This section includes 7 InterviewSolutions, each offering curated multiple-choice questions to sharpen your Current Affairs knowledge and support exam preparation. Choose a topic below to get started.
| 1. |
पुनः मूल्यांकन के बाद के आर्थिक चिढे में संपत्ति और दायित्व किस किमत से दर्शाये जाते है ? । |
|
Answer» पुन: मूल्यांकन के बाद के आर्थिक चिठे में संपत्ति और दायित्व बदली हुई किमत से दर्शाये जाते है । |
|
| 2. |
पुनः मूल्यांकन खाते का लाभ या हानि किस खाते से लाया जाता है ? |
|
Answer» पुन: मूल्यांकन खाते में अगर लाभ हो तब पुराने साझेदारों के पूँजी खाते जमा किया जाता है, और अगर हानि हो तो पुराने साझेदारों के पूंजी खाते उधार किया जाता है । |
|
| 3. |
पुनः मूल्यांकन खाते का लाभ या हानि किस प्रमाण में साझेदारों के बीच बाँटा जाता है ?(अ) त्याग के प्रमाण में(ब) लाभ के प्रमाण में(क) नये लाभ-हानि के प्रमाण में(ड) पुराने लाभ-हानि के प्रमाण में |
|
Answer» सही विकल्प है (ड) पुराने लाभ-हानि के प्रमाण में |
|
| 4. |
त्याग का प्रमाण अर्थात् क्या ? |
|
Answer» पुराने साझेदारों द्वारा स्वयं के लाभ का भाग नये साझेदार को दिया जाये तथा चालु साझेदारी में परिवर्तन होने पर किसी साझेदार ने अन्य लाभ-हानि वितरण के प्रमाण में साझेदार को दिया जानेवाला लाभ में भाग को त्याग का प्रमाण कहते हैं । |
|
| 5. |
एक साझेदार पेढी में से प्रति मास के अंत में एकसमान रकम का आहरण करता है । वर्ष के अंत में कुल वार्षिक आहरण ₹ 12,000 किया है । अगर आहरण पर वार्षिक 12% की दर से ब्याज वसूल करना हो, तब वर्ष के अंत में आहरण पर ब्याज गिनिए। |
|
Answer» = Interest = ब्याज आहरण पर ब्याज = I = \(\frac{PRN}{100}\) सूचना :
|
|
| 6. |
x और Y एक पेढी के साझेदार है । उन्होंने साझेदारों करारनामा तैयार नहीं किया है। साझेदारों के बीच निम्न प्रश्नों में मतभेद रहा हुआ है । आप साझेदार को कानूनी सलाह दीजिए।(1) X साझेदारों ने किये आहरण पर 6% ब्याज लेने की माग करता है ।(2) Y पेढ़ी में सक्रिय साझेदार के रूप में कार्य करता है उसके बदले में पारिश्रमिक (महेनताना) और कमीशन की मांग करता है ।(3) X साझेदारों को पूँजी पर ब्याज देने की माँग करता है।(4) X द्वारा पेढी को ₹ 20,000 लोन के रूप में दिया गया है। वह लोन पर ब्याज की मांग करता है ।(5) Y को पेढी ने ₹ 25,000 की लोन दी है। X लोन पर ब्याज वसूल करने को कहता है ।(6) X पेढी के लाभ का वितरण साझेदारों की पूँजी के प्रमाण में बाँटने को कहता है । |
|
Answer» X और Y ने खुद की पेढी का करारनामा तैयार नहीं किया है। इसलिये भारतीय साझेदारी अधिनियम 1932 के अनुसार उपरोक्त प्रश्नों का हल निम्नानुसार किया जायेगा : (1) साझेदारी अधिनियम 1932 के अनुसार X को कोई आहरण पर ब्याज नहीं दिया जायेगा। (2) साझेदारी अधिनियम 1932 के अनुसार Y को पेढी में कार्य करने के बदले में पारिश्रमित (मेहनताना) और कमीशन नहीं दिया जायेगा। (3) साझेदारी अधिनियम 1932 के अनुसार X या अन्य किसी भी साझेदार को पूँजी पर ब्याज नहीं दिया जायेगा । (4) साझेदारी अधिनियम 1932 के अनुसार X को ₹ 20,000 की लोन पर वार्षिक 6% की दर से ब्याज दिया जायेगा । (5) साझेदारी अधिनियम 1932 के अनुसार अगर करारपत्र में पेढ़ी के द्वारा किसी भी साझेदार या अन्य व्यक्ति को दी गई लोन पर ब्याज के संदर्भ में कोई स्पष्टता न हो तो कोई ब्याज दिया नहीं जायेगा । अर्थात् Y से पेढी कोई लोन पर ब्याज वसूल नहीं करेगी । (6) साझेदारी अधिनियम 1932 के अनुसार अगर लाभ-हानि वितरण के संदर्भ में करारपत्र में कोई स्पष्टता न दी गई हो तब समान हिस्से |
|
| 7. |
अगर साझेदारी करारपत्र में स्पष्टता न हो तब पेढी के द्वारा साझेदार को दी गई लोन पर कितने प्रतिशत ब्याज दिया जायेगा?(अ) 6%(ब) 9%(क) 12%(ड) ब्याज गिना नहीं जायेगा । |
|
Answer» सही विकल्प है (अ) 6% |
|
| 8. |
साझेदारी अर्थात् क्या ? |
|
Answer» भारत में साझेदारी के लिये भारतीय साझेदारी अधिनियम 1932 की कलम-4 के अनुसार साझेदारी की व्याख्या इस अनुसार है : “साझेदारी अर्थात् धंधे में हुए लाभ या हानि का वितरण एकत्रित व्यक्तियों के बीच करना जिसका संचालन सभी व्यक्तियों के द्वारा अथवा सबको ओर से किसी एक व्यक्ति के द्वारा किया जाता है।” साझेदारी की व्याख्या के अनुसार साझेदारो में एक से अधिक व्यक्ति मिलकर व्यवसाय या धंधा करते है। साझेदारों के बीच साझेदारी करार किया जाता है जिसके आधार पर साझेदारी संस्था चलती है । |
|
| 9. |
साझेदार के चालु खाते की उधार शेष का ब्याज पेढी के लिये क्या गिना जायेगा ?(ब) दायित्व(क) आवक(ड) नुकसान(अ) खर्च |
|
Answer» सही विकल्प है (क) आवक |
|
| 10. |
अस्थिर पूँजी पद्धति में साझेदार के भाग का लाभ किस खाते किस तरफ लिखा जायेगा ?(अ) पूँजी खाते उधार(ब) पूँजी खाते जमा(क) चालु खाते उधार(ड) चालु खाते जमा |
|
