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This section includes 7 InterviewSolutions, each offering curated multiple-choice questions to sharpen your Current Affairs knowledge and support exam preparation. Choose a topic below to get started.
| 1. |
एकसमान चुबंकीय क्षेत्र B में चुंबक के दोलन (oscillation) का आवर्तकाल निलंबन अक्ष के परितः उसके जड़त्व - आघूर्ण ( moment of intertia) I तथा चुंबकीय आघूर्ण m पर निर्भर करता हैं और आवर्तकाल T के लिए प्रयुक्त सूत्र हैं - `T = 2pisqrt((I)/(mB)).` दोलन के क्रम में चुंबक की स्थितिज ऊर्जा तथा घूर्णन गतिज ऊर्जा के बीच विनिमय होता हैं तथा आदर्श स्थिति में इसकी कुल यांत्रिक ऊर्जा संरक्षित रहती हैं । किसी चुंबक को दो बराबर भागों में काटकर तथा उनमें विजातीय ध्रुवों ( unlike poles) , को एक साथ रखकर एकसमान चुंबकीय क्षेत्र से दोलन कराया जाता हैं । यदि काटने से पूर्व संपूर्ण चुंबक को आवर्तकाल T हो , तो उनके दो भागों से बने निकाय का आवर्तकाल क्या होगा ?A. 2TB. TC. `(T)/(2)`D. अनंत |
| Answer» Correct Answer - D | |
| 2. |
किसी ट्रांसमीटर ऐंटेना से आकाश की ओर प्रेषित रेडियो तरंगो का आयनमंडल से परावर्तन होना और पुनः अभिग्राही ऐंटेना व्दारा प्राप्त होने की प्रक्रिया को आकाश तरंग संचार कहा जाता हैं । ऐसी रेडियो - तरंगो को आकाश तरंग भी कहा जाता हैं । आयनमंडल ( ionosphere) का अस्तित्व पृथ्वी - पृष्ठ से 80 km की ऊँचाई से लेकर 300 km तक होता हैं जो इलेक्ट्रॉन तथा आयन जैसे आवेशित कणों से मिलकर बनता हैं । पृथ्वी की सतह के निकट आयनमंडलीय सतह पर आयनीकरण की डिग्री ( degree of ionization ) अधिक होती हैं और ऊपरी पृष्ठ पर अपेक्षाकृत कम होती हैं । यही कारण है कि आयनमंडल की निचली सतह पर रेडियो - तरंगो का अपवर्तनांक अधिक होता हैं और ऊपर जाने के क्रम में इसका मान घटता जाता हैं । आकाश - तरंग संचरण के लिए रेडियों - तरंग की आवृत्ति का कौन - सा परास (range) उपयुक्त होता हैं ?A. 10kHz - 500kHzB. 1MHz - 2MHzC. 5 MHz - 20MHzD. 30MHz से अधिक |
| Answer» Correct Answer - C | |
| 3. |
किसी ट्रांसमीटर ऐंटेना से आकाश की ओर प्रेषित रेडियो तरंगो का आयनमंडल से परावर्तन होना और पुनः अभिग्राही ऐंटेना व्दारा प्राप्त होने की प्रक्रिया को आकाश तरंग संचार कहा जाता हैं । ऐसी रेडियो - तरंगो को आकाश तरंग भी कहा जाता हैं । आयनमंडल ( ionosphere) का अस्तित्व पृथ्वी - पृष्ठ से 80 km की ऊँचाई से लेकर 300 km तक होता हैं जो इलेक्ट्रॉन तथा आयन जैसे आवेशित कणों से मिलकर बनता हैं । पृथ्वी की सतह के निकट आयनमंडलीय सतह पर आयनीकरण की डिग्री ( degree of ionization ) अधिक होती हैं और ऊपरी पृष्ठ पर अपेक्षाकृत कम होती हैं । यही कारण है कि आयनमंडल की निचली सतह पर रेडियो - तरंगो का अपवर्तनांक अधिक होता हैं और ऊपर जाने के क्रम में इसका मान घटता जाता हैं । रेडियो - तरंगे के लिए आयनामंडल का अपवर्तनांकA. नीचे से ऊपर की ओर जाने के क्रम में बढ़ता हैंB. नीचे से ऊपर की ओर जाने के क्रम में घटता हैंC. सभी स्थानों पर समान रहता हैं चाहे दूरी कुछ भी होD. सदैव एकांक (unity ) केा होता हैं । |
| Answer» Correct Answer - B | |
| 4. |
अंतरिक्ष संचार (space communication ) में रेडियो सिग्नल को किसी एक स्थान के ट्रांसमीटर ऐटेना से अंतरिक्ष (space) में भेजा जाता हैं । प्रेषित तरंगे पृथ्वी के क्षोभमंडल ( troposphere ) से होकर किसी दूसरे स्थान पर लगे अभिग्राही ऐंटेना व्दारा अंतर्रोधित ( intercept ) होती हैं । अंतरिक्ष संचार व्यवस्था में रेडियो संके सरल रैखिक पथ पर ट्रांसमीटर ऐंटेना से सीधे अभिग्राही ऐंटेना तक पहुँचाती हैं । स्पष्टतः अंतरिक्ष , संचार व्यवस्था पृथ्वी की वक्रता ( curvature) के कारण प्रतिबंधित (restricted) होती हैं । इस प्रकार के संचरण को दिष्ट तरंग संचरण ( direct wave propagation ) कहा जाता हैं । यदि ट्रांसमीटर के ऐंटेना की ऊँचाई h हो , तो उस स्थान से प्रसारण की अधिकतम दूरी d के लिए , d = `sqrt(2Rh)` , जहाँ पृथ्वी की त्रिज्या R हैं । स्पष्टतः , ट्रांसमीटर के ऐंटेना की ऊँचाई जितनी अधिक होगी , प्रसारण उतने ही अधिक क्षेत्र में पहुँचेगा ।यदि TV टावर की ऊँचाई 80 m हैं तथा किसी शहर में आबादी का माध्य - घनत्व 2000 व्यक्ति प्रति वर्ग किलोमीटर हो , तो उपर्युक्त प्रश्न में कितनी आबादी तक प्रसारण पहुँचेगा ?A. 25 लाखB. 50 लाखC. 64 लाखD. 80 लाख |
| Answer» Correct Answer - C | |
| 5. |
किसी ट्रांसमीटर ऐंटेना से आकाश की ओर प्रेषित रेडियो तरंगो का आयनमंडल से परावर्तन होना और पुनः अभिग्राही ऐंटेना व्दारा प्राप्त होने की प्रक्रिया को आकाश तरंग संचार कहा जाता हैं । ऐसी रेडियो - तरंगो को आकाश तरंग भी कहा जाता हैं । आयनमंडल ( ionosphere) का अस्तित्व पृथ्वी - पृष्ठ से 80 km की ऊँचाई से लेकर 300 km तक होता हैं जो इलेक्ट्रॉन तथा आयन जैसे आवेशित कणों से मिलकर बनता हैं । पृथ्वी की सतह के निकट आयनमंडलीय सतह पर आयनीकरण की डिग्री ( degree of ionization ) अधिक होती हैं और ऊपरी पृष्ठ पर अपेक्षाकृत कम होती हैं । यही कारण है कि आयनमंडल की निचली सतह पर रेडियो - तरंगो का अपवर्तनांक अधिक होता हैं और ऊपर जाने के क्रम में इसका मान घटता जाता हैं । आयनमंडल की गैसों का आयनीकरण जिसके व्दारा होता हैं , वह हैंA. सूर्य से आनेवाली पराबैंगनी (ultraviolet) एंव ऊच्च आवृत्ति के विकिरणB. सूर्य से आनेवाली अवरक्त किरणें ( infra - red rays )C. पृथ्वी की सतह से परावर्तित सौर्य - विकिरणD. भूमंडलीय तापन (Global warming ) |
| Answer» Correct Answer - A | |
| 6. |
नाभिक की संरचना प्रोटॉन तथा न्यूट्रॉन के कारण होती हैं , जहाँ प्रोटॉन धनावेशित कण हैं जबकि न्यूट्रॉन अनावेशित होता हैं । न्यूट्रॉन के क्वार्क मॉडल ( quark model ) के आधार पर इसका नेट आवेश शून्य रहने पर भी इसे अशून्य (nonzero) चुबंकीय आघूर्ण प्राप्त हैं जिसका z-घटक `9.66 xx 10^(-27) A - m^(2)` होता हैं । इस संकल्पना की व्याख्या न्यूट्रॉन के आंतरिक बनावट के आधार पर की जा सकती हैं । न्यूट्रॉन की सरंचना तीन प्रकार के मौलिक कणों ( fundamental particles) व्दारा होती हैं जिन्हें क्वार्क (quark) कहा जाता हैंः एक अप क्वार्क ( up quark ) , संकेत u , आवेश + `(2e)/(3)` दो डाउन क्वार्क ( down quark ) , संकेत d , प्रत्येक पर आवेश - `(e)/(3)` तीन प्रकार के कणों के सम्मिलित प्रभाव से न्यूट्रॉन का नेट आवेश = `(2e)/(3) - (e)/(3) - (e)/(3) ` = शून्य । यदि ये क्वार्क गतिमान हो तब इनके व्दारा उत्पन्न चुंबकीय आघूर्ण अशून्य हो सकता हैं । चित्र में प्रदर्शित सरल मॉडल में u - क्वार्क r त्रिज्या v से वामावर्त दिशा में (anticlockwise) घूम रहा हैं तथा दोनों d - क्वार्क उसी वृतीय पथ पर समान वेग v से दक्षिणावर्त दिशा में (clockwise) घूम रहे हैं । केवल एक d - क्वार्क की एकसमान वृत्तीय गति के कारण उत्पन्न चुंबकीय आपूर्ण का परिमाणA. evrB. `(evr)/(2)`C. `(evr)/(3)`D. `(evr)/(6)` |
