This section includes 7 InterviewSolutions, each offering curated multiple-choice questions to sharpen your Current Affairs knowledge and support exam preparation. Choose a topic below to get started.
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‘मेरा नया बचपन’ कविता के कला पक्ष पर प्रकाश डालिए। |
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Answer» ‘मेरा नया बचपन’ एक भाव-प्रधान रचना है। कवयित्री ने इसे सजाने-सँवारने का प्रयास नहीं किया है। फिर भी कविता का कला पक्ष भावों के प्रकाशन में सहायक बना है। कविता की सादगी और प्रवाह से युक्त भाषा इसकी उल्लेखनीय विशेषता है। शब्दावली सरल होते हुए भी भाषा लक्षणा शब्द-शक्ति से बड़ी प्रभावशाली बन गई है। ‘‘लुटी हुई ………………..द्वार पर खड़ी हुई।” पूरी रचना में वात्सल्य की सरसता साकार हो रही है। |
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छैल-छबीली सुभद्रा जी के मन में कौन-सी पहेली थी? ‘मेरा नया बचपन’ कविता के आधार पर लिखिए। |
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Answer» युवती हो जाने के अनुभव ने सुभद्रा जी के मन में कई प्रश्न जन्म दिए थे। वह सोचती थी कि इतने लोगों के बीच रहते हुए भी उन्हें एक अकेलेपन का सा अनुभव क्यों हो रहा था ? वह अपने मन की दुविधाएँ औरों से साझा करने में क्यों हिचक रही थी। इस पहेली का उन्हें कोई हल नहीं सूझ रहा था। |
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जूही किसके लिए नाच सकती थी? किसके लिए नहीं? |
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Answer» जूही स्वराज्य के लिए नाच सकती थी। जो लोग विलासिता में डूबे थे, उनके लिए नहीं। |
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जूही अपनी कला को किनके गले की फांसी नहीं : बना सकती? : |
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Answer» जूही अपनी कला को विलासिता में डूबे हुए लोगों के : गले की फांसी नहीं बना सकती। |
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जूही ने किसे दुत्कार दिया था? |
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Answer» तात्या राव साहब के सामने नाचने के लिए जूही को बुलाने आया था। तब खरी-खोटी सुनाकर जूही ने तात्या को दुत्कार दिया था। |
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सही शब्द चुनकर वाक्य पूर्ण कीजिए :वह मिल सकता है, केवल सेवा, तपस्या और ……………. से। (बलिदान/युद्ध)महासागर की डरावनी ………… थपेड़े मारने लगती हैं। (लहरें/हवाएँ)कौन कहता है कि ……………. में डूब गए हैं? (विलासिता/तपस्या)मैं ………………. के लिए नाच सकती हूँ। (विजय/स्वराज्य)हमारी …………… कलंकित न होने पाए। (श्रेष्ठता/वीरता) |
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Answer» 1. स्वराज्य मिल सकता है, केवल सेवा, तपस्या और बलिदान से। 2. महासागर की डरावनी लहरे थपेड़े मारने लगती हैं। 3. कौन कहता है कि हम विलासिता में डूब गए है? 4. मैं स्वराज्य के लिए नाच सकती हूँ। 5. हमारी वीरता कलंकित न होने पाए। |
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उदाहरण के अनुसार शब्द बनाए :राज्य – स्व+राज्य = स्वराज्यदेश – ………….भाव – ………….तंत्र – ………….जन – …………. |
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Answer» 1. देश – स्व + देश = स्वदेश 2. भाव – स्व + भाव = स्वभाव 3. तंत्र – स्व + तंत्र = स्वतंत्र 4. जन – स्व + जन = स्वजन |
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पेशवा की हार का समाचार पाकर रानी ने क्या कहा? |