Answer» सही विकल्प है (ब) पूँजी खाते जमा |
|
| 11. |
स्थिर पूंजी खाते की पद्धति अस्तित्व में हो, तब साझेदार अतिरिक्त पूँजी स्थायी स्तर पर लाये तो वह किस खाते जमा होता है? |
|
Answer» स्थिर पूँजी खाते की पद्धति अस्तित्व में हो, तब साझेदार अतिरिक्त पूजी स्थायी स्तर पर लाये तो वह राशि साझेदारों के पूंजी खाते जमा की जाती है। |
|
| 12. |
अगर साझेदार के चालु खाते की उधार शेष हो, तब पक्का तलपट में किस पक्ष में दर्शाया जाता है ? |
|
Answer» अगर साझेदार के चालु खाते की उधार शेष हो तब पक्की तलपट के संपत्ति-लेना पक्ष में दर्शाया जाता है । |
|
| 13. |
स्थिर पूँजी पद्धति में साझेदार का लाभ किस खाते जमा किया जाता है ? |
|
Answer» स्थिर पूँजी पद्धति में साझेदार का लाभ चालु खाते में जमा किया जाता है । |
|
| 14. |
लाभ-हानि वितरण (समायोजन) खाता यह किस खाते का ही एक भाग है ? |
|
Answer» लाभ हानि वितरण खाता यह लाभ-हानि खाने का ही एक भाग है । |
|
| 15. |
साझेदारी के लक्षण बताइए । |
|
Answer» साझेदारी के लक्षण निम्नानुसार है (Characteristics of Partnership) : (1) करारजन्य संबंध : साझेदारी करार द्वारा अस्तित्व में आती है। यह करार लिखित या मौखिक हो सकता है । साझेदारी में लिखित करार अनिवार्य नहीं परंतु हितावह है । (2) लाभ का उद्देश्य : साझेदारी पेढी का मुख्य उद्देश्य धंधाकीय प्रवृत्ति करके उसमें से होनेवाले लाभ को साझेदारों के बीच बाँटना है। साझेदारी पेढी में साझेदार लाभ के उद्देश्य से ही एकत्र होते है, बिना लाभ के उद्देश्य से एकत्र हुए व्यक्तियों को साझेदार नहीं कहा जायेगा। जैसे : लाइब्रेरी, जिमखाना, क्लब में एकत्रित व्यक्ति । (3) कानूनन धंधा : साझेदारी पेढी कानूनन व्यवसाय चलाने के लिये अस्तित्व में आती है। सरकार द्वारा मान्य कानूनी धंधा ही साझेदारी पेढी द्वारा किया जा सकता है । (4) एक-दूसरे के प्रतिनिधि (Agent) : साझेदारी पेढी का संचालन सभी साझेदार संयुक्त रूप से करते है अथवा सभी की तरफ से उनमें से कोई एक या दो व्यक्ति भी संचालन कर सकता है । सभी साझेदारों को पेढी के निर्णय तथा उसके संचालन में भाग लेने का अधिकार है। प्रत्येक साझेदार एक दूसरे के प्रतिनिधि (Agent) होते है, अर्थात् एक साझेदार के द्वारा किया गया व्यवसायिक निर्णय सभी साझेदारों को बंधनकर्ता है। |
|
| 16. |
साझेदारी करारनामा की अनुपस्थिति में हिसाबों को असर करनेवाले भारतीय साझेदारी कानून 1932 के प्रावधान बताइए । |
|
Answer» यदि साझेदारी पेढी में साझेदारों के बीच करार न हुआ हो अथवा करारपत्र में उल्लेख न किया हो तो भारतीय साझेदारी अधिनियम 1932 के निम्न प्रावधानों का पालन करना पड़ता है ।
|
|
| 17. |
घिसाईपात्र संपत्ति अर्थात् क्या ? उसकी स्पष्टता करके घिसाईपात्र संपत्ति की सूचि (यादी) दीजिए । |
|
Answer» घिसाईपात्र संपत्ति (Depreciable Assets) : संपत्ति की किंमत में उसके मर्यादित आयुष्य के कारण होनेवाली कमी घिसाईपात्र संपत्तियाँ कहलाती है । धंधे में कितनी ही संपत्तियाँ ऐसी होती है, जिनके उपयोग या समय बीतने की वजह से उनकी किंमत में कोई कमी नहीं होती, ऐसी संपत्तियाँ पर घिसाई की गणना नहीं की जाती । सामान्यतः घिसाईपात्र संपत्तियों के बारे में यह कहा जा सकता है कि – (1) जिस संपत्ति की खरीदी सिर्फ उपयोग करने के उद्देश्य से की गई हो अर्थात् भविष्य में जिसे क्रय-विक्रय न किया जा सके वह संपत्तियाँ घिसाईपात्र संपत्तियाँ कहलाती है । (2) जो संपत्ति एक ही हिसाबी वर्ष के लिये उपयोगी हो ऐसी संपत्ति की संपूर्ण राशि घिसाई के रूप में अपलिखित की जानेवाली होने से दीर्घकालीन घिसाईपात्र संपत्ति नहीं गिनी जाती । अर्थात् जो संपत्ति एक से अधिक हिसाबी वर्ष के लिए उपयोग में ली जाती हो वह संपत्ति घिसाईपात्र संपत्ति कहलाती है । (3) जिस संपत्ति का उपयोगी आयुष्य मर्यादित हो वह घिसाईपात्र संपत्ति कहलाती है । परंतु जिसका आयुष्य तय करना संभवित न हो या आयुष्य अमर्यादित हो वह संपत्तियाँ घिसाईपात्र संपत्तियाँ नहीं कहलाती । घिसाईपात्र संपत्तियों की यादी (सूचि): (i) सांचा और यंत्र |
|
| 18. |
वार्षिक घिसाई की राशि और घिसाई का दर निश्चित करते समय ध्यान में रखने योग्य मुद्दों का विवरणवार स्पष्टता कीजिए । |
|
