This section includes 7 InterviewSolutions, each offering curated multiple-choice questions to sharpen your Current Affairs knowledge and support exam preparation. Choose a topic below to get started.
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‘कुछ पुरानी चीजों के पक्ष में’ कविता में कवि का रुझान किन चीजों की ओर है ?(क) आध्यात्मिकता(ख) सामाजिकता(ग) पुरानापन(घ) नयापन |
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Answer» ‘पुरानी चीजों के पक्ष में’ कविता में कवि का रुझान पुरानापन की ओर है। |
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सारे विवाद का केन्द्र स्थान कौन-सी बात है ?(क) सच(ख) झूठ(ग) सच और झूठ दोनों(घ) एक भी नहीं |
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Answer» सारे विवाद का केन्द्र स्थान सच और झूठ दोनों है। |
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कुछ पुरानी चीजों के पक्ष में आधुनिकता की परिचायक कौन-सी चीजें हैं? |
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Answer» कुछ पुरानी चीजों के पक्ष में झूठ और सच, अहिंसा, विनम्रता और कुछ पुरानी समझदारियाँ जैसी चीजें आधुनिकता की परिचायक हैं। |
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पुरानी समझदारियां कैसी बची रहती हैं? |
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Answer» दुनिया में नए बदलाव आने के साथ ही लोग तरह-तरह की नई मुर्खताएं भी कर रहे हैं। तरह-तरह के लड़ाई-झगड़े, युद्ध-विग्रह इन्हीं मूर्खताओं के परिणाम हैं। फिर भी आपसी प्रेम, मानवीय संस्कार और नीति-न्याय के नाम पर विवेक-बुद्धि के रूप में पुरानी समझदारियाँ बची रहती हैं। |
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इनमें से किसकी कहानियाँ पुरानी हैं ?(क) चाची(ख) मास्टरजी(ग) नानी(घ) एक भी नहीं |
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Answer» इनमें से नानी की कहानियाँ पुरानी हैं। |
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थक जाने पर बापू किसके सहारे बैठते थे ? |
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Answer» थक जाने पर बापू एक बड़े तकिये के सहारे बैठते थे। |
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इन्हीं चदाइयों पर देश-विदेश के बड़े बड़े व्यक्ति बैठते और बापू के मुख से निकले ………. का पान करते।(क) भजन(ख) वक्तव्य(ग) भाषण(घ) वचनामृत |
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Answer» सही विकल्प है (घ) वचनामृत |
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इसके तीसरे भाग में बापू का है।(क) शयनागार(ख) रसोईघर(ग) स्नानागार(घ) वाचनालय |
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Answer» सही विकल्प है (ग) स्नानागार |
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बापू की कुटी किनसे बनी थी? |
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Answer» बापू की कुटी बाँस, लकड़ी और खपरैल से बनी थी। |
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लेखक ने गांधीजी की लेखनी को जादूभरी क्यों कहा है? |
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Answer» लेखक ने गांधीजी की लेखनी को जादूभरी कहा हैं, क्योंकि उसने न जाने कितने प्राणों को उद्वेलित किया था। |
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डॉ. रामधारीसिंह दिनकर ने ‘कण – कण का अधिकारी’ कविता के माध्यम से आज के समाज को क्या संदेश दिया है? |
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Answer» ‘कण – कण का अधिकारी’ नामक कविता के कवि हैं श्री रामधारी सिंह दिनकर | यह कविता कुरुक्षेत्र से ली गयी है । आप इस कविता में श्रम तथा श्रामिक के बडप्पन तथा महत्व के बारे में बताते हैं । कवि ने इस कविता में मज़दूरों के अधिकारों का वर्णन किया है । कवि कहते हैं कि मेहनत ही सफलता की कुंजी है । मेहनत करनेवाला व्यक्ति कभी नहीं हारता वह हमेशा सफल होता है । सारा संसार उसे आदर भाव से देखता है । कवि कहते हैं कि एक मनुष्य अर्थ पाप के बल पर संचित करता है तो दूसरा भाग्यवाद के छल पर उसे भोगता है। कवि कहते हैं कि नर समाज का भाग्य श्रम ही है । वह भुजबल है | श्रमिक के सम्मुख पृथ्वी और आकाश झुक जाते हैं । नतमस्तक हो जाते हैं। कवि श्रम – जल देनेवाले को पीछे मत रहजाने को कहते हैं । वे कहते हैं कि विजीत प्रकृति से पहले श्रमिक को ही सुख पाने देना चाहिए | आखिर कवि बताते हैं कि इस प्रकृति में जो कुछ न्यस्त है वह मनुजमात्र का धन है । हे धर्मराज उस के कण – कण का अधिकार जन – जन हैं | मतलब यह है कि जो श्रम करेगा वही कण – कण का अधिकारी है। संदेश : जो श्रम करेगा वही कण – कण का अधिकारी है। |
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कविवर रामधारी सिंह दिनकर के बारे में आप क्या जानते हैं? |
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Answer» डॉ. रामधारी सिंह दिनकर हिंदी के प्रसिद्ध कवियों में एक हैं। आपका जन्म सन् 1908 में बिहार के मुंगेर में हुआ। आप हिंदी के राष्ट्र कवि कहे जाते हैं। रचनाएँ : उर्वशी, रेणुका, कुरुक्षेत्र, रश्मिरथी, परशुराम की प्रतीक्षा, रसवंती आदि। |
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बापू के बिस्तरे को लेखक क्यों महान मानता है ? |