| Answer» Correct Answer - D | |
| 7. |
नाभिक की संरचना प्रोटॉन तथा न्यूट्रॉन के कारण होती हैं , जहाँ प्रोटॉन धनावेशित कण हैं जबकि न्यूट्रॉन अनावेशित होता हैं । न्यूट्रॉन के क्वार्क मॉडल ( quark model ) के आधार पर इसका नेट आवेश शून्य रहने पर भी इसे अशून्य (nonzero) चुबंकीय आघूर्ण प्राप्त हैं जिसका z-घटक `9.66 xx 10^(-27) A - m^(2)` होता हैं । इस संकल्पना की व्याख्या न्यूट्रॉन के आंतरिक बनावट के आधार पर की जा सकती हैं । न्यूट्रॉन की सरंचना तीन प्रकार के मौलिक कणों ( fundamental particles) व्दारा होती हैं जिन्हें क्वार्क (quark) कहा जाता हैंः एक अप क्वार्क ( up quark ) , संकेत u , आवेश + `(2e)/(3)` दो डाउन क्वार्क ( down quark ) , संकेत d , प्रत्येक पर आवेश - `(e)/(3)` तीन प्रकार के कणों के सम्मिलित प्रभाव से न्यूट्रॉन का नेट आवेश = `(2e)/(3) - (e)/(3) - (e)/(3) ` = शून्य । यदि ये क्वार्क गतिमान हो तब इनके व्दारा उत्पन्न चुंबकीय आघूर्ण अशून्य हो सकता हैं । चित्र में प्रदर्शित सरल मॉडल में u - क्वार्क r त्रिज्या v से वामावर्त दिशा में (anticlockwise) घूम रहा हैं तथा दोनों d - क्वार्क उसी वृतीय पथ पर समान वेग v से दक्षिणावर्त दिशा में (clockwise) घूम रहे हैं । केवल u - क्वार्क की एकसमान वृत्तीय गति के कारण उत्पन्न चुंबकीय आपूर्ण का परिमाणA. `(evr)/(3)`B. `(2evr)/(3)`C. evrD. 2evr |
| Answer» Correct Answer - A | |
| 8. |
प्रकाश - ऊर्जा व्दारा किसी धातु के पृष्ठ से इलेक्ट्रॉन के उत्सर्जन को प्रकाश - वैद्युत प्रभाव कहते हैं तथा इस प्रकार निर्गत इलेक्ट्रॉनों को प्रकाश - इलेक्ट्रॉन कहते हैं । दिए गए धातु के लिए यदि आपतित प्रकाश की आवृत्ति एक निश्चित न्यूनतम मान से कम हो , तो प्रकाश इलेक्ट्रॉन उत्सर्जित नही होते । आपतित प्रकाश की वह न्यूनतम आवृत्ति जिससे दिए गए धातु से इलेक्ट्रॉन उत्सर्जित हो सकते हैं , देहली आवृत्ति ( threshold frequency ) कहलाती हैं । उत्सर्जित इलेक्ट्रॉनों की गतिज ऊर्जा शून्य से एक अधिकतम मान तक होती हैं । यदि धातु का कार्य फलन `phi_(0) ` हो तथा आपतित प्रकाश की आवृत्ति v अथवा तरंगदैर्घ्य `lamda` हो , तो उत्सर्जित इलेक्ट्रॉनों की अधिकतम गतिज ऊर्जा , `E_(k) = hv - phi_(0) = (hc)/(lamda) - phi_(0)`. यह आंइस्टीन का प्रकाश - वैद्युत समीकरण कहलाता हैं । यदि देहली आवृत्ति `v_(0)` तथा देहली तरंगदैर्घ्य `lamda_(0)` हो , तो धातु का कार्य - फलन , ` phi_(0) = hv_(0) = (hc)/(lamda_(0))` . यदि उत्सर्जित इलेक्ट्रानों की अधिकतम गतिज ऊर्जा `E_(k)`हो , तो निरोधी विभव (stopping potential ) `v_(0)` के लिए `E_(k) = (1)/(2)mv_(max)^(2) = eV_(0)` जिसमें `v_(max)` प्रकाश - इलेक्ट्रॉनों की अधिकतम चाल हैं । जब 400 nm तरंगदैर्घ्य वाला बैंगनी प्रकाश एक प्रकाश - वैद्युत सेल पर गिरता हैं , तो इसके कैथोड़ से इलेक्ट्रॉन की गति रोकने के लिए `0.5 eV` के निरोधी विभव की आवश्यकता होती हैं । यदि h `= 6.6 xx 10^(-34)` Js हो , तो इस सेल के लिए देहली आवृत्ति हैंA. `6.4 xx 10^(14) Hz`B. ` 4.2 xx 10^(14)Hz`C. `3.6 xx10^(14) Hz`D. `8xx10^(14)Hz` |
| Answer» Correct Answer - A | |
| 9. |
पृथ्वी की सतहरो अनुरेख गमन करनेवाली रेडियो तरंगो को , जो ट्रांसमीटर ऐंटेना से अभिग्राही ऐंटेना तक पहुँचाती हैं , भू - तरंगे ( ground waves ) कहा जाता हैं । भू - तरंगो व्दारा संकेत के संचरण को भू - तरंग संचार ( ground - wave communication ) कहा जाता हैं । संचरण के क्रम में भू - तरंगों की तीव्रता ( intensity ) में ह्रास होता हैं । यही कारण हैं कि अधिक दूरी के लिए संचार व्यवस्था में भू - तरंगे उपयुक्त नही होती हैं । केवल स्थानीय प्रसारण ( local broadcasting ) मे ही भू - तरंगो का उपयोग किया जाता हैं । भू - तरंगो के संचरण में सिग्नल की तीव्रता से ह्रास होने का कारण हैंA. पृथ्वी की सतह से तरंगों का परावर्तनB. पृथ्वी की सतह से तरंगों का अवशोषणC. वायुमंडल के धूल कण तथा गैस के अणुओं व्दारा तरंगों का प्रकीर्णनD. इनमे से कोई नहीं |
| Answer» Correct Answer - D | |
| 10. |
नाभिक की संरचना प्रोटॉन तथा न्यूट्रॉन के कारण होती हैं , जहाँ प्रोटॉन धनावेशित कण हैं जबकि न्यूट्रॉन अनावेशित होता हैं । न्यूट्रॉन के क्वार्क मॉडल ( quark model ) के आधार पर इसका नेट आवेश शून्य रहने पर भी इसे अशून्य (nonzero) चुबंकीय आघूर्ण प्राप्त हैं जिसका z-घटक `9.66 xx 10^(-27) A - m^(2)` होता हैं । इस संकल्पना की व्याख्या न्यूट्रॉन के आंतरिक बनावट के आधार पर की जा सकती हैं । न्यूट्रॉन की सरंचना तीन प्रकार के मौलिक कणों ( fundamental particles) व्दारा होती हैं जिन्हें क्वार्क (quark) कहा जाता हैंः एक अप क्वार्क ( up quark ) , संकेत u , आवेश + `(2e)/(3)` दो डाउन क्वार्क ( down quark ) , संकेत d , प्रत्येक पर आवेश - `(e)/(3)` तीन प्रकार के कणों के सम्मिलित प्रभाव से न्यूट्रॉन का नेट आवेश = `(2e)/(3) - (e)/(3) - (e)/(3) ` = शून्य । यदि ये क्वार्क गतिमान हो तब इनके व्दारा उत्पन्न चुंबकीय आघूर्ण अशून्य हो सकता हैं । चित्र में प्रदर्शित सरल मॉडल में u - क्वार्क r त्रिज्या v से वामावर्त दिशा में (anticlockwise) घूम रहा हैं तथा दोनों d - क्वार्क उसी वृतीय पथ पर समान वेग v से दक्षिणावर्त दिशा में (clockwise) घूम रहे हैं । यदि क्वार्क मॉडल के तीनों क्वार्क समान दिशा में समान वृत्तीय गति उत्पन्न करें तब न्यूट्रॉन का नेट चुंबकीय आपूर्ण क्यो होगा ?A. evrB. `(evr)/(3)`C. `(3evr)/(4)`D. इनमे से कोई नहीं |
| Answer» Correct Answer - D | |
| 11. |