Answer» घिसाई की राशि और घिसाई का दर निश्चित करते समय ध्यान में रखने योग्य मुद्दे (तत्त्व) (factors to be considered to Determine amount and Rate of Depreciation) : संपत्ति पर घिसाई की गणना करते समय विविध तत्त्वों का अंदाज तय किया जाता है । यह अंदाज जितना ही वास्तविक और निश्चितता से भरा होगा उतना ही घिसाई की गणना अधिक वास्तविक बनेगी । इस प्रकार, किसी भी स्थायी संपत्ति पर घिसाई की रकम या घिसाई का दर निश्चित करते समय निम्न मुद्दों का विशेष ध्यान रखना चाहिए । (1) संपत्ति की लागत किंमत : घिसाई की गणना हमेशा ही संपत्ति की लागत किंमत पर होती है । इसलिए संपत्ति की लागत किंमत तय करना यह आवश्यक है । संपत्ति की लागत किंमत में संपत्ति खरीदकिंमत, उसके उपयोगी स्थल तक लाने का खर्च और स्थापित करने का खर्च शामिल होता है । इसे अगर सूत्र स्वरूप में प्रस्तुत करें तो – लागत किंमत = खरीदकिंमत + लाने का या स्थापना खर्च यदि पुरानी संपत्ति खरीद कर उपयोग में लेनी हो तब संपत्ति की चुकाई गयी किंमत के अलावा संपत्ति को उपयोगी बनाने के लिये जो मरम्मत खर्च करना पड़ता है उसे लागत किंमत में गिन लिया जाता है । सूत्र स्वरूप में रखे तो – लागत किंमत = खरीद किंमत + संपत्ति को उपयोग में लिया जा सके उसका खर्च (मरम्मत खर्च) (2) संपत्ति का अंदाजित आयुष्य : किसी भी संपत्ति की खरीदी के पश्चात वह कितने वर्षों तक कार्यक्षम रूप से उपयोग में ली जा सकेगी उसके अंदाजित समयावधि को संपत्ति के अंदाजित आयुष्य के रूप में जाना जाता है । संपत्ति की आयु का अंदाज तय करते समय तकनिकी (टेक्नोलॉजी) विषय, नयी खोजों की संभावनाएँ, व्यापारी स्तर की क्षमता तथा भूतकाल के अनुभवों को भी ध्यान में लिया जाता है। (3) संपत्ति का अंदाजित अवशेष मूल्य (भंगार किंमत) : संपत्ति के उपयोग के पश्चात् उसके अंदाजित आयुष्य के अंत में उसकी प्राप्त होनेवाली अनुमानित राशि भंगार किंमत के रूप में जानी जाती है । हिसाब की दृष्टि से भंगार किंमत सिर्फ एक अंदाज है । ऐसी अनुमानित भंगार किंमत संपत्ति की लागत किंमत में से घटाने पर संपत्ति की घिसाईपात्र राशि तय होती है । संपत्ति की यह घिसाईपात्र राशि को उसके अंदाजित आयुष्य से भाग देने पर वार्षिक घिसाई की राशि तय होती है । (4) संपत्ति का उपयोग : किसी भी संपत्ति पर घिसाई की राशि तय करते समय उस संपत्ति का उपयोग वर्तमान में कितना है और भविष्य में कितना रहेगा ? जिस प्रमाण में संपत्ति का उपयोग किया जायेगा उसी प्रमाण में उसके आयुष्य में भी कमी होती जाती है । इस प्रकार, घिसाई की गणना में संपत्ति का उपयोग यह महत्त्वपूर्ण तत्त्व गिना जायेगा । (5) मरम्मत और रख-रखाव खर्च : प्रत्येक संपत्ति की सुरक्षा और मरम्मत के पीछे योग्य समय में पूर्ण प्रमाण में राशि लगाई जाये तब उस संपत्ति की कार्यक्षमता और उपयोगी आयुष्य में वृद्धि होती है । प्रत्येक संपत्ति पर घिसाई की राशि तय करते समय संपत्ति के आयुष्य काल के दौरान अंदाजित कितना मरम्मत और रख-रखाव का खर्च होगा इस बात को भी ध्यान से लेना चाहिए । इसके अलावा, घिसाई की राशि और मरम्मत की राशि के बीच समतुलन बना रहे यह भी ध्यान रखना चाहिए । (6) संपत्ति में लगाई गई पूँजी पर ब्याज : घिसाई की राशि तय करते समय यह ध्यान में रखना चाहिए कि लागत किंमत जितनी पूँजी यदि अन्य किसी प्रतिभूति या संस्था में लगाई जाती तो ब्याज की आय होती । इसलिए संपत्ति के आयुष्य के दरम्यान लागत किंमत जितनी राशि की पूँजी संपत्ति में लगाई जाती है, इस रकम की ब्याज हानि को भी ध्यान में लेना आवश्यक है । इसके अलावा, अगर संपत्ति की खरीदी किसी संस्था से लोन से खरीदी गई हो तब संपत्ति की खरीदी का समय और उत्पादन प्रारंभ न हुआ हो तब तक समय और उत्पादन प्रारंभ न हुआ हो तब तक का ब्याज संपत्ति की किंमत में जोड़ा जाता है और कुल राशि पर घिसाई की गणना की जाती है । (7) नयी खोज और संशोधन : बदलते युग में हमेशा होनेवाली नयी खोज और संशोधन के परिणामस्वरूप संपत्ति अमुक समय के बाद अप्रचलित बन जाती है । इसलिए संपत्ति का शेष बचा हुआ समय भी घिसाई की गणना के समय ध्यान में लिया जाता है । (8) अन्य तत्त्व : घिसाई की राशि को प्रभावित करनेवाले तत्त्वों के अलावा संपत्ति के उपयोग का उद्देश्य, बाजार भाव में कमी की संभावना, दुर्घटना की संभावना, प्राकृतिक आपदा, एवं अन्य तत्त्व भी घिसाई की गणना के समय ध्यान में रखना अनिवार्य है । |
|
| 19. |
संक्षिप्त टिप्पणी लिखिए :घटती शेष की पद्धति (Reducing Balance Method) | |
|
Answer» घटती शेष की पद्धति (Reducing Balance Method) : इस पद्धति में संपत्ति के प्रारंभिक शेष पर निश्चित किये गये प्रतिशत की दर से घिसाई गिनी जाती है । प्रारंभिक शेष अर्थात् पिछले वर्ष की घिसाई घटाने के बाद का अंतिम शेष । इस पद्धति में प्रथम वर्ष संपत्ति की लागत किंमत पर निश्चित दर से घिसाई गिनी जाती है । दूसरे वर्ष लागत किंमत में से प्रथम वर्ष की घिसाई की रकम घटाकर शेष रकम पर दूसरे वर्ष की घिसाई गिनी जाती है । इस प्रकार क्रमश: वर्ष प्रतिवर्ष संपत्ति की वर्ष की प्रारंभ की शेष पर घिसाई गिनी जाती है और संपत्ति की किंमत में से उस वर्ष की घिसाई घटायी जाती है । संपत्ति पर घिसाई की गणना हिसाबी वर्ष के अंत में की जाती है । प्रति वर्ष संपत्ति की शेष उस वर्ष की घिसाई की रकम घटाने से घटती जाती है इसलिए इस पद्धति को घटती शेष पद्धति कहते हैं । वार्षिक घिसाई की रकम के लिये सूत्र : D = C × \(\frac{C−S}N \) जिसमें D = Depreciation = वार्षिक घिसाई C = Cost Price = arra forma R = Rate of Depreciation = घिसाई का दर लाभ : (i) घिसाई गिनने की यह सरल पद्धति है । (ii) इस पद्धति में मरम्मत खर्च और घिसाई की राशि के बीच संतुलन बना रहता है । कारण कि प्रारंभ के वर्षों में घिसाई अधिक और बाद के वर्षों में घिसाई घटती जाती है, जबकि मरम्मत खर्च प्रारंभ के वर्षों में कम या नहीवत होता है और जैसे-जैसे वर्ष बढ़ते है मरम्मत खर्च बढ़ता जाता है । (iii) इस पद्धति में संपत्ति के उपयोग दरम्यान या उपयोगी आयुष्य के अंत में उसकी किंमत शून्य नहीं होती, लगभग अंदाजित भंगार किंमत जितनी शेष रहने की अपेक्षा होती है । मर्यादाएँ (हानियाँ): (i) यह पद्धति समान किस्त पद्धति की तुलना में थोड़ी कठिन है । .. (ii) इस पद्धति में संपत्ति में लगाई गई पूँजी के ब्याज हानि संबंध में कोई व्यवस्था नहीं है । किन संपत्तियों के लिये अनुकूल : जिन संपत्तियों का उपयोगी आयुष्य लंबा हो, उसके लिए यह पद्धति अधिक अनुकूल रहती है । जैसे : यंत्र, फर्निचर, फिक्ष्चर्स वगैरह । |
|
| 20. |
संक्षिप्त टिप्पणी लिखिए :समान किस्त (हप्ता) की पद्धति या सीधी रेखा की पद्धति |
|
Answer» समान किस्त (हप्ता) की पद्धति या सीधी रेखा की पद्धति (Fixed Instalment or Straight Line Method) : स्थायी संपत्तियों पर घिसाई गिनने की सबसे सरल तथा प्रचलित पद्धति है । इस पद्धति के अनुसार संपत्ति की मूलकिंमंत या लागत किंमत पर एक बार जो घिसाई गिनी जाती है वही घिसाई वर्षोवर्ष तक गिनी जाती है । इसलिए यह पद्धति समान किस्त की पद्धति के रूप में जानी जाती है । प्रत्येक वर्ष का घिसाई का आलेख एक सीधी रेखा में मिलने से इसे सीधी लीटी की पद्धति के रूप में भी जाना जाता है । इस पद्धति में संपत्ति की लागत किंमत में से संपत्ति की अनुमानित भंगार किंमत घटाकर संपत्ति के अंदाजित आयुष्य के द्वारा भाग देने से जो राशि प्राप्त होती है उसे वार्षिक घिसाई के रूप में जाना जाता है । वार्षिक घिसाई की राशि निम्न दिये गये सूत्र की मदद से भी जाना जा सकता है | D = C−SN जिसमें इस पद्धति में कितनी बार घिसाई की राशि तय करने के लिये घिसाई का दर दिया जाता है । ऐसी स्थिति में लागत किंमत को घिसाई के दर से गुणा करने से वार्षिक घिसाई की रकम मिलती है । इसके लिये निम्न सूत्र का उपयोग किया जा सकता है : सूत्र : D = \(\frac{C×R}{100}\) जिसमें D = Depreciation = वार्षिक घिसाई सीधी रेखा पद्धति के लाभ निम्न है : (i) यह पद्धति गणना की दृष्टि से खूब सरल है । दोष (मर्यादाएँ): (1) इस पद्धति में संपत्ति में लगाई गई पूँजी पर ब्याज को ध्यान में नहीं लिया जाता । किस प्रकार की संपत्तियों के लिये योग्य : जिस संपत्ति का उपयोगी आयुष्य आसानी से तय किया जा सके ऐसा हो उस संपत्ति के लिये यह पद्धति अधिक उपयोगी है । जैसे : पेटेन्ट, ट्रेडमार्क, कोपीराइट वगैरह । |
|
| 21. |
घिसाई की व्याख्या देकर घिसाई के तत्त्वों की चर्चा करो । |
|
Answer» घिसाई की व्याख्या (Definition of Depreciation) : (i) कार्टर : ‘संपत्ति की किंमत में किसी भी कारणसर क्रमश: और स्थायी कमी हो उसे घिसाई कहा जाता है ।’ (ii) स्पाईसर और पेग्लर : ‘घिसाई यह दिये गये समय के दरम्यान अमुक कारणसर संपत्तियों के असरकारक आयुष्य की कमी का माप है ।’ उपरोक्त व्याख्याओं पर से कहा जा सकता है कि संपत्ति की किंमत में उत्तरोत्तर होनेवाली कमी घिसाई कहलाती है । निश्चित किये गये समय के पश्चात् संपत्ति बिनउपयोगी बन जाती है । घिसाई यह समय से संबंधित खर्च है और उसे राजस्व खर्च के रूप में लाभ- . हानि खाते के उधार पक्ष में बताया जाता है । घिसाई को असर करनेवाले तत्त्व : घिसाई यह स्थायी संपत्ति के उपयोगिता मूल्य में होनेवाली कमी है । संपत्ति की उपयोगिता मूल्य में होनेवाली तत्त्व या कारण निम्न है : (1) संपत्ति का उपयोग : किसी भी संपत्ति के उपयोग के कारण उसकी कार्यक्षमता में कमी आती है । जिससे उसके उपयोगी आयुष्य और उपयोगिता मूल्य में कमी होती है । वर्ष के दरम्यान संपत्ति की किंमत में होनेवाली कमी घिसाई दर्शाती है । (2) समय का तत्त्व : धंधे में प्रत्येक संपत्ति का आयुष्य समय पूरा होने पर अपने आप पूरा हो जाता है । भाडापट्टे जैसी संपत्तियों का उपयोगी आयुष्य पहले से निश्चित होने से ऐसी संपत्तियों का उपयोगी आयुष्य समय के साथ घटता जाता है और निश्चित समय के अंत में उसकी किंमत शून्य गिनी जाती है । कितनी बार अमुक समय तक बिन उपयोगी रहने के बावजूद उसके मूल्य में कमी होती है । यह कमी भी घिसाई कहलाती है । (3) मात्रा में क्रमश: कमी : खनिज की खान या तेल के कुओं जैसी संपत्तियों का मूल्य उसमें रहे हुए खनिज तेल की मात्रा पर आधारित होता है । कुल मात्रा में जैसे-जैसे मात्रा का उपयोग होता जाता है वैसे-वैसे उस अनुपात में उस संपत्ति का उपयोगी मूल्य घटता जाता । है । इस प्रकार ऐसी संपत्तियों की घिसाई मात्रा की कमी पर तय करता है । ऐसी संपत्तियों की चुकाई गई किंमत में से प्रमाणसर राशि घिसाई