This section includes 7 InterviewSolutions, each offering curated multiple-choice questions to sharpen your Current Affairs knowledge and support exam preparation. Choose a topic below to get started.
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महिलाएँ क्यों निम्न वेतन वाले कार्यों में नियोजित होती हैं? |
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Answer» महिलाएँ निम्न कारणों से निम्न वेतन वाले कार्यों में नियोजित होती हैं ⦁ ज्ञान व जानकारी के अभाव में महिलाएं असंगठित क्षेत्रों में कार्य करती हैं जो उन्हें कम मजदूरी देते हैं। उन्हें अपने कानूनी अधिकारों की जानकारी भी नहीं है। ⦁ महिलाओं को शारीरिक रूप से कमजोर माना जाता है इसलिए उन्हें प्रायः कम वेतन दिया जाता है। ⦁ बाजार में किसी व्यक्ति की आय निर्धारण में शिक्षा महत्त्वपूर्ण कारकों में से एक है। ⦁ भारत में महिलाएँ पुरुषों की अपेक्षा कम शिक्षित होती हैं। उनके पास बहुत कम शिक्षा एवं निम्न कौशल स्तर हैं। इसलिए उन्हें पुरुषों की तुलना में कम वेतन दिया जाता है। ⦁ महिलाएँ भौतिक एवं भावनात्मक रूप से कमजोर होती हैं। ⦁ महिलाएँ खतरनाक कार्यों (hazardous work) के लिए उपयुक्त नहीं होती हैं। ⦁ महिलाओं के कार्यों पर सामाजिक प्रतिबंध होता है। ⦁ महिलाएँ दूर स्थित, पहाड़ी एवं मरुस्थलीय क्षेत्रों में कार्य नहीं कर सकती। |
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आर्थिक और गैर आर्थिक क्रियाओं में क्या अन्तर है? |
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Answer» आर्थिक क्रियाएँ-वह क्रियाएँ जो जीविका कमाने के लिए और आर्थिक उद्देश्य से की जाती हैं, आर्थिक क्रियाएँ कहलाती हैं। यह क्रियाएँ उत्पादन, विनियम एवं वस्तुओं और सेवाओं के वितरण से संबंधित होती हैं। लोगों का व्यवसाय, पेशे और रोज़गार में होना आर्थिक क्रियाएँ हैं। इन क्रियाओं का मूल्यांकन मुद्रा में किया जाता है। गैर-आर्थिक क्रियाएँ-वह क्रियाएँ जो भावनात्मक एवं मनोवैज्ञानिक आवश्यकताओं की संतुष्टि के लिए की जाती हैं। और जिनका कोई आर्थिक उद्देश्य नहीं होता, गैर-आर्थिक क्रियाएँ कहलाती हैं। यह क्रियाएँ सामाजिक, सांस्कृतिक, धार्मिक, शैक्षिक एवं सार्वजनिक हित से संबंधित हो सकती हैं। |
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प्राथमिक क्षेत्र किसे कहते हैं? |
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Answer» प्रकृति द्वारा प्रदत वस्तु को एकत्र करने या उपलब्ध कराने से जुड़ी क्रियाओं को प्राथमिक क्षेत्र में शामिल किया जाता है। उदाहरणतः कृषि, वानिकी, पशुपालन, मुर्गीपालन, मत्स्य पालन एवं खनन आदि। |
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‘बेरोजगारी’ शब्द की आप कैसे व्याख्या करेंगे? |
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Answer» वह स्थिति जिसके अन्तर्गत कुशल व्यक्ति प्रचलित कीमतों पर कार्य करने के इच्छुक होते हैं किन्तु कार्य नहीं प्राप्त कर पाते, तो ऐसी स्थिति बेरोजगारी कहलाती है, यह स्थिति विकसित देशों की अपेक्षा विकासशील देशों में अधिक देखने को मिलती है। |
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क्या आप कुछ ऐसे गाँवों की कल्पना कर सकते हैं जहाँ पहले रोज़गार का कोई अवसर नहीं था, लेकिन बाद में बहुतायत में हो गया? |
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Answer» निश्चय ही हम ऐसे गाँवों की कल्पना कर सकते हैं, क्योंकि हमने अपने गाँव के वयोवृद्ध लोगों से आर्थिक रूप से पिछड़े गाँवों के बारे में काफी कुछ सुना है। लोगों ने बताया है कि देश की स्वतंत्रता के समय गाँव में मूलभूत सुविधाओं जैसे-अस्पताल, स्कूल, सड़क, बाजार, पानी, बिजली, यातायात का अभाव था। लेकिन स्वतंत्रता के बाद सरकार द्वारा संचालित योजनाओं के माध्यम से गाँवों में आवश्यक सेवाओं का विस्तार हुआ। गाँव के लोगों ने पंचायत का ध्यान इन सभी समस्याओं की ओर आकृष्ट किया। पंचायत ने एक स्कूल खोला जिसमें कई लोगों को रोजगार मिला। जल्द ही गाँव के बच्चे वहाँ पढ़ने लगे और वहाँ कई प्रकार की तकनीकों का विकास हुआ। अब गाँव वालों के पास बेहतर शिक्षा, स्वास्थ्य सुविधाएँ एवं पानी, बिजली की भी उचित आपूर्ति उपलब्ध थी। सरकार ने भी जीवन स्तर को सुधारने के लिए विशेष प्रयास किए थे। कृषि एवं गैर कृषि क्रियाएँ भी अब आधुनिक तरीकों से की जाती हैं। |
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शिक्षित बेरोजगारी भारत के लिए एक विशेष समस्या क्यों है? |
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Answer» शिक्षित बेरोजगारी भारत के लिए एक कठिन चुनौती के रूप में उपस्थित हुई है। मैट्रिक, स्नातक, स्नातकोत्तर डिग्रीधारक अनेक युवा रोजगार पाने में असमर्थ हैं। एक अध्ययन में यह बात सामने आई है कि मैट्रिक की अपेक्षा स्नातक एवं स्नातकोत्तर डिग्रीधारकों में बेरोजगारी अधिक तेजी से बढ़ी है। एक विरोधाभासी जनशक्ति-स्थिति सामने आती है क्योंकि कुछ वर्गों में अतिशेष जनशक्ति अन्य क्षेत्रों में जनशक्ति की कमी के साथ-साथ विद्यमान है। एक ओर तकनीकी अर्हता प्राप्त लोगों में बेरोजगारी व्याप्त है जबकि दूसरी ओर आर्थिक संवृद्धि के लिए जरूरी तकनीकी कौशल की कमी है। उपरोक्त के प्रकाश में हम कह सकते हैं कि शिक्षित बेरोजगारी भारत के लिए एक विशेष समस्या है। । अधिकांश शिक्षित बेरोज़गारी शिक्षित मानवशक्ति के विनाश को प्रदर्शित करती हैं। बेरोजगारी सदैव बुरी है किन्तु यह हमारी शिक्षित युवाओं की स्थिति में एक अभिशाप है। हम अपने कुशल दिमाग का उपयोग करने योग्य नहीं होते। |
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प्रच्छन्न एवं मौसमी बेरोजगारी में क्या अन्तर है? |
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Answer» प्रच्छत्र एवं मौसमी बेरोजगारी में अंतर इस प्रकार है प्रच्छन्न बेरोजगारी–इस बेरोजगारी में लोग नियोजित प्रतीत होते हैं जबकि वास्तव में वे उत्पादकता में कोई योगदान नहीं कर रहे होते हैं। ऐसा प्रायः किसी क्रिया से जुड़े परिवारों के सदस्यों के साथ होता है। जिस काम में पाँच लोगों की आवश्यकता होती है किन्तु उसमें आठ लोग लगे हुए हैं, जहाँ 3 लोग अतिरिक्त हैं। यदि इन 3 लोगों को हटा लिया जाए तो भी उत्पादकता कम नहीं होगी। यही बचे 3 लोग प्रच्छन्न बेरोजगारी में शामिल हैं। मौसमी बेरोजगारी-वर्ष के कुछ महीनों के दौरान जब लोग रोजगार नहीं खोज पाते, तो ऐसी स्थिति मौसमी बेरोजगारी कहलाती है। भारत में कृषि कोई पूर्णकालिक रोजगार नहीं है। यह मौसमी है। इस प्रकार की बेरोजगारी कृषि में पाई जाती है। कुछ व्यस्त मौसम होते हैं जब बिजाई, कटाई, निराई और गहाई की जाती है। कुछ विशेष महीनों में कृषि पर आश्रित लोगों को अधिक काम नहीं मिल पाता। |
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व्यवसाय झा अर्थ स्पष्ट कीजिए तथा इसकी विशेषताएँ बताइए। |
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Answer» वस्तुओं और सेवाओं का लाभ के उद्देश्य से किया गया विक्रय, विनिमय का हस्तांतरण व्यवसाय कहलाता है। वसाय की प्रमुख विशेषताएँ निम्नलिखित हैं ⦁ व्यवसाय का उद्देश्य लाभ कमाना है। |
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भारत में बच्चों में शिक्षा के प्रसार हेतु सरकार ने क्या कदम उठाए हैं? |