नाभिक की संरचना प्रोटॉन तथा न्यूट्रॉन के कारण होती हैं , जहाँ प्रोटॉन धनावेशित कण हैं जबकि न्यूट्रॉन अनावेशित होता हैं । न्यूट्रॉन के क्वार्क मॉडल ( quark model ) के आधार पर इसका नेट आवेश शून्य रहने पर भी इसे अशून्य (nonzero) चुबंकीय आघूर्ण प्राप्त हैं जिसका z-घटक `9.66 xx 10^(-27) A - m^(2)` होता हैं । इस संकल्पना की व्याख्या न्यूट्रॉन के आंतरिक बनावट के आधार पर की जा सकती हैं । न्यूट्रॉन की सरंचना तीन प्रकार के मौलिक कणों ( fundamental particles) व्दारा होती हैं जिन्हें क्वार्क (quark) कहा जाता हैंः एक अप क्वार्क ( up quark ) , संकेत u , आवेश + `(2e)/(3)` दो डाउन क्वार्क ( down quark ) , संकेत d , प्रत्येक पर आवेश - `(e)/(3)` तीन प्रकार के कणों के सम्मिलित प्रभाव से न्यूट्रॉन का नेट आवेश = `(2e)/(3) - (e)/(3) - (e)/(3) ` = शून्य । यदि ये क्वार्क गतिमान हो तब इनके व्दारा उत्पन्न चुंबकीय आघूर्ण अशून्य हो सकता हैं । चित्र में प्रदर्शित सरल मॉडल में u - क्वार्क r त्रिज्या v से वामावर्त दिशा में (anticlockwise) घूम रहा हैं तथा दोनों d - क्वार्क उसी वृतीय पथ पर समान वेग v से दक्षिणावर्त दिशा में (clockwise) घूम रहे हैं । तीनों क्वार्क के निकाय के सम्मिलित प्रभाव के कारण नेट चुंबकीय आपूर्ण का परिणामA. `(evr)/(2)`B. `(evr)/(3)`C. `(2)/(3) evr`D. शून्य |
| Answer» Correct Answer - C | |
| 12. |
नाभिक की संरचना प्रोटॉन तथा न्यूट्रॉन के कारण होती हैं , जहाँ प्रोटॉन धनावेशित कण हैं जबकि न्यूट्रॉन अनावेशित होता हैं । न्यूट्रॉन के क्वार्क मॉडल ( quark model ) के आधार पर इसका नेट आवेश शून्य रहने पर भी इसे अशून्य (nonzero) चुबंकीय आघूर्ण प्राप्त हैं जिसका z-घटक `9.66 xx 10^(-27) A - m^(2)` होता हैं । इस संकल्पना की व्याख्या न्यूट्रॉन के आंतरिक बनावट के आधार पर की जा सकती हैं । न्यूट्रॉन की सरंचना तीन प्रकार के मौलिक कणों ( fundamental particles) व्दारा होती हैं जिन्हें क्वार्क (quark) कहा जाता हैंः एक अप क्वार्क ( up quark ) , संकेत u , आवेश + `(2e)/(3)` दो डाउन क्वार्क ( down quark ) , संकेत d , प्रत्येक पर आवेश - `(e)/(3)` तीन प्रकार के कणों के सम्मिलित प्रभाव से न्यूट्रॉन का नेट आवेश = `(2e)/(3) - (e)/(3) - (e)/(3) ` = शून्य । यदि ये क्वार्क गतिमान हो तब इनके व्दारा उत्पन्न चुंबकीय आघूर्ण अशून्य हो सकता हैं । चित्र में प्रदर्शित सरल मॉडल में u - क्वार्क r त्रिज्या v से वामावर्त दिशा में (anticlockwise) घूम रहा हैं तथा दोनों d - क्वार्क उसी वृतीय पथ पर समान वेग v से दक्षिणावर्त दिशा में (clockwise) घूम रहे हैं । u - क्वार्क की एकसमान वृत्तीय गति के कारण तुल्य विद्युत - धारा हैंA. `(ev)/(pi r)`B. `(2 ev)/(pi r) `C. `(ev)/(3 pi r)`D. `(2ev)/(3 pi r)` |
| Answer» Correct Answer - C | |
| 13. |
न्यूट्रॉन एक अनावेशित परंतु `9.66xx10^(-27) Am^(2)` का z - अक्षीय चुंबकीय आघूर्ण (magnetic moment) रखनेवाला कण हैं । इसे न्यूट्रॉन के आंतरिक बनावट से समझा जा सकता हैं । प्रायोगिक सत्यापन से यह ज्ञात हुआ हैं कि एक न्यूट्रॉन तीन मूलभूत क्वार्क एक `+(2)/(3)e` आवेश के अप - क्वार्क (u) तथा दो ` - (1)/(3) e` आवेश के डाउन - क्वार्क (d) से मिलकर बना हैं । तीनों क्वार्कों का युग्म इसे अनावेशित बनाता हैं । यदि ये क्वार्क गित में हो , तो एक चुंबकीय आघूर्ण उत्पन्न करते हैं । इस साधारण संरचना में यदि यह माना जाए कि u - क्वार्क घड़ी की दिशा की विपरीत दिशा में जबकि d - क्वार्क घड़ी की दिशा से r त्रिज्या वाले वृत्तीय पथ पर एक समरुप चाल v से चलते हैं , तो निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर दें । u - क्वार्क के घूमने के कारण उत्पन्न विद्युत -धारा का मान होगाA. `(ev)/(6 pi r)`B. `(ev)/(3 pi r)`C. `(ev)/(pi r)`D. `(2 ev)/(pi r)` |
| Answer» Correct Answer - B | |
| 14. |
टेलीविजन , रेडियो जैसे इलेक्ट्रॉनिक साधनों के विद्युत - परिपथ की जाँच के क्रम में मल्टीमीटर का उपयोग किया जाता हैं । इस यंत्र में एक मिलीऐमीटर (milliameter) को विभिन्न प्रतिरोधों से जोड़कर विभिन्न परास (range) की धारा , विभवांतर तथा प्रतिरोधों का मापन किया जाता हैं । चित्र में मल्टीमीटर का परिपथ दिखाया गया हैं जिसके टर्मिनल P से धारा प्रवेश करती हैं और जो मिलीऐमीटर से तथा इसके श्रेणी तथा समांतरक्रम में जुड़े प्रतिरोधकों से प्रवाहित होकर अन्य किसी टर्मिनल Q , R ,S बाहर निकलती हैं । धारा को किस टर्मिनल से बाहर निकलना हैं यह इस बात पर निर्भर करता हैं कि मल्टीमीटर का उपयोग ऐमीटर , वोल्टमीटर या प्रतिरोध मापक के रुप में किस परास (range) के मापन के लिया किया जाना हैं । दिए गए चित्र में मिलीऐमीटर की कुंडली का प्रतिरोध `0.9 Omega ` तथा इससे 10 mA की धारा प्रवाहित होने पर यह पूर्ण स्केल विक्षेप ( full scale deflection ) देता हैं । यदि मल्टीमीटर के टर्मिनल P से S से क्रमशः धारा का प्रवेश एंव निकास हो तब इस व्यवस्था व्दारा एक वोल्टमीटर जैसा उपयोग होगा जिसकी माप सीमा ( measuring range) होगीA. 1 VB. 10 VC. 100 VD. 1000 V |
| Answer» Correct Answer - C | |
| 15. |
टेलीविजन , रेडियो जैसे इलेक्ट्रॉनिक साधनों के विद्युत - परिपथ की जाँच के क्रम में मल्टीमीटर का उपयोग किया जाता हैं । इस यंत्र में एक मिलीऐमीटर (milliameter) को विभिन्न प्रतिरोधों से जोड़कर विभिन्न परास (range) की धारा , विभवांतर तथा प्रतिरोधों का मापन किया जाता हैं । चित्र में मल्टीमीटर का परिपथ दिखाया गया हैं जिसके टर्मिनल P से धारा प्रवेश करती हैं और जो मिलीऐमीटर से तथा इसके श्रेणी तथा समांतरक्रम में जुड़े प्रतिरोधकों से प्रवाहित होकर अन्य किसी टर्मिनल Q , R ,S बाहर निकलती हैं । धारा को किस टर्मिनल से बाहर निकलना हैं यह इस बात पर निर्भर करता हैं कि मल्टीमीटर का उपयोग ऐमीटर , वोल्टमीटर या प्रतिरोध मापक के रुप में किस परास (range) के मापन के लिया किया जाना हैं । दिए गए चित्र में मिलीऐमीटर की कुंडली का प्रतिरोध `0.9 Omega ` तथा इससे 10 mA की धारा प्रवाहित होने पर यह पूर्ण स्केल विक्षेप ( full scale deflection ) देता हैं । यदि मल्टीमीटर के टर्मिनल P तथा Q से क्रमशः धारा के प्रवेश तथा निकास हो , तब यह व्यवस्था एक ऐमीटर जैसा कार्य करेगी जिसका पारस हैंA. 10 mAB. 100mAC. `1 A`D. `10 A` |
| Answer» Correct Answer - C | |
| 16. |
एक समांतर प्लेट संधारित्र की दोनों प्लेटों को ऊर्ध्वाधरतः रखकर दृढ़ आधार से क्लैम्प कर दिया गया हैं । दोनों प्लेट शून्य - विक्षेप प्रदर्शित करनेवाले गैलवेनोमीटर से होकर सेल व्दारा संबंधित हैं । धातु की बात एक समतल प्लेट जिसकी मोटाई संधारित्र की प्लेटों के बीच की दूरी से थोड़ा कम हैं , प्लेटों के बीच से होकर उन्हें बिना स्पर्श किए ऊर्ध्वाधरतः गुरुत्व के अधीन गिरती हैं । संधारित्र की प्लेटों के बीच से गुजरने के क्रम में धातु की प्लेट की गति का सही विवरण निम्नलिखित में किस विकल्प व्दारा व्यक्त होता हैं ?A. धातु की प्लेट का त्वरण एकसमान हैं तथा यह गुरुत्वीय त्वरण g के तुल्य हैं ।B. इसका एकसमान त्वरण , गुरुत्वीय त्वरण से थोड़ा कम हैं ।C. इसका एकसमान त्वरण , गुरुत्वीय त्वरण से थोड़ा अधिक हैंD. इसका त्वरण परिवर्ती हैं तथा यह g से हमेशा कम हैं । |
| Answer» Correct Answer - D | |