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Answer» पेशवा की हार का समाचार पाकर रानी ने कहा, “यह अच्छा हुआ, अब पेशवा की आँखें खुलेंगी।” |
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जूही देश के लिए किसे ठुकरा सकती है? |
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Answer» जूही देश के लिए अपने प्रेमी तात्या साहब को भी ठुकरा सकती है। |
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स्वराज्य की नींव का अर्थ अपने शब्दों में बताइए । |
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Answer» स्वराज्य का नींव का अर्थ भारत को आज़ाद कराना है। उस समय भारत अँग्रेज़ों का गुलाम था। झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई ने प्रथम स्वतंत्रता संग्राम का नेतृत्व किया। अतः उन्होंने स्वराज्य प्राप्त करने के युद्ध की नींव रखी। स्वराज्य का मतलब है स्वयं द्वारा स्वयं के नियम बनाकर उसके अनुसार काम करना। |
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उदाहरण के अनुसार शब्द बनाए :सुन्दर – सुन्दरता – सौंदर्यशूर – शूरताधीर – धीरताउदार – उदारतास्थिर – स्थिरता |
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Answer» 1. शुर – शुरता – शौर्य 2. धीर – धीरता – धैर्य 3. उदार – उदारता- औदार्य 4. स्थिर – स्थिरता – स्थैर्य |
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रानी लक्ष्मीबाई की चिंता का कारण क्या था? |
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Answer» रानी लक्ष्मीबाई की चिंता का यह कारण था कि बहुत प्रयत्न करने के बाद भी स्वराज्य उनके हाथ में नहीं आ रहा था। |
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जूही सेनापति तात्या का पक्ष क्यों लेती है? |
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Answer» जूही सेनापति तात्या का पक्ष लेती है, क्योंकि वह उससे प्रेम करती है। |
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रानी लक्ष्मीबाई ने क्या प्रतिज्ञा की थी? |
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Answer» रानी लक्ष्मीबाई ने प्रतिज्ञा की थी कि “मैं अपनी झाँसी नहीं दूंगी।” मैं अकेली हूँ। लेकिन उससे क्या ? मैं अकेले ही झाँसी लेकर रहूँगी। |
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तोपों की आवाज़ सुनकर रानी ने तात्या से क्या व्यंग्य किया? |
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Answer» तोपों की आवाज सुनकर रानी ने तात्या को व्यंग्य किया कि शायद अहाभोज के उपलक्ष्य में ये तोपें चल रही है। श्रीखंड और लडु के लिए घी-शक्कर की कमी तो नहीं पड़ी। |
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लक्ष्मीबाई की दृष्टि में मातृभूमि का क्या महत्व है? |
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Answer» लक्ष्मीबाई मातृभूमि को माता के समान मानती हैं। वे मातृभूमि को अंग्रेजों के हाथों अपवित्र नहीं होने देना चाहतीं। वे भारत माता को गुलाम होते नहीं देख सकती। वे यहाँ के समाज में फैले भेदभाव को भी दूर करना चाहती हैं। इसी कारण वे मातृभूमि की स्वतंत्रता के लिए लड़ते हुए अपने प्राण त्याग दिये। |
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लक्ष्मीबाई को कौन सी चिंता सताती थी? |
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Answer» लक्ष्मीबाई को चिंता सता रही थी कि कहीं उनकी वीरता कलंकित न होने पाये। उन्हें पता था कि वह युद्ध में जीत नहीं पाएँगी। लेकिन वह मरकर भी स्वराज्य की नींव का पत्थर बनना चाहती थीं। लेकिन उनके साथी रावसाहब इत्यादि विलासिता में डूबे थे। रावसाहब के सेनापति तात्या भी उनका साथ दे रहे थे। इस कारण रानी को चिंता थी कि उनकी वीरता कहीं कलंकित न होने पाये। |