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Answer» भारत में बच्चों में शिक्षा के प्रसार हेतु सरकार ने निम्न कदम उठाए हैं- ⦁ हमारे संविधान में प्रावधान है कि राज्य सरकारें 14 वर्ष तक की आयु के बच्चों को सार्वभौमिक निःशुल्क शिक्षा उपलब्ध कराएगी। हमारी केन्द्र सरकार ने वर्ष 2010 तक 6 से 14 वर्ष तक की आयु के सभी बच्चों को प्राथमिक शिक्षा देने के लिए “सर्व शिक्षा अभियान के नाम से एक योजना प्रारंभ की है। ⦁ लड़कियों की शिक्षा पर विशेष बल दिया गया है। ⦁ प्रत्येक जिले में नवोदय विद्यालय जैसे विशेष स्कूल खोले गए हैं। ⦁ उच्च विद्यालय के छात्रों को व्यावसायिक प्रशिक्षण देने के उद्देश्य से व्यावसायिक पाठ्यक्रम विकसित किए गए हैं। ⦁ स्कूल उपलब्ध कराने के साथ ही यह लोगों को उनके बच्चों को स्कूल भेजने के लिए प्रोत्साहित करने एवं बीच में पढ़ाई छोड़ने को हतोत्साहित करने हेतु कुछ गैर-पारंपरिक उपाय कर रही है। ⦁ उपस्थिति को प्रोत्साहित करने व बच्चों को स्कूल में बनाए रखने और उनके पोषण स्तर को बनाए रखने के लिए दोपहर की भोजन योजना लागू की गई है। ⦁ कामकाजी वयस्कों एवं खानाबदोश परिवारों के बच्चों के लिए रात्रि स्कूल एवं मोबाइल स्कूल उपलब्ध कराए गए हैं। ⦁ दसवीं पंचवर्षीय योजना ने इस योजना के अंत तक 18 से 23 वर्ष तक की आयु समूह के युवाओं में उच्चतर शिक्षा हेतु नामांकन वर्तमान 6 प्रतिशत से बढ़ाकर 9 प्रतिशत करने का प्रयास किया। ⦁ यह योजना दूरस्थ शिक्षा, अनौपचारिक, दूरस्थ एवं सूचना प्रौद्योगिकी शिक्षण संस्थानों के अभिसरण पर भी केंद्रित हैं। |
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क्या आप शिक्षा प्रणाली में शिक्षित बेरोजगारी की समस्या को दूर करने के लिए कुछ उपाय सुझा सकते हैं? |
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Answer» शिक्षा प्रणाली में निम्नलिखित सुधार करके हम शिक्षित बेरोजगारी को दूर कर सकते हैं ⦁ शिक्षा द्वारा लोगों को स्वावलंबी एवं उद्यमी बनाने के लिए प्रेरित करना चाहिए। ⦁ शिक्षा के लिए योजना बनाई जानी चाहिए एवं इसकी भावी संभावनाओं को ध्यान में रखकर इसे क्रियान्वित किया जाना चाहिए। ⦁ रोजगार के अधिक अवसर पैदा किए जाने चाहिए। ⦁ केवल किताबी ज्ञान देने की अपेक्षा अधिक तकनीकी शिक्षा दी जाए। ⦁ शिक्षा को अधिक कार्योन्मुखी बनाया जाना चाहिए। एक किसान के बेटे को साधारण स्नातक की शिक्षा देने की अपेक्षा इस बात का प्रशिक्षण दिया जाना चाहिए कि खेत में उत्पादन कैसे बढ़ाया जा सकता है। ⦁ हमारी शिक्षा प्रणाली को रोज़गारोन्मुख (Job oriented) एवं आवश्यकतानुसार होना चाहिए। उच्च स्तर तक सामान्य शिक्षा होनी चाहिए। इसके पश्चात् विभिन्न शैक्षिक शाखाएँ प्रशिक्षण के साथ प्रारंभ करनी चाहिए। |
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महिलाओं द्वारा किए जाने वाले गैर-भुगतान कार्य को संक्षेप में समझाइए। |
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Answer» महिलाओं द्वारा संपादित गैर भुगतान कार्य निम्नलिखित हैं ⦁ कल्याण क्रियाएँ-मानवीय रूप से कल्याण के लिए दी गई सेवाएँ एवं पिछड़े लोगों को ऊपर उठाने के लिए | किए गए कार्यों का भुगतान नहीं किया जाता। ⦁ सांस्कृतिक क्रियाएँ–सांस्कृतिक क्रियाओं में महिलाओं के योगदान जैसे-नृत्य, नाटक, गीत आदि से उनको कोई कमाई नहीं होती। ⦁ धार्मिक क्रियाएँ–कीर्तन, भजन, धार्मिक गान, भगवती जागरण आदि सेवाएँ गैर भुगतान होती हैं। ⦁ मनोवैज्ञानिक एवं आवश्यकताओं की संतुष्टि की क्रियाएँ-उपरोक्त क्रियाओं के अतिरिक्त अन्य सेवाएँ जो निजी, भावनात्मक एवं मनोवैज्ञानिक खुशी की संतुष्टि के उद्देश्य से की जाती हैं वह भी भुगतान प्राप्त नहीं करती। ⦁ घरेलू क्रियाएँ-महिलाओं को घरेलू सेवाएँ प्रदान करने की आवश्यकता होती है जैसे-खाना बनाना, सफाई, धुलाई, कपड़े धोना आदि। जिनके लिए उन्हें भुगतान नहीं किया जाता है। उन्हें सब कार्य उनके उत्तरदायित्व पर करने होते हैं। ⦁ दान क्रियाएँ-पड़ोसियों, कमज़ोरों एवं गरीब लोगों को दान के रूप में सेवाएँ प्रदान करने का भी भुगतान नहीं किया जाता। ⦁ सामाजिक सेवाएँ समाज के लाभ के लिए प्रदान की गई सेवाएँ जैसे-गरीबों को शिक्षा, स्वास्थ्य सुरक्षा एवं सफाई के लिए भी भुगतान प्राप्त नहीं होता। |
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बेरोजगारी को परिभाषित कीजिए। |
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Answer» बेरोजगारी वह स्थिति है जिसके अंतर्गत कुशल व्यक्ति प्रचलित कीमतों पर कार्य करने के इच्छुक होते हैं लेकिन कार्य नहीं प्राप्त कर पाते। |
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चा गैर-आर्थिक क्रियाओं का उल्लेख कीजिए। |
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Answer» वह क्रियाएँ जो भावनात्मक एवं मनोवैज्ञानिक आवश्यकताओं की सन्तुष्टि के लिए की जाती हैं, गैर-आर्थिक क्रियाएँ कहलाती हैं, जैसे ⦁ परिवार के सदस्यों के लिए खाना बनाना, ⦁ माता-पिता द्वारा अपने बच्चों को पढ़ाना। ⦁ गरीब बच्चों के लिए मुफ्त शिक्षा की व्यवस्था, ⦁ गरीब लोगों के लिए मुफ्त चिकित्सा व्यवस्था। |
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संगठित क्षेत्र में महिला रोजगार वृद्धि हेतु क्या उपाय किये जा सकते हैं? |
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Answer» संगठित क्षेत्र में महिला रोजगार बढ़ाने के लिए किए जाने वाले प्रमुख प्रयास ⦁ महिलाओं की शिक्षा, प्रशिक्षण एवं घर से बाहर कार्य करने के संबंध में पारंपरिक विचार को परिवर्तित करने के लिए समाज में सार्वजनिक चेतना का विकास किया जाना चाहिए। ⦁ महिलाओं के कार्य के दौरान उनके बच्चों की देख-रेख के लिए शिशुपालन केन्द्र (creches) की व्यवस्था होनी चाहिए। ⦁ महिलाओं को अधिक शिक्षा एवं प्रशिक्षण प्रदान करना चाहिए। ⦁ नियुक्तिकर्ताओं को बढ़ावा दिया जाना चाहिए कि महिलाओं को रोज़गार प्रदान करें। ⦁ महिलाओं के कार्य के लिए आवासीय स्थान प्रदान करना चाहिए। कार्य करने वाली महिलाओं के लिए छात्रावास बनाए जाने चाहिए। |
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महिलाओं एवं पुरुषों के बीच विभेद को कम करने के लिए सरकार द्वारा किए गए चार उपाय बताइए। |
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Answer» सरकार द्वारा सामज से लिंग-भेद मिटाने के लिए भिन्न उपाय किए गए हैं- ⦁ विधवा का पुनर्विवाह, ⦁ सती प्रथा से सुरक्षा, ⦁ बाल अवस्था में विवाह पर रोक, ⦁ लिंग के आधार पर सभी विभेद को रोकना। |
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भूमिहीन कृषि मज़दूरों तथा प्रवसन करने वाले मजदूरों के हितों की रक्षा करने के लिए आपके अनुसार सरकार ने क्या उपाय किए हैं, अथवा क्या किए जाने चाहिए? |
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Answer» भूमिहीनों के संरक्षण के लिए उपाय ⦁ विधिक रूप से बंधुआ मजदूरी की समाप्ति – उत्तर प्रदेश तथा बिहार में बंधुआ मजदूरी की प्रथा, गुजरात में हेलपति तथा कर्नाटक में जोता व्यवस्था की भारत सरकार द्वारा कानूनी रूप से समाप्ति। |
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एक अग्रणी भारतीय समाजशास्त्री का नाम लिखिए। |
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Answer» योगेंद्र सिंह एक अग्रणी भारतीय समाजशास्त्री हैं। |
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‘दि ग्रुप माइंड’ पुस्तक के लेखक कौन हैं? |
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Answer» ‘दि ग्रुप माइंड’ पुस्तक के लेखक मैक्डूगल हैं। |
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‘एशियन ड्रामा’ पुस्तक के लेखक का नाम लिखिए। |
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Answer» ‘एशियन ड्रामा’ पुस्तक के लेखक का नाम गुन्नार मिर्डल है। |
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हमें यूरोप में समाजशास्त्र के प्रारंभ और विकास को क्यों पढ़ना चाहिए? |