| 17. |
एक समांतर प्लेट संधारित्र की दोनों प्लेटों को ऊर्ध्वाधरतः रखकर दृढ़ आधार से क्लैम्प कर दिया गया हैं । दोनों प्लेट शून्य - विक्षेप प्रदर्शित करनेवाले गैलवेनोमीटर से होकर सेल व्दारा संबंधित हैं । धातु की बात एक समतल प्लेट जिसकी मोटाई संधारित्र की प्लेटों के बीच की दूरी से थोड़ा कम हैं , प्लेटों के बीच से होकर उन्हें बिना स्पर्श किए ऊर्ध्वाधरतः गुरुत्व के अधीन गिरती हैं । धातु की प्लेट को संधारित्र की प्लेटों की बीच से गुजरने के संपूर्ण प्रक्रम में , निम्नलिखित विकल्पों में कौन सही नहीं हैं ?A. इसकी गतिज ऊर्जा में वृध्दि का मान गुरुत्वीय स्थितिज ऊर्जा ह्रास में कम हैं ।B. विद्युत - परिपथ में कुछ ऊष्मा उत्पन्न होगी ।C. सेल व्दारा कुछ विद्युत - ऊर्जा का ह्रास होगा , लेकिन किसी अन्य प्रकार की ऊर्जा की प्राप्ति नहीं होगी ।D. सेल से प्रवाहित धारा की दिशा किसी क्षण विपरीत हो जायेगी । |
| Answer» Correct Answer - C | |
| 18. |
एक समांतर प्लेट संधारित्र की दोनों प्लेटों को ऊर्ध्वाधरतः रखकर दृढ़ आधार से क्लैम्प कर दिया गया हैं । दोनों प्लेट शून्य - विक्षेप प्रदर्शित करनेवाले गैलवेनोमीटर से होकर सेल व्दारा संबंधित हैं । धातु की बात एक समतल प्लेट जिसकी मोटाई संधारित्र की प्लेटों के बीच की दूरी से थोड़ा कम हैं , प्लेटों के बीच से होकर उन्हें बिना स्पर्श किए ऊर्ध्वाधरतः गुरुत्व के अधीन गिरती हैं । गैलवेनोमीटर के सूचक के विक्षेप का सही विवरण निम्नलिखित में किस विकल्प व्दारा व्यक्त होता हैं ?A. प्लेटों के बीच से गुजरने के क्रम में गैलवेनोमीटर व्दारा केवल एक ओर नियत विक्षेप होगा ।B. प्लेटों के बीच से गुजरने के क्रम में गैलवेनोमीटर व्दारा प्रदर्शित विक्षेप एक ओर परिवर्ती रुप से होगा ।C. विक्षेप कुछ देर तक बायीं ओर और फिर दाहिनी ओर होगा ।D. धातु की प्लेट पर नेट आवेश शून्य रहने पर गैलवेनोमीटर में कोई विक्षेप नहीं होगा । |
| Answer» Correct Answer - C | |
| 19. |
किसी विद्युत व्दिध्रुव का नेट आवेश शून्य होता हैं , लेकिन इसका व्दिध्रुव - आपूर्ण अशून्य होता हैं । बिंदु A तथा B पर स्थित (-q) तथा (+ q) आवेश के सरल निकाय के लिए चित्र से `(-q)vec(r_(1)) + (+ q) vec(r_(2)) = q(vec r_(2) - vec(r_(1))) = q vec(r) = vec (P)` = व्दिध्रुव - आघूर्ण सदिश । व्यापक रुप से यदि आवेश के वितरण में नेट आवेश शून्य हो , तो उस निकाय का व्दिध्रुव - आघूर्ण सदिश रुप से परिभाषित होता हैं : आवेश के असंतत (discrete) वितरण के लिए , `vec(P) = sum vec(r_(i) q_(i)) तथा आवेश के संतत ( continuous) वितरण के लिए , `vec(P) = int vec(r_(i))dq_(i).` उपर्युक्त आवेशित रिंग के कारण बिंदु P(n R, 0,0) पर विद्युत - क्षेत्र ज्ञात करें , जहाँ n का मान बहूत बड़ा हैं ।A. `(1)/(4piin_(0)(nR)^(3))hati`B. `(1)/(4piin_(0)(nR)^(3))hati`C. `(1)/(4piin_(0)(nR)^(3))hati`D. `(1)/(4piin_(0)(nR)^(3))hati` |
| Answer» Correct Answer - B | |
| 20. |
मैक्सवेल व्दारा प्रतिपादित क्षेत्र - समीकरणों (field equations) के आधार पर विद्युत - चुंबकीय तरंग की उत्पत्ति , संचरण तथा अन्य घटनाओं की व्याख्या की जाती हैं । इस सिध्दांत के अनुसार , विद्युत क्षेत्र `vec(E)` तथा चुंबकीय क्षेत्र `vec(B)` एक - दूसरे से अतंरबध्द है तथा तरंग संचरण के क्रम में दोनों क्षेत्र समय के साथ परिवर्ती होते हैं । मुक्त आकाश में वे प्रकाश की चाल `(c_(0) = 3xx10^(8)m s^(-1) )` से गमन करती हैं । मैक्सवेल के चार समीकरण मूलतः (i) चुंबकत्व गॉस का नियम , (ii) स्थिर वैद्युतिकी में गॉस का नियम , (iii) फैराडे का विद्युत - चुंबकीय प्रेरण का नियम तथा (iv) ऐम्पियर के नियम का एक पूर्ण सेट हैं । फैराडे का नियम जिस समीकरण में व्यक्त होता हैं , वह हैंA. `ointvec(E)*dvec(l) = - (d)/(dt) intvec(B)*dvec(A)`B. `ointvec(B)*dvec(l) = - (d)/(dt) intvec(E)*dvec(A)`C. `ointvecE.dvecl=-(dphiE)/(dt)`D. `ointvecE.dvecA=-(dphiE)/(dt)` |
| Answer» Correct Answer - A | |
| 21. |
मैक्सवेल व्दारा प्रतिपादित क्षेत्र - समीकरणों (field equations) के आधार पर विद्युत - चुंबकीय तरंग की उत्पत्ति , संचरण तथा अन्य घटनाओं की व्याख्या की जाती हैं । इस सिध्दांत के अनुसार , विद्युत क्षेत्र `vec(E)` तथा चुंबकीय क्षेत्र `vec(B)` एक - दूसरे से अतंरबध्द है तथा तरंग संचरण के क्रम में दोनों क्षेत्र समय के साथ परिवर्ती होते हैं । मुक्त आकाश में वे प्रकाश की चाल `(c_(0) = 3xx10^(8)m s^(-1) )` से गमन करती हैं । मैक्सवेल के चार समीकरण मूलतः (i) चुंबकत्व गॉस का नियम , (ii) स्थिर वैद्युतिकी में गॉस का नियम , (iii) फैराडे का विद्युत - चुंबकीय प्रेरण का नियम तथा (iv) ऐम्पियर के नियम का एक पूर्ण सेट हैं । चालन धारा `(I _(c))` तथा विस्थापन धारा `( I_(d) = epsi_(0) (d phi_(E))/(dt))` के पद में ऐम्पियर का नियम जिस समीकरण से व्यक्त होता हैं , वह हैंA. `ointvec(B)*d vec(l) = mu_(0)(I_(c) + I_(d))`B. `ointvec(E)*d vec(l) = mu_(0)(I_(c) + I_(d))`C. `ointvec(B)*d vec(l) = in_(0)(I_(c) + I_(d))`D. `ointvec(E)*d vec(l) = in_(0)(I_(c) + I_(d))` |
| Answer» Correct Answer - A | |
| 22. |
किसी गोले की त्रिज्या R है तथा इसके पदार्थ की परावैद्युतता (permittivity ) `in` हैं । इसके भीतर आवेश का आयतन - घनत्व ( volume density of charge) `rho` को गोले के केंद्र से दूरी r के फलन ( function ) के रुप में संबंध `rho = rho_(0)(1 - (r)/(R))` से व्यक्त किया जाता हैं । केंद्र से दूरी के फलन के रुप में गोले के भीतर विद्युत - क्षेत्र का परिमाण हैंA. `E = (rho_(0))/(in)[(r)/(3) - (r^(2))/(4R)]`B. `E = (rho_(0))/(in)[(r)/(4) - (r^(2))/(3R)]`C. `E = (rho_(0))/(in)[(r)/(3) + (r^(2))/(4R)]`D. `E = (rho_(0))/(in)[(r)/(4) + (r^(2))/(3R)]` |
| Answer» Correct Answer - A | |
| 23. |
मैक्सवेल व्दारा प्रतिपादित क्षेत्र - समीकरणों (field equations) के आधार पर विद्युत - चुंबकीय तरंग की उत्पत्ति , संचरण तथा अन्य घटनाओं की व्याख्या की जाती हैं । इस सिध्दांत के अनुसार , विद्युत क्षेत्र `vec(E)` तथा चुंबकीय क्षेत्र `vec(B)` एक - दूसरे से अतंरबध्द है तथा तरंग संचरण के क्रम में दोनों क्षेत्र समय के साथ परिवर्ती होते हैं । मुक्त आकाश में वे प्रकाश की चाल `(c_(0) = 3xx10^(8)m s^(-1) )` से गमन करती हैं । मैक्सवेल के चार समीकरण मूलतः (i) चुंबकत्व गॉस का नियम , (ii) स्थिर वैद्युतिकी में गॉस का नियम , (iii) फैराडे का विद्युत - चुंबकीय प्रेरण का नियम तथा (iv) ऐम्पियर के नियम का एक पूर्ण सेट हैं । मुक्त आकाश में विद्युत - चुंबकीय तरंग के वेग `(c_(0))` को परावैद्युत `(in_(0))` तथा चुंबकनशीलता `(mu_(0))` के पद में किस संबंध व्दारा व्यक्त किया जाता हैं ?A. `c_(0)= sqrt(mu_(0)in_(0))`B. `c_(0)= (1)/(mu_(0)in_(0))`C. `c_(0)= (1)/sqrt(mu_(0)in_(0))`D. `c_(0)sqrt(mu_(0)/(in_(0)` |