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Answer» लेखक बापू की कुटिया की सादगी देखकर मुग्ध हो जाता है। उसे लगता है कि हमारे ऋषियों की परंपरा अभी तक बनी हुई है। बापू के बिस्तर की सादगी लेखक को अभिभूत कर देती है। उसे लगता है कि अपनी उस सादगी में बापू सचमुच बहुत महान थे। रत्नजड़ित स्वर्ण-सिंहासन भी बापू के बिस्तर से ईर्ष्या करते होंगे। जितना महान व्यक्ति इस सारे बिस्तर पर बैठता था, उतना महान व्यक्ति उन भव्य सिंहासनों पर एक पल के लिए भी नहीं बैठा होगा। लेखक बापू के बिस्तरे को महान मानता है, क्योंकि बापू ने वर्षों तक इस पर बैठकर इसे गौरवान्ति किया था। |
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बापू की कुटिया में आकर लेखक अपना सौभाग्य क्यों मानता है ? |
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Answer» लेखक गांधीजी के जीवित रहते उनके साबरमती आश्रम नहीं आ पाया। वह इसे अपना दुर्भाग्य मानता है। उनके न रहने पर उनकी कुटी में आने पर उसे लगता है कि यदि वह उन दिनों आता तो उनके बिस्तर के निकट इतनी देर तक न बैठ पाता। उस शांत एकांत में उनकी कुटिया से इतना तादात्म्य स्थापित करने का सुख भी उसे न मिल पाता। उनके पायताने बैठकर वह अपनी लेखनी को सार्थकता भी प्रदान न कर पाता। जो तब न मिलता वह आज पाने का अवसर मिलने से लेखक स्वयं को सौभाग्यशाली मानता है। |
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लेखक ने किस कहावत को सच बताया है? |
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Answer» लेखक ने ‘देर आयद दुरुस्त आयद’ कहावत को सच बताया है। |
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हिन्दुत्त्व के नाम पर किसने अनर्थ किया ? |
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Answer» हिन्दुत्व के नाम पर बापू के हत्यारे नाथूराम गोड़से ने अनर्थ किया। |
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बापू का बिस्तरा किन वस्तुओं से निर्मित था ? |
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Answer» बापू का बिस्तरा खजूर की चटाई, एक गद्दा और खादी से निर्मित था। |
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बापू के कमरे में लेखक को क्या-क्या दिखाई देता है ? |
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Answer» बापू के कमरे में लेखक उन बहुत-सी चीजों को देखता है जिनका उपयोग बापू करते थे। लेखक खजूर की चटाई पर एक गद्दा डालकर और उसे खादी से ढककर बनाए गए बापू के बिस्तरे को देखता है। बिस्तरे पर बापू का तकिया और तुलसी की माला है। उनका प्रिय चरखा भी वहीं रखा हुआ है। बापू की घड़ी और खडाऊ भी रखे हुए हैं। कमरे की खुली अलमारी पर उनके तीनों बंदर उनकी याद दिला रहे हैं। बापू का कलमदान, रद्दी कागज डालने के लिए रखा टोकरा, पीतल का थूकदान, एक स्टैंड पर रखी पेंसिल और कताई के सामान भी कुटिया में रखे हुए हैं। बिस्तरे के पास तीन खानों का शैल्फ भी रखा हुआ है। इन सारे स्मृतिचिहनों को देखकर लेखक कुटिया को बापूमय पा रहा है। |
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What is euryhaline? |
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Answer» Organisms which can tolerate wide range of salinities are called euryhaline. |
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What is meant by stenothermal? |
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Answer» Stenothermal are those organisms which are restricted to only narrow range of temperatures. |
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किस बात की कल्पना लेखक को भावमुग्ध कर देती है ? |
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Answer» लेखक कुटी में बापू के कमरे में अनेक चटाइयाँ पड़ी देखता है। बापू से मिलने के लिए देश-विदेश से आनेवाले व्यक्ति उन पर बैठते और उनकी अमृतवाणी सुनते थे। लेखक सोचता है कि इन्हीं चटाइयों पर कभी जवाहरलाल नेहरू, राजेन्द्र प्रसाद, सरदार पटेल जैसे देश के बड़े नेता बैठे होंगे। इनके अतिरिक्त संसार के बड़े-सेबड़े राजनीतिज्ञ, पत्रकार और साहित्यकार भी बैठे होंगे। आज उन्हीं पर लेखक अकेला बैठा है। अपने इसी सौभाग्य की कल्पना लेखक को भावमुग्ध कर देती है। |
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‘यदि सच्ची राह पर हो तो तुम्हें क्रोध करने की जरूरत ही नहीं।’ |
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Answer» सच्चाई मनुष्य का सबसे बड़ा गुण है। सच्चाई के सामने झूठ कभी नहीं टिक सकता। सच्ची राह पर चलनेवाला व्यक्ति निर्भीक होता है। उसे अपनी सच्चाई के सबूत के रूप में इधर-उधर की बेसिर-पैर की मनगढंत बातें जोड़नी नहीं पड़तीं। सच्ची राह पर चलनेवाले व्यक्ति को कितना भी उत्तेजित क्यों न किया जाए, वह अपना धैर्य कभी नहीं खोता। इसका कारण यह है कि उसे यह पता होता है कि आखिरकार विजय उसके सच की ही होगी। सच्चाई की राह पर चलनेवाला व्यक्ति शांतिपूर्ण ढंग से अपने लक्ष्य की ओर बढ़ता रहता है। इसका प्रत्यक्ष प्रमाण हैं महात्मा गांधी। वे देश को स्वतंत्र कराने का उद्देश्य लेकर सच्ची राह पर आगे बढ़े। उन पर अनेक प्रकार के अत्याचार हुए, पर उन्होंने कभी प्रतिक्रिया में कभी क्रोध नहीं किया। वे शांतिपूर्ण ढंग से निष्ठापूर्वक सच्चाई के मार्ग पर चलते रहे और एक दिन अपने उद्देश्य में सफल हुए। उन्होंने देश को आज़ाद करा कर ही दम लिया। |
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‘आदमी का दुर्भाग्य भी कभी-कभी सौभाग्य बन जाता है ?’ |
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Answer» मनुष्य के जीवन में सौभाग्य और दुर्भाग्य उसके प्रत्येक कार्य की सफलता और असफलता से जुड़े होते हैं। मनुष्य कार्य की सफलता को अपना सौभाग्य और असफलता को दुर्भाग्य मानता है। पर कभी-कभी मनुष्य के जीवन में दुर्भाग्य भी सौभाग्य बनकर आता है। उदाहरण के लिए एक रेलगाड़ी में किसी विशेष दिन किसी व्यक्ति को आरक्षित टिकट मिलना उसके लिए सौभाग्य का सूचक होता है। |