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तात्या रानी लक्ष्मीबाई के सामने लज्जित क्यों हो उठे? |
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Answer» रानी लक्ष्मीबाई ने तात्या को ‘सरदार’ कहकर संबोधित किया। रानी के मुंह से अपने लिए यह संबोधन सुनकर तात्या लज्जित हो उठे। |
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बाबा गंगादास ने रानी लक्ष्मीबाई से क्या कहा था? |
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Answer» बाबा गंगादास ने रानी लक्ष्मीबाई से कहा था कि समाज में छूआछूत, ऊँच-नीच और विलास प्रियता के होते हुए हमें स्वराज्य नहीं मिल सकता। स्वराज्य केवल सेवा, तपस्या और बलिदान से ही मिल सकता है। |
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बाबा गंगादास ने रानी लक्ष्मीबाई से क्या कहा था?(या)बाबा गंगादास ने क्या कहा था? |
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Answer» बाबा गंगादास ने रानी लक्ष्मीबाई से कहा था कि “जब तक हमारे समाज में छुआछूत और ऊँच – नीच का भेद नहीं मिट जाता, जब तक हम विलासप्रियता को छोड़कर जन सेवक नहीं बन जाते, तब तक स्वराज्य नहीं मिल सकता। वह मिल सकता है केवल सेवा, तपस्या और बलिदान से। |
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जूही तात्या का पक्ष क्यों लेती है? |
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Answer» जूही तात्या का पक्ष इसलिए लेती है कि वह उसे अपना स्वामी मानती है। उससे वह प्यार करती है। |
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तात्या कौन थे, उनसे लक्ष्मीबाई क्यों नाराज़ थीं? |
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Answer» तात्या लक्ष्मीबाई की सेना के सेनापति थे। लेकिन वे रावसाहब को अपना स्वामी मानते थे। राव साहब युद्ध की घड़ी में भी विलासिता में डूबे थे। तात्या भी उनका साथ दे रहे थे। इसलिए लक्ष्मीबाई तात्या से नाराज थीं। |
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रानी लक्ष्मीबाई निराश क्यों हो गई? |
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Answer» रानी लक्ष्मीबाई के स्वराज्य पाने के प्रयत्न विफल हो रहे : थे। झांसी उनके हाथ से निकल गई थी। उनके पास शक्ति थी, फिर भी वे दुर्बल थीं। तात्या जैसे कुशल सेनापति के होते हुए भी सेना में अनुशासन नहीं था। रानी के सहयोगी विलासिता में डूबे हुए थे। वे युद्ध में साहस और शौर्य दिखाने के बदले ब्रह्मभोज के आयोजन में पड़े थे। ग्वालियर जैसा किला हाथ में होकर भी वे कुछ नहीं कर पा रही थीं। शत्रु को अपना शिकार बनाने के बदले वे अविश्वासों के शिकार बन रही थीं। अपने पक्ष की ऐसी स्थिति देखकर रानी लक्ष्मीबाई निराश हो गई। |
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बाबा गंगादास कौन थे ? उन्होंने लक्ष्मीबाई से क्या कहा था? |
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Answer» बाबा गंगादास रानी लक्ष्मीबाई के गुरु थे। उन्होंने उनसे कहा था कि जब तक हमारे समाज में छुआछूत और ऊँच-नीच का भेद नहीं मिट जाता, जब तक हम विलासप्रियता को छोड़कर जनसेवक नहीं बन जाते, तब तक स्वराज्य नहीं मिल सकता। वह मिल सकता है केवल सेवा, तपस्या और बलिदान से। |
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तात्या कौन थे? |
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Answer» तात्या बाँदा के नवाब सरदार तथा सेनापति थे। |
