This section includes 7 InterviewSolutions, each offering curated multiple-choice questions to sharpen your Current Affairs knowledge and support exam preparation. Choose a topic below to get started.
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भक्ति में लीन मीरा को लोग क्या-क्या कहते थे ? और क्यों ? |
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Answer» मीराबाई श्रीकृष्ण के प्रेम में रंगते-रंगते संसार के प्रति विरक्त हो गई थीं। उन्होंने सांसारिकता को बिलकुल भुला दिया था। मीरां श्रीकृष्ण के प्रेम में पैरों में घुघरू बाँधकर नाचती थीं। यह देखकर लोग उन्हें ‘पागल’ कहने लगे थे। वे साधुओं की संगति में बैठती थीं। यह देखकर लोग उनकी खिल्ली उड़ाया करते थे। उनकी सास और राणा को मीरां का भक्तिभाव बिलकुल अच्छा नहीं लगता था। इसलिए सास उन्हें ‘कुलनाशिनी’ कहती थी और राणा को लगता था कि ऐसे प्राणी को जीवित ही नहीं रहना चाहिए। इसलिए उन्होंने मीरा को जान से मारने के लिए विष का प्याला ही भेज दिया था। इस प्रकार भक्तिभाव में लीन मीरां को लोग तरह-तरह से संबोधित करते थे। |
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भक्त प्रभु के निकट होने की बात समझाने के लिए किसका सहारा लेते हैं? |
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Answer» भक्त प्रभु के निकट होने की बात समझाने के लिए विभिन्न प्रतीकों का सहारा लेते हैं। |
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मोती और धागा किस भाव का प्रतीक है? |
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Answer» मोती और धागा एकाकार का प्रतीक है। |
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‘मीराबाई की भक्ति दैन्य एवं माधुर्य भाव की है’- इस कथन को स्पष्ट कीजिए। |
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Answer» मीरा की कृष्ण भक्ति में दैन्य और माधुर्य भाव का अद्भुत समन्वय है। वे कृष्ण की दैन्य भाव अर्थात् दास भाव से भी भक्ति करती हैं तो वे कृष्ण की सखा, प्रियतम, पति रूप में मानकर माधुर्य भाव से भक्ति भी करती है। |
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ससंदर्भ भाव स्पष्ट कीजिए:या देही रो गरब ना करना माटी मा मिल जासी।यो संसार चहर री बाजी साँझ पड्या उठ जासी। |
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Answer» प्रसंग : प्रस्तुत पद्यांश हमारी पाठ्य पुस्तक ‘साहित्य वैभव’ के ‘मीराबाई के पद’ से लिया गया है। इसकी रचयिता मीराबाई हैं। |
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मीराबाई ने किसकी संगति में बैठकर लोक-लाज छोडा? |
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Answer» मीराबाई ने साधुओं की संगति में बैठकर लोक-लाज छोड़ा। |
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पद का भावार्थ लिखें:म्हारां री गिरधर गोपाल दूसरां न कूयां।दूसरां न कोवां साधां सकल लोक जूयां।भाया छांड्या बंधां छांड्या सगां सूयां।साधां संग बैठ बैठ लोक लाज खूया।भगत देख्यां राजी ह्ययां जगत देख्यां रूयां।असवां जल सींच सींच प्रेम बेल बूयां।राणा विषरो प्याला भेज्यां पीय मगन हुयां।अब तो बात फैल पड्या जाणं सब कूयां।मीरां री लगन लग्यां होना होजू हूँया। |
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Answer» भावार्थ : मेरा तो गिरधर गोपाल के अलावा और कोई दूसरा नहीं है, अर्थात् वही मेरा एकमात्र प्राणाधार (जीवन का आधार) है। हे साधु! मैंने सारा जग देख लिया है, कृष्ण के अतिरिक्त मेरा कोई दूसरा है ही नहीं। उस कृष्ण के लिए मैंने अपना भाई छोड़ दिया है; अर्थात् उसके लिए संसार के समस्त प्रिय रिश्ते-नाते छोड़ दिए हैं। मैंने साधुओं के पास बैठ-बैठ कर लोक की लाज को खो दिया है। कृष्णभक्त को देखकर मैं प्रसन्न होती हूँ और संसार की सांसारिकता को देखकर मुझे रोना आता है। मैंने अपने आँसुओं से सींच-सींच कर अपने हृदय में कृष्ण के प्रेम की बेल बो ली है और दही को मथ कर उसमें से घी निकाल लिया है तथा छाछ को छोड़ दिया है। अर्थात् सार तत्व ग्रहण कर लिया है और असार तत्व छोड़ दिया है। राणा ने मुझे कृष्ण भक्ति से विमुख करने के लिए विष का प्याला भेजा था, जिसे मैंने प्रसन्न होकर पी लिया। मीरा कहती है कि अब तो मेरी लंगन गिरधर कृष्ण से लग गई है, यह छूट नहीं सकती, चाहे जो हो। विशेष : इसमें मीरा की अनन्य भक्ति की सुन्दर अभिव्यंजना हुई है। |