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‘झूठ शब्दों में निहित नहीं है. छल करने में है। चुप्पी साधकर भी झूठ बोला जा सकता है।’ |
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Answer» आम तौर पर खुलकर साफ-साफ शब्दों में किसी सच बात को उसके विपरीत रूप में बनाकर कहना या पेश करना झूठ कहलाता . है। इसके अतिरिक्त झूठ के अन्य रूप भी हैं और ये साफ-साफ शब्दों। में झूठ बोलने से कहीं अधिक बुरे होते हैं। ये झूठ छल-कपट के रूप। में होते हैं। ऐसे मामलों में किसी सच बात को सच न कहकर उस पर चुप्पी साधकर, दोहरे अर्थवाले शब्दों का प्रयोगकर, किसी शब्दांश पर विशेष ओर देकर, आँख से संकेतकर तथा किसी वाक्य को विशेष महत्त्व आदि देकर झूठ का प्रयोग होता है। इस प्रकार की हरकतों का गूढ अर्थ अथवा आशय साधारणतः प्रत्यक्ष रूप में नहीं खुलता, पर वास्तव में यह बहुत महत्त्व रखता है। इस प्रकार का झूठा प्रयोग बहुत भयानक होता है और इसके पीछे झूठ बोलनेवाले की बुरी नीयत होती है। |
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अपने बिस्तरे पर बैठे बापू अपने ………. को घुमा रहे हैं।(क) काल चक्र(ख) यरवदा चक्र(ग) कलमचक्र(घ) अशोक चक्र |
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Answer» सही विकल्प है (ख) यरवदा चक्र |
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शैल्फ के ऊपर रखा पत्थर का टुकड़ा कैसा है ?(क) चिकना(ख) मुलायम(ग) खुरदरा(घ) ऊबड़-खाबड़ |
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Answer» सही विकल्प है (घ) ऊबड़-खाबड़ |
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प्रत्यय अलग कीजिए :हिन्दुत्वअर्थवालासाहित्यिकस्वच्छताचदाइयाँ |
Answer»
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‘आन का मान’ नाटक के आधार पर औरंगजेब का चरित्र-चित्रण कीजिए। या‘आन का मान’ नाटक के किसी एक पात्र का चरित्र-चित्रण कीजिए। |
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Answer» औरंगजेब का चरित्र-चित्रण श्री हरिकृष्ण प्रेमी कृत ‘आन का मान’ नाटक में औरंगजेब; वीर दुर्गादास का प्रतिद्वन्द्वी है तथा उसे खलनायक के रूप में चित्रित किया गया है। वह पूरे भारत पर एकछत्र राज्य की कामना करने वाला मुगल सम्राट् है। वह जीवन भर हिन्दुओं और उनके मन्दिरों के अस्तित्व को खत्म करने के लिए कुचक्र रचता रहता है। उसकी प्रमुख चारित्रिक विशेषताएँ निम्नलिखित हैं (1) कट्टर धार्मिक और संकीर्ण हृदय व्यक्ति—औरंगजेब संकीर्ण हृदय वाला कट्टर सुन्नीमुसलमान है। इस्लाम के आगे सभी धर्म उसकी दृष्टि में हेय हैं। मानव-मात्र के लिए वह इस्लाम को ही श्रेयस्कर मानता है। वह जोधपुर के कुमार अजीतसिंह को भी मुसलमान बनाना चाहता है। |
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‘आन का मान’ के आधार पर वीर दुर्गादास का चरित्र-चित्रण कीजिए अथवा चारित्रिक विशेषताओं का उल्लेख कीजिए।या‘आन का मान’ नाटक के प्रमुख पात्र (नायक) को चरित्र-चित्रण कीजिए। या“दुर्गादास का चरित्र ‘आन का मान’ नाटक को प्राणतत्त्व है।” इस कथन की समीक्षा कीजिए। या‘आन का मान’ नाटक के आधार पर उस प्रमुख पात्र का चरित्र-चित्रण कीजिए जिसने आपको सबसे अधिक प्रभावित किया हो। |
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Answer» दुर्गादास का चरित्र-चित्रण श्री हरिकृष्ण प्रेमी कृत ‘आन का मान’ नाटक के नायक वीर दुर्गादास राठौर हैं। दुर्गादास उच्च मानवीय गुणों से युक्त वीर पुरुष हैं। नाटक का सम्पूर्ण घटनाक्रम इनके चारों ओर ही घूमता है। इनकी चारित्रिक विशेषताएँ निम्नलिखित हैं (1) मानवतावादी दृष्टिकोण-दुर्गादास एक सच्चा व उच्च श्रेणी का मानव है। वह ऐसे किसी भी सिद्धान्त को आदर्श नहीं मानता, जो मानवता के विरुद्ध हो। औरंगजेब के बेटे को मुसलमान होते हुए भी वह अपना मित्र बनाता है। प्राणों की बाजी लगाकर वह अकबर द्वितीय की बेटी सफीयत की रक्षा करता है। दुर्गादास कहता है-”मानवता का मानव के साथ जो नाता है, वह स्वार्थ का नाता नहीं, शाहजादा हुजूर!” इस प्रकार वीर दुर्गादास उच्च आदर्शों वाला मानव है। वह स्वामिभक्त, कर्तव्यपरायण, मानवता में विश्वास रखने वाला, सच्चा मित्र तथा हिन्दू-मुस्लिम एकता का समर्थक है। उसके ये सभी मानवीय गुण उसके उदात्त चरित्र के प्रमाण हैं। वही इस नाटक का नायक अर्थात् प्रमुख पात्र है। |
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विरह-व्यथा किनकी दूर हुई? |
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Answer» गोपिकाओं की विरह-व्यथा दूर हुई। |
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क्या कारण है कि जापान को पूर्व का ब्रिटेन कहते हैं ?याआप कैसे कह सकते हैं कि जापान एक विकसित देश है ? इसके चार प्रमुख लक्षण/कारण बताइए। |
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Answer» औद्योगिक दृष्टि से जापान विश्व का एक अग्रणी देश है और एशिया में तो उसका प्रथम स्थान है। इस क्षेत्र में इसने यूरोप को भी पीछे छोड़ दिया है। केवल ब्रिटेन ही इसका समकक्ष प्रतीत होता है। द्वितीय विश्व युद्ध के पश्चात् मात्र पच्चीस वर्षों में इसने इतनी प्रगति की कि सारा विश्व आश्चर्यचकित रह गया। इसका कारण यहाँ के लोगों के द्वारा रात-दिन परिश्रम, ईमानदारी और लगन से काम में लगे रहना ही रहा है।तकनीकी प्रगति के फलस्वरूप इसके उत्पाद इतनी उच्च श्रेणी के तथा सस्ते होते हैं कि इसका कोई मुकाबला नहीं कर पाता। दुनिया के कार-बाजार तथा इलेक्ट्रॉनिक बाजार पर तो यह छाया हुआ है। यहाँ के प्रसिद्ध उद्योग हैं-इलेक्ट्रॉनिक सामान, रसायन, कपड़ा, लौह-इस्पात। अपनी औद्योगिक प्रगति के कारण ही यह विकसित देश कहलाता है। यहाँ पर याकोहामा, ओसाका, नगोया तथा नागासाकी सघन औद्योगिक क्षेत्र हैं, जहाँ जाकर लगता है कि हम किसी दूसरी दुनिया में ही पहुँच गये हों। पश्चिम के ब्रिटेन जैसी उन्नति करने के कारण ही जापान को ‘पूर्व का ब्रिटेन’ भी कहा जाता है। प्रमुख लक्षण/कारण
