परिवर्तन निश्चित रूप से सार्वजनिक नीतियों से भी जुड़े होते हैं, जिसे कि सरकार अपनाती है और विश्व-व्यापार संगठन (WTO) से समझौता करके तय करती है। इसी प्रकार, स्थूल नीतिगत परिवर्तनों का मतलब यह है कि एक टेलीविजन चैनल के बजाय आज हमारे पास वास्तव में कई चैनल हैं।

⦁    समाजशास्त्रीय कल्पना-शक्ति व्यष्टि एवं समष्टि तथा व्यक्तिगत एवं सार्वजनिक के बीच संबंध स्थापित कर सकती है।

⦁    भूमंडलीकरण को प्रेरित करने वाले अनेक आर्थिक कारकों में पारराष्ट्रीय निगमों (TNCs) की भूमिका विशेष रूप से महत्वपूर्ण है।

40.

समाचार-पत्र उद्योग में जो परिवर्तन हो रहे हैं, उनकी रूपरेखा प्रस्तुत करें। इन परिवर्तनों के बारे में आपकी क्या राय है?

Answer»

ऐसा अक्सर माना जाता था कि टेलीविजन तथा इंटरनेट के विकास के साथ ही प्रिंट मीडिया को भविष्य खत्म हो जाएगा। किंतु समाज में इन दोनों माध्यमों के आने के बाद भी समाचार-पत्रों में वृद्धि हुई है।

नई तकनीक ने समाचार-पत्रों के उत्पादन तथा वितरण को एक नया आयाम दिया है। बड़ी संख्या में व्याख्यात्मक पत्रिकाएँ भी बाजार में आ गई हैं। भारत में समाचार-पत्रों के विकास के पीछे कई कारण है

⦁    बड़ी संख्या में शिक्षित लोग शहरों की तरफ रुख कर रहे हैं। हिंदी दैनिक ‘हिन्दुस्तान’ जो 2003 में केवल 64,000 प्रत्तियाँ ही छापता था, अप्रत्याशित रूप से 2005 में 4,25,000 प्रतियाँ छापने लगा। इसका कारण यह था कि दिल्ली की आबादी 1 करोड़ 47 लाख में 52 प्रतिशत लोग हिंदी भाषी राज्यों उ०प्र० तथा बिहार से आए हैं। इनमें 47% लोग ग्रामीण पृष्ठभूमि के हैं तथा इनमें 60% लोग 40 वर्ष की उम्र से कम हैं।

⦁    बड़े शहरों की तुलना में छोटे शहरों तथा गाँवों में पाठकों की रुचियाँ अलग हैं। क्षेत्रीय भाषा में समाचार-पत्र उनकी इन रुचियों को पूरा करते हैं। भारतीय भाषाओं के प्रमुख पत्र ‘मलयाली मनोरमा’ तथा ‘ईनाडु’ का गठन क्षेत्रीय आवश्यकताओं को ध्यान में रखकर ही किया गया था। इसे जिला संस्करणों के साथ प्रकाशित किया जाता था। एक अन्य अग्रणी समाचार-पत्र ‘दिन तंती’ ने हमेशा सरल तथा बोलचाल की भाषा का प्रयोग किया।

⦁    भारतीय भाषाओं के समाचार-पत्रों ने उन्नत मुद्रण प्रौद्योगिक्रियों को अपनाया और परिशिष्ट, अनुपूरक अंक, साहित्यिक पुस्तिकाएँ प्रकाशित करने का प्रयत्न किया।

⦁    दैनिक भास्कर समूह की समृद्धि का कारण उनके द्वारा अपनाई गई अनेक विपणन संबंधी रणनीतियाँ हैं, जिनके अंतर्गत वे उपभोक्ता संपर्क कार्यक्रम, घर-घर जाकर सर्वेक्षण और अनुसंध न जैसे कार्य करते हैं। अतः आधुनिक मास मीडिया के लिए एक औपचारिक सरंचनात्मक संगठन का होना आवश्यक है।