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Answer» यूरोप में समाजशास्त्र के प्रारंभ और विकास का अध्ययन हमारे लिए अत्यंत महत्त्वपूर्ण है। इसका प्रमुख कारण यह है कि समाजशास्त्र के अधिकांश मुद्दे उस समय की बात करते हैं जब 18वीं एवं 19वीं शताब्दी की यूरोपीय समाज में औद्योगीकरण एवं पूंजीवाद के आगमन से क्रांतिकारी परिवर्तन होने प्रारंभ हुए। शहरीकरण की प्रक्रिया, कारखानों के उत्पादन इत्यादि मुद्दे न केवल यूरोप अपितु सभी आधुनिक समाजों के लिए प्रासंगिक थे। औद्योगिक क्रांति के अतिरिक्त फ्रांसीसी क्रांति तथा । ज्ञानोदय जैसे मुद्दे भी यूरोप से ही जुड़े हुए हैं। इन सबका पूरे विश्व पर गहरा प्रभाव पड़ा है। भारतीय समाज का अतीत अंग्रेजी पूँजीवादी एवं उपनिवेशवाद के इतिहास में घनिष्ठ रूप से जुड़ा हुआ है। इसलिए भारत जैसे देश में समाजशास्त्र को समझने हेतु यूरोप में समाजशास्त्र के प्रांरभ और विकास को पढ़ना आवश्यक है। |
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एक समाज की प्रकृति कैसी होती है? |
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Answer» ‘एक समाज’ की प्रकृति मूर्त होती है। |
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समाजशास्त्र समाज का वैज्ञानिक अध्ययन है। तर्क दीजिए। |
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Answer» ‘समाजशास्त्र’ शब्द का शाब्दिक अर्थ ही समाज का अध्ययन या समाज का विज्ञान है। विज्ञान अनुसंधान की पद्धति है। यह किसी भी विषय के बारे में क्रमबद्ध ज्ञान है। इसीलिए ओडम, वार्ड, जिंसबर्ग की परिभाषाएँ समाज पर ही केंद्रित हैं। उदाहरणार्थ–गिडिंग्स के शब्दों में, “समाजशास्त्र समग्र रूप से समाज का क्रमबद्ध वर्णन तथा व्याख्या है। इसी प्रकार, जिंसबर्ग के अनुसार, समाजशास्त्र को समाज के अध्ययन के रूप में पभिाषित किया जा सकता है।” यह पूर्णतः सही भी है, क्योंकि समाजशास्त्र आज निश्चित रूप से एक विज्ञान है। इस संदर्भ में निम्नांकित बातें महत्त्वपूर्ण हैं- |
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सामाजिक संबंधों को अमूर्त क्यों कहा जाता है ? |
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Answer» सामाजिक संबंधों का कोई भौतिक आकार नहीं होता है। सामाजिक संबंध मानसिक तथ्य हैं; अतः इन्हें महसूस किया जाता है, वस्तुओं की भाँति इन्हें नापा-तौला नहीं जा सकता। इसी कारण सामाजिक संबंधों को अमूर्त कहा जाता है। |
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समाजशास्त्र के उदगम और विकास का अध्ययन क्यों महत्त्वपूर्ण है? |
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Answer» समाजशास्त्र का उद्गम एवं विकास पश्चिमी यूरोप की सामाजिक परिस्थितियों की देन है। औद्योगिक क्रांति, फ्रांस की क्रांति तथा ज्ञानोदय की इसके विकास में महत्त्वपूर्ण भूमिका रही है। इनके परिणामस्वरूप न केवल पश्चिमी समाजों में एक नवीन आर्थिक क्रियाकलाप की पद्धति (जिसे पूँजीवाद कहा जाता है) विकसित हुई अपितु इनसे इन देशों की सामाजिक संरचना पर भी गहरा प्रभाव पड़ा। गाँव से शहरों की ओर प्रवर्जन, सामाजिक गतिशीलता, शिक्षा एवं रोजगार में वृद्धि, लौकिक दृष्टिकोण के विकास के साथ-साथ अनेक सामाजिक समस्याएँ भी विकसित होने लगीं। औद्योगिक मजदूरों एवं खेतिहर मजदूरों की संख्या में वृद्धि हुई तथा उत्पादन कार्यों में इनका शोषण होने लगा। पूँजीवाद की सेवा हेतु सत्रहवीं एवं उन्नीसवीं शताब्दी में बड़ी संख्या में अफ्रीकियों को दास बनाया गया। यद्यपि उन्नीसवीं शताब्दी के प्रारंभ में दास प्रथा कम होने लगी, तथापि अनेक उपनिवेशवादी देशों में यह बँधुआ मजदूरों के रूप में आज भी प्रचलित है। समाजशास्त्र के उद्गम और विकास के अध्ययन का महत्त्व समाजशास्त्र के उद्गम और विकास के अध्ययन के महत्त्व को निम्नलिखित शीर्षकों के अंतर्गत स्पष्ट किया जा सकता है- 1. पारिभाषिक महत्त्व-समाजशास्त्र के अध्ययन से समाजशास्त्र के पारिभाषिक शब्दों, अध्ययन विषयों और धारणाओं का ठीक-ठीक परिचय प्राप्त हो जाता है। इन शब्दों का वैज्ञानिक अध्ययन समाज के स्वरूप को समझने में सहायक होता है। समाजशास्त्र में अनेक पारिभाषिक शब्द होते हैं, जिनको हम नित्यप्रति बोलचाल की भाषा में प्रयोग करते हैं। लेकिन समाजशास्त्र के अंतर्गत उन शब्दों का विशेष स्थान होता है, जिनको समझ लेने के पश्चात् अनेक प्रमों का निवारण हो जाता है। रीति-रिवाज, जाति, संस्था, समाज, संस्कृति, प्रजाति तथा समूह ऐसे ही अनेक शब्द हैं, परंतु समाजशास्त्र में इनका सामान्य अर्थ न होकर विशेष अर्थ होता है। समाजशास्त्र के अध्ययन से इन शब्दों का सही-सही ज्ञान प्राप्त होता है तथा इनमें हो रहे परिवर्तनों का भी ज्ञान हो जाता है। 2. समाज का वैज्ञानिक ज्ञान–समाजशास्त्र के अध्ययन द्वारा समाज के विषय में वैज्ञानिक ज्ञान 3. सामाजिक जीवन की समस्याओं का ज्ञान–समाजशास्त्र हमें सामाजिक जीवन की सामान्य समस्याओं की जानकारी प्रदान करता है। समाज की विभिन्न समस्याओं; जैसे-अपराध, किशोर अपराध, श्वेतवसन अपराध, जनसंख्या की समस्या, निर्धनता और बेकारी आदि का ज्ञान तथा इनके प्रचलन के कारणों का पता हमें समाजशास्त्र के अध्ययन द्वारा ही होता है। समाजशास्त्र के उद्गम और विकास ने सामाजिक समस्याओं को समझने तथा उनका समाधान खोजने में राजनीतिज्ञों, समाज-सुधारकों तथा नीति-निर्धारकों को सहायता प्रदान की है। 4. सांस्कृतिक लाभ-सांस्कृतिक विकास, सामाजिक विकास में विशेष सहायक होता है। सांस्कृतिक विकास के बिना समाज का विकास असम्भव है; अतः सामाजिक विकास के लिए यह आवश्यक है कि इसके अर्थों, स्वरूपों तथा क्रियाओं के नियमों को भली प्रकार समझा जाए। समाजशास्त्र संस्कृति के पूर्ण स्वरूप पर प्रकाश डालने का कार्य करता है। उसके अध्ययन से संस्कृति के महत्त्वपूर्ण तत्त्वों को सरलता से समझा जा सकता है। समाजशास्त्र के अध्ययन से ही हम समझते हैं कि संस्कृति क्या है, विभिन्न संस्कृतियाँ किस प्रकार समानता रखती हैं और उनमें क्या-क्या भिन्नताएँ हैं। 5. पारिवारिक जीवन को सफल बनाने में सहायक–व्यक्ति और परिवार का अटूट संबंध है। व्यक्ति परिवार में जन्म लेता है और उसका लालन-पालन भी परिवार में ही होता है। इस प्रकार वह परिवार के अन्य सदस्यों से अनेक प्रकार से संबंधित होता है। प्रत्येक व्यक्ति का परिवार में अपना-अपना स्थान होता है और साथ-ही-साथ उसके अधिकार और कर्तव्य होते हैं। इन अधिकारों और कर्तव्यों के उचित संतुलन पर ही परिवार का सुख-दु:ख निर्भर करता है। समाजशास्त्र के अध्ययन द्वारा विभिन्न परिवारिक समस्याओं का ज्ञान होता है तथा संतुलन स्थापित करने में सहायता मिलती है। 6. सामाजिक परिस्थितियों से अनुकूलन में सहायक-समाजशास्त्र हमें समाज के स्वरूप की । विस्तृत जानकारी कराता है। इसके अध्ययन से हम सामाजिक वातावरण तथा विभिन्न सामाजिक परिस्थितियों को सरलता से समझ जाते हैं। समाजशास्त्र का अध्ययन व्यक्ति के दृष्टिकोण को अधिक व्यापक बना देता है। वर्तमान युग औद्योगिक युग है। औद्योगीकरण और यंत्रीकरण के कारण सामाजिक जीवन अत्यधिक जटिल हो गया है और प्रतिदिन नवीन परिवर्तन दृष्टिगोचर हो रहे हैं। समाजशास्त्र द्वारा इन जटिलताओं और परिवर्तनों का ज्ञान होता है, जिससे सामाजिक परिस्थितियों से अनुकूलन करने में बड़ी सहायता मिलती है। 7. अंतर्राष्ट्रीय जीवन को सुखद बनाने में सहायक-समाजशास्त्र के अध्ययन से केवल अपने समाज का ही ज्ञान नहीं होता वरन् विश्व समाज को भी ज्ञान प्राप्त होता है। समाजशास्त्र विश्व के विभिन्न भागों में निवास करने वाले व्यक्तियों की जीवन-शैली और रहन-सहन के ढंगों को भी ज्ञान प्रदान करता है। आज यातायात के साधनों तथा संचार साधनों की अपूर्व प्रगति ने हमारे जीवन को अंतर्राष्ट्रीय बना दिया है। ऐसी दशा में समाजशास्त्र का अध्ययन अत्यंत रोचक एवं लाभकारी सिद्ध होता है। समाजशास्त्र के अध्ययन से जब हम दूसरे समाजों के विभिन्न पक्षों का अध्ययन करते हैं तो विश्व के अन्य निवासियों के रीति-रिवाजों, परम्पराओं और प्रवृत्तियों में होने वाले संघर्ष के कारण हमें ज्ञात हो जाते हैं। इन्हें समझकर संघर्ष के स्थान पर सहानुभूति, सहिष्णुता और उदारता की भावनाओं का प्रसार हो सकता है। इस प्रकार अंतर्राष्ट्रीय जीवन को सुखद बनाने तथा अंतर्राष्ट्रीय संघर्ष को समझने में समाजशास्त्र विशेष रूप से सहायक होता है। |