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भारत को विकासशील देश क्यों कहा जाता है ? कोई चार कारण लिखिए। |
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Answer» विकसित देश, संयुक्त राज्य अमेरिका, जापान, ब्रिटेन, कनाडा आदि देशों की अपेक्षा भारत में प्रति व्यक्ति आय कम है तथा जनसंख्या का जीवन-स्तर निम्न है। अत: इसे विकासशील देश कहा जाता है। इस देश को विकासशील देश मानने के चार प्रमुख कारण निम्नलिखित हैं–
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परशुराम के क्रोध करने पर लक्ष्मण ने धनुष के टूट जाने के लिए कौन-कौन से तर्क दिए? |
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Answer» कवि ने ‘श्री ब्रजदूलह’ ब्रज-दुलारे कृष्ण के लिए प्रयुक्त किया है। वे सारे संसार में सबसे सुंदर, सजीले, उज्ज्वल और महिमावान हैं। जैसे मंदिर में ‘दीपक’ सबसे उजला और प्रकाशवान होता है। उसके होने से मंदिर में प्रकाश फैल जाता है। उसी प्रकार कृष्ण की उपस्थिति से ही सारे ब्रज-प्रदेश में आनंद, उत्सव और प्रकाश फैल जाता है। इसी कारण उन्हें संसार रूपी मंदिर का दीपक कहा गया है। |
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विकासशील देश किसे कहते हैं ? स्पष्ट कीजिए। |
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Answer» जो देश आर्थिक विकास का उच्च स्तर पाने के लिए प्रयत्नशील हैं, विकासशील देश कहलाते हैं। पारम्परिक विकास का मार्ग छोड़कर द्रुतगति से औद्योगिक तथा कृषि उपज बढ़ाना ही इनको विकासशील देश की श्रेणी में लाकर खड़ा करता है। प्राय: इन देशों में जनसंख्या का घनत्व अधिक होने के कारण इनका सार्थक विकास दृष्टिगोचर नहीं होता। चीन, भारत, मिस्र, ब्राजील, श्रीलंका, बांग्लादेश आदि विकासशील देश हैं, जब कि जापान विकसित देश है। |
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‘जायरे को विकासशील देश कहा जाता है। क्यों ? कोई दो कारण दीजिए। |
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Answer» जो देश आर्थिक विकास का उच्च स्तर पाने के लिए प्रयत्नशील है, विकासशील देश कहे जाते हैं। जायरे एक अफ्रीकी देश है, जो विकासशील देशों की श्रेणी में आता है। इसको विकासशील देश स्वीकार करने के दो मुख्य कारण निम्नवत् हैं 1.जल-विद्युत उत्पादन की अनन्त क्षमता-जायरे नदी और उसकी सहायक नदियाँ, जायरे में जल-विद्युत उत्पादन की अनन्त क्षमताएँ उपलब्ध कराती हैं, जो संसार के किसी अन्य देश में उपलब्ध नहीं हैं। 2.खनिज के अनन्त भण्डारजायरे कॉपर, कोबाल्ट एवं औद्योगिक हीरे के उत्पादन में विश्व का अग्रणी देश है। दक्षिणी जायरे में लिथियम, चाँदी, सोना, टिन तथा मैंगनीज के अपार भण्डार उपलब्ध उपर्युक्त दोनों उपलब्ध संसाधन किसी भी देश को विकास के पथ पर अग्रसर करने के लिए वांछित ही नहीं महत्त्वपूर्ण रूप से सहायक भी हैं। |
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विकासशील देशों में जनसंख्या की समस्या पर एक टिप्पणी लिखिए। |
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Answer» विकासशील देशों में जनसंख्या की समस्या अधिकांश विकासशील देशों में जनसंख्या में तीव्र गति से वृद्धि की समस्या विद्यमान है। जनसंख्या की दृष्टि से विश्व में चीन का प्रथम तथा भारत का द्वितीय स्थान है। विकासशील देशों में जनसंख्या-वृद्धि की दर 2 से 3% वार्षिक है, जब कि विकसित देशों में वृद्धि-दर केवल 1% ही है। विकासशील देशों में जनसंख्या सम्बन्धी प्रमुख समस्याएँ निम्नलिखित हैं– 1. जनाधिक्य की स्थिति – विकासशील देशों में विश्व की लगभग 67% जनसंख्या निवास करती है। अनेक देशों में जनसंख्या में निरन्तर तीव्र वृद्धि के कारण जनाधिक्य की स्थिति उत्पन्न हो गयी है। इन देशों में शिक्षा तथा चिकित्सा सुविधाओं में सुधार होने से मृत्यु दर में कमी तथा औसत आयु में वृद्धि हो गयी है, किन्तु जन्म-दर में कोई विशेष कमी नहीं हो पायी हैं। परिणामत: जनसंख्या-वृद्धि की दर बढ़ती गयी है। 2. कार्यशील जनसंख्या का अभाव – अधिकांश विकासशील देशों की समस्त जनसंख्या में 35-40% तक बच्चे हैं, जब कि विकसित देशों में 20-25% ही बच्चे हैं। परिणामतः विकासशील देशों में जनसंख्या का एक बड़ा भाग कार्यशील जनसंख्या पर भार बना हुआ है। 3. भूमि पर भार में वृद्धि – जनसंख्या में तीव्र वृद्धि के कारण भूमि पर जनसंख्या का भार बढ़ता गया है। परिवार के सदस्यों में वृद्धि से भूमि का उपविभाजन तथा विखण्डन बढ़ता जा रहा है और खेतों का आकार छोटा तथा अनार्थिक होता जा रहा है। 4. जनोपयोगी सेवाओं पर अधिक व्यय – जनसंख्या में तीव्र वृद्धि के कारण इन देशों की सरकारों को परिवहन, बिजली, शिक्षा, चिकित्सा, भवन-निर्माण, जल-आपूर्ति आदि जनोपयोगी सेवाओं पर लगातार अधिकाधिक धनराशि व्यय करनी पड़ती है। इससे पूँजी की कमी के कारण विकास-योजनाओं को पूर्ण करने में कठिनाई आती है। 5. बेरोजगारी – जनाधिक्य की स्थिति के कारण अनेक अल्पविकसित देशों में बेरोजगारी तथा अर्द्ध-बेरोजगारी की समस्या ने विकराल रूप धारण कर लिया है। कृषि में छिपी हुई बेरोजगारी की समस्या प्रतिदिन बढ़ती जा रही है। 6. निम्न औसत आयु – अधिकांश विकासशील देशों में औसत आयु 35 से 45 वर्ष है, जबकि विकसित देशों में औसत आयु 65 से 75 वर्ष तक है। 7. शहरी जनसंख्या तथा समस्याओं में वृद्धि – जनसंख्या में तीव्र वृद्धि के कारण लोग रोजगार के लिए गाँवों को छोड़कर शहरों में आ रहे हैं, जिससे शहरों की जनसंख्या में भी तेजी से वृद्धि हुई है। इससे शहरों में भीड़-भाड़, मकानों की कमी, गन्दगी व प्रदूषण, गन्दी बस्तियों में वृद्धि, अपराधों में वृद्धि आदि समस्याएँ तथा बुराइयाँ बढ़ती जा रही हैं। |
