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1.

बिरादरी के एक संपन्न परिवार का युवक रमेश उन दिनों लखनऊ से छुट्टियों में गाँव आया हुआ था। बातों-बातों में वंशीधर ने मोहन की पढ़ाई के संबंध में उससे अपनी चिंता प्रकट की तो उसने न केवल अपनी सहानुभूति जतलाई बल्कि उन्हें सुझाव दिया कि वे मोहन को उसके साथ ही लख्खनऊ भेज दें । घर में जहाँ, चार प्राणी है एक और बढ़ जाने में कोई अंतर नहीं पड़ता, बल्कि बड़े शहर में रहकर वह अच्छी तरह पढ़-लिख सकेगा। वंशीधर को जैसे रमेश के रूप में भगवान मिल गए हों । उनकी आँखों में पानी छलछलाने लगा।लखनऊ से गाँव कौन आया था और क्यों ?रमेश ने वंशीधर को क्या सुझाव दिया ?वंशीधर की आँखों में पानी क्यों छलछलाने लगा ?

Answer»
  1. लखनऊ से बिरादरी के एक संपन्न परिवार का युवक रमेश गाँव आया था क्योंकि उसकी छुट्टियाँ पड़ गई थी।
  2. वंशीधर ने रमेश के समक्ष जब मोहन की पढ़ाई के संबंध में चिंता प्रकट की तब रमेश ने वंशीधर को सुझाव दिया कि वे मोहन को उसके साथ ही लखनऊ भेज दें तथा घर में जहाँ चार प्राणी है वहाँ एक बढ़ जाने में कोई अंतर नहीं पड़ता।
  3. वंशीधर की आँखों में पानी छलछलाने लगा क्योंकि रमेश मोहन को लखनऊ ले जाने के लिए तैयार था । वंशीधर को मानो रमेश के रूप में साक्षात् भगवान मिल गए थे।
2.

तेरे दिमाग में तो लोहा भरा है रे ! विद्या का ताप कहाँ लगेगा इसमें ? – कहानी का यह वाक्य(क) किसके लिए कहा गया है ?(ख) किस प्रसंग में कहा गया है ?(ग) किस आशय से कहा गया है ?

Answer»

(क) यह वाक्य धनराम के लिए कहा गया है।

(ख) धनराम को बारह का पहाड़ा तो पूरी तरह याद आ गया था किन्तु तेरह का पहाड़ा उसके लिए पहाड़ हो गया था । मास्टरजी जब धनराम से तेरह का पहाड़ा पूछते हैं तब वह लड़खड़ा जाता है। तब मास्टरजी बेंत का उपयोग करने के बजाय जबान की चाबुक लगा देते है।

(ग) चमड़े की चाबुक की चोट से तो शरीर पर घाव लगता है जो जल्दी भर जाता है किन्तु जबान की चाबुक से तो मन और हृदय को चोट पहुँचती है जो कभी नहीं भरती है। यह वाक्य धनराम पर इतना हावी हो जाता है कि वह पढ़ाई छोड़कर पुश्तैनी काम में जुट जाता है।

3.

लंबे बेंटवाले हँसुये को लेकर वह घर से इस उद्देश्य से निकला था कि अपने खेतों के किनारे उग आई काँटेदार झाड़ियों को काट-छाँटकर साफ़ कर आएगा । बूढ़े वंशीधर जी के बूते का अब यह सब काम नहीं रहा । यही क्या, जन्म भर जिस पुरोहिताई के बूते पर उन्होंने घर-संसार चलाया था, वह भी अब वैसे कहाँ कर पाते हैं । यजमान लोग उनकी निष्ठा और संयम के कारण ही उन पर श्रद्धा रखते हैं ।मोहन घर से किस उद्देश्य के लिए निकला ?वंशीधर ने कौन-सा कार्य करके घर-संसार चलाया था ?यजमान किस पर श्रद्धा रखते हैं ? तथा क्यों ?

Answer»
  1. मोहन अपने खेतों के किनारे उग आई काँटेदार झाड़ियों को काट-छाँटकर साफ़ कर ने के उद्देश्य से घर से लंबे बेंटवाला हँसुआ लेकर निकला था ।
  2. वंशीधर ने जन्म भर पुरोहिताई के बूते पर ही अपना घर-संसार चलाया था।
  3. यजमान लोग वंशीधर पर विश्वास रखते है क्योंकि वंशीधर निष्ठा और संयम से कार्य करते थे।
4.