| Answer» Correct Answer - C | |
| 24. |
मैक्सवेल व्दारा प्रतिपादित क्षेत्र - समीकरणों (field equations) के आधार पर विद्युत - चुंबकीय तरंग की उत्पत्ति , संचरण तथा अन्य घटनाओं की व्याख्या की जाती हैं । इस सिध्दांत के अनुसार , विद्युत क्षेत्र `vec(E)` तथा चुंबकीय क्षेत्र `vec(B)` एक - दूसरे से अतंरबध्द है तथा तरंग संचरण के क्रम में दोनों क्षेत्र समय के साथ परिवर्ती होते हैं । मुक्त आकाश में वे प्रकाश की चाल `(c_(0) = 3xx10^(8)m s^(-1) )` से गमन करती हैं । मैक्सवेल के चार समीकरण मूलतः (i) चुंबकत्व गॉस का नियम , (ii) स्थिर वैद्युतिकी में गॉस का नियम , (iii) फैराडे का विद्युत - चुंबकीय प्रेरण का नियम तथा (iv) ऐम्पियर के नियम का एक पूर्ण सेट हैं । चुंबकत्व में गॉस का नियम जिस समीकरण से व्यक्त होता हैं , वह हैंA. `intvec(B)*d vec(A) = (m)/(mu_(0))`B. `intvec(B)*d vec(A) = mu_(0)m`C. `intvec(E)*dvec(A) = sqrt((q)/(in_(0))`D. `intvec (E) *dvec(A) = (q)/(in_(0))` |
| Answer» Correct Answer - D | |
| 25. |
विद्युत - क्षेत्र `vec(E)` में आवेश q पर आरोपित बल `vec(F)` परिणामी एंव दिशा में सूत्र `vec(F) = q vec(E)` व्दारा व्यक्त होता हैं । आरोपित बल की दिशा आवेश की प्रकृति ( धनात्मक एंव ऋणात्मक ) पर निर्भर करती हैं । स्प्ष्टतः , किसी एकसमान विद्युत - क्षेत्र ( uniform electric field ) में विराम में स्थित मुक्त आवेश क्षेत्र `vec(E)` की दिशा के समांतर अथवा विपरीत दिशा में सरल रेखा में गतिशील होता हैं । यदि कोई गतिशील आवेशित कण विद्युत - क्षेत्र की दिशा के साथ कोण `theta`बनाता हुआ क्षेत्र में प्रवेश करता हो तब इसका गति पथ परवलीय (parabolic) होता हैं , यदि `theta ne 0^(@) , 180^(@)`. इसी क्रम में क्षैतिज दिशा में गतिशील प्रोटॉन पर विचार करें जो समय t = 0 पर एकसमान ऊर्ध्वाधर विद्युत - क्षेत्र (uniform vertical electric field) में प्रवेश कर रहा हो । प्रवेश करते समय जमीन (ground) से इसकी ऊँचाई h हैं । प्रेक्षण से ज्ञात होता हैं कि क्षेत्र `vec(E)` की उपस्थिति में प्रोटॉन को जमीन (ground) से इसकी ऊँचाई h हैं । प्रेक्षण से ज्ञात होता हैं कि क्षेत्र `vec(E)` की उपस्थिति में प्रोटॉन को जमीन तक आने में लगा समय , क्षेत्र की अनुपस्थिति में लगनेवाले समय का आधा हैं । यह भी पाया जाता हैं कि क्षेत्र के अंदर प्रोटॉन व्दारा ` 250 mu s ` ( माइक्रोसेकंड) में 10 cm का क्षैतिज विस्थापन होता हैं और अंततः यह ` 500 m s^(-1)` की चाल से जमीन से टकराता हैं । प्रोटॉन के जमीन से टकराने में लगा समयA. 3.6 sB. 6.4 sC. 7.5 sD. 9.5 s |
| Answer» Correct Answer - C | |
| 26. |
विद्युत - क्षेत्र `vec(E)` में आवेश q पर आरोपित बल `vec(F)` परिणामी एंव दिशा में सूत्र `vec(F) = q vec(E)` व्दारा व्यक्त होता हैं । आरोपित बल की दिशा आवेश की प्रकृति ( धनात्मक एंव ऋणात्मक ) पर निर्भर करती हैं । स्प्ष्टतः , किसी एकसमान विद्युत - क्षेत्र ( uniform electric field ) में विराम में स्थित मुक्त आवेश क्षेत्र `vec(E)` की दिशा के समांतर अथवा विपरीत दिशा में सरल रेखा में गतिशील होता हैं । यदि कोई गतिशील आवेशित कण विद्युत - क्षेत्र की दिशा के साथ कोण `theta`बनाता हुआ क्षेत्र में प्रवेश करता हो तब इसका गति पथ परवलीय (parabolic) होता हैं , यदि `theta ne 0^(@) , 180^(@)`. इसी क्रम में क्षैतिज दिशा में गतिशील प्रोटॉन पर विचार करें जो समय t = 0 पर एकसमान ऊर्ध्वाधर विद्युत - क्षेत्र (uniform vertical electric field) में प्रवेश कर रहा हो । प्रवेश करते समय जमीन (ground) से इसकी ऊँचाई h हैं । प्रेक्षण से ज्ञात होता हैं कि क्षेत्र `vec(E)` की उपस्थिति में प्रोटॉन को जमीन (ground) से इसकी ऊँचाई h हैं । प्रेक्षण से ज्ञात होता हैं कि क्षेत्र `vec(E)` की उपस्थिति में प्रोटॉन को जमीन तक आने में लगा समय , क्षेत्र की अनुपस्थिति में लगनेवाले समय का आधा हैं । यह भी पाया जाता हैं कि क्षेत्र के अंदर प्रोटॉन व्दारा ` 250 mu s ` ( माइक्रोसेकंड) में 10 cm का क्षैतिज विस्थापन होता हैं और अंततः यह ` 500 m s^(-1)` की चाल से जमीन से टकराता हैं । विद्युत - क्षेत्र `vec(E)` की दिशा हैंA. ऊर्ध्वाधरतः ऊपर की ओरB. ऊर्ध्वाधरतः नीचे की ओरC. प्रोटॉन के लिए नीचे की ओर तथा इलेक्ट्रॉन के लिए ऊपर की ओरD. इलेक्ट्रॉन के लिए नीचे की ओर तथा प्रोटॉन के लिए ऊपर की ओर |
| Answer» Correct Answer - B | |
| 27. |
स्थिर वैद्युतिकी (electrostatics) में गॉस के प्रमेय का अनुप्रयोग जिस प्रकार किया जाता हैं , ठीक उसी प्रकार गुरुत्वाकर्षण (gravitation) संबंधी प्रश्नों का हल भी गॉस के प्रमेय के अनुप्रयोग से संभव हैं , क्योंकि दोनों प्रकार के बलों के लिए व्युत्क्रम - वर्ग नियम ( inverse square law ) मान्य हैं । इसके अतिरिक्त निम्नलिखित समतुल्यताओं की मान्यता भी आवश्यकता हैं : (i) आवेश (charge) - द्रव्यमान (mass) (ii) विद्युत - क्षेत्र की प्रबलता - गुरुत्वीय क्षेत्र की तीव्रता अथवा गुरुत्वीय त्वरण (iii) नियतांक , k = `(1)/(4 pi in_(0))` - गुरुत्वाकर्षण नियतांक Gअनंत विस्तार की एक पतली एकसमान समतल प्लेट ( जिसके प्रति एकांक क्षेत्रफल का द्रव्यमान m हैं ) के निकट गुरुत्वीय क्षेत्र की प्रबलता का परिमाणA. ` 4(pi)G sigma`B. `((1)/(4(pi)))G sigma`C. `2(pi)Gsigma`D. `(2(pi)sigma)/(G)` |
| Answer» Correct Answer - C | |
| 28. |
स्थिर वैद्युतिकी (electrostatics) में गॉस के प्रमेय का अनुप्रयोग जिस प्रकार किया जाता हैं , ठीक उसी प्रकार गुरुत्वाकर्षण (gravitation) संबंधी प्रश्नों का हल भी गॉस के प्रमेय के अनुप्रयोग से संभव हैं , क्योंकि दोनों प्रकार के बलों के लिए व्युत्क्रम - वर्ग नियम ( inverse square law ) मान्य हैं । इसके अतिरिक्त निम्नलिखित समतुल्यताओं की मान्यता भी आवश्यकता हैं : (i) आवेश (charge) - द्रव्यमान (mass) (ii) विद्युत - क्षेत्र की प्रबलता - गुरुत्वीय क्षेत्र की तीव्रता अथवा गुरुत्वीय त्वरण (iii) नियतांक , k = `(1)/(4 pi in_(0))` - गुरुत्वाकर्षण नियतांक G प्रति एकांक लंबाई के द्रव्यमान `lamda` युक्त किसी पतले एकसमान धागे के कारण r दूरी पर गुरुत्वीय क्षेत्र की प्रबलता का परिमाणA. `(Glamda)/(r)`B. `(2 G lamda)/(r)`C. `(G lamda)/(2r)`D. `(Glamda)/(2pir)` |
| Answer» Correct Answer - B | |