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यह एकांकी सुनने के बाद उस समय की किन परिस्थितियों का पता चलता है? |
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Answer» यह एकांकी सुनने के बाद हमें उस समय की इन परिस्थितियों का पता चलता हैं –
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मार्ग में हिमालय अड़ने, डरावनी लहरों के थपेड़े मारने, नाविकों के सो जाने से क्या अभिप्राय है? |
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Answer» रानी लक्ष्मीबाई को अपनी प्यारी झाँसी शत्रुओं के हाथ में चले जाने का दुःख है। स्वराज्य की मंजिल हर बार पास आकर दूर चली जाती है। रानी स्वराज्य को पास आते हुए देखती हैं, पर तभी हिमालय जैसी बाधाएँ उनके मार्ग में आ जाती हैं। जब वे इन बाधाओं को पार करती हैं, तो मुसीबतों के महासागर सामने उमड जाते है। जब वे उन्हें पार करना चाहती हैं, तो देखती हैं कि नाविक सो रहे हैं। ये नाविक है विलास में डूबे हुए उनके साथी सेनापति तात्या, राव साहब, बाँदा के नवाब आदि। |
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कवयित्री बचपन की कौन सी बातें नहीं भूल पाती है? |
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Answer» कवयित्री बचपन की निश्चिन्तता, निडरता, स्वच्छंदता से घूमना-फिरना आदि बातें नहीं भूल पाती है। |
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बिटिया कवयित्री को खिलाने आई थी-(क) रोटी(ख) मिठाई(ग) बिस्किट(घ) मिट्टी |
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Answer» बिटिया कवयित्री को खिलाने आई थी मिट्टी |
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‘स्वराज्य की नींव’ एकांकी को अपने शब्दों में कहानी के रूप में लिखिए।(या)वीरांगना लक्ष्मीबाई की देशभक्ति का एकांकी के आधार पर परिचय दीजिए। |
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Answer» पाठ का नाम : स्वराज्य की नींव प्राचीन जमाने की बात है। झाँसी नामक एक राज्य था। महारानी लक्ष्मीबाई उसकी पालिका थी। वह अबला नहीं सबला है। वह पुरुषों के जैसे ही युद्ध करती थी। वह “मर्दानी” थी। एक बार की बात है। उसके और उसके अगल – बगल के राज्यों पर अंग्रेजों का आक्रमण होने लगा। अंग्रेज़ों ने राज्य संक्रमण सिद्धांत को अपनाकर कई राज्यों को हस्तगत करने लगे। तो झाँसी की रानी वीरांगना लक्ष्मीबाई नारी सेना को तैयार करके इसके विरुद्ध डटकर रही। झाँसी, कलापी और ग्वालियर आदि पर गोरों का आक्रमण हो रहा था। इसलिए अंग्रेजों के विरुद्ध झाँसी लक्ष्मीबाई युद्ध भूमि में कूद पड़ी। लक्ष्मीबाई प्रतिज्ञा करती है कि झाँसी को कभी नहीं दूंगी। उसकी रक्षा करूँगी। झाँसी सेवा, तपस्या और बलिदान से स्वराज्य तथा स्वतंत्रता पाना चाहती थी। वह जूही, मुंदर, तात्या आदि वीरों के सहारे स्वराज्य प्राप्ति के लिए भूमि तैयार करने नींव का पत्थर बनाती रही। वह अपनी सेना में अनुशासन स्थापित करती है। विलासिता उसके लिए असह्य था। वह समाज में छुआछूत, ऊँच – नीच आदि भावनाओं को दूर करना चाहती थी। झाँसी लक्ष्मीबाई नूपुरों के कार के स्थान पर तोपों का गर्जन सुनना चाहती थी। वह युद्ध भूमि में स्वराज्य प्राप्ति नहीं कर सकेगी तो वहीं मर जाना चाहती थी। वह सदा युद्ध के लिए ललकारती थी। विशेषता : देश के लिए मर मिटने की प्रेरणा मिलती है। |
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काव्यांशों की सप्रसंग व्याख्याएँ-दिल में एक चुभन सी थी, यह दुनिया अलबेली थी।मन में एक पहेली थी, मैं सबके बीच अकेली थी।मिला, खोजती थी जिसको, हे बचपन! ठगा दिया तूने।अरे! जवानी के फंदे में, मुझको हँसा दिया तूने॥माना, मैंने, युवाकाल का जीवन खूब निराला है।आकांक्षा, पुरुषार्थ, ज्ञान का उदय मोहने वाला है। |