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भारत में समाजशास्त्र के विकास के बारे में आप क्या जानते हैं? |
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Answer» भारत में समाजशास्त्र का एक संस्थागत विषय के रूप में विकास 1919 ई० में हुआ जबकि प्रो० शैट्रिक गेडिस नामक अंग्रेज समाजशास्त्री की अध्यक्षता मे बंबई विश्वविद्यालय में स्नातकोत्तर स्तर पर समाजशास्त्र का अध्यापन कार्य प्रारंभ हुआ। भारत में समाजशास्त्र का विकास उपनिवेशवाद, आधुनिक पूँजीवाद एवं औद्योगीकरण का परिणाम माना जाता है। अंग्रेज समाजशास्त्रियों ने 19वीं शताब्दी के भारत में यूरोपीय समाजों का अतीत देखा। यद्यपि भारत में औद्योगीकरण का प्रभाव उतना नहीं था जितना कि पश्चिमी समाजों पर, तथापि पश्चिमी समाजशास्त्रियों ने पूँजीवाद एवं आधुनिक समाजों पर लिखे अपने लेखों को भारत में हो रहे सामाजिक परिवर्तनों को समझने के लिए प्रांसगिक माना। उनके एवं भारतीय समाजशास्त्रियों द्वारा आदिम समूहों, ग्रामीण एवं नगरीय क्षेत्रों में अध्ययनों से भारत में समाजशास्त्र की नींव मजबूत होती गई। |
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समाजशास्त्र तथा मनोविज्ञान के संबंधों की विवेचना कीजिए। |
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Answer» समाजशास्त्र तथा मनोविज्ञान दोनों परस्पर संबंधित सामाजिक विज्ञान हैं। समाजशास्त्र सामाजिक क्रियाओं से संबंधित हैं, जबकि मनोविज्ञान मानसिक दशाओं से संबंधित है। आज अधिकांश विद्वान मनोविज्ञान को भी व्यवहार के अध्ययन के रूप में परिभाषित करने लगे हैं। जे०एस० मिल का विचार है कि मस्तिष्क की विधियों के बिना सामान्य सामाजिक विज्ञान स्थापित ही नहीं हो सकता अर्थात् समाजशास्त्र को आधार प्रदान करने वाला विज्ञान मनोविज्ञान है। जिंसबर्ग तथा कुछ अन्य समाजशास्त्रियों का यह मत है कि समाजशास्त्रीय सामान्यीकरण मनोवैज्ञानिक नियमों से संबंधित किए जाने पर अधिक दृढ़ता से स्थापित किए जा सकते हैं। वास्तव में, यह मिल और दुर्णीम के मतों में मध्य स्थिति को प्रकट करने वाला दृष्टिकोण है। नैडल का भी यही विचार है कि मनोविज्ञान की सहायता से सामाजिक जाँच अच्छी तरह से की जा सकती है। |
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समाज किसे कहते हैं? इसकी विशेषताओं का विस्तृत वर्णन कीजिए।अथवा“समाज सामाजिक संबंधों का जाल है।” इस कथन की व्याख्या कीजिए। |
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Answer» समाज का सामान्य अर्थ सामान्य बोलचाल की भाषा में समाज’ शब्द का प्रयोग व्यक्तियों के समूह के लिए किया जाता है। उदाहरण के लिए ईसाई समाज’, ‘आर्य समाज’, ‘ब्रह्म समाज’, ‘धर्म समाज’, वैश्य समाज’, ‘विद्यार्थी समाज’ तथा ‘बाल-समाज’ आदि शब्दों का प्रयोग व्यक्ति इसी अर्थ में करते हैं। इनमें से अधिकांश शब्द, जिनके साथ समाज’ शब्द जोड़ दिया गया है, समाज न होकर संप्रदाय, वर्ण, सामाजिक श्रेणी, क्षेत्रीय समूह या विशिष्ट भाषा-भाषी समूह हैं। उदाहरणार्थ यदि कोई व्यक्ति यह कहे कि वह ईसाई समाज’ का सदस्य है तो यह गलत होगा। वह ईसाई समाज’ का नहीं अपितु ‘ईसाई संप्रदाय’ का सदस्य है। इसी भाँति, ‘आर्य समाज’ या ‘ब्रह्म समाज’ समाज न होकर विशिष्ट धार्मिक ‘संप्रदाय’ है। ‘वैश्य समाज का उदाहरण न होकर एक वर्ण है। ‘विद्यार्थी मिलकर समाज का निर्माण नहीं करते, अपितु एक सामाजिक श्रेणी का निर्माण करते हैं। कुछ लोग ‘समाज’ शब्द का प्रयोग व्यक्तियों के समूह के रूप में अथवा एक समिति यो संस्था के रूप में भी करते हैं। इसी कारण समाज के अर्थ के संबंध में काफी अनिश्चिता पायी जाती है। समाज की परिभाषाएँ विभिन्न समाजशास्त्रियों ने ‘समाज’ शब्द की निम्नलिखित परिभाषाएँ दी हैं- ⦁ गिडिंग्स (Giddings) के अनुसार- “समाज स्वयं एक संघ है, यह एक संगठन तथा औपचारिक संबंधों का योग है, जिसमें सहयोग देने वाले व्यक्ति एक-दूसरे से संबंधित होते हैं।” उपर्युक्त विभिन्न परिभाएँ ‘समाज’ शब्द का समाजशास्त्रीय अर्थ तथा इसके विभिन्न पक्षों को स्पष्ट करती है। इन परिभाषाओं के अनुसार, केवल व्यक्तियों के समूह को ही समाज नहीं कहा जा सकता। वास्तव में, व्यक्ति सामाजिक प्राणी होने के नाते जिस संगठन को जन्म देता है, वह ‘समाज’ कहलाता . है। समाज सामाजिक संबंधों की व्यवस्था को कहा जाता है। ये संबंध उन सभी व्यक्तियों के बीच पाए जाते हैं, जो मानव समाज के संदस्य होते हैं। समाज का यह संगठन अपने सदस्यों के व्यवहारों तथा संबंधों को नियंत्रित और निर्देशित भी करता है। समाज में रहने वाले व्यक्ति परस्पर व्यवहार भी करते हैं, जिनके द्वारा उनमें परस्पर सामाजिक संबंधों की स्थापना होती है। ये सामाजिक संबंध इतने अधिक व्यापक संपूर्ण व जटिल होते हैं कि इनका वर्णन नहीं किया जा सकता। वास्तव में, समाज इन्हीं सामाजिक संबंध का जाल है। ये संबंध ही प्रत्येक व्यक्ति को अन्य व्यक्तियों से संबंधित एवं अन्योन्याश्रित करते हैं। सामाजिक संबंधों में निरंतरता पायी जाती है। इसी तथ्य को ध्यान में रखते हुए ई० बी० यूटर (E.B. Reuter) ने कहा है कि जिस प्रकार जीवन एक वस्तु नहीं है बल्कि जीवित रहने की एक प्रक्रिया है, उसी प्रकार समाज एक वस्तु नहीं बल्कि संबंध स्थापित करने की एक प्रक्रिया है।’ समाज सामाजिक संबंधों का ताना-बाना होने के कारण एक अमूर्त धारणा है। इससे सदस्यों में पाए जाने वाले सामाजिक संबंधों की संपूर्णता व जटिलता का भी पता चलता है। समाज की प्रमुख विशेषताएँ समाज की प्रकृति को स्पष्ट रूप से समझने के लिए यह आवश्यक है कि उसकी विशेषताओं का भी उल्लेख किया जाए। समाज में निम्नलिखित प्रमुख विशेषताएँ पायी जाती हैं- 1. अमूर्त संकल्पना–समाज का रूप मूर्त न होकर अमूर्त (Abstract) है। यह अपने आप में । विभिन्न सामाजिक संबंधों की व्यवस्था है। ये ऐसे संबंध हैं जिनसे कि लोग परस्पर जुड़े रहते हैं। सामाजिक संबंधों को देखा नहीं जा सकता अर्थात् वे अमूर्त होते हैं। सामाजिक संबंधों के अमूर्त होने के कारण ही समाज भी एक अमूर्त व्यवस्था है; क्योंकि समाज मूल रूप से सामाजिक संबंधों की एक व्यवस्था है। 2. केवल व्यक्तियों का समूह-मात्र नहीं-राइट को यह कथन पूर्णतया सत्य है कि “यह . (समाज) व्यक्तियों का समूह नहीं है, वरन् यह समूह के सदस्यों के मध्य स्थापित संबंधों की व्यवस्था है। वास्तव में समाज केवल व्यक्तियों का एक समूह नहीं है, वरन् मनुष्यों में जो पारस्परिक सामाजिक संबंध होते हैं उन्हीं की एक व्यवस्था अथवा जाल है। व्यक्तियों के एक समूह को समिति तथा समुदाय के नाम से पुकारा जा सकता है, समाज के नाम से नहीं। 3. समाज में समानता–सहयोग और पारस्परिक संबंध समाज के मुख्य आधार हैं, परंतु सहयोग और संबंध तब ही संभव हैं जबकि व्यक्तियों में समरूपता हो। सामाजिक संबंधों की स्थापना के लिए यह आवश्यक है कि व्यक्तियों में शारीरिक एवं मानसिक दोनों प्रकार की समानताएँ हों; क्योंकि समानताओं के परिणामस्वरूप ही उनकी आवश्यकताएँ भी समान ही होती हैं। इन आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए ही सामाजिक संबंधों की स्थापना होती है। गिडिंग्स के मत में समाज को आधार ‘सजातीयता की भावना’ (Consciousness of kind) है। 