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‘विकासशील देशों में आर्थिक विकास की पर्याप्त सम्भावनाएँ हैं।’ इस कथन की व्याख्या कीजिए। |
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Answer» विकासशील देशों में आर्थिक विकास की सम्भावनाएँ। आधुनिक विश्व में विकासशील राष्ट्रों के तीव्र आर्थिक विकास की सम्भावनाएँ पहले की अपेक्षा बहुत अधिक हैं। वर्तमान अनुकूल अन्तर्राष्ट्रीय परिस्थितियों को देखते हुए अब अल्प-विकसित राष्ट्रों के लिए विकास-मार्ग में आने वाली बाधाओं को दूर करना अत्यन्त कठिन नहीं रहा है। निम्नलिखित तथ्य अल्प-विकसित राष्ट्रों में विकास की प्रबल सम्भावनाओं को प्रकट करते हैं
विकासशील देशों में अभी तक समस्त कृषि-योग्य भूमि का उपयोग नहीं हो पाया है। अनेक देशों में लाखों एकड़ भूमि वनों तथा दलदलों से ढकी है और बेकार पड़ी है। इस समस्त भूमि का समुचित उपयोग करके इसे कृषि योग्य बनाया जा सकता है। उन्नत बीज व रासायनिक खाद का प्रयोग, सिंचाई-सुविधाओं में वृद्धि, साख-सुविधाओं में वृद्धि, आधुनिक विधियों तथा कृषि-यन्त्रों का प्रयोग आदि उपायों के द्वारा ये राष्ट्र कृषि के क्षेत्र में तीव्रता से विकास कर सकते हैं। 2. उद्योगों के विकास की सम्भावना – उद्योग-धन्धों का विकास मूलतः खनिज पदार्थों, शक्ति के साधनों, श्रम-शक्ति, पूँजी की उपलब्धता आदि बातों पर निर्भर करता है। अधिकांश विकासशील देश प्राकृतिक संसाधनों की दृष्टि से धनी हैं। चीन, भारत, मिस्र तथा ब्राजील में कोयले और लौह-अयस्क के विशाल भण्डार हैं। इराक, ईरान, तुर्की, सऊदी अरब, मिस्र, नाइजीरिया तथा चीन में खनिज तेल प्रचुर मात्रा में उपलब्ध है। इन देशों में यदि आधारभूत तथा अन्य उद्योगों का विकास कर लिया जाए तो इनके विकास की गति तीव्र हो सकती है। अब अन्तर्राष्ट्रीय परिस्थितियाँ बदल चुकी हैं। अब ये देश अपने साधनों का योजनाबद्ध ढंग से उपयोग करके तीव्रता से अपना औद्योगिक विकास कर सकते हैं। 3. विकसित राष्ट्रों के अनुभव से शिक्षा – अमेरिका, इंग्लैण्ड, फ्रांस तथा जापान जो आज अत्यधिक विकसित राष्ट्र हैं, भ में अविकसित थे या उनके सामने भी अनगिनत समस्याएँ थीं। अपनी समस्याओं का दृढ़तापूर्वक समाधान करके अब जापान भी विकसित राष्ट्रों की श्रेणी में सम्मिलित हो गया है। जापान की असाधारण सफलता से शिक्षा ग्रहण करके विकासशील राष्ट्र भी विकास-मार्ग पर तीव्रता से अग्रसर हो सकते हैं। 4. प्राकृतिक संसाधनों का कुशलतम उपयोग – वर्तमान युग में साधनों की बहुलता इतनी अधिक महत्त्वपूर्ण नहीं है, जितना कि उनका समुचित उपयोग। विश्व के कुछ राष्ट्रों ने प्राकृतिक साधनों के अल्प मात्रा में उपलब्ध होने के बावजूद तीव्रता से आर्थिक विकास किया है। जापान तथा इजराइल इसके ज्वलन्त उदाहरण हैं। अधिकांश अल्प-विकसित राष्ट्रों में तो प्राकृतिक साधन प्रचुर मात्रा में उपलब्ध हैं, जिनका कुशलतम उपयोग न कर पाने के कारण ये राष्ट्र अपना समुचित विकास नहीं कर सके हैं। ये राष्ट्र श्रमिकों की कार्यक्षमता में वृद्धि, परिवहन एवं बैंकिंग सुविधाओं का विकास एवं विस्तार तथा तकनीकी ज्ञान में वृद्धि करके प्राकृतिक संसाधनों का समुचित दोहन कर सकते हैं। 5. विदेशी सहायता – आजकल विकसित राष्ट्र अल्प-विकसित राष्ट्रों के विकास हेतु उन्हें पूँजी, तकनीकी ज्ञान, विशेषज्ञों की सेवाएँ आदि के रूप में सहायता प्रदान कर रहे हैं। इसके अतिरिक्त अन्तर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष, विश्व बैंक, एशियाई विकास बैंक आदि अन्तर्राष्ट्रीय संस्थाएँ विकासशील राष्ट्रों को बड़ी मात्रा में ऋण प्रदान कर रही हैं। अन्तर्राष्ट्रीय सहयोग ने विकासशील देशों की विकास सम्भावनाओं में पर्याप्त वृद्धि कर दी है। |
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विकासशील देशों में उद्योग-धन्धों के पिछड़ेपन के क्या कारण हैं ? |
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Answer» विकासशील देशों में उद्योग-धन्धों के पिछड़ेपन के निम्नलिखित कारण हैं
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विकसित देशों में कृषि के यन्त्रीकरण के लाभों का वर्णन कीजिए। |
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Answer» विकसित देशों में हरित क्रान्ति के आलोक में कृषि के यन्त्रीकरण को ग्रहण किया गया है। कृषि के यन्त्रीकरण से आशय पशु एवं मानव शक्ति के स्थान पर यन्त्रों के प्रयोग द्वारा कृषि उत्पादन से लगाया जाता है। विकसित देशों में बड़े पैमाने पर कृषि का यन्त्रीकरण किया गया है। इससे इन देशों को निम्नलिखित लाभ हुए हैं
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ब्राजील को विकासशील देश क्यों कहा जाता है ? किन्हीं पाँच कारणों द्वारा अपने उत्तर की पुष्टि कीजिए। |
