This section includes 7 InterviewSolutions, each offering curated multiple-choice questions to sharpen your Current Affairs knowledge and support exam preparation. Choose a topic below to get started.
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‘गंग’ और ‘सुसंग’ को तुलसीदास ने समान कैसे बताया है? |
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Answer» गंगा के जल से जो वस्तु मिलती है या जो व्यक्ति स्नान करता है, वह गंगा के समान ही पवित्र हो जाता है। इसी प्रकार सत्संग करने वाला व्यक्ति सदाचारी हो जाता है। |
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कवि कृपाराम कैसे लोगों से मित्रता न करने की सीख देते हैं? |
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Answer» कृपाराम उन लोगों से मित्रता न करने की सीख देते हैं जो मुख से तो मीठा बोलते हैं परन्तु हृदय में कपट रखते हैं। |
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तुलसीदास जी ने बुरे समय के सखा किनको बताया है? |
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Answer» तुलसीदास जी ने धैर्य, धर्माचरण, विवेक, सत्साहित्य, साहस और सत्य पर दृढ़ रहना-इन गुणों को बुरे समय का सखा बताया है। |
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“पर जळती निज पाय, रती न सूझै राजिया” पंक्ति का भाव स्पष्ट कीजिए। |
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Answer» इस पंक्ति से सम्बद्ध सोरठे में कवि कृपाराम खिड़िया ने संकेत किया है कि समाज में लोग दूसरों के घरों में लगी आग अर्थात् कलह और विवाद आदि को दूर से देखकर आनन्दित हुआ करते हैं, परन्तु उन्हें अपने घर की कलह और अशान्ति दिखाई नहीं देती। पहाड़ पर लगी आग तो सभी को दिखाई दे जाती है परन्तु अपने पैरों के निकट जलती आग लोगों को दिखाई नहीं देती। दूसरों के दोषों को देखने से पहले व्यक्ति को अपनी कमियों पर ध्यान देना चाहिए। |
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तुलसी ने संकलित दोहों में क्या सीख दी है? |
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Answer» तुलसीदास ने अपने दोहों में काम, क्रोध आदि दुर्गुणों से बचने, परमार्थ पर ध्यान देने, सत्संगति करने, हिल-मिलकर जीवन बिताने तथा धैर्य, धर्म, विवेक आदि गुण अपनाने की सीख दी है। |
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कृपाराम ने रसना (वाणी) का गुण कैसे दर्शाया है? |
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Answer» कवि कृपाराम ने कहा है कि मीठी और कड़वी वाणी के कारण ही कोयल सबके मन को प्रसन्न करती है और कौआ सभी को कड़वा या बुरा लगता है। |
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तुलसीदास जी की पाँच प्रमुख रचनाओं के नाम लिखिए। |
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Answer» तुलसीदास जी की पाँच प्रमुख रचनाएँ हैं-रामचरितमानस, गीतावली, दोहावली, विनय पत्रिका तथा कवितावली। |
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रसना रा गुण राजिया’ से कवि का क्या आशय है? स्पष्ट कीजिए। |
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Answer» कहा गया है-वाणी एक अमोल है, जो कोई जानै बोल। वाणी या बोली भगवान द्वारा दी गई एक अमूल्य वस्तु है। बस मनुष्य को इसका सही प्रयोग करना आना चाहिए। कवि कृपाराम भी ‘रसना का गुण’ अर्थात् वाणी के इसी महत्त्व को बता रहे हैं। कवि कोयल और कौए का उदाहरण देकर अपनी बात को प्रमाणित कर रहा है। कोयल अपनी मधुर बोली से हृदय में प्यार जगाती है और सबके मन को प्रसन्न किया करती है। इसके विपरीत कौआ अपनी कर्कश काँव-काँव द्वारा मन में खीझ उत्पन्न करता है। वाणी में अन्तर से ही कोयल सबकी प्रिय है और कौआ अप्रिय है। |