4. समाज में असमानता–समाज में एकरूपता अथवा समानता के साथ ही विषमता या असमानता भी पाई जाती है। समाज के समस्त व्यक्तियों में वैयक्तिकं भिन्नता पाई जाती है। लिंग, आयु तथा शारीरिक क्षमता आदि के भेद सामाजिक संबंधों एवं जीवन में असमानता उत्पन्न करने के प्रमुख साधन हैं। इस विषमता या भेदों के कारण समाज के समस्त व्यक्ति | भिन्न-भिन्न कार्यों में लगे रहते हैं। यदि समस्त व्यक्ति एकसमान हों तो विभिन्न प्रकार के कार्य कैसे हो सकते हैं? यदि सभी व्यक्ति खेती का कार्य करने लग जाएँ तो समाज में अव्यवस्था फैल जाएगी और व्यक्तियों की विभिन्न आवश्यकताओं की पूर्ति नहीं हो सकेगी। श्रम-विभाजन के लिए भी विषमता या असमानता अनिवार्य है। इस कारण ही समाज का आर्थिक ढाँचा श्रम-विभाजन पर आधारित है, जिसमें व्यक्तियों के व्यवसाय व आर्थिक क्रियाएँ भिन्न-भिन्न होती हैं। इस प्रकार हम देखते हैं कि समाज के लिए समानता और विषमता (असमानता) दोनों ही आवश्यक हैं। समानता व्यक्तियों में अपनत्व तथा चेतना उत्पन्न करती हैं, जबकि विषमता के आधार पर परस्पर संबंधों की स्थापना होती है। 5. पारस्परिक जागरूकता—मनुष्यों में सामाजिक संबंधों की स्थापना के लिए यह आवश्यक है। | कि व्यक्तियों को एक-दूसरे के अस्तित्व को ज्ञान हो। यदि दो व्यक्ति एक-दूसरे से अनभिज्ञ एवं मुख मोड़े विपरीत दिशा में खड़े हैं तथा परस्पर अप्रभावित हैं, तो ऐसी दशा में उनमें सामाजिक संबंध स्थापित नहीं होंगे। अतः समाज की स्थापना का प्रश्न तब उत्पन्न होता है। जबकि इन व्यक्तियों को एक-दूसरे के अस्तित्व का ज्ञान होता है और वे परस्पर एक-दूसरे को प्रभावित करने लगते हैं। इस प्रकार, समाज के लिए व्यक्तियों का एक-दूसरे के अस्तित्व के प्रति जागरूक होना अनिवार्य है। 6. सहयोग एवं संघर्ष-समाज के सदस्यों में दो प्रकार के संबंध होते हैं—सहयोगपूर्ण और संघर्षमय। समाज का प्रमुख आधार सहयोग है। सहयोग के अभाव में समाज की कल्पनां भी नहीं की जा सकती। सहयोग के कारण ही श्रम-विभाजन सफल होता। सहयोग प्रत्यक्ष एवं परोक्ष (अप्रत्यक्ष) दोनों रूपों में पाया जाता है। सीमित क्षेत्र में सहयोग का प्रत्यक्ष रूप अधिक पाया जाता है तथा विस्तृत क्षेत्र में अप्रत्यक्ष सहयोग का अधिक महत्त्व होता है। सहयोग के साथ-साथ समाज में संघर्ष भी पाया जाता है। यह भी प्रत्यक्ष एवं परोक्ष (अप्रत्यक्ष) दोनों रूपों में पाया जाता है। कभी-कभी संघर्ष के द्वारा भी सहयोग की स्थापना के प्रयास किए जाते हैं। परिवार में पाए जाने वाले संबंध इसका उदाहरण हैं। परिवार में सहयोग और संघर्ष दोनों पाए जाते हैं, परंतु समाज का निरंतरता के लिए यह अनिवार्य है कि संघर्ष सहयोग के 7. पारस्परिक निर्भरता—व्यक्तियों की अनेक आवश्यकताएँ होती हैं। आवश्यकताओं की पूर्ति के *लिए ही व्यक्तियों को एक-दूसरे पर निर्भर रहना पड़ता हैं। इसकी पूर्ति, बिना एक-दूसरे की सहायता के नहीं हो सकती। इस आधार पर व्यक्तियों में परस्पर निर्भरता उत्पन्न होती है तथा समाज का निर्माण होता हैं। 8. समाज और जीवन समाज और जीवन में परस्पर घनिष्ठ संबंध है। ठीक ही कहा जाता है कि जहाँ जीवन है, वहीं समाज है।” अन्य शब्दों में, समाज का संबंध केवल प्राणि-जगत से ही होता है। उसका निर्जीव जगत से कोई संबंध नहीं है। वैसे पशु और पक्षियों का भी समाज होता हैं, परंतु समाजशास्त्र का संबंध केवल मानव समाज से ही होता है। मानव समाज का स्तर पशु समाज के स्तर से अधिक ऊँचा होता है। 9. निरंतर परिवर्तनशीलता-समाज एवं उसके सदस्यों में व्याप्त संबंधों की व्यवस्था स्थिर न होकर परिवर्तनशील होती है। समाज में निरंतर परिवर्तन होते रहते हैं। मैकाइवर एवं पेज ने सामाजिक संबंधों की सदैव परिवर्तित होने वाली जटिल व्यवस्था को ही समाज कहा है। इनके शब्दों में, “यह सामाजिक संबंधों का जाल है तथा सदैव परिवर्तित होता रहता है।” निष्कर्ष-उपर्युक्त विवेचन से स्पष्ट हो जाता है कि समाजशास्त्र में समाज’ शब्द का प्रयोग सामाजिक संबंधों के ताने-बाने के लिए किया जाता है। यह एक अमूर्त धारणा या व्यवस्था है। जनसंख्या का प्रतिपालन सदस्यों में कार्यों का विभाजन, समूह की एकता तथा सामाजिक व्यवस्था की निरंतरता समाज के प्रमुख तत्त्व हैं। प्रत्येक समाज में समानता व असमानता, पारस्परिक जागरूकता, सहयोग एवं संघर्ष, पारस्परिक निर्भरता एवं निरंतरता जैसी प्रमुख विशेषताएँ पायी जाती हैं। |
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भारत में समाजशास्त्र का क्या महत्त्व है? |
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Answer» भारत जैसे देशों में समाजशास्त्र को अत्यंत महत्त्वपूर्ण विषय माना जाता है। ग्रामों की प्रधानता होने के नाते भारत में ग्रामोत्थान कार्यक्रमों की सफलता हेतु ग्रामीण समाज का ज्ञान होना आवश्यक है। यह ज्ञान समाजशास्त्र ही उपलब्ध कराता है। भारत में समाजशास्त्रं प्रजातांत्रिक दृष्टिकोण के विकास, औद्योगिक समस्याओं के हल, सामाजिक असमता को समझने, असामान्य एवं अपराधी व्यवहार को समझने, राष्ट्रीय एकता को बनाए रखने, अनुसूचित जातियों एवं जनजातियों सहित समाज के कमजोर वर्गों की समस्याओं के निदान तथा सामाजिक संतुलन स्थापित करने में सहायक रहा है। |
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| 29. |
‘समाज (‘सोसायटी’) पुस्तक के लेखक कौन हैं? |
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Answer» ‘समाज’ (‘सोसायटी’) पुस्तक के लेखक मैकाइवर तथा पेज हैं। |
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| 30. |
समाज की प्रकृति कैसी होती है? |
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Answer» समाज की प्रकृति अमूर्त होती है। |
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| 31. |
एक समाज से क्या तात्पर्य है ? एक उदाहरण भी दीजिए। |
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Answer» एक समाज व्यक्तियों का वह समूह या संग्रह है जो कुछ संबंधों या व्यवहार के कुछ ढंगों द्वारा संगठित है, जो उन्हें उन अन्यों से पृथक करते हैं जो इन संबंधों में सम्मिलित नहीं हैं या जो व्यवहार में उनसे भिन्न हैं। आर्य समाज ‘एक समाज’ का उत्तम उदाहरण है। |
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| 32. |
क्या आप सोचते हैं कि विज्ञापन वास्तव में लोगों के उपभोग के तरीकों को प्रभावित करते है? |
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Answer» विज्ञापनों का उद्देश्य विज्ञापित वस्तुओं के विक्रय को बढ़ाना है। कोई भी कंपनी विज्ञापन पर इसलिए धन व्यय करती है ताकि उसके उत्पादों का प्रचार-प्रसार हो तथा जनता तथा उसके उत्पादों के बारे में सचेत होकर खरीदने के लिए विवश हो जाए। इस उद्देश्य की पूर्ति के अतिरिक्त विज्ञापन निश्चित रूप से लोगों के उपभोग के तरीकों को भी प्रभावित करते हैं। विज्ञापनों से न केवल उत्पादों की बिक्री ही बढ़ती है, अपितु इससे लोगों की जीवन-पद्धति भी प्रभावित होती है। बहुत-से लोग नए-नए विज्ञापित उत्पादों को खरीदते हैं, उनका उपयोग करते हैं तथा इससे उनकी जीवन-शैली प्रभावित होती है। विज्ञापनों से समाज की मूल्य व्यवस्था भी प्रभावित हो सकती है। बहुत-से विज्ञापनों में दर्शकों को आकर्षित करने हेतु स्त्रियों को अनावश्यक रूप से दर्शाया जाता है। इससे विज्ञापनों में भी स्त्रियों को शोषण होने लगता है। इस प्रकार, विज्ञापन से अर्थशास्त्र एवं समाजशास्त्र के संबंधों का पता चलता है। |