के रूप में अपलिखित किया जाता है । (4) बाजार किंमत में स्थायी कमी : बदलते जमाने में आधुनिकता का रंग चढ़ा है । पुराने प्रकार की संपत्तियाँ आज के उत्पादन या व्यापार के साथ अनुकूल नहीं होती । नित नये आधुनिक उत्पादन बाजार में आने से पुराने प्रकार की संपत्तियों का चलन घटता जाता है । ऐसी स्थिति में स्थिर संपत्तियों की बाजार किंमत में स्थायी कमी के कारण जितनी राशि कम होती है वह घिसाई कहलाती है । (5) दुर्घटना (अकस्मात) : कितनी बार संपत्ति के उपयोग के दरम्यान या स्थानांतरण के कारण वह संपत्ति दुर्घटनाग्रस्त बनती है । जिससे संपत्ति की उपयोगिता और उसका आयुष्य घटने से संपत्ति की किंमत में कमी आती है । ऐसी संपत्तियों को अगर मरम्मत कराया जाये तब वह खर्च उसकी किंमत से बढ़ जाता है इसलिए वह संपत्ति अनुपयोगी बनने से उसके मूल्य की शेष रकम नुकसान के रूप में या अतिरिक्त घिसाई के रूप में गिननी चाहिए। (6) नयी खोज और संशोधन : आज के इस आधुनिक और परिवर्तनशील युग में समय के साथ-साथ नए संशोधन और खोज होने से नई टेक्नोलॉजी और संशोधनों के कारण नई आधुनिक संपत्तियाँ बाजार में आती रहती है । इस नई संपत्तियों की तुलना में वर्तमान में उपयोग में ली जानेवाली संपत्तियाँ कम या अकार्यक्षम या कम लाभदायक सिद्ध होती है । इस प्रकार संपत्ति के उपयोगिता मूल्य में कमी होती है जो घिसाई कहलाती है । (7) प्राकृतिक तत्त्व : घिसाई के लिये ज्यादातर प्राकृतिक तत्त्व भी जिम्मेदार है । बाढ़, भूकंप, तूफान जैसे प्राकृतिक तत्त्व ज्यादातर संपत्ति को अनुपयोगी या अल्पायु बना देते हैं । जिससे संपत्ति की किंमत में कमी होती है । वह घिसाई कहलाती है । |
|
| 22. |
अधिक लाभ अर्थात् क्या ? |
|
Answer» अधिक लाभ अर्थात् जब धंधा अपेक्षित (अंदाजित) लाभ की अपेक्षा अधिक लाभ प्राप्त करता हो तब जितना लाभ धंधे के द्वारा अधिक किया जाता हो उसे अधिक लाभ कहते है। |
|
| 23. |
औसत लाभ अर्थात् क्या ? |
|
Answer» औसत लाभ की पद्धति अर्थात् पिछले अमुक वर्षों के लाभ की औसत को ध्यान में लेकर निश्चित हुए वर्ष के साथ गुणाकार करके ख्याति की किंमत तय की जाये उसे औसत लाभ की पद्धति कहते है । |
|
| 24. |
पूँजीकृत लाभ अर्थात् क्या ? |
|
Answer» पूंजीकृत लाभ अर्थात् धंधे के औसत लाभ को ज्ञात करके उसे धंधे के सामान्य । अपेक्षित मुआवजा के दर के आधार पर उसकी पूंजीकृत किंमत तप की जाये उसे पूंजीकृत लाभ कहते है । |
|
| 25. |
अधिक लाभ अर्थात् ………………….(अ) लगाई गई पूँजी – अपेक्षित लाभ(ब) अपेक्षित लाभ – लगाई गई पूंजी(क) औसत लाभ – अपेक्षित लाभ(ड) अपेक्षित लाभ – औसत लाभ |
|
Answer» सही विकल्प है (क) औसत लाभ – अपेक्षित लाभ |
|
| 26. |
ख्याति का आधार किस पर रहा हुआ है ?(अ) धंधाकीय इकाई के कर्मचारीयों पर(ब) धंधाकीय इकाई के संचालकों पर(क) धंधाकीय इकाई की मिल्कत पर(ड) धंधाकीय इकाई का भविष्य में बना रहे ऐसे लाभ पर |
|
Answer» सही विकल्प है (ड) धंधाकीय इकाई का भविष्य में बना रहे ऐसे लाभ पर |
|
| 27. |
ख्याति यह किस प्रकार की संपत्ति है ?(अ) दृश्य संपत्ति(ब) अदृश्य संपत्ति(क) चालु संपत्ति(ड) अवास्तविक संपत्ति |
|
Answer» सही विकल्प है (ब) अदृश्य संपत्ति |
|
| 28. |
भारित औसत लाभ अर्थात् क्या ? |
|
Answer» अलग-अलग वर्षों के लाभ को भार देकर औसत ज्ञात की जाये उसे भारित औसत लाभ के रूप में जाना जाता है । |
|
| 29. |
ख्याति आर्थिक चिट्ठे में किस शीर्षक के तहत् दर्शायी जाती है ? |
|
Answer» ख्याति आर्थिक चिट्ठे के संपत्ति-लेना पक्ष में बिन चालू संपत्ति के स्थायी संपत्ति शीर्षक में अदृश्य संपत्ति के रूप में दर्शायी जाती है। |
|
| 30. |
ख्याति यह …………………… का मौद्रिक मूल्य है ।(अ) विनियोग(ब) धंधाकीय इकाई की प्रतिष्ठा(क) स्थायी संपत्तियाँ(ड) स्पर्धा |
|
Answer» सही विकल्प है (ब) धंधाकीय इकाई की प्रतिष्ठा |
|
| 31. |
ख्याति अर्थात् क्या ? |
|
Answer» ख्याति (पघड़ी) (Goodwill) का अर्थ : जो पेढ़ी अपनी प्रतिष्ठा, खास प्रकार के संबंध या स्थिर ग्राहक वर्ग और अन्य कारणों से सामान्य पेढ़ीयों से अधिक लाभ कमाने की क्षमता रखती हो ऐसी पेढ़ी के पास “ख्याति” है ऐसा कहा जाता है । ख्याती व्यवसाय की प्रतिष्ठा का मूल्य दर्शानेवाली अदृश्य मिलकत है । कई पेढ़ीयाँ बाजार में इतनी प्रतिष्ठा, नाम या ग्राहकों का विश्वास प्राप्त कर लेती है कि जिससे ग्राहक बार-बार उसी पेढ़ी पर माल खरीदने जाते है, जिससे इन पेढ़ीयाँ को बाजार की अन्य पेढ़ीयाँ से अधिक लाभ कमाने का अवसर मिलता है । पेढ़ी की बाजार में प्रतिष्ठा या विश्वसनीयता जितनी ज्यादा उतनी ही उसकी ख्याति का मूल्य अधिक होता है। लोर्ड एल्डन ने कहा है कि, “ख्याति यह कुछ नहीं परंतु पुराने ग्राहक पुरानी जगह (पुरानी पेढ़ी से) पर स्थिर रहेगे ऐसी संभावना है।” |
|
| 32. |
ख्याति यह किस प्रकार की संपत्ति है ? |
|
Answer» ख्याति पर धंधे की प्रतिष्ठा का मूल्य दर्शानेवाली अदृश्य संपत्ति है । |