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कबीरदास की वाणी साखी क्यों कहलाती है? स्पष्ट कीजिए। |
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Answer» साखी’ शब्द संस्कृत के ‘साक्षी’ का ही विकसित या तद्भव रूप है।’साक्षी’ वह होता है जिसने किसी घटना या वस्तु को स्वयं अपनी आँखों से देखा हो। ‘साखी’ नाम से रचित दोहों में कबीरदास जी द्वारा अपने स्वयं के अनुभव से प्राप्त विचारों, शिक्षाओं और सन्देशों को व्यक्त किया गया है। अत: कबीरदास के आध्यात्मिक अनुभवों पर आधारित होने के कारण, इन दोहों को ‘साखी’ नाम दिया गया प्रतीत होता है। |
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| 10. |
कवि कृपाराम के सोरठे में राजिया शब्द किसके लिए प्रयुक्त हुआ है? |
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Answer» राजिया कृपाराम का अत्यन्त प्रिय सेवक था। वह नि:सन्तान था। उसका दु:ख दूर करने के लिए कृपाराम ने उसे सम्बोधित करते हुए अपने सोरठों की रचना की थी। |
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| 11. |
संकलित दोहों के आधार पर तुलसीदास की रचनाओं की काव्यगत विशेषताएँ संक्षेप में लिखिए। |
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Answer» संकलित दोहों के आधार पर तुलसीदास की निम्नलिखित काव्यगत विशेषताएँ सामने आती हैंभाषा-कवि ने साहित्यिक ब्रजभाषा का प्रयोग किया है। लक्षणा शब्द शक्ति के प्रयोग से भाषा को प्रभावशाली बनाया है। शैली-तुलसी की कथन शैली उपदेशात्मक तथा प्रेरणादायिनी है। कहीं-कहीं मधुर व्यंग्य का भी प्रयोग किया गया है। रस-कवि शान्त रस की सृष्टि करने में पूर्ण दक्ष है। अलंकार-कवि ने अनुप्रास, उपमा, रूपक तथा दृष्टांत आदि अलंकारों का स्वाभाविक रूप से प्रयोग किया है। विषय-संकलित दोहों में कवि ने मानव जीवन को सुखी एवं सार्थक बनाने के लिए प्रेरणादायक विषयों का चुनाव किया है। |
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कबीरदास ने त्याग को आदर्श स्वरूप कैसा बताया है? |
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Answer» त्याग करने के लिए मनुष्य का मोह से मुक्त होना आवश्यक होता है। थोड़ा-थोड़ा करके सांसारिक वस्तुओं का त्याग करने की अपेक्षा एक ही बार में दृढ़ निश्चय के साथ सारी सांसारिक वस्तुओं का त्याग कर देना उत्तम होता है। मनुष्य ऐसा तभी कर सकता है जब वह मान लेता है कि सब कुछ भगवान का है, उसका कुछ भी नहीं है। यही त्याग का आदर्श स्वरूप होता है। |
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कवि कृपाराम खिड़िया ने अपने सोरठों में कोयल और कौआ तथा कस्तूरी और शक्कर की तुलना द्वारा क्या सन्देश देना चाहा है? अपने शब्दों में लिखिए। |
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Answer» कृपाराम ने इन दोनों सोरठों द्वारा पाठकों को मधुरवाणी और जीवन में गुणों के महत्त्व का सन्देश दिया है। सभी जानते हैं। कि लोग कोयल को प्यार करते हैं और कौए को भगा देते हैं। इसका एकमात्र कारण वाणी का स्वरूप है। कोयल अपनी मीठी बोली से सभी के मन में प्रेम भाव जगाती है और सुनने वालों के मन को प्रसन्न कर देती है। जबकि कौए की कर्कश बोली कानों को तनिक भी नहीं सुहाती । कवि का यही सन्देश है कि सबका प्रिय बनना है तो सदा मधुर वाणी का प्रयोग करना चाहिए। कस्तूरी और शक्कर का उदाहरण सामने रखकर कवि ने सन्देश दिया है कि केवल वस्तु या व्यक्ति की सुन्दरता उसे समाज में सम्मान नहीं दिला सकती। सम्मान और मूल्य मनुष्य को उसके श्रेष्ठ गुणों से प्राप्त होते हैं। कस्तूरी भले ही देखने में काली-कुरूप हो किन्तु उसकी अद्वितीय मादक सुगन्ध ने उसे अति मूल्यवान बना दिया है। शक्कर भले देखने में सुन्दर लगे पर वह कस्तूरी के सामने मूल्य और महत्त्व में कहीं नहीं ठहरती। |