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समाज में पायी जाने वाली समानता एवं असमानता को स्पष्ट कीजिए। |
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Answer» समाज में पायी जाने वाली समानता एवं असमानता समाज में समानता एवं असमानता या भिन्नता दोनों पायी जाती हैं। कोई भी समाज ऐसा नहीं हैं जिसमें पूर्णतया समानता अथवा पूर्णतया असमानता पायी जाती हो। प्रत्येक समाज में दोनों ही बातें अनिवार्य रूप से पायी जाती है, परंतु समाज के संगठन के लिए असमानता का समानता के अंतर्गत पाया जाना अनिवार्य हैं। बाह्य दृष्टिकोण से दोनों परस्पर विरोधी प्रतीत होती है, पर वास्तविकता में ये परस्पर पूरक हैं। समानता व्यक्तियों में पाए जाने वाले सहयोग एवं संबंधों को प्रोत्साहन देती है। सामाजिक संबंधों की स्थापना के लिए यह अनिवार्य है कि व्यक्तियों में शारीरिक एवं मानसिक दोनों प्रकार की समानताएँ हों; क्योंकि इन समानताओं के परिणामस्वरूप ही उनकी आवश्यकताएँ भी समान होती हैं, इने । आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए सामाजिक संबंधों की स्थापना होती है। गिडिंग्स ने समानता को ‘सजातीयता की भावना’ कहा है। मैकाइवर एवं पेज के अनुसार, “समाज का अस्तित्व उन्हीं लोगों में होता है जो एक-दूसरे से शरीर या मस्तिष्क के किसी अंश में समान हैं और इस तथ्य को जानने के लिए पर्याप्त निकट या बुद्धिमान है।” समाज में यद्यपि समानता पायी जाती है, तथापि असमानता की उपेक्षा नहीं की जा सकती। प्रत्येक व्यक्ति एक-दूसरे से भिन्नता रखता है। यह भिन्नता, आयु तथा शारीरिक क्षमता अदि.के भेदों के द्वारा उत्पन्न होती है तथा इसी के आधार पर समाज के समस्त व्यक्ति भिन्न-भिन्न कार्यों में लगे रहते हैं। यदि सभी व्यक्ति एक समान कार्य करने लगे तो समाज में संघर्ष की स्थिति उत्पन्न हो जाएगी और सामाजिक व्यवस्था की निरंतरता खतरे में पड़ जाएगी। श्रम-विभाजन में पाई जाने वाली भिन्नता; असमानता की सूचक है। असमानता के कारण ही स्त्री-पुरुष आकर्षित होते हैं और परिवार की आधारशिला रखते हैं। विचारों, आदर्शो, दृष्टिकोणों आदि की भिन्नता से ही समाज की संस्कृति का विकास होता है। असमानता परस्पर सहयोग को बढ़ावा देकर समाज के संगठन को दृढ़ बनाती है। इस प्रकार, हम देखते हैं कि समाज के लिए समानता और असमानता दोनों ही अनिवार्य हैं। समानता व्यक्तियों में अपनत्व तथा चेतना उत्पन्न करती हैं, और असमानता के आधार पर परस्पर संबंधों की स्थापना होती है; परंतु समाज में समानता प्रधान है, असमानता का स्थान गौण है। |
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सामाजिक संबंधों के जाल को हम क्या कहते हैं? |
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Answer» सामाजिक संबंधों के जाल को हम समाज कहते हैं। |
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| 35. |
असम में चाय की खेती की शुरूआत कब हुई? |
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Answer» असम में चाय की खेती की शुरुआत अंग्रेजी शासनकाल में हुई। ऐसा माना जाता है कि 1823-24 ई० में, असम में तत्कालीन राजधानी रंगपुर के समीप पहाड़ियों पर चीन से लाए हुए पौधों एवं बीजों से इसकी खेती प्रारंभ हुई। असम की सिंगफो जनजाति के प्रयासों से असम में चाय के उत्पादन से भारत के अन्य प्रान्तों में रहने वाले लोगों को भी इसकी जानकारी प्राप्त हुई। तत्कालीन ब्रिटिश गवर्नर जनरल लॉर्ड विलियम बैंटिंक के प्रयासों से 1834 ई० में चाय की खेती को व्यापारिक रूप देने हेतु एक समिति का गठन किया गया। ईस्ट इंडिया कंपनी के असम स्थित प्रतिनिधि सी०ए० बूस को चाय बागानों का अधीक्षक नियुक्त किया गया। तभी से असम के विभिन्न क्षेत्रों में चाय की खेती प्रारम्भ हुई तथा आज असम की चाय पूरे विश्व के बाजारों में उपलब्ध है। 19वीं शताब्दी के अंत तक दक्षिण में नीलगिरि पहाड़ियों पर भी चाय की खेती प्रारंभ हो चुकी थी। यद्यपि भारत में चाय की खेती अनेक राज्यों में होने लगी है, तथापि आज भी दार्जिलिंग की चाय विश्व में सबसे अच्छी चाय मानी जाती है। |
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भारत में ग्रामीण समाज से शहरी समाज में परिवर्तन होने की प्रक्रिया को समझाइए। |
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Answer» भारत में ग्रामीण समाज से शहरी समाज में परिवर्तन होने की गति ब्रिटेन जैसे देश की तुलना में धीमी रही है। इसका प्रमुख कारण औद्योगीकरण का उस तीव्र गति से विकास न होना है जिस गति से ब्रिटेन एवं अन्य पश्चिमी देशों में हुआ है। साथ ही, कृषिप्रधान समाज होने के नाते व्यक्ति अपने व्यवसाय एवं परिवारवाद की भावना से इस प्रकार से बँधा हुआ था कि वह अवसर मिलने पर भी औद्योगिक क्षेत्रों में जाने से हिचकिचाता था। अब भी बहुत-से ग्रामवासी शहरों एवं औद्योगिक केंद्रों में नौकरी के बाद पुन: अपने गाँव लौट जाते हैं। अंग्रेजी शासनकाल के दौरान शहरी केंद्रों में तो वृद्धि हुई परंतु ब्रिटिश निर्मित वस्तुओं के प्रयोग के साथ अधिकांश लोग कृषि क्षेत्र की तरफ भी उन्मुख हुए क्योंकि उच्च तकनीकी से कृषि उत्पादन में वृद्धि की भी संभावना थी। |
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“समाज चलनों तथा कार्य-प्रणालियों, अधिकार व पारस्परिक सहायता, अनेक समूहों तथा उनके विभाजनों, मानव-व्यवहार पर नियंत्रणों एवं स्वतंत्रताओं की व्यवस्था है। सदैव परिवर्तित होने वाली इस जटिल व्यवस्था को ही हम समाज कहते हैं। यह सामाजिक संबंधों का जाल है, जो सदैव परिवर्तित होता रहता है।” इस कथन की व्याख्या कीजिए। |
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Answer» समाज सामाजिक संबंधों की अमूर्त व्यवस्था को कहते हैं। वह सामाजिक संबंधों का ताना-बाना अथवा जाल हैं। मैकाइवर एवं पेज ने भी समाज को इसी रूप में परिभाषित किया है। इनके शब्दों में, “समाज चलनों तथा कार्य-प्रणालियों, अधिकार व पारस्परिक सहायता, अनेक समूहों तथा उनके विभाजनों, मानव-व्यवहार पर नियंत्रणों एवं स्वतंत्रताओं की व्यवस्था है। इस सदैव परिवर्तित होने वाली जटिल व्यवस्था को ही इन्होंने समाज कहा हैं। समाज सामाजिक संबंधों का जाल है, जो सदैव परिवर्तित होता रहता है। मैकाइवर एवं पेज द्वारा प्रतिपादित समाज की इस परिभाषा से समाज के निम्नलिखित लक्षण स्पष्ट होते हैं- ⦁ चलन अथवा रीतियाँ-रीतियाँ या चलन (Usages) समाज द्वारा स्वीकृत वे पद्धतियाँ है जो व्यक्तियों को सामाजिक विरासत के रूप में अपने पूर्वजों से प्राप्त होती हैं। ये वे स्वीकृत पद्धतियाँ हैं जिन्हें समाज व्यवहार के क्षेत्र में ग्रहण करने योग्य समझता है। रीतियाँ उपयोगी मानी जाती हैं तथा इनमें समाज की शक्ति निहित होती है। इसी कारण प्रत्येक व्यक्ति इनका पालन निष्ठा से करता है। |
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| 38. |
समष्टिता किसे कहते हैं? |
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Answer» समष्टिता से अभिप्राय विभिन्न इकाइयों द्वारा निर्मित समग्र से है। समष्टिता का निर्माण अनेक व्यक्तियों द्वारा होता है। |
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भारत में सामाजिक असमानता के प्रमुख क्षेत्रों का वर्णन कीजिए। |
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Answer» भारत में शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार, जीवन के अवसर, जाति, वर्ग इत्यादि सामाजिक असमानता के प्रमुख क्षेत्र हैं। सर्वाधिक असमानता जातिगत है तथा परंपरागत रूप से उच्च जातियाँ आर्थिक एवं राजनीतिक दृष्टि से भी ऊँची रही है। इसके विपरीत, निम्न जातियों की स्थिति न केवल संस्कारात्मक दृष्टि से निम्न रही है अपितु वे आर्थिक दृष्टि से भी पिछड़ी हुई थी तथा राजनीति में भी उनकी किसी प्रकार की पकड़ नहीं थी। इसी के कारण निम्न जातियों में शिक्षा की दर निम्न है, निम्न आर्थिक स्थिति के कारण पोषक भोजन न मिलने से स्वास्थ्य की समस्या बनी रहती है तथा रोजगार मिलने में भी कठिनाई होती है। |