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देह किसमें मिल जाएगी? |
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Answer» देह मिट्टी में मिल जाएगी। |
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कौन स्वयं को कृष्ण की दासी मानती है? |
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Answer» मीरा स्वयं को कृष्ण की दासी मानती हैं। |
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मीराबाई ने जीवन के सार तत्व को कैसे अपना लिया? |
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Answer» मीराबाई ने अपने इष्ट गिरधर गोपाल की सच्चे मन से भक्ति की है। उसने जीवन के सारतत्व को अपना लिया है। अर्थात् तीर्थाटन, व्रत-उपवास अथवा कासी में करवट लेने जैसे पाखंड (दिखावटी) भक्ति न करके, काया-वाचा-मनसा वाली सच्ची भक्ति की है। |
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| 11. |
मीराबाई ने जीवन की नश्वरता के सम्बन्ध में क्या कहा हैं? |
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Answer» मीराबाई के अनुसार धरती और आसमान में जितनी दूर तक दृष्टि जाए, सबकुछ नश्वर है। जो जन्म लेता है, वह एक-न-एक दिन अवश्य मरता है। यह शरीर नश्वर है। मनुष्य को इस नाशवान शरीर के लिए गर्व नहीं करना चाहिए। क्योंकि यह शरीर मिट्टी से बना है और मिट्टी में मिल जायेगा। यह जीवन चिड़ियों के खेल के समान है, जीवन की साँझ होते ही सबकुछ खतम हो जायेगा। |
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| 12. |
मीराबाई ने उनके ऊपर हुए अनाचारों का वर्णन कैसे किया है? |
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Answer» मीराबाई कहती हैं- राणा ने मुझे भगवान की भक्ति से विमुख करने के लिए विष का प्याला भेजा था, जिसे मैने प्रसन्न होकर पी लिया। राणा नहीं चाहते थे कि उनके घराने की स्त्री साधुओं के साथ सत्संग करें। राणा ने तरह तरह से उन्हें यातनाएँ दी। |
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किसका घमंड नहीं करना चाहिए? |
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Answer» मनुष्य देह (शरीर) का घमंड नहीं करना चाहिए। |
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मीराबाई की लगन किसमें लगी है? |
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Answer» मीराबाई की लगन अपने इष्ट गिरिधर गोपाल में लगी है। |
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श्रीकृष्ण के चरणकमल कैसे हैं? |
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Answer» श्रीकृष्ण के चरणकमल अविनासी हैं। |
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मीराबाई किन बन्धनों को नष्ट करने के लिए प्रार्थना करती हैं? |
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Answer» मीराबाई सांसारिक बन्धनों को नष्ट करने की प्रार्थना करती हैं। |
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श्यामा ने कौन-सा ब्रह्मास्त्र छोड़ा? उसका क्या परिणाम हुआ?अथवाबच्चनजी को डॉ. मुखर्जी के पास क्यों जाना पड़ा? |
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Answer» बीमार बच्चनजी डॉक्टर के पास जाने की बात टाल रहे थे। यह देखकर पत्नी ने ब्रह्मास्त्र छोड़ा कि जब तक वे डॉ. मुखर्जी को नहीं दिखाएंगे, तब तक वह खाना नहीं खाएगी। इससे बाध्य होकर बच्चनजी को डॉ. मुखर्जी के पास जाना पड़ा। |
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श्यामा ने कौन-सा ब्रह्मास्त्र छोड़ा? |
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Answer» श्यामा ने यह ब्रह्मास्त्र छोड़ा कि जब तक बच्चनजी अपनी तबियत डॉक्टर को नहीं दिखाएंगे तब तक वह खाना नहीं खाएगी। |
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गुरुदेव द्वारा लिखी गई कविता पढ़कर लेखक के सामने कौन-सी घटना साकार हो उठती है ? |