⦁    जबकि अंग्रेजी भाषा के समाचार-पत्र, जिन्हें अक्सर ‘राष्ट्रीय दैनिक’ कहा जाता है, देशी भाषाओं के समाचार-पत्रों का प्रसार राज्यों तथा अंदरुनी ग्रामीण प्रदेशों में बहुत अधिक बढ़ गया है। इलेक्ट्रॉनिक मीडिया से मुकाबला करने के लिए समाचार-पत्रों ने विशेष रूप से अंग्रेजी भाषा के समाचार-पत्रों ने एक ओर जहाँ अपनी कीमतें घटा दी हैं वहीं दूसरी ओर एक साथ अनेक केंद्रों से अपने अलग-अलग संस्करण निकालने लगे हैं।
समाचार-पत्र के उत्पादन में परिवर्तन : प्रौदयोगिकी की भूमिका

⦁    बहुत से लोगों को यह डर था कि इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के उत्थान से प्रिंट मीडिया के प्रसार में गिरावट आएगी। लेकिन ऐसा नहीं हुआ। किंतु इस प्रक्रिया के कारण अक्सर कीमतें घटानी पड़ी हैं और परिणामस्वरूप विज्ञापनों के प्रायोजकों पर निर्भरता बढ़ गई है। इसके कारण अब समाचार-पत्रों की विषय-वस्तु में विज्ञापनदाताओं की भूमिका बढ़ गई है।

⦁    समाचार-पत्र अब एक उपभोक्ता उत्पाद का रूप लेते जा रहे हैं तथा जैसे-जैसे इनकी संरचना बढ़ती जा रही है, सब कुछ बिक्री पर निर्भर होता जा रहा।

41.

टेलीविजन के माध्यम जो परिवर्तन होते रहे हैं, उनकी रूपरेखा प्रस्तुत करे। चर्चा करें।

Answer»

⦁    प्रायोगिक तौर पर भारत में टेलीविजन कार्यक्रमों की शुरुआत ग्रामीण विकास को संवर्द्धन प्रदान करने हेतु 1959 के प्रारंभ में ही गई थी। बाद में उपग्रह निर्देशित टेलीविजन प्रयोग (Satellite Instructions Television Experiment-Site) सीधे तौर पर ग्रामीण क्षेत्रों के भारत में छः राज्यों में अगस्त 1975 से जुलाई 1976 के बीच कार्यक्रम प्रसारित करता था।

⦁    इस तरह के कार्यक्रम 2400 टी०वी० सेटों के लिए सीधे 4 घंटे प्रतिदिन कार्यक्रम प्रसारित करते थे।

⦁    1991 में भारत में केवल एक ही राज्य नियंत्रित टी०वी० चैनल दूरदर्शन था। 1998 तक लगभग 70 चैनल हो गए। 1990 के दशक के मध्य भाग से गैर सरकारी चैनलों की संख्या कई गुणा बढ़ गई है। वर्ष 2000 में जब दूरदर्शन 20 से अधिक चैनलों पर अपना कार्यक्रम प्रसारित कर रहा था, तब गैर सरकारी टेलीविजन नेटवर्कों की संख्या 40 के आसपास थी। गैर सरकारी उपग्रह टेलीविजन में हुई आश्चर्यजनक वृद्धि समकालीन भारत में हुए निर्णयात्मक विकासों में से एक है।

⦁    1991 के खाड़ी युद्ध ने (जिसने सी०एन०एन० को लोकप्रिय बनाया) और उसी वर्ष हांगकांग के हवामपोआ हचिनसन समूह द्वारा प्रारंभ किए गए स्टार टी०वी० ने भारत में गैर सरकारी उपग्रह चैनलों | के आगमन का संकेत दे दिया था। 1992 में, हिंदी आधारित उपग्रह मनोरंजक चैनल जी०टी०बी ने भारत में केबल टेलीविजन को अपना कार्यक्रम देना शुरू कर दिया था। वर्ष 2000 तक भारत में 40 गैर सरकारी केबल और उपग्रह चैनल उपलब्ध हो चुके थे। इनमें से कुछ ऐसे भी थे, जो केवल क्षेत्रीय भाषाओं के प्रसारण पर ही केंद्रित थे- जैसे, सन टी.वी. ईनाडु टी.वी., उदय टी.वी, राज टी.वी
और एशिया नेट।