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| 40. |
चर्चा कीजिए कि आजकल अलग-अलग विषयों में परस्पर लेन-देन कितना ज्यादा है। |
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Answer» मानव द्वारा अर्जित ज्ञान को मुख्य रूप से दो प्रमुख भागों में विभाजित किया जा सकता है—प्राकृतिक विज्ञान तथा सामाजिक विज्ञान। प्राकृतिक विज्ञानों के अंतर्गत भौतिकशास्त्र, रसायनशास्त्र, जीवविज्ञान, वनस्पतिविज्ञान आदि आते हैं। सामाजिक विज्ञानों के अंतर्गत राजनीतिशास्त्र, अर्थशास्त्र, मनोविज्ञान, दर्शनशास्त्र, मानवशास्त्र तथा समाजशास्त्र आदि विषय आते हैं। समाजशास्त्र यद्यपि प्राकृतिक विज्ञानों से पर्याप्त भिन्न है परंतु उसका राजनीतिशास्त्र, इतिहास, अर्थशास्त्र आदि विभिन्न सामाजिक विज्ञानों से घनिष्ट संबंध है। समाजशास्त्र में प्रायः उन्हीं तथ्यों और विषयों का अध्ययन किया जाता है जिनका कि सामान्यतः अन्य सामाजिक विज्ञान भी अध्ययन करते हैं; परंतु इसके दृष्टिकोण में भिन्नता पाई जाती है। अन्य सामाजिक विज्ञानों का क्षेत्र पर्याप्त सीमित है, जबकि समाजशास्त्र का क्षेत्र व्यापक और विस्तृत है क्योंकि अन्य शास्त्र जीवन के एक विशिष्ट पहलू (राजनीतिक, ऐतिहासिक या आर्थिक) का ही विवेचन करते हैं, जबकि समाजशास्त्र उन सबका समन्वय करके संपूर्ण समाज एवं जीवन का अध्ययन करता है। आजकल अलग-अलग सामाजिक विज्ञानों में अत्यधिक सहयोग पाया जाता है। मानव के सामाजिक व्यवहार को समझने हेतु यह सहयोग आवश्यक भी है। विभिन्न विषयों में पाए जाने वाले सहयोग के परिणामस्वरूप ही आज अंत:विषयक उपागम (Inter-disciplinary approach) पर अधिक बल दिया जाता है। यह उपागम सामाजिक व्यवहार को विभिन्न समाज-वैज्ञानिकों द्वारा संयुक्त रूप से समझने के परिणाम का प्रतिफल है। बार्स एवं बेकर जैसे विद्वान् समाजशास्त्र को न तो अन्य सामाजिक विज्ञानों का स्वामी मानते हैं और न ही सेवक वरन् समाजशास्त्र को अन्य सामाजिक विज्ञानों की बहन-मात्र मानते हैं। उनके शब्दों में, “समाजशास्त्र अन्य सामाजिक विज्ञानों की न मालकिन है। और न उनकी दासी, वरन् उनकी बहन है।” वे आगे और स्पष्ट करते हुए लिखते हैं, “यद्यपि सामाजिक विज्ञानों को बहन मानने में सबसे बाद में उत्पन्न होने के कारण यह सबसे छोटी बहन है, परंतु प्रभाव की दृष्टि से सबसे बड़ी-चढ़ी है। छोटी होते हुए भी ये सब बहनों को एक-दूसरे के पास लाती है और उनके सामाजिक अध्ययन के कार्य में पूरा सहयोग देती है।” विज्ञापन जैसे विषय का अध्ययन अर्थशास्त्र तथा समाजशास्त्र दोनों विषयों में किया जाता है। अर्थशास्त्री विज्ञापनों द्वारा किसी कंपनी की आय में होने वाली वृद्धि पर ध्यान केंद्रित करते हैं तो समाजशास्त्री इन विज्ञापनों का समाज के विभिन्न वर्गों पर पड़ने वाले प्रभाव की बात करते हैं। इसी भाँति, चुनावों एवं मतदान को समझने हेतु राजनीतिशास्त्र एवं समाजशास्त्र एक-दूसरे को सहयोग प्रदान करते हैं। इतिहासकारों द्वारा अतीत के बारे में जो ठोस विवरण प्रस्तुत किए जाते हैं उनके सार से समाजशास्त्री वर्गीकरण एवं सामान्यीकरण करने का प्रयास करता है। इसी भॉति, अन्य सामाजिक विज्ञानों में भी परस्पर संबंध एवं सहयोग पाया जाता है। |
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| 41. |
समाजशास्त्र के जनक कौन है? |
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Answer» समाजशास्त्र के जनक ऑगस्त कॉम्टे है। |
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| 42. |
गृहविहीनता के कारणों का संक्षेप में वर्णन कीजिए। |
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Answer» समाजशास्त्रीय कल्पना हमें मृहविहीनता के कारणों को सामाजिक संरचना में निहित विसंगतियों में खोजने हेतु प्रेरित करती है। गृहविहीनता का कारण निर्धनता या बेरोजगारी हो सकती है। अथवा किसी व्यक्ति का गाँव से शहर की ओर नौकरी की तलाश में किया गया प्रवसन हो सकता है। निर्धनता एवं नौकरी में मिलने की स्थिति का परिणाम गृहविहीनता हो सकता है। गृहविहीनता का कारण वर्ग समाज में असमानता की संरचना भी है और वे लोग इस स्थिति में जीवन-यापन हेतु विवश हो जाते हैं जिनकी कार्य की अनियमितता दीर्घकालिक होती है, जबकि उन्हें मजदूरी कम मिलती है। चूंकि गृहविहीनता सामाजिक संरचना में पाई जाने वाली विसुंगतियों का परिणाम है, इसलिए सरकार इसे जनहित का मुद्दा मानते हुए गरीब एवं गृहविज्ञान लोगों के लिए मुफ्त आवास उपलब्ध कराने का। प्रयास करती है। |
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‘समाज’ शब्द के विभिन्न पक्षों की चर्चा कीजिए। यह आपके सामान्य बौद्धिक ज्ञान की समझ से किस प्रकार अलग है? |
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Answer» सामान्य रूप से ‘समाज’ शब्द से प्रत्येक व्यक्ति परिचित है। ऐसा कहा जाता है कि जहाँ जीवन है वहीं समाज भी है। ‘समाज’ एक अत्यधिक प्रचलित शब्द है जिसको साधारण बोलचाल की भाषा में व्यक्तियों के समूह के लिए प्रयुक्त किया जाता है। उदाहरण के लिए–‘आर्य समाज’, ब्रह्म समाज’, ‘धर्म समाज’, ‘विद्यार्थी समाज’ तथा ‘बाल समाज’, आदि शब्दों का प्रयोग व्यक्ति इसी अर्थ में करते हैं। कुछ लोग ‘समाज’ शब्द का प्रयोग व्यक्तियों के समूह के रूप में अथवा एक समिति या संस्था के रूप में भी करते हैं। इसी कारण समाज के अर्थ के संबंध में काफी अनिश्चितता पायी जाती है। समाजशास्त्र में समाज’ शब्द का प्रयोग जनसाधारण द्वारा लगाए गए इन अर्थों में नहीं होता, वरन् यह एक विशिष्ट अर्थ को प्रतिपादित करता है। समाजशास्त्र एक विज्ञान है तथा विज्ञान होने के नाते इसकी अपनी एक शब्दावली है। वैज्ञानिक शब्दावली में प्रत्येक शब्द को विशिष्ट अर्थ में प्रयोग किया जाता है। ‘समाज’ भी इसी प्रकार का एक शब्द (संकल्पना या अवधारणा) है, जिसका संबंध समाजशास्त्र की शब्दावली से है। इस नाते न केवल इसका स्पष्ट अर्थ है, अपितु इसके विभिन्न पक्षों के बारे में भी किसी प्रकार का संदेह नहीं है। मैकाइवर एवं पेज (Maclver and Page) के अनुसार-“समाज रीतियों एवं कार्य-प्रणालियों, प्रभुत्व एवं पारस्परिक सहयोग, अनेक समूहों और उनके विभाजनों, मानव-व्यवहार के नियंत्रणों एवं स्वाधीनताओं की एक व्यवस्था है। इस निरंतर परिवर्तनशील जटिल व्यवस्था को हम समाज कहते हैं। यह सामाजिक संबंधों का जाल (Web of social relationships) है और यह सदैव परिवर्तित होता रहता है। समाज की यह परिभाषा समाज के विभिन्न पक्षों को पूर्णतः स्पष्ट करने वाली मानी जाती है। समाज मूर्त न होकर अमूर्त होता है। यह कोई अखंडित व्यवस्था नहीं है अपितु इसमें अनेक समूह एवं उप-समूह पाए जाते हैं। व्यक्तियों के व्यवहार हेतु निश्चित रीतियाँ एवं कार्य-प्रणालियाँ होती हैं जिन्हें संस्थाएँ कहा जा सकता है। संस्थाएँ व्यक्ति को समाज की मान्यताओं के अनुरूप व्यवहार करने हेतु प्रेरित करती हैं। व्यक्ति को स्वतंत्रता तो होती है परंतु वह अन्य व्यक्तियों से व्यवहार हेतु समाज द्वारा मान्य रीतियों में से ही किसी एक का चयन कर सकता है। विभिन्न व्यक्तियों में जो संबंध पाए जाते हैं उन्हीं को समाज कहते हैं। संबंध स्थिर नहीं रहते अपितु निरंतर परिवर्तित होते रहते हैं। इस प्रकार, समाज के विभिन्न पक्ष मिलकर एक जटिल व्यवस्था का निर्माण करते हैं। समाज के क्रमबद्ध ज्ञान एवं सामान्य बौद्धिक ज्ञान में अंतर समाजशास्त्र में समाज का क्रमबद्ध (विधिवत्) अध्ययन