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Answer» लेखक जब भी गुरुदेव द्वारा लिखी कविता पढ़ते हैं तब उनके सामने श्रीनिकेतन के तितल्ले पर कुत्तेवाली घटना साकार हो उठती है, कि किस तरह से वह कुत्ता दो मील चलकर अपने स्नेह-दाता से मिलने आ गया था और गुरुदेव का स्पर्श पाकर उसका रोम-रोम स्नेह-रस से आनंदित हो उठा था। |
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गुरुदेव द्वारा मैना को लक्ष्य करके लिखी कविता के मर्म को लेखक कब समझ पाया ? |
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Answer» गुरुदेव ने लेखक को पहली बार मैना को दिखाते हुए कहा कि “देखते हो, यह यूथभ्रष्ट है। रोज फुदकती है यहीं आकर। मुझे इसकी चाल में एक करुणभाव दिखाई देता है। इससे पहले लेखक का मानना था कि मैना करुणभाव दिखानेवाला पक्षी है ही नहीं। वह तो दूसरों पर अनुकंपा ही दिखाया करती है। लेखक ने साक्षात् मैना को देखा तब वह कविता के मर्म को समझ पाया। |
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‘झेन की देन’ पाठ से आपको क्या संदेश मिलता है? |
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Answer» ‘झेन की देन’ पाठ हमें अत्यधिक व्यस्त जीवनशैली और उसके दुष्परिणामों से अवगत कराता है। पाठ में जापानियों की व्यस्त दिनचर्या से उत्पन्न मनोरोग की चर्चा करते हुए वहाँ की ‘टी-सेरेमनी’ के माध्यम से मानसिक तनाव से मुक्त होने का संकेत करते हुए यह संदेश दिया है कि अधिक तनाव मनुष्य को पागल बना देता है। इससे बचने का उपाय है मन को शांत रखना। बीते दिनों और भविष्य की कल्पनाओं को भूलकर वर्तमान की वास्तविकता में जीना और वर्तमान का भरपूर आनंद लेना। इसके मन से चिंता, तनाव और अधिक काम की बोझिलता हटाना आवश्यक है ताकि शांति एवं चैन से जीवन कटे। |
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भारत में भी लोगों की जिंदगी की गतिशीलता में खूब वृद्धि हुई है। इसके कारण और परिणाम का उल्लेख ‘झेन की देन’ पाठ के आधार पर कीजिए। |
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Answer» अत्यधिक सुख-सुविधाएँ पाने की लालसा, भौतिकवादी सोच और विकसित बनने की चाहत ने भारतीयों की जिंदगी की गतिशीलता में वृधि की है। भारत विकास के पथ पर अग्रसर है। गाँव हो या महानगर, प्रगति के लिए भागते दिख रहे हैं। विकसित देशों की भाँति जीवन शैली अपनाने के लिए लोगों की जिंदगी में भागमभाग मची है। लोगों के पास अपनों के लिए भी समय नहीं बचा है। यहाँ के लोगों की स्थिति भी जापानियों जैसी हो रही है जो चलने की जगह दौड़ रहे हैं, बोलने की जगह बक रहे हैं और इससे भी दो कदम आगे बढ़कर मनोरोगी होने लगे हैं। |
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‘टी-सेरेमनी’ की चाय का लेखक पर क्या असर हुआ? |
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Answer» ‘टी-सेरेमनी’ में चाय पीते समय लेखक पहले दस-पंद्रह मिनट उलझन में पड़ा। फिर उसके दिमाग की रफ्तार धीमी होने लगी। जो कुछ देर में बंद-सी हो गई। अब उसे सन्नाटा भी सुनाई दे रहा था। उसे लगने लगा कि वह अनंतकाल में जी रहा है। |
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‘व्यवहारवाद’ समाज के लिए किस प्रकार हानिकारी है? |
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Answer» ‘व्यवहारवाद’ अर्थात् ‘लाभ-हानि’ की गणना करके किया गया व्यवहार। इसे अवसरवादिता भी कहा जा सकता है। मनुष्य जब अपने लाभ, उन्नति और भलाई के लिए आदर्शों को त्याग दे तब मानवीय मूल्यों का पतन हो जाता है। ऐसा व्यवहारवाद समाज को पतनोन्मुख बनाता है। |
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समाज के उत्थान में आदर्शवादियों का योगदान स्पष्ट कीजिए। |
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Answer» हर समाज के कुछ शाश्वत मूल्य होते हैं। इनमें सत्य, त्याग, प्रेम, सहभागिता परोपकार आदि प्रमुख हैं। आदर्शवादी लोग ही अपने व्यवहार द्वारा इन मूल्यों को बनाए रखते हैं और आने वाली पीढ़ी को हस्तांतरित कर जाते हैं जिससे समाज में ये मूल्य बने रहते हैं। |