⦁    1980 में दशक में, जहाँ दूरदर्शन तेजी से विस्तृत हो रहा था, वही केबल टेलीविजन उद्योग भी भारत के बड़े-बड़े शहरों में तेजी से पनप रहा था। वी०सी०आर० ने दूरदर्शन की एकल चैनल व्यवस्था के अनेक विकल्प प्रस्तुत करके भारतीय दर्शकों के लिए मनोरंजन के विकल्पों में कई गुणा वृद्धि कर दी। निजी घरों तथा सामुदायिक बैठक कक्षों में वीडियो कार्यक्रम देखने की सुविधा में भी तेजी से वृद्धि हुई। वीडियो कार्यक्रमों में अधिकतर मनोरंजक फिल्में शामिल थीं। उद्यमी एक दिन में अनेक फिल्में दिखाने के लिए अपार्टमेंटों से तार लगाते थे। केबल आपरेटरों की संख्या में भी तेजी से वृद्धि हुई।।

⦁    स्टार टी०वी०, एम०टी०वी०, चैनल वी तथा सोनी जैसी अंतर्राष्ट्रीय टेलीविजन कंपनियों के आ जाने से कुछ लोगों को भारतीय युवाओं और भारतीय संस्कृति पर उनके संभावित प्रभाव के बारे में चिंता हुई। लेकिन अधिकांश अंतर्राष्ट्रीय टेलीविजन चैनलों ने अनुसंधान के द्वारा यह जान लिया कि भारतीय दर्शकों के विविध समूहों को आकर्षित करने में चिर-परिचित कार्यक्रमों का प्रयोग ही अधिक प्रभावशाली होगा। सोनी इंटरनेशनल की प्रारंभिक रणनीति यह थी कि हर सप्ताह 10 हिंदी फिल्में प्रसारित की जाएँ और बाद में स्टेशन जब अपने हिंदी कार्यक्रम तैयार कर लें तो धीरे-धीरे इनकी संख्या घटा दी जाए। अब अधिकतर विदेशी नेटवर्को ने या तो हिंदी भाषा के कार्यक्रमों का एक हिस्सा (एम०टी०वी० इंडिया) हो गए हैं अथवा नया हिंदी चैनल (स्टार प्लस) ही शुरू कर दिया है। स्टार स्पोटर्स और ई.एस.पी.एन दोहरी कॉमेंटरी अथवा हिंदी में एक आडियो साउंड ट्रैक चलाते हैं। बड़ी कंपनियाँ जो बांगला, पंजाबी, मराठी और गुजराती जैसी भाषाओं में विशिष्ट क्षेत्रीय चैनल शुरू किए हैं।

⦁    स्टार टी.वी. का स्थानीयकरण – स्टार प्लस चैनल, जो प्रारंभ में हांगकांग से संचालित पूर्ण रूप से सामान्य मनोरंजन का अंग्रेजी चैनल था, वे अक्टूबर 1996 से सायं 7 और 9 बजे के बीच हिंदी भाषा के कार्यक्रम देने शुरू कर दिए। फरवरी, 1999 से यह पूर्ण रूप से हिंदी चैनल बन गया और सभी अंग्रेजी धारावाहिक स्टारवर्ड को, जो कि इस नेटवर्क का अंग्रेजी भाषा का एक अंतर्राष्ट्रीय चैनल है, को दे दिए गए। इन हिंदी चैनलों को प्रोत्साहित करने वाला नारा था-आपकी बोली आपका प्लसप्वाइंट। स्टार और सोनी दोनों ही संयुक्त राज्य अमेरिका के अपने कार्यक्रमों को छोटे बच्चों के लिए डब करते रहे हैं, क्योंकि उन्हें यह प्रतीत होने लगा था कि बच्चे उन विलक्षणताओं से समझने तथा स्वीकार करने लगे हैं, जो उस स्थिति में उत्पन्न होती है जब भाषा कोई अन्य हो तथा कथा परिवेश कोई अन्य।

42.