|
| 33. |
ख्याति का पुनः मूल्यांकन अर्थात् क्या ? |
|
Answer» ख्याति का पुनः मूल्यांकन अर्थात् जब धंधाकीय इकाई का विक्रय किया जाये और उसका समावेश कंपनी स्वरुप में किया जाये तब किया जानेवाला पेढी का मूल्यांकन वह ख्याति के पुनः मूल्यांकन के रूप में जाना जाता है । |
|
| 34. |
घिसाई का अर्थ देकर उसके लक्षण बताइए । |
|
Answer» घिसाई का अर्थ : किसी भी कारणसर संपत्ति की कार्यक्षमता में लगातार कमी होने से संपत्ति के उपयोगी मूल्य (Useful value) में होनेवाली क्रमशः कमी घिसाई के रूप में जानी जाती है । संपत्ति की लागत किंमत में से उसके उपयोगी आयुष्य के दरम्यान अपलिखित की जानेवाली राशि घिसाई के रूप में जानी जाती है । घिसाई का लक्षण (Characteristics of Depreciation) : (1) स्थिर संपत्ति : घिसाई यह व्यवसाय का स्थिर दृश्य संपत्तियों पर गिना जाने से ऐसी संपत्तियाँ घिसाईपात्र संपत्तियाँ भी कहलाती है। इसके अलावा अदृश्य संपत्तियाँ । (2) उपयोगी मूल्य : घिसाई यह संपत्ति की उपयोगिता मूल्य में क्रमश: और लगातार होनेवाली कमी को सूचित करता है । (3) समय : घिसाई यह समय से जुड़ा खर्च है । तय किये गये समय के अनुसार घिसाई की गणना की जाती है । (4) राजस्व खर्च : घिसाई को बिनरोकड़ राजस्व खर्च के रूप में उसकी गणना करके राशि को लाभ-हानि खाते उधार किया जाता है । (5) अपलिखित राशि : घिसाई यह राजस्व खर्च होने के बावजूद वेतन और किराये की तरह नकद में चुकाया जानेवाला खर्च नहीं है । (6) संपत्ति का उपयोग : घिसाई यह समय के साथ-साथ संपत्ति की उपयोगिता पर भी आधार रखती है । संपत्ति का उपयोग जितना अधिक उतनी ही अधिक घिसाई भी गिनी जायेगी । (7) हिसाबी वर्ष के अंत में : घिसाई को प्रत्येक हिसाबी वर्ष के अंत में स्थिर संपत्ति की किंमत में से उसे अपलिखित किया जाता है और संपत्ति की अगले वर्ष आगे ले जानेवाली किंमत भी तय की जाती है । (8) प्रावधान : घिसाई की गणना यह एक प्रकार का प्रावधान है । |
|
| 35. |
घिसाई की गणना किस-किस उद्देश्य से की जाती है ? |
|
Answer» घिसाई के उद्देश्य (आवश्यकता) (Necessity (Objectives) of Provision for Depreciation) : घिसाई यह व्यावसायिक विभिन्न प्रकार के खर्चों में से एक अलग प्रकार का राजस्व खर्च गिना जाता है । यह अन्य खर्च किराया, वेतन, मजदूरी वगैरह खर्च की तरह वास्तव में नकद चुकाया खर्च नहीं है । निम्न दर्शायी गयी जानकारियाँ घिसाई गिनने की आवश्यकता का उद्देश्य स्पष्ट करती है । (1) धंधे के खर्च के रूप में गिनना : व्यवसाय के अन्य राजस्व खर्च की तरह घिसाई भी समय आधारित राजस्व खर्च के रूप में गिना जाता है । इसे रोकड़ में गिना नहीं जाता । घिसाई यह अग्रीम चुकाया खर्च होने की वजह से प्रमाणसर राशि प्रत्येक हिसाबी वर्ष के अंत में घिसाई के रूप में अपलिखित की जाती है । (2) धंधे का सही और योग्य लाभ-हानि जानने के लिये : घिसाई की राशि को लाभ-हानि खाते के उधार पक्ष में दर्शाकर धंधे का योग्य और सही लाभ-हानि जाना जा सकता है । प्रत्येक धंधे में लाभ कमाने के लिये संपत्ति का योगदान रहा हुआ है । इस संपत्ति की उपयोगिता के कारण होनेवाली घिसाई अगर लाभहानि खाते में दर्शाया न जाये तो वह धंधा सही और योग्य स्थिति नहीं दर्शायेगा । (3) धंधे की सही और योग्य आर्थिक परिस्थिति जानने के लिये : प्रत्येक आर्थिक चिट्ठा अपने धंधे की सही आर्थिक परिस्थिति दर्शाता है । आर्थिक चिट्ठा में संपत्ति की घिसाई घटाने के बाद की किंमत अगर दर्शायी जाये तब वह व्यवसाय की सही परिस्थिति प्रस्तुत करता है । जिसके आधार पर व्यवसाय की सही और योग्य स्थिति जानी जा सकती है । (4) उत्पादन की सही लागत तय करना : उत्पादित किये जानेवाले माल या सेवा की लागत किंमत तय करते समय उत्पादन को असर करनेवाले अथवा उत्पादन से जुड़े हुए तमाम खर्चों को ध्यान में लेना चाहिए । घिसाई की गणना वह भी उत्पादन से जुड़ा खर्च होने से उसे अगर ध्यान में नहीं लिया जायेगा तो उत्पादित वस्तु की सही लागत तय नहीं की जा सकती । (5) वस्तु या सेवा की सही बिक्री किंमत तय करना : किसी भी वस्तु या सेवा की बिक्री किंमत तय करने के लिये कुल लागत तय – करना आवश्यक है, जिसमें घिसाई का भी समावेश करना अनिवार्य है । अन्य राजस्व खर्च की तरह घिसाई को भी खर्च के रूप में साथ में लेने से सही बिक्री किंमत तय करने का कार्य सरल बनता है । (6) पूँजी बनाये रखना : धंधे में लगायी गयी पूँजी में से ज्यादातर पूँजी स्थिर संपत्तियों में लगी रहती है । ऐसी संपत्तियाँ उसके उपयोगी आयुष्य के दरम्यान बिनउपयोगी बनती है । उनके स्थान पर नयी संपत्ति खरीदने या बसाने के लिये पूँजी की आवश्यकता रहती है । ऐसी पूँजी व्यवसाय में बनाये रखने के उद्देश्य से धंधे में संपत्ति पर घिसाई का प्रावधान करना आवश्यक बन जाता है । (7) कानूनी बातों का पालन करने के लिए : कंपनी कानून में कहे गये अनुसार घिसाई गिनना अनिवार्य है । कंपनी कानून के अनुसार कोई भी कंपनी लाभ में से घिसाई गिनने के पहले अपना डिविडेन्ड नहीं बाँट सकती । व्यक्तिगत मालिकी या साझेदारी पेढ़ी में घिसाई गिनना अनिवार्य न होने के बावजूद सामान्य सिद्धांत के अनुसार प्रत्येक घिसाईपात्र संपत्ति पर घिसाई की गणना अनिवार्य है । |