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‘जीना इसी का नाम है’ लेखक ने ऐसा किस स्थिति को कहा है? |
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Answer» ‘जीना इसी का नाम है’ लेखक ने ऐसा उस स्थिति को कहा है जब वह भूतकाल और भविष्य दोनों को मिथ्या मानकर उन्हें भूल बैठा। उसके सामने जो वर्तमान था उसी को उसने सच मान लिया था। टी-सेरेमनी में चाय पीते-पीते उसके दिमाग से दोनों काले उड़ गए थे। वह अनंतकाल जितने विस्तृत वर्तमान में जी रहा था। |
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प्रैक्टिकल आइडियालिस्ट’ किन्हें कहा गया है? |
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Answer» प्रैक्टिकल आइडियालस्टि वे हैं, जो अपने आदर्शों में व्यावहारिकता रूपी ताँबे का मेल करते हैं और चलाकर दिखाते हैं। वे आदर्श और व्यावहारिकता का समन्वय करके चलते हैं। |
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व्यवहारवादी लोगों की क्या विशेषताएँ हैं? |
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Answer» व्यवहारवादी लोग अपनी उन्नति और अपने लाभ-हानि को अधिक महत्त्व देते हैं। वे आदर्शों और मानवीय मूल्यों को महत्त्व नहीं देते हैं। यही नहीं वे समाज के अन्य लोगों की उन्नति या कल्याण की चिंता नहीं करते हैं। उनका व्यवहार लाभ-हानि की गणना से प्रभावित रहता है। |
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गांधी जी प्रैक्टिकल आइडियालिस्ट थे। स्पष्ट कीजिए। |
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Answer» गांधी जी भली-भाँति जानते थे कि शुद्ध आदर्शों को आचरण में नहीं लगाया जा सकता है फिर भी उनकी दृष्टि आदर्श से हटी नहीं। उन्होंने अपने आदर्शों से समझौता किए बिना व्यावहारिक आदर्शवाद को अपनाया तथा मर्यादित एवं श्रेष्ठ व्यवहार करते हुए जीवन बिताया। |
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नीचे दिए गए विशेषण शब्दों से भाववाचक संज्ञा बनाइए- 1. सफल = ……… 2. विलक्षण = …………. 3. व्यावहारिक = ………………… 4. सजग = ……….. 5. आदर्शवादी = ……….6. शुद्ध = …………. |
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Answer» 1. सफल = सफलता 2. विलक्षण = विलक्षणता 3. व्यावहारिक = व्यावहारिकता 4. सजग = सजगता 5. आदर्शवादी = आदर्शवादिता 6. शुद्ध = शुद्धता |
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लाभ-हानि’ का विग्रह इस प्रकार होगा-लाभ और हानि यहाँ द्वंद्व समास है जिसमें दोनों पद प्रधान होते हैं। दोनों पदों के बीच योजक शब्द का लोप करने के लिए योजक चिह्न लगाया जाता है। नीचे दिए गए द्वंद्व समास का विग्रह कीजिए- 1. माता-पिता = …….. 2. पाप-पुण्य = ……. 3. सुख-दुख = ……… 4. रात-दिन = ………. 5. अन्न-जल = ………. 6. घर-बाहर = ……….. 7. देश-विदेश = ……….. |
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Answer» 1. माता-पिता = माता और पिता 2. पाप-पुण्य = पाप और पुण्य 3. सुख-दुख = सुख और दुख 4. रात-दिन = रात और दिन 5. अन्न-जल = अन्न और जल 6. घर-बाहर = घर और बाहर 7. देश-विदेश = देश और विदेश |
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नीचे दिए गए वाक्यों में रेखांकित अंश पर ध्यान दीजिए और शब्द के अर्थ को समझिए- (क) शुद्ध सोना अलग है। (ख) बहुत रात हो गई अब हमें सोना चाहिए। ऊपर दिए गए वाक्यों में सोना” का क्या अर्थ है? पहले वाक्य में ‘सोना” का अर्थ है धातु ‘स्वर्ण’। दूसरे वाक्य में ‘सोना’ को अर्थ है ‘सोना’ नामक क्रिया। अलग-अलग संदर्भो में ये शब्द अलग अर्थ देते हैं अथवा एक शब्द के कई अर्थ होते हैं। ऐसे शब्द अनेकार्थी शब्द कहलाते हैं। नीचे दिए गए शब्दों के भिन्न-भिन्न अर्थ स्पष्ट करने के लिए उनका वाक्यों में प्रयोग कीजिए- उत्तर, कर, अंक, नग |
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Answer» उत्तर- सड़क की उत्तर दिशा में डाकखाना है। मुझे इस प्रश्न का उत्तर नहीं मालूम है। कर – हमें आय कर चुका कर देश की प्रगति में योगदान देना चाहिए। अध्यापक को दखते ही मैंने कर बद्ध प्रणाम किया। अंक – माँ ने सोते बच्चे को अंक में उठा लिया। एक अंक की कुल 4 संख्याएँ हैं। नग – हिमालय को नग राज कहा जाता है। उसके घर में कीमती नग जड़ा है। |