एक निबंध लिखकर उदाहरण देते हुए उन तरीकों को बताइए जिनसे भारतीय संविधान ने साधारण जनता के दैनिक जीवन में महत्वपूर्ण है। और उनकी समस्याओं का अनुभव किया है।

Answer»

⦁    भारत के संविधान ने हम सबके लिए एक लोकतांत्रिक पद्धति प्रदान की है।

⦁    लोकतंत्र जनता के, जनता से तथा जनता के लिए बनी शासन-व्यवस्था है। यह केवल राजनैतिक स्वतंत्रता और सामाजिक न्याय तक ही सीमित नहीं है। यह सभी जाति, धर्म, कुल तथा लिंगों के लिए
समान स्वतंत्रता प्रदान करता है।

⦁    भारत के संविधान ने धर्मनिरपेक्षता को स्थापित किया है। हम सभी धर्मों का सम्मान करते हैं तथा सभी भारतीयों को अपने धर्म के प्रति आस्था रखने की पूरी स्वतंत्रता है। भारत का संविधान अल्पसंख्यकों को भी समान अधिकार प्रदान करता है तथा उनके विकास के लिए उसमें बहुत सारे उपबंध विद्यमान हैं।

⦁    भारत एक कल्याणकारी राज्य है तथा यहाँ का समाज सामाजिकता से संरक्षित है। यह हमारा कर्तव्य है कि हम सार्वजनिक तथा राष्ट्रीय संपत्ति की हिफाजत करें। यह संविधान हम सबके लिए इस बात का समान अवसर प्रदान करता है कि हम संसाधनों का उपयोग करें तथा आर्थिक विकास के लिए प्रयत्न करें।

⦁    भारत का संविधान यहाँ के नागरिकों को समान रूप से सामाजिक, आर्थिक तथा राजनीतिक न्याय एवं समानता प्रदान करता है। अतएव यह हमारा कर्तव्य है कि हम सरकार द्वारा चलाए जा रहे कार्यक्रमों; जैसे- जनसंख्या नियंत्रण, चेचक, मलेरिया तथा पल्स पोलियो उन्मूलन कार्यक्रमों में अपनी भागीदारी प्रदान करें। खाद्य सुरक्षा अधिनियम, सूचना का अधिकार, शिक्षा का अधिकार तथा महिलाओं के सशक्तिकरण के प्रयास कुछ ऐसे कदम हैं, जिन्हें सरकार ने उठाए हैं, ताकि लोकतंत्र को मजबूती प्रदान की जा सके।

43.

संविधान सभा की बहस के अंशों का अध्ययन कीजिए। हित समूहों को पहचानिए। समकालीन भारत में किस प्रकार के हित समूह हैं? वे कैसे कार्य करते हैं?

Answer»

बहस के अंश

⦁    के०टी० शाह ने कहा कि लाभदायक रोजगार को श्रेणीगत बाध्यता के द्वारा वास्तविक बनाया जाना चाहिए और राज्यों की यह जिम्मेदारी है कि वह सभी समर्थ एवं योग्य नागरिकों की लाभदायक
रोजगार उपलब्ध कराए।

⦁    बी० दास ने सरकार के कार्यों को उचित अधिकार क्षेत्र तथा अनुचित अधिकार क्षेत्र में विभाजित किए जाने का विरोध किया। उनका कहना था-‘मैं समझता हूँ कि भुखमरी को समाप्त करना, सभी नागरिकों को समाजिक न्याय देना और सामाजिक सुरक्षा सुनिश्चित करना सरकार को प्राथमिक कर्तव्य है।…..लाखों लोगों की सभा यह मार्ग नहीं हूँढ़ पाई कि संघ का संविधान उनकी भूख से मुक्ति कैसे सुनिश्चित करेगा, समाजिक न्याय, न्यूनतम मानक जीवन-स्तर और न्यूनतम जन-स्वास्थ्य कैसे सुनिश्चित करेगा।”
अंबेडकर को उत्तर – “संविधान का जो प्रारूप बनाया गया है, वह देश के शासन के लिए केवल एक प्रणाली उपलब्ध कराना है। इसकी यह योजना बिल्कुल नहीं है कि अन्य देशों की तरह कोई विशेष दल को सत्ता में लाया जाए। यदि व्यवस्था लोकतंत्र को संतुष्ट करने में खरी नहीं, उतरती है, तो किसे शासन में होना चाहिए, इसका निर्धारण जनता करेगी।”

⦁    भूमि सुधार के विषय पर नेहरू ने कहा कि सामाजिक शक्ति इस तरह की है कि कानून इस संदर्भ में कुछ नहीं कर सकता, जो इन दोनों की गतिशीलता की एक प्रतिकृति है। “यदि कानून और संसद स्वयं को बदलते परिदृश्य के अनुकूल नहीं कर पाएँगे, तो स्थितियों पर नियंत्रण कठिन होगा।”