| 29. |
पार्थिव चुंबकत्व की व्याख्या के लिए एक काल्पनिक मॉडल प्रस्तुत किया जाता हैं जिसमें पृथ्वी के केंद्र पर स्थित m आघूर्ण का एक प्रबल चुंबक मान लेते हैं । अक्षांश (latitude)` lamda` के किसी स्थान P पर नमन कोण का मान `sigma` प्रेक्षित होता हैं । पृथ्वी की त्रिज्या R मान लें । स्थान P पर पृथ्वी के चुंबकीय क्षेत्र के ऊर्ध्वाधर घटक `B_(v)` के लिए संबंध हैंA. `(mu_(0))/(4pi)(2msinlamda)/(R^(3))`B. `(mu_(0))/(4pi)(2mcoslamda)/(R^(3))`C. `(mu_(0))/(4pi)(msinlamda)/(R^(3))`D. `(mu_(0))/(4pi)(mcoslamda)/(R^(3))` |
| Answer» Correct Answer - A | |
| 30. |
पार्थिव चुंबकत्व की व्याख्या के लिए एक काल्पनिक मॉडल प्रस्तुत किया जाता हैं जिसमें पृथ्वी के केंद्र पर स्थित m आघूर्ण का एक प्रबल चुंबक मान लेते हैं । अक्षांश (latitude)` lamda` के किसी स्थान P पर नमन कोण का मान `sigma` प्रेक्षित होता हैं । पृथ्वी की त्रिज्या R मान लें । नमन - कोण एंव अक्षांश `lamda` के बीच संबंध हैंA. `2 tanlamda = 3 tan delta`B. `tan lamda = (1)/(2) tan delta`C. `tan delta = (1)/(2)tan lamda`D. `lamda = delta` |
| Answer» Correct Answer - B | |
| 31. |
पार्थिव चुंबकत्व की व्याख्या के लिए एक काल्पनिक मॉडल प्रस्तुत किया जाता हैं जिसमें पृथ्वी के केंद्र पर स्थित m आघूर्ण का एक प्रबल चुंबक मान लेते हैं । अक्षांश (latitude)` lamda` के किसी स्थान P पर नमन कोण का मान `sigma` प्रेक्षित होता हैं । पृथ्वी की त्रिज्या R मान लें । स्थान P पर पृथ्वी के चुंबकीय क्षेत्र के क्षैतिज घटक `B_(H)` के लिए संबंध हैंA. `(mu_(0))/(4pi)(2msinlamda)/(R^(3))`B. `(mu_(0))/(4pi)(2mcoslamda)/(R^(3))`C. `(mu_(0))/(4pi)(msinlamda)/(R^(3))`D. `(mu_(0))/(4pi)(mcoslamda)/(R^(3))` |
| Answer» Correct Answer - D | |
| 32. |
स्थिर वैद्युतिकी (electrostatics) में गॉस के प्रमेय का अनुप्रयोग जिस प्रकार किया जाता हैं , ठीक उसी प्रकार गुरुत्वाकर्षण (gravitation) संबंधी प्रश्नों का हल भी गॉस के प्रमेय के अनुप्रयोग से संभव हैं , क्योंकि दोनों प्रकार के बलों के लिए व्युत्क्रम - वर्ग नियम ( inverse square law ) मान्य हैं । इसके अतिरिक्त निम्नलिखित समतुल्यताओं की मान्यता भी आवश्यकता हैं : (i) आवेश (charge) - द्रव्यमान (mass) (ii) विद्युत - क्षेत्र की प्रबलता - गुरुत्वीय क्षेत्र की तीव्रता अथवा गुरुत्वीय त्वरण (iii) नियतांक , k = `(1)/(4 pi in_(0))` - गुरुत्वाकर्षण नियतांक G पृथ्वी के भीतर केंद्र से r दूरी पर गुरुत्वीय त्वरण का मान `(gr)/(R)` होता हैं , जहाँ g = पृथ्वी की सतह पर गुरुत्वीय त्वरण तथा R = पृथ्वी की त्रिज्या हैं । इसी प्रकार , Q आवेश युक्त R त्रिज्या के परावैद्युत गोले के भीतर केंद्र से r दूरी पर विद्युत - क्षेत्र का परिमाण होगा ( मान लें कि आवेश का वितरण संपूर्ण गोले के आयतन में एकसमान रुप से वितरित हैं )A. `kQ[1-(r^(2))/(R^(2))]`B. `(kQr)/(R^(3))`C. `(kQR)/(r^(3))`D. `(kQ(R-r))/(R^(3))` |
| Answer» Correct Answer - B | |
| 33. |
किसी गोले की त्रिज्या R है तथा इसके पदार्थ की परावैद्युतता (permittivity ) `in` हैं । इसके भीतर आवेश का आयतन - घनत्व ( volume density of charge) `rho` को गोले के केंद्र से दूरी r के फलन ( function ) के रुप में संबंध `rho = rho_(0)(1 - (r)/(R))` से व्यक्त किया जाता हैं । केंद्र से दूरी r के फलन के रुप में गोले के बाहर विद्युत - क्षेत्र का परिमाण हैंA. `E = (rho_(0)R^(3))/(16 in r^(2))`B. `E = (rho_(0)R^(3))/(12 in r^(2))`C. `E = (rho_(0))/(in)[(1)/(r^(2)) - (1)/(R^(2))]`D. `E = (rho_(0))/(8 in)[(1)/(r) - (1)/(R)]` |
| Answer» Correct Answer - B | |
| 34. |
मैक्सवेल व्दारा प्रतिपादित क्षेत्र - समीकरणों (field equations) के आधार पर विद्युत - चुंबकीय तरंग की उत्पत्ति , संचरण तथा अन्य घटनाओं की व्याख्या की जाती हैं । इस सिध्दांत के अनुसार , विद्युत क्षेत्र `vec(E)` तथा चुंबकीय क्षेत्र `vec(B)` एक - दूसरे से अतंरबध्द है तथा तरंग संचरण के क्रम में दोनों क्षेत्र समय के साथ परिवर्ती होते हैं । मुक्त आकाश में वे प्रकाश की चाल `(c_(0) = 3xx10^(8)m s^(-1) )` से गमन करती हैं । मैक्सवेल के चार समीकरण मूलतः (i) चुंबकत्व गॉस का नियम , (ii) स्थिर वैद्युतिकी में गॉस का नियम , (iii) फैराडे का विद्युत - चुंबकीय प्रेरण का नियम तथा (iv) ऐम्पियर के नियम का एक पूर्ण सेट हैं । स्थिर वैद्यतिकी में गॉस का नियम जिस समीकरण से व्यक्त होता हैं , वह हैंA. `intvec(E)*dvec(A) = in_(0)q`B. `intvec(E)*dvec(A) = (q)/(in_(0))`C. `intvec(E)*dvec(A) = sqrt((q)/(in_(0)))`D. `intvec(E)*dvec(A) = sqrt(in_(0)q_(0))` |
| Answer» Correct Answer - B | |
| 35. |
किसी विद्युत व्दिध्रुव का नेट आवेश शून्य होता हैं , लेकिन इसका व्दिध्रुव - आपूर्ण अशून्य होता हैं । बिंदु A तथा B पर स्थित (-q) तथा (+ q) आवेश के सरल निकाय के लिए चित्र से `(-q)vec(r_(1)) + (+ q) vec(r_(2)) = q(vec r_(2) - vec(r_(1))) = q vec(r) = vec (P)` = व्दिध्रुव - आघूर्ण सदिश । व्यापक रुप से यदि आवेश के वितरण में नेट आवेश शून्य हो , तो उस निकाय का व्दिध्रुव - आघूर्ण सदिश रुप से परिभाषित होता हैं : आवेश के असंतत (discrete) वितरण के लिए , `vec(P) = sum vec(r_(i) q_(i)) तथा आवेश के संतत ( continuous) वितरण के लिए , `vec(P) = int vec(r_(i))dq_(i).` तीन आवेशों से बने किसी निकाय का व्दिध्रुम - आघूर्ण ज्ञात करें जिसमें आवेश `1 mu C` की स्थिति ( 3Å , 0 , 0) , आवेश `2 mu C` की स्थिति (0, 2 Å , 0 ) तथा ` - 3mu C` आवेश की स्थिति (0,0 , -1 Å) पर हो ।A. `(3hati + 4hatj + 3hatk) mu CÅ`B. `(- 3hati - 4hatj + 3hatk)mu C Å`C. `(3 hati - 4hatj + 3hatk)mu C Å`D. `(3 hati - 4 hatj - 3hatk) mu C Å` |
| Answer» Correct Answer - A | |
| 36. |