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गिन्नी के सोने का अधिक उपयोग क्यों किया जाता है? |
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Answer» गिन्नी का सोना शुद्ध सोने से अलग होता है। इसमें कुछ अंश तक ताँबे की मिलावट होती है जिससे यह अधिक चमकदार और मज़बूत बन जाता है। इसकी शुद्धता 22 कैरेट होती है। इसका उपयोग आभूषण बनवाने के लिए होता है। |
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शुद्ध सोने का उपयोग कम किया जाता है, क्यों? |
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Answer» शुद्ध सोना मिलावट रहित होता है। इसमें किसी अन्य धातु की मिलावट नहीं होती है। यह नरम लचीला तथा कम कठोर | होता है। इसमें चमक भी कम होती है। इसकी शुद्धता 24 कैरेट होती है तथा इससे आभूषण नहीं बनाए जाते हैं। |
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पाठ में वर्णित ‘टी-सेरेमनी’ का शब्द चित्र प्रस्तुत कीजिए। |
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Answer» ‘टी-सेरेमनी’ का शब्द चित्र- एक छह मंजिली इमारत की छत पर झोपड़ीनुमा कमरा है, जिसकी दीवारें दफ़्ती की बनी है। फ़र्श पर चटाई बिछी है। वातावरण अत्यंत शांतिपूर्ण है। बाहर ही एक बड़े से बेडौल मिट्टी के बरतन में पानी रखा है। लोग यहाँ हाथ-पाँव धोकर अंदर जाते हैं। अंदर बैठा चाजीन झुककर सलाम करता है। बैठने की जगह की ओर इशारा करता है और चाय बनाने के लिए अँगीठी जलाता है। उसके बर्तन अत्यंत साफ़-सुथरे और सुंदर हैं। वातावरण इतना शांत है कि चायदानी में उबलते पानी की आवाज साफ़ सुनाई दे रही है। वह बिना किसी जल्दबाजी के चाय बनाता है। वह कप में दो-तीन घूट भर ही चाय देता है जिसे लोग धीरे-धीरे चुस्कियाँ लेकर एक डेढ़ घंटे में पीते हैं। |
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कवि ने अमल-धवल गिरि के शिखरों पर किसको घिरते देखा है?(क) सूर्य को(ख) बादल को(ग) चंद्र को(घ) बारिश को |
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Answer» सही विकल्प है (ख) बादल को |
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लेखक के मित्र के अनुसार जापानी किस रोग से पीड़ित हैं और क्यों? |
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Answer» लेखक के मित्र के अनुसार जापानी मानसिक रुग्णता से पीड़ित हैं। इसका कारण उनकी असीमित आकांक्षाएँ, उनको पूरा करने के लिए किया गया भागम-भाग भरा प्रयास, महीने का काम एक दिन में करने की चेष्टा, अमेरिका जैसे विकसित राष्ट्र से प्रतिस्पर्धा आदि है। |
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लेखक के मित्र ने मानसिक रोग के क्या-क्या कारण बताए? आप इन कारणों से कहाँ तक सहमत हैं? |
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Answer» लेखक के मित्र ने मानसिक रोग का कारण बताया कि जापानियों ने अमरीका की आर्थिक गति से प्रतिस्पर्धा करने के कारण अपनी दैनिक दिनचर्या की गति बढ़ा दी । यहाँ कोई चलता नहीं, बल्कि दौड़ता है। वे एक महीने का काम एक दिन में करने का प्रयास करते हैं, इस कारण वे शारीरिक व मानसिक रूप से बीमार रहने लगे हैं। लेखक के ये विचार सत्य हैं क्योंकि शरीर और मन मशीन की तरह कार्य नहीं कर सकते और यदि उन्हें ऐसा करने के लिए विवश किया गया तो उनकी मानसिक संतुलन बिगड़ जाना अवश्यंभावी है। |
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'सेवक का धर्म कठिन होता है।’ कथन के आधार पर तुलसीदास के व्यक्तित्व में तत्कालीन सामाजिक परिदृश्य का चित्रण कीजिए। |