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‘सब सौं हिल-मिल चालिए’ तुलसीदास जी ने इस कथन द्वारा क्या सन्देश देना चाहा है? संकलित दोहे के आधार पर लिखिए। |
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Answer» तुलसीदास कहते हैं कि इस संसार में विभिन्न प्रकार के स्वभाव, आचरण और रुचियों वाले लोग होते हैं। हमें जहाँ तक हो सबसे हिल-मिल कर समय बिताना चाहिए। मानव जीवन’नदी-नाव संयोग’ के समान है। जैसे नाव द्वारा नदी पार करते समय नौका में बैठे लोगों को थोड़े समय साथ रहने का अवसर मिलता है, उसी प्रकार मानव जीवन में भी थोड़े समय के लिए विभिन्न प्रकृति के लोग हमारे सम्पर्क में आते हैं। इस अवसर का लाभ लेते हुए सभी के साथ प्रेमपूर्वक समय बिताना ही बुद्धिमानी है। यही कवि का सन्देश है। |
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हंस में कौन-सा विशेष गुण माना गया है? हंस का यह गुण आपको क्या संदेश देता है? |
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Answer» ऐसा विश्वास चला आ रहा है कि हंस पानी और दूध के मिश्रण में से दूध को ग्रहण करके पानी को त्याग देता है। हंस का अर्थ ज्ञानी या विवेकी पुरुष से भी लगाया जाता है। हंस का यह गुण हमें संदेश देता है कि गुणों और अवगुणों से युक्त संसार में हमें गुणों को ग्रहण करते हुए अवगुणों का त्याग करते रहना चाहिए। ऐसा करने से हमारा जीवन सुखी हो सकता है। |
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आशा को कबीर ने क्या बताया है और इससे मुक्त होने का गुरु मंत्र किसे बताया है? |
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Answer» आशा को कबीर ने साँपन बताया है जिसने सारे संसार को डस रखा है। इस दोहे में कबीर का आशा को सर्पिणी बताने का भाव यह है कि जो व्यक्ति केवल आशाओं के सहारे रहता है, वह जीवन में कभी सुखी नहीं हो सकता। आशा के साथ उद्यम भी होना चाहिए। आशा की दासता से छुटकारा पाने का एकमात्र उपाय सन्तोष की भावना है। वही आशारूपी सर्पिणी के विष से व्यक्ति की रक्षा कर सकती है। सन्तोषरूपी गुरु मन्त्र के द्वारा ही आशारूपी सर्पिणी का विष उतारा जा सकता है। |
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‘जाति न पूछो साधु की, पूछि लीजिए ज्ञान’ कबीर के इस कथन में निहित सन्देश को स्पष्ट कीजिए। |
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Answer» हमारे समाज में साधु-सन्तों का सम्मान करने की परम्परा चली आ रही है। सन्त और साधु के लक्षण भी बताए गए हैं। जिस व्यक्ति में ये लक्षण विद्यमान हों वही सन्त है और आदरणीय है। कबीर भी इसी मत को स्वीकार करते हैं। किन्तु कुछ अहंकारी और जाति को महत्त्व देने वाले लोगों ने जाति विशेष के व्यक्ति को ही सन्त मानना आरम्भ कर दिया। सन्त की परीक्षा उसकी जाति से नहीं उसके ज्ञान और सदाचरण से ही हो सकती है। जाति पर बल देने वाले लोगों को कबीर ने अज्ञानी बताया है। अत: कबीर ने ऐसे लोगों पर व्यंग्य करते हुए सन्देश दिया है कि जाति तो तलवार की म्यान के समान है। जैसे तलवार मोल लेते समय उसकी म्यान की सुन्दरता पर नहीं, अपितु तलवार की श्रेष्ठता पर ध्यान दिया जाता है, उसी प्रकार साधु का सम्मान भी उसके ज्ञान के आधार पर होना चाहिए। ऊँची जाति के अज्ञानी को साधु मानना अंधविश्वास और दुराग्रह ही कहा जाएगा। |
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मोल करो तलवार का पड़ा रहन दो म्यानसे क्या तात्पर्य है? |
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Answer» इस कथन का तात्पर्य यह है कि साधु की श्रेष्ठता उसकी जाति से नहीं अपितु उसके ज्ञान आदि से आँकी जानी चाहिए। |
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"मोल करो तलवार का, पड़ा रहन दो म्यान” कबीर ने इस कथन द्वारा क्या सन्देश देना चाहा है? |