किया जाता है। यह अध्ययन एक विशिष्ट दृष्टिकोण या चिंतन द्वारा किया जाता है, जिसे समाजशास्त्रीय चिंतन कहते हैं। यह चिंतन सामान्य बौद्धिक ज्ञान से भिन्न होता है। सामान्य बौद्धिक ज्ञाने में दार्शनिक एवं धार्मिक अनुचिंतन सम्मिलित किया जाता है। उदाहरणार्थ-हम अपने दैनिक जीवन में बहुत-सी बातों एवं घटनाओं को देखते हैं परंतु उनके बारे में वैज्ञानिक चिंतन नहीं करते अर्थात् उनका क्रमबद्ध वर्णन करने का प्रयास नहीं करते। यदि हम किसी भिखारी को किसी चौराहे या सार्वजनिक स्थल पर भीख माँगते हुए देखते हैं तो सामान्य बौद्धिक ज्ञान से यह सोच लेते हैं कि वह शायद गरीब है इसलिए भीख माँग रहा है। यदि इसी को हम समाजशास्त्रीय दृष्टिकोण से देखें तो हमारा चिंतन पूर्णतया अलग होगा। हमारी सोच के प्रमुख बिंदु इस प्रकार होंगे—क्या सभी गरीब भिक्षा माँगने पर विवश होते हैं? यदि नहीं तो, केवल कुछ व्यक्ति ही भिक्षावृत्ति क्यों करते हैं? भिक्षावृत्ति एक राष्ट्रीय समस्या क्यों है? गरीबी के अतिरिक्त भिक्षावृत्ति के क्या कारण हैं? क्या इस समस्या के कारणों का पता लगाकर इसका निराकरण करना संभव है? भिक्षावृत्ति जनहित का मुद्दा क्यों हैं? सरकार भिक्षावृत्ति के निवारण के लिए क्या प्रयास कर रही है? समाज का क्रमबद्ध चिंतन व्यक्तियों में जिस दृष्टिकोण को विकसित करता है उसी को समाजशास्त्रीय दृष्टिकोण या चिंतन कहते हैं। यह चिंतन हमें भिक्षावृत्ति के इतिहास, भिखारियों की जीवन दशाओं, उनके सामाजिक-आर्थिक कारणों तथा इस समस्या के समाधान की खोज करने की उत्सुकता से भर देता है। समाज का क्रमबद्ध अध्ययन रोजमर्रा के सामान्य प्रेक्षण से भी भिन्न है। रोजमर्रा की घटनाएँ व्यक्तियों में समाजशास्त्रीय सोच विकसित नहीं करतीं। हम बहुत-सी घटनाओं को देखकर भी अनदेखा कर देते हैं। उदाहरणार्थ-अपने पड़ोस में एक कामकाजी महिला को अपने पति, सास-ससुर या अन्य सदस्य से झगड़ते हुए देखकर हम सोच लेते हैं कि अमुक महिला ही ऐसी है। यदि इसी को हम समाजशास्त्रीय चिंतन की दृष्टि से देखें तो हमारे सामने कामकाजी महिलाओं से संबंधित अनेक मुद्दे सामने आ जाएँगे। कामकाजी महिलाएँ ही ऐसा क्यों करती हैं? क्या बिना कामकाजी महिलाओं वाले परिवारों में भी ऐसा होता है? क्या आस-पड़ोस में कोई ऐसा परिवार भी है जिसमें कामकाजी महिला को अपने परिवार के सदस्यों से किसी प्रकार का मतभेद नहीं है तथा सभी सदस्य उसके पारिवारिक दायित्वों को पूरा करने में सहयोग देते हैं? समाज के क्रमबद्ध ज्ञान एवं सामान्य बौद्धिक ज्ञान में अंतर को सामने रखते हुए ही टी० बी० बॉटोमोर ने इस तथ्य पर बल दिया है कि व्यक्ति हजारों वर्षों से समाज में रह रहे हैं, परंतु समाजशास्त्र एक नवीन विषय है। स्पष्ट है कि समाज में रहना तथा समाज में हो रही घटनाओं का सामान्य चिंतन या प्रेक्षण समाजशास्त्र नहीं है। |
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लगभग सभी सामाजिक विज्ञान क्यों अपनी सीमाएँ पार कर दूसरों के क्षेत्र में प्रवेश कर जाते हैं ? |
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Answer» सामाजिक विज्ञानों के बीच कोई स्पष्ट सीमा-रेखा नही खींची जा सकती तथा इनमें अध्ययन किये जाने वाले कई विषय समान प्रकार के होते हैं। इसी कारण लगभग सभी सामाजिक विज्ञान अपनी सीमाएँ पार कर दूसरों के क्षेत्र में प्रवेश कर जाते हैं। |
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समाजशास्त्र को सर्वप्रथम किस नाम से संबोधित किया गया था? |
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Answer» समाजशास्त्र को सर्वप्रथम ‘सामाजिक भौतिकी’ के नाम से संबोधित किया गया। |
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सर्वप्रथम समाजशास्त्र शब्द का प्रयोग किस सन में किया गया था? |
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Answer» ‘समाजशास्त्र’ शब्द का सर्वप्रथम प्रयोग 1838 ई० में किया गया। |
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एक गरीब और गृहविहीन दंपती को समाजशास्त्रीय कल्पना द्वारा कैसे समझा जा सकता है? |
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Answer» एक गरीब एवं गृहविहीन दंपती की समाजशास्त्रीय कल्पना इसे एक जनहित मुद्दे के रूप में देखने तथा इसके कारणों की खोज करने पर बल देती है। समाज की संरचना में ऐसी कौन-सी विसंगतियाँ हैं जो कुछ दंपतियों को गरीब एवं गृहविहीन बनाती हैं, जबकि अन्य को अमीर एवं ओलीशान मकानों में रहने का अवसर प्रदान करती है। समाजशास्त्रीय कल्पना हमें एक गरीब एवं गृहविहीन दंपती की स्थिति को भगवान की देन मानने से रोकती है तथा हमारा ध्यान समाज की विसंगतियों की ओर दिलाने का प्रयास करती है। |
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अपनी या अपने दोस्त अथवा रिश्तेदार की किसी व्यक्तिगत समस्या को चिह्नित कीजिए इसे समाजशास्त्रीय समझ द्वारा जानने की कोशिश कीजिए।” |
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Answer» मान लीजिए कि आप, आपका कोई दोस्त अथवा रिश्तेदार उच्च शिक्षा प्राप्त करने के बावजूद बेरोजगार है। उसकी यह स्थिति “शिक्षित बेरोजगारी’ कहलाती है। वह इस बेरोजगारी के कारण निराश रहता है तथा परिवार एवं अन्य समूहों से उसका व्यवहार सामान्य नहीं होता। इस समस्या को जब कोई सामान्य बौद्धिक ज्ञान से देखने का प्रयास करता है तो वह यह सोच सकता है कि आपके दोस्त अथवा रिश्तेदार का भाग्य ही ऐसा है। भगवान ने उसका पढ़ना-लिखना तो सुनिश्चित किया था, परंतु रोजगार नहीं। यह भी हो सकता है कि वह दोस्त अथवा रिश्तेदार स्वयं आलसी हो तथा रोजगार करना ही न चाहता हो। यह भी संभव है कि परिवारवाद की भावना में जकड़े होने के कारण दूरदराज के क्षेत्र में रोजगार मिलने पर वह जाना ही नहीं चाहता है। आपका दोस्त अथवा रिश्तेदार ऐसे क्षेत्र में भी निवास करने वाला हो सकता है जिसमें रोजगार के अवसर ही उपलब्ध नहीं हैं। समाजशास्त्रीय समझ पहले तो बेरोजगारी को क्रमबद्ध रूप में परिभाषित करने तथा इसे समझने को प्राथमिकता देती है। यह समझ इस शिक्षित बेरोजगारी को जनहित मुद्दे के रूप में देखने तथा इसके कारणों की खोज करने पर बल देती है। लाखों-करोड़ों लोग उच्च शिक्षा प्राप्त करने के उपरांत भी बेरोजगार क्यों रहते हैं? जब समाजशास्त्रीय समुझ द्वारा इसे देखने का प्रयास किया जाएगा तो हो सकता है कि हमारा ध्यान शिक्षा-प्रणाली के दोषपूर्ण होने, उच्च शिक्षा में अत्यधिक छात्र संख्या होने, व्यावसायिक शिक्षा का अभाव होने अथवा देश में मॉग एवं पूर्ति में असंतुलन होने जैसे कारणों पर केंद्रित हो। शिक्षित बेरोजगारी की भाँति निर्धनता, मद्यपान, मादक द्रव्य व्यसन जैसी व्यक्तिगत समस्या को यदि समाजशास्त्रीय समझ से देखने का प्रयास किया जाएगा तो हमारा नजरिया सामान्य बौद्धिक ज्ञान से देखने वाले नजरिये से पूर्णतः भिन्न होगा। इन व्यक्तिगत समस्याओं को भी हम जनहित के मुद्दों के रूप में देखेंगे तथा इनके कारणों का पता लगाने का प्रयास करेंगे। यदि सम्भव हो तो इनका समाधान भी बताएँगे। |
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यह किसका कथन है कि “मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है? |
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Answer» यह कथन अरस्तू का है। |
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भारत में एक संस्थागत विषय के रूप में समाजशास्त्र का प्रचलन कब हुआ? |
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Answer» भारत में एक संस्थागत विषय के रूप में समाजशास्त्र का प्रचलन 1819 ई० में हुआ। |
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