उसकी आँखों में एक सर्जक की चमक थी – कहानी का यह वाक्य(क) किसके लिए कहा गया है ?(ख) किस प्रसंग में कहा गया है ?(ग) यह पात्र-विशेष के किन चारित्रिक पहलुओं को उजागर करता है ?

Answer»

(क) यह कथन मोहन के लिए कहा गया है।

(ख) धनराम एक मोटी लोहे की छड़ को गरम करके उसका गोल घेरा बनाने का प्रयास कर रहा था किन्तु सफल नहीं हो पा रहा था । मोहन यह दृश्य देख रहा था । आखिर मोहन अपनी जगह से खड़ा होकर अपनी जाति की परवाह न करके धनराम के हाथ में से हथौड़ा लेकर उस पर नपी-तुली चोट मारकर उसे सुघड़ गोल रूप दे देता है । अभ्यास के साथ साथ मोहन की आँखों में एक सर्जक की चमक थी।

(ग) ब्राह्मण जाति के लोग कभी शिल्पकार के यहाँ बैठते नहीं थे । मोहन ब्राह्मण का पुत्र होने पर भी अपने बाल सखा धनराम – के आफर पर काम करता है । यही मोहन के जाति-निरपेक्ष व्यवहार को बताता है । साथ ही यह कार्य उसकी बेरोजगारी को भी दर्शाता है तथा मित्र की मदद करने का भाव भी इससे उजागर होता है।

5.

बिरादरी का यही सहारा होता है ।(क) किसने किससे कहा ?(ख) किस प्रसंग में कहा ?(ग) किस आशय से कहा ?(घ) क्या कहानी में यह आशय पूरा हुआ है ?

Answer»

(क) यह वाक्य मोहन के पिता वंशीधर ने बिरादरी के संपन्न युवक रमेश से कहा।
(ख) वंशीधर जब मोहन की पढ़ाई की चिंता रमेश के सामने व्यक्त करते है तब रमेश वंशीधर को सुझाव देते है कि वे मोहन को उसके साथ ही लखनऊ भेज दें ताकि वहाँ अच्छी तरह पढ़-लिख सकेगा।
(ग) बिरादरी के लोग ही एक-दूसरे की मदद करते है। यह कथन रमेश के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने के लिए भी कहा गया।
(घ) नहीं, यह आशय कहानी में पूरा नहीं हो पाया है। क्योंकि रमेश पर जो भरोसा वंशीधर ने किया था वह भरोसा रमेश तोड़ देते है। लखनऊ ले जाकर वे मोहन को नौकर की तरह काम करवाते है। रमेश तथा उसके परिवार ने तेजस्वी एवं मेधावी मोहन का भविष्य चौपट कर दिया, आखिर अंत में उसे बेरोजगार बनाकर घर वापस भेज देते हैं।

6.

धनराम भी उन अनेक छात्रों में से एक था जिसने त्रिलोक सिंह मास्टर के आदेश पर अपने हमजोली मोहन के हाथों कई बार बेंत खाए थे या कान खिंचवाए थे। मोहन के प्रति थोड़ी बहुत ईर्ष्या रहने पर भी धनराम प्रारंभ से ही उसके प्रति स्नेह और आदर का भाव रखता था । इसका एक कारण शायद यह था कि बचपन से ही मन में बैठा दी गई जातिगत हीनता के कारण धनराम ने कभी मोहन को अपना प्रतिद्वंदी नहीं समझा बल्कि वह इसे मोहन का अधिकार ही समझता रहा था । बीच-बीच में त्रिलोक सिंह मास्टर का यह कहना कि मोहन एक दिन बहुत बड़ा आदमी बनकर स्कूल का और उनका नाम ऊँचा करेगा, धनराम के लिए किसी और तरह से सोचने की गुंजाइश ही नहीं रखता था।धनराम ने किसके हाथों अपने कान खिंचवाए थे ?धनराम मोहन को अपना प्रतिद्वंदी क्यों नहीं मानता था ?त्रिलोक सिंह मास्टर मोहन के बारे में क्या कहते थे ?

Answer»
  1. धनराम ने त्रिलोक सिंह मास्टर के आदेश पर अपने हमजोली मोहन के हाथों कई बार बेंत खाए थे तथा कान भी खिंचवाए थे।
  2. धनराम मोहन को अपना प्रतिद्वंद्वी नहीं मानता था, क्योंकि उसके मन में बचपन से ही जातिगत हीनता के बीज बोये गये थे । इसीलिए वह मोहन की मार को अपना अधिकार समझता था।
  3. त्रिलोक सिंह मास्टर मोहन के बारे में कहते थे कि मोहन एक दिन बहुत बड़ा आदमी बनकर स्कूल का और उनका नाम ऊँचा करेगा।
7.