चित्र में आँख की बनावट का एक सरलीकृत स्वरुप दिखाया गया हैं , जिसमें आँख पर आपतित संपूर्ण प्रकाश के अपवर्तन को कॉर्निया से होता माना गया हैं । कॉर्निया आँख का सबसे अगला भाग हैं , जो लगभग 2 सेंटीमीटर के एक नियत फोकस दूरीवाला अभिसारी लेंस होता हैं । अनंत से आनेवाली समांतर किरणें कॉर्निया से अपवर्तित होकर रेटिना पर फोकसित प्रतिबिंब बनाती हैं । रेटिना प्रतिबिंब बनने की सूचना को प्रकाश तंत्रिका के माध्यम से मस्तिष्क तक पहुँचाती हैं । निकट - दृष्टि दोष एंव दूर - दृष्टि दोष आँख में होनेवाली दो सामान्य बीमारियाँ हैं । निकट - दृष्टि दोष (myopia) में दूर से आनेवाली किरणें कॉर्निया से अपवर्तन के बाद दूरस्थ वस्तु का प्रतिबिंब रेंटिना के सम्मुख बना देती हैं । दूर - दृष्टि दोष (hypermetropia) में नजदीक की वस्तु का प्रतिबिंब कॉर्निया से अपवर्तन के बाद रेटिना के पीछे बनता हैं । दोनों दोषों को दूर करने के लिए उपयुक्त फोकस - दूरी एंव प्रकृति के लेंस का उपयोग किया जाता हैं । कॉर्निया तथा प्रयुक्त लेंस का संयुक्त समूहन प्रतिबिंब को पुनः रेटिना पर ले आता हैं । यदि दूर की वस्तु को अनंत पर माना जाए तब कॉर्निया से प्रतिबिंब की दूरी (v) को निम्नलिखित सूत्र से ज्ञात किया जा सकता हैं: `(1)/(f_(c)) + (1)/(f_(1) - x) = (1)/(v)`, जहाँ `f_(c)` = कॉर्निया की फोकस - दूरी , `f_(1)` = संशोधी लेंस की फोकस - दूरी , x = कॉर्निया एंव संशोधी लेंस के बीच की दूरी । सामान्य दोषमुक्त आँखों में कॉर्निया से कितनी दूरी पर रेटिना होना चाहिए ?A. 1 cmB. 2cmC. 4cmD. 0.5cm |
| Answer» Correct Answer - B | |
| 37. |
चित्र में आँख की बनावट का एक सरलीकृत स्वरुप दिखाया गया हैं , जिसमें आँख पर आपतित संपूर्ण प्रकाश के अपवर्तन को कॉर्निया से होता माना गया हैं । कॉर्निया आँख का सबसे अगला भाग हैं , जो लगभग 2 सेंटीमीटर के एक नियत फोकस दूरीवाला अभिसारी लेंस होता हैं । अनंत से आनेवाली समांतर किरणें कॉर्निया से अपवर्तित होकर रेटिना पर फोकसित प्रतिबिंब बनाती हैं । रेटिना प्रतिबिंब बनने की सूचना को प्रकाश तंत्रिका के माध्यम से मस्तिष्क तक पहुँचाती हैं । निकट - दृष्टि दोष एंव दूर - दृष्टि दोष आँख में होनेवाली दो सामान्य बीमारियाँ हैं । निकट - दृष्टि दोष (myopia) में दूर से आनेवाली किरणें कॉर्निया से अपवर्तन के बाद दूरस्थ वस्तु का प्रतिबिंब रेंटिना के सम्मुख बना देती हैं । दूर - दृष्टि दोष (hypermetropia) में नजदीक की वस्तु का प्रतिबिंब कॉर्निया से अपवर्तन के बाद रेटिना के पीछे बनता हैं । दोनों दोषों को दूर करने के लिए उपयुक्त फोकस - दूरी एंव प्रकृति के लेंस का उपयोग किया जाता हैं । कॉर्निया तथा प्रयुक्त लेंस का संयुक्त समूहन प्रतिबिंब को पुनः रेटिना पर ले आता हैं । यदि दूर की वस्तु को अनंत पर माना जाए तब कॉर्निया से प्रतिबिंब की दूरी (v) को निम्नलिखित सूत्र से ज्ञात किया जा सकता हैंः `(1)/(f_(c)) + (1)/(f_(1) - x) = (1)/(v)`, जहाँ `f_(c)` = कॉर्निया की फोकस - दूरी , `f_(1)` = संशोधी लेंस की फोकस - दूरी , x = कॉर्निया एंव संशोधी लेंस के बीच की दूरी । निकट - दृष्टि दोष एंव दूर - दृष्टि दोष को दूर करने के लिए क्रमशः किस प्रकृति के लेंस का उपयोग का जाना चाहिए ? ( मान ले कि `f_(c) = x`)A. उत्तल , उत्तलB. अवतल , उत्तलC. उत्तल , अवतलD. |
| Answer» Correct Answer - B | |
| 38. |
सर जे0 जे0 थॉमसन ने इलेक्ट्रॉन के विशिष्ट आवेश (specific charge) `(e)/(m_(e))` को मापने के लिए एक प्रयोग किया था , जिसका आधुनिक स्वरुप चित्र में प्रदर्शित किया गया हैं । एक तापायनिक उत्सर्जन (thermonic emission ) से इलेक्ट्रॉन उत्पन्न कर उसे विभवांतर V के अंतर्गत त्वरित किया जाता हैं । इलेक्ट्रॉन विक्षेपण उत्पन्न करनेवाले प्लेटों ( deflecting plates ) के विद्युतीय - क्षेत्र `vec (E)` एंव चुंबकीय क्षेत्र `vec (B) ` से होकर गुजरता हैं । प्लेटों से बाहर निकलने पर विद्युतीय एंव चुंबकीय प्रभाव रहित क्षेत्र से गुजरकर पर्दे पर पड़ता हैं । इलेक्ट्रॉन के गमन वाले पूरे क्षेत्र को निर्वात ( vacuum) बनाया जाता हैं । प्रारंभ में थॉमसन ने E = 0 तथा B = 0 के लिए पर्दे ( screen ) पर बिना विक्षेपित इलेक्ट्रॉन के स्थान को चिह्नित किया । इसके लिए विद्युत क्षेत्र `vec (E)` को उत्पन्न किया गया । इससे इलेक्ट्रॉन के प्रवाह मार्ग में उत्पन्न विक्षेप, `d_(1) = (e EL^(2))/(2m_(e)v^(2))` को मापा गया , जहाँ L प्लेटों की लंबाई एंव v इलेक्ट्रॉन का वेग हैं । इसके बाद चुंबकीय क्षेत्र `vec (B)` के मान को इस प्रकार समंजित किया जाता हैं , ताकि पर्दे पर इलेक्ट्रॉन का विक्षेप शून्य हो जाए । ऐसी स्थिति में eE = evB. इस संबंध से v के मान को `d_(1)` के मान वाले समीकरण में पदस्थापित करने पर , `(e)/(m_(e)) = (2d_(1)E)/(B^(2)L^(2))` . थॉमसन के लिए इलेक्ट्रॉन - प्रवाह मार्ग को निर्वात बनाने की आवश्यकता क्यों पड़ी ?A. इलेक्ट्रॉन निर्वात में तेजी से चलते हैं तथा इससे विक्षेप का मान कम होता हैं ।B. विद्युत - चुंबकीय तरंगे सिर्फ निर्वात में ही चलती हैं ।C. इलेक्ट्रॉन के हवा के कणों से टक्कर (collision) होने पर इलेक्ट्रॉन किरण (elctrone beam) का बिखराव होता तथा वह एक बिंदु पर फोकस नहीं हो पाते ।D. ऐसा करना कोई बहुत जरुरी नहीं था और प्रयोग को हवा में भी किया जा सकता था । |
| Answer» Correct Answer - C | |
| 39. |
सर जे0 जे0 थॉमसन ने इलेक्ट्रॉन के विशिष्ट आवेश (specific charge) `(e)/(m_(e))` को मापने के लिए एक प्रयोग किया था , जिसका आधुनिक स्वरुप चित्र में प्रदर्शित किया गया हैं । एक तापायनिक उत्सर्जन (thermonic emission ) से इलेक्ट्रॉन उत्पन्न कर उसे विभवांतर V के अंतर्गत त्वरित किया जाता हैं । इलेक्ट्रॉन विक्षेपण उत्पन्न करनेवाले प्लेटों ( deflecting plates ) के विद्युतीय - क्षेत्र `vec (E)` एंव चुंबकीय क्षेत्र `vec (B) ` से होकर गुजरता हैं । प्लेटों से बाहर निकलने पर विद्युतीय एंव चुंबकीय प्रभाव रहित क्षेत्र से गुजरकर पर्दे पर पड़ता हैं । इलेक्ट्रॉन के गमन वाले पूरे क्षेत्र को निर्वात ( vacuum) बनाया जाता हैं । प्रारंभ में थॉमसन ने E = 0 तथा B = 0 के लिए पर्दे ( screen ) पर बिना विक्षेपित इलेक्ट्रॉन के स्थान को चिह्नित किया । इसके लिए विद्युत क्षेत्र `vec (E)` को उत्पन्न किया गया । इससे इलेक्ट्रॉन के प्रवाह मार्ग में उत्पन्न विक्षेप, `d_(1) = (e EL^(2))/(2m_(e)v^(2))` को मापा गया , जहाँ L प्लेटों की लंबाई एंव v इलेक्ट्रॉन का वेग हैं । इसके बाद चुंबकीय क्षेत्र `vec (B)` के मान को इस प्रकार समंजित किया जाता हैं , ताकि पर्दे पर इलेक्ट्रॉन का विक्षेप शून्य हो जाए । ऐसी स्थिति में eE = evB. इस संबंध से v के मान को `d_(1)` के मान वाले समीकरण में पदस्थापित करने पर , `(e)/(m_(e)) = (2d_(1)E)/(B^(2)L^(2))` . यदि प्रयुक्त यंत्र में विद्युत - क्षेत्र लगाने पर इलेक्ट्रॉन नीचे की ओर विक्षेपित हुआ होता , तब प्रयोग के दूसरे चरण में प्रयुक्त विद्युतीय क्षेत्र `vec(E)` एंव चुंबकीय क्षेत्र `vec (B)` की दिशाएँ होतीA. `vec(E)` नीचे की ओर तथा `vec(B)` पेज के लंबवत अंदर की ओरB. `vec(E)` नीचे की ओर तथा `vec(B)` पेज के लंबवत बाहर की ओरC. `vec(E)` ऊपर की ओर तथा `vec(B)` पेज के लंबवत अंदर की ओरD. `vec(E)` नीचे की ओर तथा `vec(B)` पेज के लंबवत बाहर की ओर लगा |
| Answer» Correct Answer - D | |
| 40. |