⦁    संविधान सभा की बहस के समय आदिवासी हितों की रक्षा के मामले में जयपाल सिंह से नेहरू ने कहा-”यथासंभव उनकी सहायता करना हमारी अभिलाषा और निश्चित इच्छा है; यथासंभव उन्हें कुशलतापूर्वक उनके लोभी पड़ोसियों से बचाया जाएगा और उन्हें उन्नत किया जाएगा।”

⦁    संविधान सभा ने ऐसे अधिकारों को जिन्हें न्यायालय नहीं लागू करवा सकता, राज्य के नीति निर्देशक सिद्धातों के शीर्षक के रूप में स्वीकार किया तथा इनमें सर्व-स्वीकृति से कुछ अतिरिक्त सिद्धांतों को जोड़ा गया। इनमें के० संथानम का वह खंड भी है, जिसके अनुसार राज्य को ग्राम-पंचायतों की स्थापना करनी चाहिए तथा स्थानीय स्वशासन के लिए उन्हें अधिकार और शक्ति भी देनी चाहिए।

⦁    टी०ए० रामालिंगम चेट्टियार ने ग्रामीण क्षेत्रों में सहकारी कुटीर उद्योगों के विकास से संबंधित खंड जोड़ा। प्रख्यात सांसद ठाकुरदास भार्गव ने यह खंड जोड़ा कि राज्य को कृषि एवं पशुपालन को आधुनिक प्रणाली से व्यवस्थित करना चाहिए।

44.

धन्धा तथा समाज दोनों एकदूसरे के अभिन्न अंग है । किस तरह ?

Answer»

कोई भी धन्धाकीय प्रवृत्ति, अन्त में समाज में ही जन्म लेती है, आकार प्राप्त करती है, वृद्धि करती है तथा उसका अन्त भी . समाज में ही होता है । धन्धाकीय प्रवृत्ति को समाज से अलग करके नहीं देखा जा सकता । धन्धा तथा समाज दोनों एकदूसरे के अभिन्न अंग हैं ।

45.

ग्रामीणों की आवाज को सामने लाने में 73 वाँ संविधान संशोधन अत्यंत महत्त्वपूर्ण है। चर्चा कीजिए।

Answer»

73 वाँ संशोधन ग्रामीण लोगों की आवाज बुलंद करने हेतु एक मिसाल की तरह है। इसका कारण यह है कि यह संशोधन राज्य के नीति निर्देशक तत्वों तथा पंचायती राज से संबंधित है। यह संशोधन जनता की शक्ति के सिद्धांतों पर आधारित है तथा पंचायतों को संवैधानिक संरक्षण प्रदान करता है।

अधिनियम की प्रमुख विशेषताएँ।

⦁    पंचायतों का स्वायत्तशासी सरकार के रूप में मान्यता।
⦁    आर्थिक विकास तथा सामाजिक न्याय हेतु कार्यक्रम तैयार करने हेतु पंचायतों को शक्तियाँ।
⦁    पंचायतों की एक मजबूत त्रिस्तरीय-ग्राम, प्रखंड तथा जिला स्तर पर व्यवस्था। यह व्यवस्था उन सभी राज्यों में होगी, जहाँ की आबादी 20 लाख से अधिक है।
⦁    यह अधिनियम दिए गए क्षेत्र के कमजोर वर्गों के लिए पंचायतों में हिस्सेदारी, पंचायतों के कार्य तथा उत्तरदायित्व, वित्तीय व्यवस्था तथा चुनाव इत्यादि के लिए दिशा-निर्देश निर्धारित करता है।
अधिनियम का महत्त्व
⦁    जमीनी स्तर पर लोकतंत्र की लाने में यह एक क्रांतिकारी कदम था।
⦁    73 वें संशोधन अधिनियम के दिशा-निर्देशों क आलोक में सभी राज्यों ने अपने यहाँ कानून बनाए।
⦁    इस अधिनियम के कारण पंचायती राज्य का विचार जमीनी स्तर पर यथार्थ रूप में सामने आया।

46.