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Answer» कबीर ने इस पंक्ति द्वारा यह सन्देश देना चाहा है कि व्यक्ति की महानता और सम्मान का मूल्यांकन उसकी जाति के आधार पर करना उसके साथ अन्याय है। उसके ज्ञान और मानवीय गुणों के आधार पर ही उसकी महानता का मूल्यांकन किया जाना चाहिए। तलवार खरीदने वाला अनुभवी व्यक्ति, उसका मूल्य, उसके म्यान की सुन्दरता देखकर निश्चित नहीं करता। वह तलवार के लोहे की गुणवत्ता और उसकी धार के टिकाऊपन के आधार पर उसका मूल्य तय करता है। जाति तो साधु का म्यान है, उसमें रखी तलवार उसका ज्ञान है। उसे ही परखना चाहिए। |
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असा साँपनी’ की औषधि है-(अ) माया(ब) सुख(स) सम्पदा(द) सन्तोष |
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Answer» असा साँपनी’ की औषधि है सन्तोष। |
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कृपाराम की लोकप्रियता का कारण क्या है? संकलित सोरठों के आधार पर लिखिए। |
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Answer» कवि कृपाराम अपने नीति सम्बन्धी सोरठों के लिए प्रसिद्ध हैं। इन सोरठों में कवि ने जीवन को सुखमय बनाने की तथा सामाजिक मर्यादाओं के पालन की सीख दी है। वह व्यक्ति को मधुरवाणी अपनाने की प्रेरणा देते हैं। सुन्दरता की अपेक्षा आन्तरिक गुणों की श्रेष्ठता पर बल देते हैं। दूसरों पर हँसने के बजाय अपने अवगुणों पर ध्यान देना, स्वार्थियों से बचना, कपटी मित्रों से सावधान रहना, सच्चे मित्र की पहचान तथा साहसी बनना आदि, ऐसी ही शिक्षाएँ हैं। |
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कबीर के अनुसार साधु की श्रेष्ठता का निर्णय किस आधार पर करना चाहिए? |
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Answer» साधु की श्रेष्ठता उसके ज्ञान से आँकी जानी चाहिए, न कि उसकी जाति के आधार पर। |
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कृपाराम के अनुसार रद्दी के समान निरादर होता है –(क) निर्धन व्यक्ति का(ख) गुणहीन व्यक्ति का(ग) हिम्मत से रहित व्यक्ति का(घ) कटुभाषी व्यक्ति का। |
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Answer» (ग) हिम्मत से रहित व्यक्ति का |
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कबीर के दोहे हमें श्रेष्ठ जीवन मूल्यों को अपनाने की प्रेरणा देते हैं। इस कथन पर अपना मत लिखिए। |
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Answer» सन्त कबीर ने अपने दोहों में श्रेष्ठ मानवीय गुणों को अपनाने की प्रेरणा दी है, यह कथन सर्वथा सही है। वे कहते हैं कि, “सब कुछ प्रभु का है मेरा कुछ भी नहीं” यह त्याग की भावना का आदर्श रूप है। विवेकपूर्वक अवगुणों से बचकर गुणों को धारण करना, हर प्रकार के अहंकार का त्याग, जात और धर्म की अपेक्षा ज्ञान से साधुता का मूल्यांकन करना, सज्जनों की संगति करना, सन्तोषपूर्वक जीवन बिताना तथा मधुर वाणी का प्रयोग करना ये सभी श्रेष्ठ जीवन मूल्य हैं, जिनको धारण करने की प्रेरणा कबीर ने दी है। |
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“कबीर के दोहे मनुष्य को सदाचरण और श्रेष्ठ जीवन मूल्य को अपनाने की प्रेरणा देते हैं। अपनी पाठ्यपुस्तक में संकलित कबीर के दोहों के आधार पर इस कथन की पुष्टि कीजिए। |