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Answer» कठिन शब्दार्थ-चुभन-सी = मधुर कसक। अलबेली = अनौखी, सजी-धजी। पहेली = प्रश्न, उत्सुकता। अकेली = मन की भावना व्यक्त न कर पा रही। ठगा दिया = जवानी को सौंप दिया। जवानी का फंदा = युवावस्था की मुधर अनुभूतियाँ। आकांक्षा = इच्छा। पुरुषार्थ = पराक्रम, सामर्थ्य। उदय = उत्पन्न होना॥ संदर्भ तथा प्रसंग-प्रस्तुत काव्यांश हमारी पाठ्यपुस्तक में संकलित कवियत्री सुभ्रद्रा कुमारी चौहान की कविता ‘मेरा नय बचपन’ से लिया गया है। कवियत्री ने रस अंश में युवावस्था आने पर, मन में उठने वाली मधुर भावनाओं के प्रकट किया है। व्याख्या-कवयित्री कहती है कि जवानी में प्रवेश करते ही उसकी मनोभावनाएँ बदलने लगीं। उसके मन में एक मधुर कसक सी उठने लगी। जवानी की वह दुनिया बड़ी अनौखी और आकर्षक थी। उसके मन में जीवन को लेकर अनेक प्रश्न और उत्सुकताएँ जागने लगीं। उसे लगने लगा जैसे इतने प्रियजनों और परिजनों के बीच रहते हुए भी उसे ऐसा कोई विश्वस्त साथी नहीं मिल रहा था जिससे वह अपनी मनोभावनाओं को साझा कर सके। कवयित्री कहती है वह मन ही मन जिससे मिलने को उत्सुक थी वह यौवन उसे मिला तो सही पर उसे लगा कि बचपन ने उससे छल किया था। उसने उसे जवानी के मधुर जाल में उलझा दिया। यह ठीक है कि जवानी का समय बड़ा अनौखा होता है। इस आयु में व्यक्ति के मन में अनेक कामनाएँ जागा करती हैं। उसमें नई सामर्थ्य उत्पन्न होती है और ज्ञान में भी वृद्धि होती है। जवानी का यह समय सचमुच बड़ा मनमुग्धकारी होता है॥ विशेष- |
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विष्णु प्रभाकर की एकांकी का शीर्षक ‘स्वराज्य की नींव’ क्यों रखा गया होगा? |
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Answer» सन् सत्तावन के समय भारत देश पर अंग्रेज़ों का शासन रहा था। अंग्रेज़ लोग भारत के सभी प्रांतों पर आक्रमण कर रहे थे। लक्ष्मीबाई झांसी की रानी थी। अंग्रेज़ लोग झांसी को भी अपने वश करने युद्ध कर रहे थे। बाबा गंगादास, लक्ष्मीबाई से कहते हैं कि स्वराज्य प्राप्त करने के लिए सभी भारतवासी अपनी विलासिता को छोड़कर जन सेवक बनना है। स्वराज्य की प्राप्ति से उत्तम है स्वराज्य की स्थापना के लिए भूमि तैयार करना हर एक को स्वराज्य की नींव का पत्थर बनना है। इसका अर्थ है सब लोगों में स्वराज्य प्राप्ति की इच्छा होनी चाहिए। नींव के पत्थर बनने से कोई नहीं रोक सकते हैं। यह सब का अधिकार है। इसी आशय पर जोर देते इस एकांकी का शीर्षक ” स्वराज्य की नींव रखा होगा। |
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लक्ष्मीबाई की सहेलियाँ कौन थीं? उनके बारे में दो वाक्य लिखिए । |
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Answer» लक्ष्मीबाई की सहेलियाँ जूही और मुंदर थीं। वे भी उनके साथ युद्ध करने आई थीं। वे बहादुर थीं। वे रानी लक्ष्मीबाई का साहस बढ़ा रही थीं। जूही एक नृत्यांगना थी। वह तात्या से प्रेम करती थी। मुंदर एक वीरांगना थी। वह भी निडर होकर अंग्रेज़ों से लोहा लेने आई थी। |
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बाबा गंगादास ने किसे स्वराज्य-प्राप्ति से बढ़कर बताया था? |
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Answer» बाबा गंगादास ने बताया था कि स्वराज्य-प्राप्ति से बढ़कर है स्वराज्य की स्थापना के लिए भूमि तैयार करना। उन्होंने कहा था कि स्वराज्य की नींव का पत्थर बनकर ही स्वराज्य पाया जा सकता है। |