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Answer» सेवक का धर्म कठिन होता है। उसे स्वामी के अतिरिक्त और किसी से अनुराग नहीं होता। तुलसी स्वयं को राम का सेवक मानते थे। अतः मन को राम की भक्ति में ही तल्लीन रखना चाहते थे। मोह उत्पन्न होने पर सेवक की भक्ति में व्यवधान उत्पन्न होता है। तुलसी ने इसी कारण रत्नावली को आश्रम में नहीं रहने दिया, यद्यपि उनका मन बार-बार रत्नावली की ओर झुकता था, किन्तु राम की भक्ति को सर्वश्रेष्ठ मानकर उन्होंने रत्नावली का त्याग कर दिया। मोह में नहीं बँधे । सेवक धर्म का निर्वाह तलवार की धार पर चलने के समान है। सेवक को संसार से विरक्त होना पड़ता है। तुलसी ने भी राम की सेवा के लिए सब भोगों का त्याग कर दिया। किसी भी प्रकार के मोह में बँधकर सेवक अपने धर्म से विमुख हो जाता है। इस कारण तुलसी ने सेवक धर्म को कठिन बताया है। राम के अतिरिक्त उन्हें कुछ भी अच्छा नहीं लगता था। उनके हृदय में रत्नावली के त्याग का दुख भी है। मैं अपने और पत्नी के सुख के लिए समाज की आस्था अधर में नहीं लटका सकता। यह था तुलसी का व्यक्तित्व। तुलसी के समय में जनता मुगलों के शासन से संघर्ष करते हुए हतोत्साहित हो गई थी और विलासिता के पंक में डूब चुकी थी। राजा एक से अधिक स्त्रियाँ रखते थे। मुगलों के शासन में वर्ण व्यवस्था शिथिल हो गई थी। उस समय लोग जीविकाहीन और निरुद्देश्य भटक रहे थे। सदाचार नष्ट हो रहे थे। उनके समय में ओर ही लोगों का ध्यान था। धनोपार्जन विशेष उद्देश्य था। नारियों की दशा ठीक नहीं थी। उदरपूर्ति के लिए सन्तान का क्रय-विक्रय होता था। ब्राह्मणों की स्थिति शोचनीय थी। दहेज प्रथा प्रबल थी। तुलसी के समय विवाह के अवसर पर रीति-रिवाजों का पालन किया जाता था। अन्धविश्वास व्याप्त था। नारियों को एक ओर महान् गौरव प्रदान था तो दूसरी ओर उन्हें मात्र भोग और विलासिता का साधन समझा जाता था। नागरिकों की स्थिति दयनीय थी। उन्हें सामाजिक अधिकार प्राप्त नहीं थे। सती प्रथा का प्रचलन था। स्पष्ट है कि तुलसी के समय तात्कालीन सामाजिक स्थिति ठीक नहीं थी। |
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राजा भगत अपने साथ किसको लेकर आए? |
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Answer» राजा भगत अपने साथ रत्नावली को लेकर आये। |
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| 41. |
“भौजी जैसी तपसिनी हमने देखी नहीं।” रत्नावली के किस तपस्विनी रूप का वर्णन किया गया है? |
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Answer» राजा ने तुलसी से कहा कि तुम यहाँ तपस्या करते हो, भौजी गाँव में तपस्या करती हैं। उन जैसी तपस्विनी मैंने नहीं देखी। वे गाँव में तुम्हारी रुचि की रसोई बनाती रहीं और किसी भूखे बंगले को खिलाती थीं। आप बिना चुपड़ी बिना सागभाजी के दो रोटी खाकर अपने दिन बिताती हैं। रोज तुम्हारी धोती धोना, तुम्हारी पूजा की सामग्री लगाना, तुम्हारे बैठक में झाड़ लगाना, तुम्हारी एक-एक चीज को सहेज-सँभालकर रखना, यह सारे काम वे करती हैं। यह उनकी तपस्या ही है। ऐसी तपस्या भौजी ही कर सकती हैं। इसलिए राजा ने उन्हें तपस्विनी कहा। |
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सभी प्रकार की साधना करने के बाद भी तुलसी को प्राप्त नहीं हुआ –(क) साम्राज्य भक्ति(ख) वैराग्य(ग) प्रत्यक्ष दर्शन(घ) मन का सन्तोष। |
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Answer» (ग) प्रत्यक्ष दर्शन। |
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रत्नावली ने तुलसीदास से किस रचना की प्रति माँगी? |
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Answer» रत्नावली ने तुलसीदास से उनके द्वारा रचित ‘रामचरितमानस’ की प्रति माँगी। |
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“रामजी कदाचित् मुझे इसलिए दर्शन नहीं दे रहे हैं कि मैं रत्नावली से निठुराई बरत रहा हूँ।” पंक्ति में निहित तुलसीदास के अन्तर्द्वन्द्व को स्पष्ट कीजिए। |
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Answer» तुलसी के हृदय में अन्तर्द्वन्द्व था। उनका मन थाली के बैंगन की तरह कभी रत्नावली की ओर झुकता तो कभी राम की ओर मुड़ जाता । राजा से बात करने के बाद उन्होंने चादर तान ली। राम-राम जपना भी आरम्भ किया किन्तु रत्नावली उनके मन से नहीं हटी। वे सोचने लगे कि रत्नावली उनके पास आए अपना दुख-सुख उनसे कहे। कभी सोचते रत्नावली को अपने पास रख लूं इससे उसे सुख मिलेगा। रत्नावली से दूर रहने के लिए ही शायद राम दर्शन नहीं दे रहे हैं। उनका मन इसी उहापोह में रहता। कभी मन रत्नावली के मोह में फँस जाता, कभी राम की ओर मुड़ जाता । इसी अन्तर्द्वन्द्व के कारण वे रातभर सो न सके। मन की गति अस्थिर थी। |