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Answer» पाठ्यपुस्तक में संकलित कबीरदास के दोहे प्रशंसनीय आचरण और श्रेष्ठ मानवीय गुणों को अपनाने की प्रेरणा देते हैं। कबीर जीवन में त्याग के महत्त्व को स्वीकारते हुए कहते हैं कि त्याग करना है तो मन में दृढ़ निश्चय करके सारे सांसारिक माया-मोह को त्याग दो। ‘सब प्रभु का है मेरा नहीं’ यह विचार मनुष्य को विनम्रता धारण करने की प्रेरणा देता है। हंस के नीर-क्षीर विवेक प्रसंग द्वारा वह विवेकी बनने की प्रेरणा दे रहे हैं। प्रभु प्राप्ति में और सम्मान में अहंकार ही बाधक है। अहंकार को त्याग मनुष्य के आचरण को प्रशंसनीय बनाता है। “पूछि लीजिए ज्ञान” इस कथन द्वारा ज्ञान और ज्ञानी का सम्मान करने की प्रेरणा दी गई है। सत्संगति भी आचरण को सुधारने में महत्त्वपूर्ण योगदान करती है। इसीलिए कबीर सत्संग की महिमा का बखान कर रहे हैं। सन्तोष एक श्रेष्ठ जीवन मूल्य है। आशा और तृष्णा से छुटकारा सन्तोषी बनने से ही मिल पाता है। मधुर वाणी का प्रयोग करना भी सदाचार का ही अंग है। कौए और कोयल के उदाहरण से मधुर वाणी का प्रयोग करने की प्रेरणा दी गई है। |
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त्यागी व्यक्ति को मन में क्या विचार दृढ़ कर लेना चाहिए? |
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Answer» त्यागी व्यक्ति को ‘सब कुछ प्रभु का है मेरा नहीं’ यह विचार दृढ़ता से मन में रखना चाहिए। |
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कवि ने ‘कस्तूरी’ व ‘चीनी’ के माध्यम से मनुष्य के किन गुणों की ओर संकेत किया है?(अ) आन्तरिक(ब) बाह्य(स) आन्तरिक व बाह्य(द) इनमें से कोई नहीं। |
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Answer» कवि ने ‘कस्तूरी’ व ‘चीनी’ के माध्यम से मनुष्य के किन गुणों की ओर संकेत किया है आन्तरिक |
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तुलसी के अनुसार कैसे लोग भगवान राम की महत्ता को नहीं समझ सकते और क्यों? |
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Answer» तुलसी के अनुसार जो लोग भोगों में डूबे हैं, क्रोधी हैं, अहंकारी हैं तथा घरबार के मोह में फँसे हुए हैं, वे कभी भगवान राम की महिमा नहीं जान सकते। तुलसी के अनुसार इसका कारण है कि ऐसे लोग संसाररूपी कुएँ में पड़े हैं। जैसे कुएँ का मेंढक कुएँ से बाहर के अनन्त संसार को परिचय नहीं पा सकता। उसी प्रकार सांसारिक विकारों से ग्रस्त और भोगों में लिप्त मनुष्य भी भगवान राम की महिमा और कृपा से अपरिचित रह जाता है। तुच्छ विषयों के भोग में ही सारा मानव जीवन नष्ट कर देता है। |
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कवि के अनुसार मनुष्य के जीवन में संगति का क्या प्रभाव पड़ता है? |
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Answer» कवि के अनुसार मनुष्य जैसी संगति करता है, वैसा ही बन जाता है, व्यक्ति सत्संगति से भला और कुसंगति से दुर्बल और निन्दनीय हो जाता है। |
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चतुर व्यक्ति अपनी इन्द्रियों का प्रयोग किसलिए किया करते हैं और क्यों? |
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Answer» तुलसीदास जी कहते हैं कि विधाता ने मनुष्य को बोलने के लिए जीभ दी है सुनने के लिए कान दिए हैं और हितकारी बातों को धारण करने के लिए चित्त दिया है। अज्ञानी लोग इन इन्द्रियों का प्रयोग सांसारिक सुखों को भोगने के लिए किया करते हैं, परन्तु सुजान लोग इनका प्रयोग केवल परमार्थ अर्थात् जीवन के महानतम लक्ष्य (ईश्वर की प्राप्ति या मोक्ष) को प्राप्त करने के लिए ही किया करते हैं। |
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तुलसीदास के अनुसार इन्द्रियों की सार्थकता किससे सम्भव है? |
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Answer» तुलसीदास जी के अनुसार इन्द्रियों की सार्थकता, उनके परमार्थ या ईश्वर प्राप्ति में प्रयोग किए जाने पर ही सम्भव है। |
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ईश्वर प्राप्ति में बाधक अवगुण कौन-कौनसे बताए गए हैं? |
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Answer» तुलसीदास जी के अनुसार काम, क्रोध, मद, लोभ और घर-परिवार से मोह आदि अवगुण ईश्वर प्राप्ति में बाधक होते हैं। |
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