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स्वराज्य प्राप्ति से बढ़कर है स्वराज्य की स्थापना के लिए भूमि तैयार करना, स्वराज्य की नींव का पत्थर बनना। |
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Answer» इस वाक्य को झाँसी रानी लक्ष्मीबाई की कर्नल जूही लक्ष्मीबाई से कहती है। स्वराज्य प्राप्ति से बढ़कर है स्वराज्य की स्थापना के लिए भूमि तैयार करना, स्वराज्य की नींव का पत्थर बनना। इसका आशय यह है कि स्वराज्य के लिए सेना को तैयार करना, उन्हें प्रशिक्षण देना, तलवार, बंदूकें आदि शास्त्रों को इकट्ठा करना, अश्वबल को तैयार करना, स्वराज्य तथा स्वतंत्रता भावनाओं को जनता में व्याप्त करना आदि हैं। |
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रानी लक्ष्मीबाई देशभक्ति की एक अद्भुत मिसाल थीं- समजाइए। |
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Answer» रानी लक्ष्मीबाई हमारे इतिहास का एक अत्यंत तेजस्वी चरित्र हैं। स्वराज्य ही उनका अंतिम लक्ष्य है। इसके लिए वे बड़े से बड़ा बलिदान दे सकती हैं। स्वराज्य की नींव बनने में ही वे जीवन की सार्थकता मानती है। उन्हें राग-रंग से सख नफरत है। उन्हें यही चिता है कि स्वराज्य के लिए लड़ रहे उनके सैनिकों की वीरता कलंकित न होने पाए। सचमुच, रानी लक्ष्मीबाई देशभक्ति की एक अद्भुत मिसाल थीं। |
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प्रस्तुत एकांकी में से उन कथनों को छाँटिए जिससे पता चलता है कि युद्ध की छाया में भी राव साहब वैभव विलास में डूबे थे? |
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Answer» 1. जूही – जानती हूं महारानी! हम विलासिता में डूब गए हैं। 2. मुंदर – विलासिता में डूबे हैं राव साहब, बाँदा के नवाब, सेनापति तात्या। 3. लक्ष्मीबाई – जूही ने उन्हें रोका है मुंदर। मैं जानती हूँ। जब राव साहब के लिए बुलाने इसे आए थे तो इसने उनको बुरी तरह दुत्कार दिया था। |
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विलासिता में कौन डूबे हुए थे? |
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Answer» विलासिता में राव साहब, बाँदा के नवाब और तात्या डूबे हुए थे। युद्धभूमि की चिंता छोड़कर वे नृत्य और मदिरा का आनंद ले रहे थे। इसी कारण रानी लक्ष्मीबाई उनसे नाराज़ थीं। |
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काव्यांशों की सप्रसंग व्याख्याएँ-किन्तु यह झंझट भारी, युद्ध क्षेत्र संसार बना।चिंता के चक्कर में पड़ कर, जीवन भी है भार बना॥आजा बचपन एक बार फिर, दे दे अपनी निर्मल शांति।व्याकुल व्यथा मिटाने वाली, वह अपनी प्राकृत विश्रांति॥वह भोली सी मधुर सरलता, वह प्यारा जीवन निष्पाप।क्या आकर फिर मिटा सकेगा, तू मेरे मन का संताप। |
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Answer» कठिन शब्दार्थ-झंझट = व्यर्थ का बखेड़ा। भार = बोझ। निर्मल शांति = पूर्णत: बाधारहित शांति। प्राकृत = स्वाभाविक। विश्रांति = विश्राम। निष्पाप = पापरहित। संताप = कष्ट॥ संदर्भ तथा प्रसंग-प्रस्तुत काव्यांश हमारी पाठ्य पुस्तक में संकलित कवयित्री सुभद्रा कुमारी चौहान की कविता ‘मेरा नया बचपन’ से लिया गया है। इस अंश में कवयित्री ने जवानी को अनेक चुनौतियों से भरा एक झंझट बताया है। व्याख्या-कवयित्री ने माना है कि युवावस्था में नई-नई कामनाओं, पुरुषार्थ और ज्ञान की वृद्धि होती है किन्तु इस आयु में बड़े झंझट भी हैं। इस अवस्था में व्यक्ति के लिए सांसारिक जीवन, एक चुनौतियों और संघर्ष से पूर्ण रणभूमि सा नजर आता है। युवावस्था नई-नई जिम्मेदारियों के आने से मन चिंतित रहता है