मास्टर त्रिलोक सिंह के किस कथन को लेखक ने ज़बान के चाबुक कहा है और क्यों ?

Answer»

धनराम पढ़ाई में कमजोर था तथा बार-बार उन्हें मास्टर जी मोहन के हाथों पिटवाते थे। इसलिए उसमें डर का भाव घर कर गया था। धनराम पूरा दिन घोटा लगाता है फिर भी तेरह का पहाड़ा याद नहीं कर पाया और यह मास्टर जी के सामने तेरह का पहाड़ा सुनाते-सुनाते लड़खड़ा गया। आखिर मास्टर जी बेंत का उपयोग करने के बजाय जबान की चाबुक का उपयोग करते हुए व्यंग्य से कहते हैं – ‘तेरे दिमाग में तो लोहा भरा है रे।

विद्या का ताप कहाँ लगेगा इसमें ?’ लेखक ने इसी व्यंग्य वचनों को जबान की चाबुक कहा है। चमड़े की चाबुक शरीर पर चोट करती है किन्तु जबान की चाबुक मन और हृदय पर चोट करती है और यह चोट कभी ठीक नहीं होती। आखिर धनराम पढ़ाई छोड़कर पुश्तैनी काम में लग जाता है।

8.

त्रिलोक सिंह मास्टर ने मोहन के बारे में क्या घोषणा की थी ?

Answer»

मोहन पढ़ाई में तेज था और एक तो वह ब्राह्मण था । पढ़ाई में होशियार होने के कारण त्रिलोक सिंह मास्टर ने उन्हें क्लास का मोनीटर बनाया था । मोहन स्कूल प्रार्थना भी करता था तथा मास्टर जी के आदेश से कमजोर और शिस्त में न रहनेवाले बच्चों के कान भी खींचता था । मोहन की तेजस्विता देखकर ही मास्टर जी ने यह घोषणा की थी कि मोहन एक बहुत बड़ा आदमी बनकर स्कूल व उनका नाम रोशन करेगा।

9.

‘गलता लोहा’ शीर्षक की सार्थकता सिद्ध कीजिए।

Answer»

‘गलता लोहा’ कहानी में समाज के जातिगत विभाजन और स्तरीकरण पर कई कोणों से टिप्पणी की गई है। यह कहानी लेखक के लेखन में अर्थ की गहराई को दर्शाती है। इस पूरी कहानी में लेखक की कोई मुखर टिप्पणी नहीं है। इसमें एक मेधावी, किन्तु निर्धन ब्राह्मण युवक मोहन किन परिस्थितियों के चलते उस मनोदशा तक पहुँचता है, जहाँ उसके लिए जातीय अभिमान बेमानी हो जाता है।

मोहन सामाजिक जातिगत भेदभावों को तोड़कर धनराम लोहार के आफर पर जाता है, बैठता है, साथ ही उसके काम में भी अपनी कुशलता भी दिखाता है। वैसे ब्राह्मणों का शिल्पकारों के मुहल्ले में उठना-बैठना नहीं होता था। किसी काम-काज के सिलसिले में यदि शिल्पकार होले में आना ही पड़ा तो खड़े-खड़े बातचीत निपटा ली जाती थी।

ब्राह्मण होले के लोगों को बैठने के लिए कहना भी उनकी मर्यादा के विरुद्ध समझा जाता था। मोहन इन जातिगत भेदभाव को भूलकर धनराम के हाथ से हथौड़ा लेकर नपी-तुली चोट मारते, अभ्यस्त हाथों से धौंकनी फूंककर लोहे को दुबारा भट्ठी में गरम करते और फिर निहाई पर रखकर उसे ठोकते-पिटते सुघड़ गोले का रूप दे डालता है । इस प्रकार मोहन जातिगत भेदभाव को गलाकर नया आकार दे देता है। इस प्रकार प्रस्तुत कहानी का शीर्षक ‘गलता लोहा’ सार्थक है।

10.

वंशीधर की आँखों में पानी क्यों छलछलाने लगता है ?