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Answer» जो देश विकास की प्रक्रिया में विकसित देशों की तुलना में पिछड़े हुए हैं, विकासशील देश कहे जाते हैं। इन देशों में विकास की पर्याप्त सम्भावनाएँ होती हैं, परन्तु विकास की गति मन्द होती है। ब्राजील, भारत की तरह एक विकासशील देश है। ब्राजील को विकासशील देश कहे जाने के पाँच कारण निम्नलिखित हैं 1. उद्योगों का धीमा विकास – ब्राजील में औद्योगिक विकास हो रहा है, यद्यपि विकास की गति धीमी है। औद्योगिक विकास की मन्द गति इस तथ्य से जानी जा सकती है कि 1960 ई० तक ब्राजील अनेक वस्तुओं; जैसे–स्टील, भारी मशीनरी, पेट्रो-केमिकल्स, हथियार आदि का आयात करता था, जबकि अब ये सभी चीजों का अपने यहाँ निर्माण करता है। आज ब्राजील के बने वायुयान अमेरिका में उड़ते हैं, तो यहाँ बने कम्प्यूटर्स चीन में प्रयोग किये जा रहे हैं। एक समय था जब ब्राजील की अर्थव्यवस्था का आधार उसके कृषि-उत्पादों का निर्यात था, परन्तु अब स्थिति बदल रही है और ब्राजील की अर्थव्यवस्था में उद्योगों ने प्रमुख स्थान प्राप्त कर लिया है। 2. पूँजी की कमी तथा विदेशी कर्ज – अधिकतर विकासशील देशों के समान ब्राजील को भी अपने औद्योगिक विकास के लिए विश्व के अन्य देशों, विशेषकर संयुक्त राज्य अमेरिका से, आर्थिक ऋण लेने पड़े। आज ब्राजील विश्व के सबसे अधिक कर्जदार देशों में से एक है। उस पर कर्ज की राशि इतनी अधिक है कि ब्राजील की निर्यात आय इस कर्ज का ब्याज चुकाने में ही लग जाती है। ब्राजील की धीमी गति के विकास का यह मुख्य कारण है। 3. अल्प-विकसित प्राकृतिक संसाधन – ब्राजील में खनिज पर्याप्त मात्रा में विद्यमान हैं, जिनमें अभ्रक, मैंगनीज, सोना, टिन, गैस एवं खनिज तेल मुख्य हैं। ब्राजील अपनी प्राकृतिक खनिज सम्पदा के बल पर विकास की ओर अग्रसर है। 4. कृषि आधारित अर्थव्यवस्था – ब्राजील की अर्थव्यवस्था अभी भी कृषि पर आधारित है। यहाँ से कॉफी, सोयाबीन, सन्तरा, चीनी तथा सन्तरे का जूस पर्याप्त मात्रा में निर्यात किये जाते हैं। 5. साक्षरता एवं तकनीकी का निम्न स्तर – ब्राजील में साक्षरता की दर अभी भी वांछित स्तर नहीं प्राप्त कर पायी है। इसी प्रकार तकनीकी दृष्टि से भी अभी यह देश उन्नत स्थिति में नहीं आ पाया है। यह स्वीकार करना पड़ेगा कि दोनों ही क्षेत्रों में विकास के लिए, ब्राजील प्रयत्नशील है। साक्षरता दर 82% से ऊपर पहुँच चुकी है। तकनीकी ज्ञान भी धीरे-धीरे बढ़ रहा है, जिसके कारण वायुयान और कम्प्यूटर जैसी चीजें अब वहाँ भी बन रही हैं। |
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यदि विधानसभा में किसी दल को स्पष्ट बहुमत प्राप्त नहीं है, तो सरकार की रचना में राज्यपाल किन-किन विकल्पों का प्रयोग कर सकता है? |
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Answer» राज्यपाल का एक मुख्य कार्य मुख्यमन्त्री की नियुक्ति करना है। राज्य की विधानसभा में यदि किसी एक राजनीतिक दल को स्पष्ट बहुमत प्राप्त है तथा बहुमत वाले राजनीतिक दल ने अपना नेता चुन लिया है, तो राज्यपाल के लिए यह अनिवार्य हो जाता है कि वह उसी नेता को मुख्यमन्त्री नियुक्त करे। ⦁ स्पष्ट बहुमत प्राप्त न होने की स्थिति में मुख्यमन्त्री पद के लिए एक से अधिक दावेदार हों, तब मुख्यमन्त्री के चयन और मनोनयन में राज्यपाल पदधारी को अपने विवेक का प्रयोग करते हुए सामान्यतया सबसे बड़े दल के नेता को प्राथमिकता देनी चाहिए। नवनियुक्त मुख्यमन्त्री को शीघ्रातिशीघ्र विधानसभा का अधिवेशन बुलाकर अपने बहुमत को प्रमाणित करना होता है। बहुमत को सिद्ध करने के लिए सामान्यतया 3 दिन से अधिक का समय देना, उसे मोलभाव का अवसर देना है। ऐसी स्थिति राजनीतिक तनाव, विवाद तथा उत्पातों को जन्म देती है। |
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राज्य प्रशासन में मुख्यमन्त्री का क्या स्थान है? |
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Answer» राज्य प्रशासन में मुख्यमन्त्री का स्थान |
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राज्यपाल के किन्हीं दो विधायी अधिकारों का उल्लेख कीजिए। याराज्यपाल के दो विधायी कार्यों का उल्लेख कीजिए। |
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Answer» राज्यपाल के दो विधायी (कार्य) निम्नवत् हैं 1. धन विधेयकों से सम्बन्धित अधिकार – धन विधेयक केवल राज्यपाल की सिफारिश पर ही विधानसभा में प्रस्तुत किए जा सकते हैं। उस पर कोई भी संशोधन राज्यपाल की सिफारिश के बिना प्रस्तुत नहीं किया जा सकता है। किन्तु राज्यपाल धन विधेयकों को पुनर्विचार के लिए वापस नहीं भेज सकता, बल्कि सामान्यतया वह उनको स्वीकृति दे देता है। |
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राज्यपाल की किन्हीं दो प्रकार की शक्तियों को बताइए। |
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Answer» राज्यपाल की दो प्रकार की शक्तियाँ निम्नवत् हैं 1. कार्यकारिणी शक्तियाँ |
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राज्यपाल की आपातकालीन शक्तियों का उल्लेख कीजिए। |
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Answer» यदि राज्यपाल यह अनुभव करता है कि राज्य में संविधान के अनुसार शासन का संचालन असम्भव हो गया है तो वह राष्ट्रपति को इसकी सूचना देता है। उसकी सूचना के आधार पर राष्ट्रपति संविधान के अनुच्छेद 356 के अन्तर्गत राज्य में आपातकाल की घोषणा कर देता है। तथा राष्ट्रपति के आदेशानुसार वह राज्य के शासन का समस्त कार्य अपने हाथ में ले लेता है। |
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उन घटनाओं को याद करके लिखिए जब आपने अन्याय का प्रतिकार किया हो। |
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Answer» एक बार मेरे अध्यापक ने गणित में एक ही सवाल के लिए मुझे तीन अंक तथा किसी अन्य छात्र को पाँच अंक दे दिया। ऐसा उन्होंने तीन प्रश्नों में कर दिया था जिससे मैं कक्षा में तीसरे स्थान पर खिसक रहा था। यह बात मैंने अपने पिता जी को बताई। उन्होंने प्रधानाचार्य से मिलकर कापियों का पुनर्मूल्यांकन कराया और मैं कक्षा में संयुक्त रूप से प्रथम आ गया। |