और कभी-कभी जीवन एक बोझ-सा प्रतीत होने लगता है। कवयित्री जवानी के झंझटों से विचलित होकर बचपन को पुकार उठती है। वह पुकार उठती है-ओ! मेरे प्यारे बचपन ! तू एक बार फिर से आजा। मेरे चिंताओं से बोझिल जीवन को फिर से अपनी निर्मल शांति से भर दे। फिर से मुझे जवानी के इस थका देने वाले मार्ग पर तू मुझे वह स्वाभाविक विश्राम प्रदान कर दे, जो मन की व्याकुलता भरी वेदना को शांत कर देता है। फिर से जीवन में उसी मधुरता भरी सरलता से भर दे। मेरे जीवन से सारे कलुषों को मिटा दे। बता, क्या तू फिर से मेरे जीवन में पधारकर, मेरे व्यथित और चिंतित मन का कष्ट दूर करेगा? विशेष- |
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मेरा नया बचपन’ कविता में माँ-बेटी के बीच क्या संवाद हुए? अपने शब्दों में लिखिए। |
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Answer» नन्ही-सी गुड़िया ने जब सुभद्रा जी को ‘ओ माँ !’ कहकर पुकारा तो कवयित्री के तन-मन वात्सल्य से भीग गए। देखा कि बिटिया मिट्टी का भोग लगाकर आई थी। वह मधुर प्रसाद उनके मुख की शोभा तो बढ़ा ही रहा था, वह अपनी माँ को भी वह स्वादिष्ट मिट्टी चखाने आई थी। बेटी ने कहा- माँ खाओ’ (माँ खाओ) तो माता ने कहा-‘तुम्हीं खाओ। माँ उस पुलकित अंगों वाली और आँखों से अचरज बरसाती आखों वाली बेटी में अपने बचपन को मूर्तिमान देखकर निहाल हो गई। उसका बचपन वापस आ गया था। |
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यदि सुभद्रा कुमारी चौहान के घर बेटी के बजाय बेटे ने जन्म लिया होता, तो भी क्या उन्हें उतना ही आनंद अनुभव होता? अपना मत लिखिए। |
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Answer» वैसे तो एक माँ को बेटी या बेटे में को भेद नहीं मानना चाहिए, किन्तु सच यह भी है कि बेटी के प्रति माँ के हृदय में एक विशिष्ट स्थान रहा करता है। बेटी हो बेटा, बच्चों की बाल-सुलभ अठखेलियाँ तो हर माँ को वात्सल्य भाव में भिगो देती हैं। किन्तु इस प्रसंग में थोड़ा-सा अंतर अवश्य है। क्योंकि सुभद्रा जी ने एक बेटी के रूप में ही बचपन बिताया था अत: बचपन को बेटी के रूप देखना उनके लिए अधिक स्वाभाविक था। बेटे के रूप में अपने बचपन को स्वीकार कर पाना शायद उनके लिए कुछ कठिन प्रतीत होता। |
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“स्वराज्य प्राप्ति से बढ़कर है स्वराज्य की स्थापना के लिए भूमि तैयार करना, स्वराज्य की नींव का पथ्थर बनना।” |
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Answer» इमारत बनाने के पहले उसके लिए उचित भूमि का चयन है किया जाता है। फिर मजबूत नींव रखी जाती है। नींव जितनी मजबूत होगी, इमारत भी उतनी ही मजबूत होगी। इसी तरह स्वराज्य पाने के लिए है देश और समाज में उसके लिए वातावरण तैयार करना जरूरी है। यह वातावरण जनमानस को जगाकर ही तैयार किया जा सकता है। शहीदों के बलिदान जनमानस को आंदोलित करते हैं और लोगों में स्वराज्य पाने की भावना तीव्र बनती है। |
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लक्ष्मीबाई और उनके साथी स्वराज्य की नींव क्यों बनना चाहती थीं? |
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Answer» लक्ष्मीबाई और उनकी साथी मातृभूमि को माता के समान मानती थीं। वे मातृभूमि को अंग्रेजों के हाथों अपवित्र नहीं होने देना चाहती थीं। वे भारत माता को गुलाम होते नहीं देख सकती थीं। उन्हें पता था कि उनकी मृत्यु के बाद भारत के लोग अंग्रेज़ों से लड़ने के लिए प्रेरित होंगे। वे जाग जाएँगे। इसलिए वे स्वराज्य की नींव बनना चाहती थीं। |