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“अपना प्रवचन आप ही खाने लगा।” पंक्ति का आशय स्पष्ट करते हुए बताइए कि तुलसीदास का प्रवचन उन्हें कैसे खाने लगा? |
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Answer» तुलसीदास ने जो प्रवचन दर्शनार्थियों के सामने किया था वे स्वयं उसी पर विचार करने लगे। अपने सम्बन्ध में सोचने लगे। प्रभु से प्रार्थना करने लगे। वे सोचने लगे कि मैंने सब कुछ किया। वेद, पुराण, शास्त्र और सन्तों की वाणी में प्रभु को पाने के जो साधन बताए गए हैं, वे सब किए। फिर भी प्रभु के दर्शन नहीं हुए। उन्होंने प्रभु से प्रार्थना की कि आप मुझे प्रत्यक्ष दर्शन क्यों नहीं देते। आप मेरे ध्यान में क्यों नहीं आते। आपकी प्रतीति क्यों नहीं होती। वे उदास हो जाते हैं। वे संताप के झरने में उतरते-चढ़ते रहे और उनका संताप बढ़ गया। |
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तुलसी तपस्वी एवं वैरागी हैं, पर रत्नावली के प्रति उनका मोह भी कम नहीं है। उदाहरण देते हुए अपने विचार प्रकट कीजिए। |
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Answer» तुलसीदास वैरागी थे। उन्होंने ने स्वयं कहा था- “विरक्त अब फिर से राग के बन्धनों में नहीं बँध सकता।” फिर भी उनके मानस पटल पर रत्नावली की मूर्ति विद्यमान थी। उसके प्रति मन के कोने में एक आकर्षण था। जो बार-बार उन्हें आकर्षित करता रहता था। रत्नावली ने जब उनके पैरों को स्पर्श किया तो उन्हें तृप्ति मिली और पलभर के लिए मन से राम बिसर गये। रत्नावली रसोई में रसोइये की सहायता कर रही है, भृत्य से यह सुनकर उन्हें अच्छा लगा। भोजन करते समय हर व्यंजन में रत्नावली के हाथ को स्पर्श मालूम पड़ता। थाली के सामने बैठकर बार-बार रत्नावली की छवि के साथ अपने मन में बँध जाते। भोजन के हर व्यंजन में वे रत्नावली के हाथ का स्पर्श चाहते थे। रत्नावली जब प्रह्लाद घाट चली गई, तो उन्हें भोजन स्वादहीन लगने लगा। राजा भगत से रत्नावली की कठिन साधना की प्रशंसा सुनकर तुलसीदास को अच्छा लगा। उन्हें सन्तोष हुआ। रत्नावली तुलसी के मन के दृश्य पटल पर बार-बार आती, उनकी इच्छा होती कि वह रत्नावली को एक बार फिर देखें, उससे बातें करें । मन में एक गुदगुदाहट होती। उनका मन रत्नावली की मनोहर छवि निहारने में अटका हुआ था। सोते समय राम-राम जपना आरम्भ किया किन्तु रत्नावली उनके मन से नहीं हटी। उनकी इच्छा होने लगी कि रत्नावली उनके पास आए, उनसे अपना दुख-सुख कहे। उन्हें अनुभव हुआ कि वह मेरे (तुलसी के) लिए तड़पती है। वे सोचने लगे कि प्रभु मुझे इसलिए दर्शन नहीं दे रहे हैं क्योंकि मैं रत्नावली के प्रति निठुराई बरत रहा हूँ। सरवन को उसकी सेवा करने का निर्देश दिया। उपर्युक्त उदाहरण से स्पष्ट है कि तुलसी वैरागी थे पर उनके अन्त: करण रत्नावली विद्यमान थी। उसके प्रति उनका मोह था और वे रत्नावली से मिलना भी चाहते थे। |
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मानस का हंस (उपन्यास अंश) लेखक परिचय। |
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Answer» अमृत लाल नागर (1916 ई.-1990 ई.) ने लगभग आधी सदी तक अपने सक्रिय लेखन से साहित्य-जगत् में अप्रतिम योगदान किया। उनका व्यक्तित्व बहुमुखी प्रतिभा सम्पन्न था। इन्होंने हिन्दी गद्य की लगभग समस्त विधाओं में लेखनी चलाई। अमृत लाल नागर संवादों के शिल्पी, घरेलू जीवन के कुशल चित्रक, कथा गठन में माहिर, मनुष्य के अन्तर्विरोधों को उभारकर उसकी दुर्बलताओं पर करारे व्यंग्य करने वाले एवं मनुष्य की मूर्खता का गम्भीरता के साथ मजाक उड़ाने वाले रचनाकार हैं। निम्न वर्ग, मध्य वर्ग तथा अभिजात्य वर्ग की विषम परिस्थितियों एवं उनकी संस्कृति के सफल और कुशल चित्रकार हैं। उनकी भाषा में उर्दू के शब्दों का सुन्दर प्रयोग हुआ है, किन्तु उससे हिन्दी की स्वाभाविकता में कोई बाधा नहीं पहुँचती। प्रमुख रचनाएँ इस प्रकार हैंउपन्यास-बूँद और समुद्र, सुहाग के नूपुर, अमृत और विष, एकदा नैमिषारण्ये, मानस का हंस, नाच्यौ बहुत गोपाल, खंजन नयन। कहानी-संग्रह -वाटिका, अवशेष, एटम बम, पीपल की परी, एक दिल हजार अफसाने आदि। अन्य- चैतन्य महाप्रभु (जीवनी), साहित्य और संस्कृति (निबन्ध), चकल्लस (व्यंग्य), हमारे युग निर्माता, सतखण्डी हवेली का मालिक (बाल साहित्य) आदि। |