विलोमार्थक शब्द लिखिए:1. पीछे2. खरीदना3. लेना4. आना5. शांति6. गरीब

Answer»

1. पीछे × आगे

2. खरीदना × बेचना

3. लेना × देना

4. आना × जाना

5. शांति × अशांति

6. गरीब × अमीर

47.

हित समूह प्रकार्यशील लोकतंत्र के अभिन्न अंग हैं। चर्चा कीजिए।

Answer»

⦁    हित समूहों का गठन राजनीति के क्षेत्र में कुछ विशेष हितों की पूर्ति के लिए किया जाता है। ये हित समूह सरकार पर अपना दबाव कायम करते हैं।

⦁    यदि कुछ समूहों को ऐसा प्रतीत होता है कि उनके हित का ध्यान नहीं रखा जा रहा है, तो वे कोई वैकल्पिक पार्टी बना लेते हैं।

⦁    लोकतंत्र लोगों का, लोगों के लिए तथा लोगों के द्वारा निर्मित शासन प्रणाली है। इस प्रणाली के अंतर्गत विभिन्न हित समूहों की सरकार की कार्य प्रणाली के बारे में जानकारी दी जाती है।

⦁    हित समूह निजी संगठन होते हैं। ये सार्वजनिक नीतियों के निर्माण में अपनी महत्त्वपूर्ण भूमिका का निर्वहन करते हैं।

⦁    ये एक गैर-राजनीतिक दल होते हैं तथा इनका लक्ष्य अपने हितों की पूर्ति करना होता है। राजनीतिक दल एक संगठित संस्था होते हैं, जिनका लक्ष्य सत्ता प्राप्त कर विशेष कार्यक्रमों का क्रियान्वयन करना होता है। विभिन्न हित समूह राजनीतिक पार्टियों पर दबाव कायम करते हैं।

⦁    इन हित समूहों को जब तक मान्यता नहीं मिल जाती, एक आंदोलन के तौर पर जाने जाते हैं।

⦁    दबाव समूह भारतीय लोकतंत्र में एक महत्वपूर्ण भूमिका का निर्वहन करते हैं तथा कई महत्वपूर्ण कार्य करते है। जैसे

(क) जनमत का निर्माण – विभिन्न प्रकार के प्रचार माध्यमों के द्वारा ये एक जनमत का निर्माण करते हैं। ये जनता की सहानुभूति प्राप्त करने व सरकार की व्यवस्था में परिवर्तन के लिए टी०वी०, रेडियो, ई-मेल, तथा सामाजिक मीडिया के अन्य साधनों का इस्तेमाल करते हैं। वे ट्वीटर तथा फेसबुक का भी इस्तेमाल अपने विचारों को लोगों के समक्ष रखने हेतु करते हैं।

(ख) प्राकृतिक आपदाओं के समय क्रिया शीलता – इस तरह के हित समूह प्राकृतिक आपदाओं के समय लोगों को मदद पहुँचाते हैं। जैसे केदारनाथ में आई विपदा, भूकंप इत्यादि में हित समूहों ने लोगों की काफी मदद पहुँचाई। इस तरह के कार्यों से ये लोगों का ध्यान अपनी तरफ आकृष्ट करने में सफल होते हैं तथा अंततः सरकार पर अपना दबाव बनाते हैं।

48.

अंग्रेजी में अनुवाद कीजिए :उसकी आयु लगभग 1 2 वर्ष की है।

Answer»

His age was around 12 years

49.

अंग्रेजी में अनुवाद कीजिए :सबेरे से अब तक कुछ नहीं बिका।

Answer»

Nothing is sold uptill now since the morning

50.

लिंग पहचानकर अलग-अलग सूची बनाइए और उनके अन्य लिंग शब्द लिखिए :लडका, बच्ची, दुबला, पतला, थैली, साहिबा, भाई, माँ, डॉक्टर, पंडिताइनपुल्लिंग स्त्रीलिंग

Answer»

    पुल्लिंग - स्त्रीलिंग

1.   लडका – लडकी

2.   बचा – बच्ची

3.   दुबला – दुबली

4.   पतला – पतली

5.   थैला – थैली

6.   साहब – साहिबा

7.   भाई – बहन

8.   बाप – माँ

9.   डॉक्टर – डॉक्टरनी

10. पंडित – पंडिताइन