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‘स्वराज्य की नींव’ शीर्षक कहाँ तक सार्थक है? प्रस्तुत एकांकी के लिए कोई अन्य शीर्षक दीजिए। |
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Answer» सन् 1857 का सैनिक विद्रोह भारत का प्रथम स्वतंत्रता संग्राम माना जाता है। उसमें झांसी की रानी लक्ष्मीबाई, जूही, मुंदर, तात्या टोपे, रामचन्द्र तथा रघुनाथराव आदि ने अपनी अनोखी देशभक्ति का परिचय दिया था। ये सब अपना बलिदान देकर स्वराज्य की नींव के पत्थर बन गए। बाद में इस एकांकी के पात्रों के न्याय, तपस्या और बलिदान की नींव पर ही भारत की आजादी की इमारत खड़ी हुई। इसलिए इस एकांकी का शीर्षक “स्वराज्य की नींव’ बिलकुल सार्थक है। इसके अन्य शीर्षक ये हो सकते हैं – ‘स्वराज्य की आधारशिला’ और ‘आजादी के वे परवाने’। |
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बचपन में कवयित्री के रोने पर काम छोड़ कर कौन आयी?(अ) कवयित्री की सहेली(ब) कवयित्री की माँ(स) कवयित्री की दादी(द) कवयित्री की बहन |
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Answer» (ब) कवयित्री की माँ |
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कवियत्री को बार-बार क्या याद आती है?(अ) युवाकाल का जीवन(ब) बचपन की मुधर याद(स) जीवन खूब निराला है।(द) मन का संताप |
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Answer» (ब) बचपन की मुधर याद |
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सुभद्रा कुमारी जी के मन ने उन्हें किस फन्दे में फंसा दिया था? स्पष्ट कीजिए। |
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Answer» सुभद्रा जी अपने मन से बड़ी नाराज थीं क्योंकि उसने भोला– भाला मतवाला जीवन छीनकर उन्हें जवानी के माया-जाल में हँसा दिया था। नई सामर्थ्य का अनुभव हो रहा था, ज्ञान का भंडार भी बढ़ रही था, पर बचपन की स्वच्छंदती और मस्ती के स्थान पर अब जीवन संघर्षों से भरा एक रणक्षेत्र-सा बन गया था। यह सौदा बड़ा महँगा था। |
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“स्वराज्य की नींव एकाकी को दृष्टि में रखकर रानी लक्ष्मीबाई के त्याग और बलिदान पर प्रकाश डालिए। |
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Answer» रानी लक्ष्मीबाई कहती हैं कि जीत हो या हार, मुझे किसी बात की चिंता नहीं। चिंता केवल इस बात की है, हमारी वीरता कलंकित न होने पाये। हम सब मिलकर या तो स्वराज्य प्राप्त करके रहेंगे या स्वराज्य की नींव का पत्थर बनेंगे। इन पंक्तियों में रानी लक्ष्मीबाई की स्वतंत्रता की तड़प स्पष्ट दिखाई देती है। लेकिन साथ ही वह एक ऐसे स्वतंत्र भारत की कल्पना करती थीं जहाँ समाज में भेदभाव न हो। लक्ष्मीबाई मातृभूमि को माता के समान मानती हैं। वे मातृभूमि को अंग्रेजों के हाथों अपवित्र नहीं होने देना चाहतीं। वे भारत माता को गुलाम होते नहीं देख सकतीं। इसी कारण उन्हें मातृभूमि की स्वतंत्रता के लिए लड़ते हुए अपने प्राण त्याग दिये। |
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| 49. |
बड़ी होने पर कवयित्री के व्यवहार में क्या अंतर आया? |
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Answer» वह स्वयं ठगी हुई सी अनुभव करने लगी और दौड़कर द्वार पर जाने लगी। |
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| 50. |
कवयित्री के परिवार के सभी लोगों के चेहरों पर चमक कब आ जाती थी? |
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Answer» जब कवयित्री आँसूभरी आँखों के साथ भोलेपन से मुस्कराने लगती थी तो सभी के मुखों पर प्रसन्नता की चमक छा जाती थी। |
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