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‘मानस का हंस’ की संवाद योजना पर एक संक्षिप्त टिप्पणी लिखिए। |
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Answer» संवाद कथा साहित्य के प्राण हैं। इनसे कथा का विस्तार होता है, कथा में रोचकता आती है। संवाद जितने छोटे, सहज, स्वाभाविक, पात्रानुकूल और परिस्थितिजन्य होंगे उतने ही रोचक होंगे और पाठकों को बाँधने वाले होंगे। छोटे संवाद बड़े संवाद पात्रानुकूल संवाद परिस्थितिजन्य संवाद संवेदनशील संवाद “रो रही हो रत्ना”-“संतोष के आँसू हैं। इस प्रकार के गम्भीर और परिस्थितिजन्य संवाद भी हैं। अतः स्पष्ट है कि संवाद की दृष्टि से यह अंश श्रेष्ठ है। |
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‘मानस का हंस’ उपन्यास के पाठांश का सार अपने शब्दों में लिखिए। |
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Answer» तुलसीदास लोलार्क कुण्ड के मठ में कृष्ण की आरती कर रहे हैं और कृष्ण भक्ति का पद गाते हैं। भक्तों को कृष्ण भक्ति का महत्व बताते हैं। उन्होंने कहा कि सब देवों की उपासना करो पर अपने इष्ट को मत भूलो ह अपने आप प्रकट हो जाएगा। एकान्त होने पर तुलसी अपने बारे में सोचने लगे। वे सोचते हैं-मैंने सब कुछ किया, सन्तों की वाणी सुनी, साधना की, पर प्रभु के प्रत्यक्ष दर्शन नहीं हुए। उनका मन अस्थिर है। वे प्रभु से प्रार्थना करते हैं कि एक बार आप यह कह दीजिए कि तुलसीदास मेरा है। मुझे आप को भरोसा है। आप अपना लेंगे तो मुझे सन्तोष हो जाएगा। राजा भगत के आने पर वे प्रसन्न हो जाते हैं, परन्तु रत्नावली को देखकर उनका मन कुछ खिन्न हो जाता है। यद्यपि वे रत्नावली और राजा के ठहरने की व्यवस्था करते हैं। रत्नावली गंगा स्नान के बाद रसोइये की सहायता के लिए रसोई में चली गई। रत्नावली के द्वारा बनाये भोजन में तुलसीदास को स्वाद आया। टोडर से तुलसीदास ने राजा भगत का परिचय कराया। टोडर ने दोनों को अपने घर आने का निमंत्रण दिया। तुलसीदास के मन में रत्नावली के प्रति मोह था। वे रत्नावली से मिलना चाहते थे पर रत्नावली सतर्कतापूर्वक बचकर निकल जाती। तुलसीदास दूध पीकर लेट गये। वे राम का नाम जपते हैं पर रत्नावली उनके मन से नहीं हटी, वे सोचने लगे कि मैं रत्नावली के प्रति निठुराई दिखा रहा हूँ शायद इसलिए रामजी मेरे प्रति दयालु नहीं हैं। उनके मन में अन्तर्द्वन्द्व चलता रहा। राजा भगत ने रत्नावली की साधना और जोगिन रूप की प्रशंसा की जिसे सुनकर तुलसीदास को सन्तोष मिला। तुलसीदास के मन में बार-बार आता कि वह रत्नावली से मिलें। रत्नावली उनसे अपने दुख-सुख की बात कहे। राजा ने समझाया कि सीता को बिना राम को कष्ट हुआ। एकाकी जीवन सुखी नहीं हो सकता। टोडर, गंगाराम, कैलाश और शिष्यों ने रत्नावली को मठ में रखने का आग्रह किया पर तुलसी ने यह कहकर- “विरक्त अब फिर से राग के बंधनों में नहीं बँध सकता” बात टाल दी। तुलसी ने कहा कि यदि वे राग में फंस जायेंगे तो समाज की आस्था अधर में लटक जाएगी। तुलसीदास ने कहा कि आज का समय बल्लभाचार्य और कबीर को नहीं है। नत्थू ने तुलसीदास को रत्नावली को लेकर जो चर्चा हो रही है, उसे सुनाया। तुलसीदास को यह सुनकर दुख हुआ। तुलसीदास ने नौकर को बुलाकर रत्नावली के पास सन्देश भिजवाया कि वे शीघ्र राजपुर चली जायें। रत्नावली ने उत्तर में कहलाया कि वे मिलना चाहती हैं। तुलसीदास ने स्वीकृति दे दी। रत्नावली आई, आसन पर बैठी, पर दोनों के बीच में पर्दा पड़ा था। अन्त में रत्नावली ने रामचरित मानस की एक प्रति माँगी और एक भिक्षा माँगी, “मेरी मृत्यु से पहले एक बार मुझे अपना श्रीमुख दिखलाने की कृपा करें।” तुलसी ने इसे स्वीकार कर लिया। |
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निम्नलिखित पंक्तियों का भाव स्पष्ट कीजिए-पीकर जिनकी लाल शिखाएँ,उगल रहीं लू-लपट दिशाएँ।। |
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Answer» उन वीर अमर शहीदों ने दीपक की भाँति जलकर जो तेज लाल अग्नि प्रज्वलित की, उसकी गर्म लपटें दिशाओं में उठ रहीं हैं। सब तरफ क्रान्ति की प्रबल इच्छा बढ़ रही है। |
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