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राज्यपाल की किन्हीं दो विवेकाधीन शक्तियों का वर्णन कीजिए। याराज्यपाल अपनी विवेकाधीन शक्तियों का प्रयोग किन परिस्थितियों में कर सकता है? किन्हीं दो का उल्लेख कीजिए। |
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Answer» कुछ कार्य ऐसे भी हैं जिन्हें राज्यपाल मन्त्रिपरिषद् से सलाह लेने के बाद भी अपने विवेक से करता है। इस प्रकार के कार्यों को किसी न्यायालय में चुनौती नहीं दी जा सकती है। राज्यपाल, क्रिस विषय पर अपने विवेक से कार्य करेगा, इसका निर्णय भी वह स्वयं ही करता है। राष्ट्रपति शासन लागू करने के लिए राष्ट्रपति को रिपोर्ट भेजना, कुछ विधेयकों को राष्ट्रपति की अनुमति के लिए अपने पास रोक लेना आदि मामलों में राज्यपाल, मुख्यमन्त्री और मन्त्रिपरिषद् से सलाह नहीं लेता है। |
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राज्यों की मन्त्रिपरिषद का गठन कैसे होता है? |
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Answer» राज्यपाल विधानसभा के बहुमत प्राप्त दल के नेता को मुख्यमन्त्री नियुक्त करता है। यदि किसी भी दल को स्पष्ट बहुमत प्राप्त नहीं होता है तो राज्यपाल स्वविवेक के आधार पर ऐसे व्यक्ति को मुख्यमन्त्री नियुक्त करता है जो बहुमत प्राप्त करने में सक्षम हो सके। तत्पश्चात् उसके परामर्श से वह मन्त्रिपरिषद् के अन्य मन्त्रियों की भी नियुक्ति करता है। |
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मुख्यमन्त्री की चार शक्तियाँ और कार्य बताइए। |
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Answer» मुख्यमन्त्री की चार शक्तियाँ और कार्य निम्नवत् हैं – 1. अपने मन्त्रिपरिषद् का गठन करना मुख्यमन्त्री का विशेषाधिकार है। |
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प्रथम भारतीय स्वतन्त्रता संग्राम 1857 ई० के कारणों एवं परिणामों की विवेचना कीजिए। |
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Answer» एंग्लो-इण्डियन इतिहासकारों ने सैनिक असन्तोषों तथा चर्बी वाले कारतूसों को ही 1857 ई० के महान् विद्रोह का मुख्य तथा महत्वपूर्ण कारण बताया है, परन्तु आधुनिक भारतीय इतिहासकारों ने यह सिद्ध कर दिया कि चर्बी वाले कारतूस ही इस विद्रोह का एकमात्र कारण अथवा सबसे प्रमुख कारण नहीं था। विद्रोह के कारण अधिक गूढ़ थे और वे सब जून, 1757 के प्लासी के युद्ध से 29 मार्च, 1857 ई० को मंगल पाण्डे द्वारा अंग्रेज अधिकारी की हत्या तक के अंग्रेजी प्रशासन के 100 वर्ष के इतिहास में निहित हैं। चर्बी वाले कारतूस और सैनिकों का विद्रोह तो केवल एक चिंगारी थी, जिसने उन समस्त विस्फोटक पदार्थों को जो राजनीतिक, सामाजिक, धार्मिक और आर्थिक कारणों से एकत्रित हुए थे, आग लगा दी और उसने दावानल का रूप धारण कर लिया। भारतीयों के प्रति अंग्रेजों के व्यवहार ने भारतीयों में असन्तोष भर दिया था। यह असन्तोष काफी समय से चला आ रहा था व समय-समय पर छोटे-छोटे विद्रोहों के रूप में परिलक्षित भी हुआ। वास्तव में 1857 ई० की क्रान्ति केवल सैनिक क्रान्ति नहीं थी। इस क्रान्ति के कारणों को छह प्रमुख भागों में विभाजित किया जा सकता है (i) राजनीतिक कारण (i) राजनीतिक कारण- विद्रोह के अधिकांश राजनीतिक कारण डलहौजी की साम्राज्यवादी नीति से उत्पन्न हुए थे। डलहौजी के गोद-निषेध सिद्धान्त से भारतीय जनता उत्तेजित हो उठी थी। इस नीति के आधार पर सतारा, नागपुर, झाँसी, सम्भलपुर, जैतपुर, उदयपुर इत्यादि राज्यों को जबरदस्ती अंग्रेजी साम्राज्य में मिला लिया गया। अवध अंग्रेजों का सर्वाधिक घनिष्ठ मित्र राज्य था, परन्तु उसका भी अपहरण कर लिया गया। जी०बी० मालेसन ने लिखा है कि “अवध को अंग्रेजी राज्य में मिलाए जाने और वहाँ पर नई पद्धति आरम्भ किए जाने से मुस्लिम कुलीनतन्त्र, सैनिक वर्ग, सिपाही और किसान सब अंग्रेजों के विरुद्ध हो गए और अवध असन्तोष का बड़ा भारी केन्द्र बन गया।” अंग्रेजों की नीति यह थी कि उच्च पदों पर भारतीयों को न बैठाया जाए, इस नीति के कारण लगभग 60,000 सैनिक व राज्य के कर्मचारी बेकार हो गए थे, जो अंग्रेजों के घोर शत्रु बन गए। इसके अतिरिक्त अंग्रेजों ने कभी-भी भारतीयता को नहीं अपनाया, यद्यपि प्रारम्भ में मुस्लिमों को विदेशी समझा जाता था परन्तु यह भेद धीरे-धीरे खत्म हो गया था व हिन्दू तथा मुस्लिम केवल भारतीय होने की भावना से परस्पर कार्य करते थे। अंग्रेजों ने हमेशा शासक वर्ग की भाँति कार्य किया, वे केवल अपने राष्ट्र (इंग्लैण्ड) के कल्याण के विषय में सोचते थे। भारतीय शासित वर्ग शनैः शनैः निर्धन होता जा रहा था। भारतीय शासित वर्ग, जैसे- जमींदारों आदि ने विद्रोह के समय क्रान्तिकारियों की धन से सहायता की। (ii) सामाजिक कारण- अंग्रेजों ने भारतीय रीति-रिवाजों की अवहेलना करके अपनी सभ्यता को जबरन भारतीयों पर थोपने का प्रयास किया। भारत के लोगों में अंग्रेजी शिक्षा को लेकर बहुत अविश्वास था। उन्हें लगता था कि अंग्रेजी शिक्षा के माध्यम से सम्भवतः उन्हें ईसाई बनाने के प्रयास कर रहे हैं। अंग्रेजों ने भारतीय धार्मिक शिक्षा का बहिष्कार किया तथा जाति के नियमों का भी उल्लंघन किया। अंग्रेजी शिक्षा के प्रसार द्वारा अंग्रेजों ने एक ऐसा वर्ग निर्मित कर दिया, जो भारतीय होते हुए भी भारतीय रीति-रिवाजों को हेय दृष्टि से देखने लगा। अंग्रेजों ने भारतीय रीति-रिवाजों का अपमान व अवहेलना की। इसके अतिरिक्त तत्कालीन भारत में अनेक कुप्रथाएँ विद्यमान थीं। अंग्रेजों ने भारतीय