|
| 36. |
किस पद्धति में संपत्ति की वार्षिक घिसाई की राशि प्रति वर्ष घटती जाती है ? |
|
Answer» घटती शेष की पद्धति में संपत्ति की वार्षिक घिसाई की राशि प्रति वर्ष घटती जाती है । |
|
| 37. |
आर्थिक चिट्टा में घिसाई कहाँ और किस प्रकार दर्शाई जाती है ? |
|
Answer» आर्थिक चिट्ठा में घिसाई संपत्ति-लेना के पक्ष में संबंधित संपत्ति की लागत किंमत में से घटाकर बताई जाती है । |
|
| 38. |
ख्याति का अर्थ देकर उसके मूल्यांकन को असर करनेवाले तत्त्वों को समझाइए । |
|
Answer» ख्याति का अर्थ : सामान्यतः ख्याति यह धंधे की बाजार में प्रतिष्ठा का मूल्य दर्शानेवाली अदृश्य संपत्ति है। अर्थात् धंधे का अंदाजित लाभ की अपेक्षा अधिक लाभ कमाने की धंधे की प्रतिष्ठा का मूल्य ख्याति के रूप में जाना जाता है । वर्षों पहले जिस धंधे की स्थापना की गई हो उसे धंधे में समय बीतने के साथ बाजार में उसके नाम प्रतिष्ठा, उसके अच्छे संबंधो, एवं संपर्क से जो अधिक लाभ प्राप्त हो वह ख्याति के रूप में जाना जाता है । ‘लोर्ड एल्डन’ने कहा है कि, “ख्याति यह कुछ और नहीं, परंतु पुराने ग्राहक पुराने स्थल (पुरानी पेढी) से जुड़े रहें ऐसी संभावना भर है । ख्याति के मूल्यांकन को असर करनेवाले तत्त्व (Factors Affecting Valuation of Goodwill). किसी भी पेढी के ख्याति का आधार उसके द्वारा कमाये जानेवाले लाभ पर है । यदि पेढी ज्यादा लाभ कमाती है तो उसकी ख्याति भी ज्यादा होगी साथ ही साथ वह भविष्य में भी वह लाभ बरकरार रखेगी इस पर से भी आधार रहता है । इस प्रकार ख्याति के मूल्यांकन को ऐसे अलग अलग तत्त्व असर करते है जो निम्न है : (1) धंधे का स्वरूप : कितने ही धंधे में स्थान बहुत ही महत्त्व का तत्त्व गिना जाता है । कितनी ही बार धंधे का स्थान कहाँ पर आया हुआ है उस पर उसका लाभ कमाने का आधार रहता है । जिस वस्तु का ग्राहक वर्ग अधिक हो वह वर्ग जिस स्थान पर अधिक आताजाता हो उस स्थान पर उस धंधे को कमाई अधिक होती है । इस प्रकार के व्यवसायिक स्थानों की ख्याति अन्य स्थानों से अधिक होती है। (2) धंधे का स्वरूप : सामान्यतः जिस पेढ़ी का अंदाजित लाभ की अपेक्षा अधिक लाभ करने की शक्ति अधिकतम मूल्यवृद्धिवाली वस्तुओं के उत्पादन के कारण हो एवं अन्य किसी भी कारण से अधिक लाभ पेढी के द्वारा प्राप्त किया जा रहा हो वहाँ पर ख्याति रही हुई होती है। (3) धंधे का समय (वर्ष) : धंधा कितने समय से कार्यरत् है उस पर ख्याति का आधार रहा हुआ होता है। सामान्यतः धंधा जितना अधिक पुराना होगा, बाजार में उसकी प्रतिष्ठा उतनी ही अधिक होगी । उसके ग्राहक वर्ग पुराने होगें एवं धंधे का मालिक स्वयं उनसे परिचित होने से उनके आपसी संबंध गहरे होगें । जिसका लाभ माल की विक्रय वृद्धि पर होने से ऐसे व्यवसाय में ख्याति अधिक होने की संभावना बनी रहेगी। (4) बाजार की परिस्थिति : कितने ही धंधे की ख्याति उसकी बाजार की परिस्थिति पर निर्भर करती है । जिस धंधे का बाजार में एकाधिकार रहा हुआ हो अथवा स्पर्धा का प्रमाण मर्यादित हो ऐसे व्यवसाय अधिक लाभ कमा सकते है । ऐसे सभी व्यवसाय में ख्याति का मूल्य अधिक रहता है। (5) संचालकों की कार्यदक्षता : धंधे का संचालक वर्ग जितना अधिक कार्यक्षम होगा, उसका लाभ उसकी उत्पादकता वृद्धि पर होगी एवं वस्तु की लागत किंमत में कमी होगी । जिसके कारण धंधे को होनेवाला लाभ बढेगा, जो ख्याति के मूल्यवृद्धि का कारण बनेगा । (6) अन्य विशेष लाभ (तत्त्व) : कितने ही धंधे पेटन्ट के कारण भी अधिक लाभ प्राप्त कर सकते है। कितने ही धंधे उसके ट्रेडमार्क या ट्रेडनाम के कारण अधिक लाभ प्राप्त कर सकते है। ऐसे सभी धंधो की ख्याति अधिक होती है । जब पेढी के पास कोई खास प्रकार का लाभ हो जिससे उसकी लाभ करने की कार्यदक्षता में वृद्धि हो तब ख्याति अस्तित्व में है ऐसा कहा जायेगा । उपरोक्त दर्शाये गये सभी तत्त्वों के अलावा पेढी के द्वारा माल के विक्रय के बाद दी जानेवाली उच्चस्तरीय सेवा, पेढी को मजदूर एवं कर्मचारियों के साथ के आपसी संबंध एवं पेढी की अपनी खुद की भूतकाल की सिद्धियाँ भी लाभ में वृद्धि का कारण बनती है जिससे ख्याति का अस्तित्व उत्पन्न होता है। |
|
| 39. |
ख्याति का स्वरूप समझाइए । |
|
Answer» सामान्यतः ख्याति के स्वरूप का आधार धंधे के विक्रय पर आधारित रहा हुआ होता है। अगर धंधे का कंपनी स्वरूप में संयोजन (मिलान) किया जाये तब ख्याति के मूल्यांकन की आवश्यकता उत्पन्न होती है। जब निजी धंधे का अन्य पेढी या कंपनी में संयोजन किया जाये तब ख्याति की किंमत उत्पन्न होगी ही ऐसा नहीं होता । प्रत्येक पेढी की लाभ कमाने की क्षमता अलग-अलग हो सकती है। साझेदारी पेढी के स्वरूप में-