Answer»

बिरादरी के एक संपन्न परिवार का युवक रमेश लखनऊ से छुट्टियों में गाँव आता है। वंशीधर रमेश के सामने मोहन की पढ़ाई के संबंध में चिंता प्रकट करते है, तब रमेश सहानुभूति दिखाकर वंशीधर को सुझाव देते है कि वे मोहन को उसके साथ लखनऊ भेज दें, वह उसे लखनऊ में मोहन को अच्छी तरह पढ़ाएगा-लिखाएगा । वंशीधर को जैसे रमेश के रूप में साक्षात् भगवान मिल गए हो । रमेश की ऐसी बातें सुनकर वंशीधर की आँखों में पानी छलछलाने लगता है।

11.

‘गलता लोहा’ कहानी में चित्रित सामाजिक परिस्थिति को समझाइए।

Answer»

प्रस्तुत कहानी में परंपरागत ग्रामीण समाज का चित्रण किया गया है। इस गाँव में जातिगत भेदभाव प्राचीन समय से चला आ रहा था। ब्राह्मण स्वयं को श्रेष्ठ मानते थे। वे शिल्पकारों के घर या दुकानों में आते-जाते नहीं थे। अगर कामकाज के कारण जाना भी पड़े तो ये वहाँ बैठते नहीं थे, अगर कोई शिल्पकार उन्हें बैठने के लिए कहता भी तो यह उनकी मर्यादा के विरुद्ध माना जाता था। मोहन लखनऊ से बेरोजगार होकर गाँव आता है और इस जातिगत भेदभाव की बुराई को चुनौती देता है। मोहन अपने बचपन के सख्या धनराम के आफर जाता है, बैठता है तथा हथौड़ा उठाकर काम भी करता है।

12.

कहानी के उस प्रसंग का उल्लेख करें, जिसमें किताबों की विद्या और घन चलाने की विद्या का जिक्र आया है।

Answer»

धनराम अपनी मंदबुद्धि या डर के कारण तेरह का पहाड़ा सुना नहीं सका, तब मास्टर त्रिलोक सिंह बेत का उपयोग करने की बजाय जबान की चाबुक लगाते हुए कहते हैं कि ‘तेरे दिमाग में तो लोहा भरा है रे ! विद्या का ताप कहाँ लगेगा इसमें ?’ अर्थात् उनके पिता में विद्या का ताप लगाने का सामर्थ्य नहीं थी ।

इसीलिए बचपन में ही अपने पुत्र धनराम को धौंकनी फूंकने और सान लगाने के काम में लगा दिया था और धनराम धीरे-धीरे हथौड़े से लेकर घन चलाने की विद्या सिखने लगा । उपर्युक्त प्रसंग में किताबों की विद्या और घन चलाने की विद्या का जिक्र आया है।

13.

मोहन के लखनऊ आने के बाद के समय को लेखक ने उसके जीवन का एक नया अध्याय क्यों कहा है ?

Answer»

मोहन मेधावी और होशियार लड़का था। मास्टर जी का भी मानना था कि यह एक बड़ा आदमी बनेगा। इसीलिए उसके पिता उसे रमेश के साथ लखनऊ भेज देते है। और वहीं से मोहन के जीवन का नया अध्याय शुरू हो जाता है। लखनऊ जाने के बाद मेधावी छात्र की प्रतिभा कुंठित हो जाती है। वहाँ सुबह से शाम तक नौकर की तरह काम करना पड़ता था।

उसने जो उज्ज्वल भविष्य के सपने देखे थे वे चकनाचूर हो जाते है। अपने पैरों पर खड़ा होने के लिए मोहन को फैक्टरी और कारखानों के चक्कर काटने पड़ते थे किन्तु फिर भी उन्हें कोई काम नहीं मिला था। इसीलिए लेखक ने मोहन के लखनऊ प्रवास को उसके जीवन का एक नया अध्याय कहा है।

14.

धनराम पढ़ाई क्यों छोड़ देता है ?

Answer»

मोहन और धनराम एक ही वर्ग में साथ-साथ पढ़ते है। मोहन मेधावी और तेजस्वी था। किन्तु धनराम पढ़ाई में कमजोर था। मास्टर त्रिलोक सिंह मोहन की पढ़ाई से खुश थे और वे उसे स्कूल का मोनिटर भी बनाते है तथा कमजोर छात्रों को पीटाई करने का, कान खींचने का भी आदेश देते थे। धनराम भी कई बार मोहन की मार खा चुका था।

इसलिए थोड़ी बहुत ईर्ष्या भी मोहन के प्रति, फिर भी वह मोहन के प्रति आदर और स्नेह रखता है। एक दिन धनराम को तेरह का पहाड़ा नहीं आया। तो मास्टर जी ने उन्हें मारने के बजाय जबान की चाबुक से खूब खरी-खोटी सुनाते है। मास्टर जी की बातें धनराम के दिल को चोंट पहुँचाती है।आखिर विवश होकर धनराम पढ़ाई छोड़कर लुहारी का अपना पुस्तैनी काम करने लगता है।

15.