समाज को सुधारने के लिए सतीप्रथा, बाल-विवाह, बाल हत्या आदि कुप्रथाओं के विरुद्ध नियम बनाने प्रारम्भ किए। यद्यपि अंग्रेजों ने इन कुप्रथाओं को हटाकर भारत का कल्याण ही किया तथापि रूढ़िवादी भारतीय अंग्रेजों के प्रत्येक कार्य को संदिग्ध दृष्टि से देखते थे। इन सुधारों ने भारतीयों के असन्तोष में वृद्धि की। (iii) धार्मिक कारण- अंग्रेज व्यापारियों के साथ ईसाई धर्म प्रचारक भी भारत में आ बसे, यद्यपि अंग्रेजों ने मुस्लिम शासकों की भाँति अपना धर्म किसी पर थोपा नहीं परन्तु सन् 1850 ई० में पास किए गए धार्मिक अयोग्यता अधिनियम द्वारा लार्ड डलहौजी ने हिन्दुओं के उत्तराधिकार नियमों में परिवर्तन किए। अभी तक नियम यह था कि धर्म परिवर्तन करने की दशा में व्यक्ति अपनी पैतृक सम्पत्ति से वंचित हो जाता था परन्तु ईसाई धर्म को अपनाने पर वह व्यक्ति अपनी पैतृक सम्पत्ति का अधिकारी बना रह सकता था। सन् 1813 ई० के चार्टर ऐक्ट द्वारा ईसाई मिशनरियों को भारत में धर्म प्रचार की आज्ञा मिल गई थी, जिससे वे खुले रूप में हिन्दू देवी-देवताओं व मुस्लिम पैगम्बरों को बुरा-भला कहने लगे। ईसाई धर्म अपनाने वाले व्यक्तियों को उच्च पदों पर प्राथमिकता मिलती थी। अनेक बार ये धर्म प्रचारक उद्दण्डता का व्यवहार भी करते थे। इसलिए भारतीयों को इन धर्म प्रचारकों से घृणा होने लगी थी। बेरोजगारों, अनाथों, वृद्धों व विधवाओं को प्रलोभन देकर व बलपूर्वक ईसाई बना लिया जाता था। (iv) आर्थिक कारण- भारत प्रारम्भ से ही धन सम्पन्न देश था। भारत में समय-समय पर अनेक आक्रमणकारी आए, जिन्होंने भारत की धन-सम्पदा को लूटा तब भी भारत में कभी धन का अभाव नहीं रहा। मुगलों के बादशाहों ने भारत का धन अपनी शानो-शौकत पर लुटाया तथा भारत के अपार धन को अपनी विलासिता पर खर्च किया तब भी भारत एक धनी देश बना रहा क्योंकि विदेशियों व मुगलों ने भारत के आय के स्रोतों पर कभी प्रहार नहीं किया। अंग्रेजों ने भारत में ‘मुक्त व्यापार नीति लागू की, जो भारतीय व्यापार व उद्योगों के विरुद्ध थी। इंग्लैण्ड में बना कपड़ा भारत में सस्ते दामों पर बेचा जाने लगा तथा भारत के कच्चे माल काफी कम कीमत पर इंग्लैण्ड भेजे जाने लगे, जिससे भारतीय वस्त्र उद्योग नष्ट हो गया। देशी रियासतों के अंग्रेजी राज्यों में मिल जाने से भी बेरोजगारी में वृद्धि हुई क्योंकि अंग्रेज उच्च प्रशासनिक पदों पर भारतीयों की नियुक्ति नहीं करते थे। भारत में बढ़ती बेरोजगारी की समस्या का निदान करना अंग्रेज अपना कर्त्तव्य नहीं समझते थे। इस प्रकार अंग्रेजों ने भारतीय समाज के आर्थिक ढाँचे को अस्त-व्यस्त कर दिया। (v) सैनिक कारण- अंग्रेजों ने भारतीय सैनिकों के सहारे से ही भारत में अपनी स्थिति मजबूत की थी। भारतीय सैनिकों की संख्या अंग्रेजी सेना में लगभग 2,50,000 थी जबकि अंग्रेज 90,000 से भी कम थे, परन्तु समस्त उच्च पद केवल अंग्रेजों को ही प्राप्त थे। अंग्रेजी सैनिकों को भारतीयों से अधिक वेतन व अन्य सुविधाएँ मिलती थीं। खाने का खर्च व वर्दी के पैसे काटकर उन्हें मात्र डेढ़ या दो रुपए दिए जाते थे, जिससे उनको पेट पालना भी मुश्किल होता था। इसी प्रकार एक भारतीय सूबेदार का वेतन 35 रुपए मासिक था, जबकि अंग्रेज सूबेदार को 195 रुपए मासिक वेतन मिलता था। युद्ध आदि के अवसरों पर भारतीय सैनिकों को भारत से बाहर भी भेजा जाता था, जिससे उनकी सामाजिक व धार्मिक भावनाओं को चोट पहुँचती थी, क्योंकि उस समय विदेश जाना सामाजिक दृष्टि से खराब माना जाता था तथा उस व्यक्ति को बिरादरी से निष्कासित कर दिया जाता था। इसके अतिरिक्त भारतीय सैनिक उच्च जाति के थे, किन्तु अंग्रेज उनके साथ अत्यन्त अभद्र व्यवहार करते थे। अंग्रेज अधिकारी भारतीय सैनिकों को भद्दी-भद्दी गालियाँ देते थे तथा उन्हें निग्गर या काला आदमी कहकर मजाक उड़ाते थे। यही कारण था कि भारतीय सैनिकों ने समय-समय पर विद्रोह कर अपनी भावनाओं को स्पष्ट किया। यद्यपि सरकार ने इनका कठोरतापूर्वक दमन तो कर दिया, किन्तु भारतीय सैनिकों के हृदयों में आक्रोश निरन्तर बढ़ता रहा जो चर्बी वाले कारतूसों की घटना के रूप में प्रस्फुटित हुआ। इन कारतूसों ने कोई नवीन कारण प्रस्तुत नहीं किया अपितु एक ऐसा अवसर प्रदान किया, जिससे उनके भूमिगत असन्तोष प्रकट हो गए। इसके अतिरिक्त अंग्रेजों ने अनेक धर्म विरुद्ध नियम बना दिए थे। उस समय समुद्री यात्रा को धर्म विरोधी माना जाता था। 1856 ई० के General Service Enlistment Act के अनुसार जो सैनिक समुद्र पार के स्थलों पर जाने के लिए मना करेगा उसका सेना से निष्कासन कर दिया जाएगा। सैनिकों ने समझा इन कानूनों से अंग्रेजी सरकार उन्हें धर्मविहीन करना चाहती है। (vi) तात्कालिक कारण- सैनिकों के असन्तोष का तात्कालिक कारण नए कारतूसों का प्रयोग था। कम्पनी सरकार ने पुरानी ब्राउन बैस बन्दूक की जगह जनवरी, 1857 से नई एनफील्ड राइफल का प्रयोग आरम्भ किया। इस राइफल में जो कारतूस भरी जाती थी, उसे दाँत से काटना पड़ता था। बंगाल सेना में यह अफवाह फैल गई कि इस कारतूस में गाय और सूअर की चर्बी मिली हुई है। इससे हिन्दू-मुसलमान सैनिकों में भयंकर रोष उत्पन्न हो गया। उनके मन में यह बात बैठ गई कि सरकार उनका धर्म भ्रष्ट करने पर तुली हुई है और उन्हें ईसाई बनाना चाहती है। इस घटना ने उस आग को जलाया जिसके लिए लकड़ियाँ पहले से ही इकट्टठा हो चुकी थीं। लोगों ने यह कहना शुरू कर दिया कि “कम्पनी औरंगजेब की भूमिका में है। और सैनिकों को शिवाजी बनना ही है।” अत: सेना अपने धर्म की रक्षा के लिए कटिबद्ध हो गई। 1857 ई० के स्वतन्त्रता संग्राम के परिणाम- इसके लिए विस्तृत उत्तरीय प्रश्न संख्या-1 के उत्तर का अवलोकन कीजिए। |
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