|
|
| 40. |
घिसाई का प्रावधान खाता उपस्थित करने की पद्धति में घिसाई का लेखा करते समय कौन-सा खाता जमा किया जाता है ? |
|
Answer» घिसाई का प्रावधान खाता उपस्थित करने की पद्धति में घिसाई का लेखा करते समय घिसाई की राशि घिसाई खाते उधार करके, घिसाई के प्रावधान खाते जमा किया जाता है । |
|
| 41. |
समान हप्ता (किस्त) की पद्धति से वार्षिक घिसाई का दर ज्ञात करने का सूत्र लिखिए । |
|
Answer» (i) समान किस्त की पद्धति से वार्षिक घिसाई का दर ज्ञात करने का सूत्र : D = \(\frac{C−S}N\) D = Depreciation = वार्षिक घिसाई (ii) अगर घिसाई का दर दिया गया हो तब : D = \(\frac{C×R}{100}\) D = Depereciation = वार्षिक घिसाई |
|
| 42. |
हिरल लिमिटेड ने खुद के यंत्रों पर 5% की दर से समान किस्त (हप्ता) की पद्धति से घिसाई गिना है । अगर यंत्रों की वार्षिक घिसाई की राशि रु. 6,000 हो तब यंत्र की लागत किंमत ज्ञात कीजिए । |
|
Answer» माना कि यंत्र की लागत किंमत x है । वार्षिक घिसाई D = C × \(\frac{R}{100}\) ∴ 6,000 = x × \(\frac{5}{100}\) ∴ 6000 × \(\frac{100}5\)= x ∴ x = रु. 1,20,000 ∴ यंत्र की लागत किंमत = 1,20,000 रु. |
|
| 43. |
हिसाब लिखने की दृष्टि से संपत्ति पर घिसाई लिखने की मुख्य पद्धतियाँ बताइए । |
|
Answer» हिसाब लिखने की दृष्टि से संपत्ति पर घिसाई लिखने की मुख्य दो पद्धतियाँ है :
|
|
| 44. |
यंत्र बिक्री पर हुआ लाभ किस खाते किस पक्ष में लिखा जाता है ? |
|
Answer» यंत्र बिक्री पर हुआ लाभ यंत्र खाते के उधार पक्ष में हुए लाभ की राशि से दर्शाया जाता है । |
|
| 45. |
घिसाई धंधे की किस संपत्ति पर गिना जाता है ? |
|
Answer» घिसाई धंधे की दृश्य संपत्ति या अदृश्य संपत्ति पर गिना जाता हैं । |
|
| 46. |
घिसाई का अर्थ समझाइए । |
|
Answer» घिसाई : सामान्य अर्थ में संपत्ति की उपयोगिता मूल्य में क्रमशः होनेवाली कमी घिसाई कहलाती है । अमुक वर्ष के अंत में संपत्ति की उपयोगिता निश्चित किये गये उद्देश्य के लिये बिनउपयोगी बन जाती है । |
|
| 47. |
घिसाईपात्र संपत्ति अर्थात् क्या ? |
|
Answer» धंधे की स्थिर दृश्य संपत्ति पर जब घिसाई गिनी जाये तब ऐसी संपत्तियाँ घिसाईपात्र संपत्तियाँ कहलाती है । जैसे : मकान, यंत्र. फर्निचर, वाहन वगैरह । |
|
| 48. |
यंत्र बिक्री का नुकसान कहाँ लिखा जाता है ?(अ) यंत्र खाते के जमा पक्ष में(ब) यंत्र खाते के उधार पक्ष में(क) घिसाई खाते के जमा पक्ष में(ड) घिसाई खाते के उधार पक्ष में |
|
Answer» सही विकल्प है (अ) यंत्र खाते के जमा पक्ष में |
|
| 49. |
देशीनामा में सरवैया किस प्रकार तैयार किया जाता है ? |
|
Answer» वर्ष के अंत में धंधे की आर्थिक स्थिति दर्शाने के लिए जो चिट्ठा तैयार किया जाता है उसे आर्थिक चिट्ठा या सरवैया कहते हैं । समायोजनों की असर करने के बाद पक्के खाते जैसे कि – व्यक्तियों के खाते या संपत्तियों के खाते इस चिट्ठा में दर्शाये जाते है । सरवैया का स्वरूप उतारा जैसा ही होता है । प्रथम चार सल जमा तथा शेष चार सल उधार माने जाते हैं । प्रथम सल में रकम तथा दूसरे सल (खानों) में खाते का नाम लिखा जाता है उसके नीचे खा.पृ. (खाता पृष्ठ संख्या) लिखी जाती है । सरवैया का जमा तरफ का योग कर उधार तरफ श्री पुरांत बाकी दर्शायी जाती है जो उतारो के जितनी ही होती है । इस प्रकार सरवैया यह वर्ष के अंत में सभी समायोजनों के बाद हिसाबों की आर्थिक स्थिति दर्शानेवाला चिट्ठा है । |
|
| 50. |
उतारा अर्थात् क्या ? उसे किस प्रकार तैयार किया जाता है ? |
|
Answer» देशीनामा में वार्षिक हिसाब तैयार करने से पूर्व हिसाब में कोई गणितिय भूल न रह जाय इसलिए एक सकल तलपट बनाई जाती है जिसे उतारा के नाम से जाना जाता है । जिस प्रकार दिनोंधी नामा पद्धति में कच्ची तलपट या सकल तलपट बनाई जाती है उसी प्रकार देशीनामा में उतारो तैयार किया जाता है । पक्के खातों की बाकियाँ तथा कच्चे खातों के जमा या उधार बाजुओं के योग पर से उतारो तैयार किया जाता है । सामान्यतः उतारो खाताबही के अंतिम पन्ने पर बताया जाता है जिसमें जमा तथा उधार बाजुएँ होती हैं । जिन खातों की बाकियाँ जमा हो उसे जमा तथा उधार खातों की बाकियाँ उधार तरफ दर्शायी जाती है । उतारो के प्रथम सल में रकम तथा शेष सलों में विवरण दर्शाया जाता है । इस प्रकार सभी कच्चे और पक्के खातों की बाकियों को उतारों में दर्शाकर योग किया जाता है । उतारो के जमा तरफ का योग अधिक होगा जिसे उधार तरफ के योग में से घटाने पर जो शेष बचेगा वह अंतिम नकद शेष होगा जिसे श्री पुरांत बाकी से दर्शाया जायेगा । इस प्रकार उतारों का अंतिम नकद शेष, रोजमेल या बैठोमेल के नकद शेष के समान हो तो हिसाब आंकड़ाकीय दृष्टि से योग्य है ऐसा माना जाता है । इस प्रकार उतारो यह सभी खातों की बाकियों को दर्शानेवाला हिसाबी भूलों को ज्ञात करने के लिए बनाया गया पत्रक है । |
|