धनराम को मोहन के किस व्यवहार पर आश्चर्य होता है और क्यों ?

Answer»

ब्राह्मण शिल्पकारों के टोले में उठते-बैठते नहीं थे । किसी काम से अगर वे उनके यहाँ जाते तो भी वे बैठते नहीं थे, खड़े-खड़े ही बात करते थे । अगर कोई उन्हें बैठने के लिए कहे तो भी उनकी मर्यादा के विरुद्ध था । जब मोहन धनराम की दुकान पर काफी देर तक बैठता है तभी धनराम अपने काम में सफल नहीं हो पा रहा था ।

यह देखकर मोहन धनराम के हाथ से हथौड़ा लेकर लोहे पर नपी-तुली चौटें मारता है और धौंकनी फूंकते हुए भट्ठी में लोहे को गरम करके उसे ठोक-पीटकर गोल रूप में परिवर्तित कर देता है । मोहन ब्राह्मण होते हुए भी निम्न जाति का काम कर रहा था यह देखकर धनराम को आश्चर्य होता है।

16.

धनराम मोहन को अपना प्रतिबंदी क्यों नहीं समझता था ?

Answer»

धनराम त्रिलोक सिंह मास्टर के आदेश के कारण कई बार मोहन के हाथों मार खा चुका था । मोहन के प्रति थोड़ी ईर्ष्या रहने पर भी धनराम प्रारंभ से ही मोहन के प्रति स्नेह और आदर का भाव रखता था । बचपन से ही धनराम के मन में जातिगत हीनता का भाव घर कर दिया गया था । दूसरी ओर मोहन होशियार भी था।

इसीलिए मास्टर जी ने उन्हें मोनीटर बनाया था । औरतों और मास्टर जी बार-बार यह कहते रहते थे कि मोहन एक न एक दिन बड़ा आदमी बनकर स्कूल और उनका नाम रोशन करेगा ! इन सभी कारणों से वह मोहन को अपना प्रतिद्वंद्वी नहीं मानता था।

17.

लोहे की एक मोटी छड़ को भट्ठी में गलाकर धनराम गोलाई में मोड़ने की कोशिश कर रहा था। एक हाथ में सँड़सी पकड़कर जब वह दूसरे हाथ से हथौड़े की चोट मारता तो निहाई पर ठीक घाट में सिरा न फँसने के कारण लोहा उचित ढंग से मुड़ नहीं पा रहा था। मोहन कुछ देर तक उसे काम करते हुए देखता रहा फिर जैसे अपना संकोच त्यागकर उसने दूसरी पकड़ से लोहे को स्थिर कर लिया और धनराम के हाथ से हथौड़ा लेकर नपी-तुली चोट मारते-अभ्यस्त हाथों से धौंकनी फूंककर लोहे को दुबारा भट्टी में गरम करते और फिर निहाई पर रखकर उसे ठोकते-पीटते सुघड़ गोले का रूप दे डाला।मोहन जब धनराम के आफर गया तब वह क्या कर रहा था ?धनराम अपने काम में सफल क्यों नहीं हो रहा था ?धनराम का अधूरा काम मोहन ने कैसे पूरा किया ?

Answer»
  1. मोहन जब धनराम के आफर गया तब धनराम लोहे की एक मोटी छड़ को भट्टी में गलाकर उसे गोलाई में मोड़ने का व्यर्थ प्रयास कर रहा था।
  2. धनराम अपने काम में इसलिए सफल नहीं हो पा रहा था क्योंकि वह एक हाथ से सँडसी पकड़कर दूसरे हाथ से हथौड़े की चोट मारता तो निहाई पर तीक घाट में सिरा न फँसने के कारण लोहा सही तरीके से मुड़ नहीं रहा था।
  3. कुछ देर तक मोहन धनराम के काम को देखता रहा। बाद में अचानक उठकर लोहे को स्थिर करके धनराम का हथौड़ा लेकर नपी-तुली चोट की। उसके बाद स्वयं धौंकनी फूंककर लोहे को दोबारा भट्ठी में गरम किया और फिर निहाई पर रखकर उसे ठोक-पीटकर सुघड़ गोल आकार में बदल देता है।
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