सर जे0 जे0 थॉमसन ने इलेक्ट्रॉन के विशिष्ट आवेश (specific charge) `(e)/(m_(e))` को मापने के लिए एक प्रयोग किया था , जिसका आधुनिक स्वरुप चित्र में प्रदर्शित किया गया हैं । एक तापायनिक उत्सर्जन (thermonic emission ) से इलेक्ट्रॉन उत्पन्न कर उसे विभवांतर V के अंतर्गत त्वरित किया जाता हैं । इलेक्ट्रॉन विक्षेपण उत्पन्न करनेवाले प्लेटों ( deflecting plates ) के विद्युतीय - क्षेत्र `vec (E)` एंव चुंबकीय क्षेत्र `vec (B) ` से होकर गुजरता हैं । प्लेटों से बाहर निकलने पर विद्युतीय एंव चुंबकीय प्रभाव रहित क्षेत्र से गुजरकर पर्दे पर पड़ता हैं । इलेक्ट्रॉन के गमन वाले पूरे क्षेत्र को निर्वात ( vacuum) बनाया जाता हैं । प्रारंभ में थॉमसन ने E = 0 तथा B = 0 के लिए पर्दे ( screen ) पर बिना विक्षेपित इलेक्ट्रॉन के स्थान को चिह्नित किया । इसके लिए विद्युत क्षेत्र `vec (E)` को उत्पन्न किया गया । इससे इलेक्ट्रॉन के प्रवाह मार्ग में उत्पन्न विक्षेप, `d_(1) = (e EL^(2))/(2m_(e)v^(2))` को मापा गया , जहाँ L प्लेटों की लंबाई एंव v इलेक्ट्रॉन का वेग हैं । इसके बाद चुंबकीय क्षेत्र `vec (B)` के मान को इस प्रकार समंजित किया जाता हैं , ताकि पर्दे पर इलेक्ट्रॉन का विक्षेप शून्य हो जाए । ऐसी स्थिति में eE = evB. इस संबंध से v के मान को `d_(1)` के मान वाले समीकरण में पदस्थापित करने पर , `(e)/(m_(e)) = (2d_(1)E)/(B^(2)L^(2))` . अगर विभवांतर को बढ़ाकर इलेक्ट्रॉन की चाल को दोगुना कर दिया गया होता तो निम्नलिखित में कौन - सा कथन `(e)/(m)` के सही मापन के लिए आवश्यक होता ?A. विद्युतीय - क्षेत्र के व्दारा उत्पन्न बल को निष्फल करने के लिए चुंबकीय क्षेत्र को आधा करना पड़ता ।B. विद्युत - क्षेत्र के व्दारा उत्पन्न बल को निष्फल करने के लिए चुंबकीय क्षेब को दुगुना करना पड़ता ।C. विक्षेप को अपरिवर्तित रखने के लिए प्लेट की लबाई को दुगुना करना पड़ता ।D. किसी परिवर्तन की आवश्यकता नहीं पड़ती । |
| Answer» Correct Answer - A | |
| 41. |
समय के साथ परिवर्ती चुंबकीय क्षेत्र के कारण हमेशा विद्युत - क्षेत्र भी संबध्द रहता हैं । इसी संदर्भ में चित्र में प्रदर्शित R त्रिज्या के बेलनाकार क्षेत्र के अक्ष के अनुरेख चुंबकीय क्षेत्र `vec(B)` के समय के साथ परिवर्तन की दर `(dB)/(dt) = prop` टेसला प्रति सेकंड हैं । केंद्र O से r दूरी पर प्रेरित विद्युत - क्षेत्र का परिमाण यदि ` r lt R` होA. `(rprop)/(2)`B. `(R^(2)prop)/(2r)`C. `(r^(2) prop)/(2R)`D. `rprop` |
| Answer» Correct Answer - A | |
| 42. |
इलेक्ट्रॉन के विशिष्ट आवेश ( specific charge ) , अर्थात् अनुपात , आवेश/द्रव्यमान `((e)/(m))` के निर्धारण के लिए सर जे0 जे0 थॉमसन व्दारा किए गए प्रयोग की व्यवस्था का आधुनिक प्रतिरुप चित्र में प्रदर्शित हैं । तप्त फिलामेंट F व्दारा उत्सर्जित इलेक्ट्रॉनों को विभवांतर V के अधीन त्वरित किया जाता हैं । सरल रेखा में गतिशील इलेक्ट्रॉनपुंज पर्दे C में बने संकीर्ण छिद्र से होकर बाहर निकलने के बाद एक ऐसे क्षेत्र से होकर गुजरता हैं जहाँ इलेक्ट्रॉन की संचरण दिशा के लंबवत परस्पर लंबवत दिशाओं में चुंबकीय क्षेत्र `vec(B)` तथा विद्युत क्षेत्र `vec(E)` दोनों वर्तमान हैं । इसके बाद इलेक्ट्रॉनपुंज बिना क्षेत्र वाले स्थान से होकर प्रतिदीप्ति परदे (fluorescent screen) S पर आघात कर दीप्ति उत्पन्न करता हैं । इलक्ट्रॉन के गमन वाला पूरा क्षेत्र निर्वातित ( evacuated) रहता हैं । सर्वप्रथम `vec(E)` तथा `vec(B)` क्षेत्रों की अनुपस्थिति में पर्दे S पर अविक्षेपित (undeflected) इलेक्ट्रॉन व्दारा उत्पन्न प्रदीप्त - बिंदु की स्थिति नोट की जाती हैं । फिर , विद्युत - क्षेत्र `vec(E)` की उपस्थिति में इलेक्ट्रॉन - पुंज का पर्दे पर विक्षेप `d_(1)` नोट किया जाता हैं । इसके बाद चुंबकीय क्षेत्र `vec(B)` की प्रबलता को समंजित कर दीप्ति - बिंदु को पुनः प्रारंभिक अविक्षेपित स्थिति में लाया जाता हैं । इस अवस्था में विद्युतीय बल `F_(e)` तथा चुंबकीय बल `F_(B)` एक - दूसरे को निष्फल कर देते हैं , अर्थात् `e_(E) = ev_(B)`. प्राप्त प्रेक्षणों से इलेक्ट्रॉन का विशिष्ट द्रव्यमान `(e)/(m)` निर्धारित किया जाता हैं । थॉमसन की प्रायोगिक व्यवस्था में टयूब को निर्वातित करने की आवश्यकता क्यो हुई ?थॉमसन की प्रायोगिक व्यवस्था में टयूब को निर्वातित करने की आवश्यकता क्यों हुई ?A. निर्वात में इलक्ट्रॉन के अधिक वेग से गतिशील होने के कारण पर्दे पर विक्षेप कम होगा ।B. विदयुत - चुंबकीय तरंगे केवल निर्वात में गमन करती हैंC. इलेक्ट्रॉन व्दारा हवा के अणुओं से टक्कर के क्रम में प्रकीर्णन (scattering) के कारण पर्दे पर तीक्ष्ण फोकस नहीं हो पाता ।D. प्रयोग को हवा की उपस्थिति में (निर्वात उत्पन्न किए बिना ) भी किया जा सकता था । |
| Answer» Correct Answer - C | |
| 43. |
समय के साथ परिवर्ती चुंबकीय क्षेत्र के कारण हमेशा विद्युत - क्षेत्र भी संबध्द रहता हैं । इसी संदर्भ में चित्र में प्रदर्शित R त्रिज्या के बेलनाकार क्षेत्र के अक्ष के अनुरेख चुंबकीय क्षेत्र `vec(B)` के समय के साथ परिवर्तन की दर `(dB)/(dt) = prop` टेसला प्रति सेकंड हैं । केंद्र O से r दूरी पर प्रेरित विद्युत - क्षेत्र का परिमाण यदि ` R lt r` होA. `(rprop)/(2)`B. `(R^(2)prop)/(2r)`C. `(r^(2) prop)/(2R)`D. `rprop` |
| Answer» Correct Answer - B | |
| 44. |
समय के साथ परिवर्ती चुंबकीय क्षेत्र के कारण हमेशा विद्युत - क्षेत्र भी संबध्द रहता हैं । इसी संदर्भ में चित्र में प्रदर्शित R त्रिज्या के बेलनाकार क्षेत्र के अक्ष के अनुरेख चुंबकीय क्षेत्र `vec(B)` के समय के साथ परिवर्तन की दर `(dB)/(dt) = prop` टेसला प्रति सेकंड हैं । आवेशित कण (द्रव्यमाण = m, आवेश = q) का तात्कालिक त्वरण जब वह केंद्र से r दूरी पर स्थित हो `(r gt R)`A. `(qrm)/(2m)`B. `(qR^(2)prop)/(2mr)`C. `(qr^(2)prop)/(2mR)`D. `(qrprop)/(m)` |
| Answer» Correct Answer - B | |
| 45. |
चित्र में विभवमापी का परिपथ प्रदर्शित हैं । विभवमापी के तार AB की लंबाई 50 cm हैं तथा दो सेल के विद्युत - वाहक बल क्रमशः `epsi_(1)` = 2V तथा `epsi_(2)` अज्ञात हैं । सेलों का आंतरिक प्रतिरोध नगण्य हैं । तथा `R_(1) = 15 Omega` और `R_(2) = 5 Omega` हैं । जब दोनों स्विच `k_(1)` तथा `k_(2)` खुले हों तब संतुलन बिंदु ( null point) की बिंदु A से दूरी 31.25 cm पर प्राप्त होती हैं । जब `k_(1)` तथा `k_(2)` दोनों बंद हो तब संतुलन बिंदु की A से दूरी घटकर मात्र 5 cm रह जाती हैं । तार AB का प्रतिरोध `10 Omega` मान लें । स्विच `K_(1)` को बंद तथा `K_(2)` को खुला रखने पर शून्य विक्षेप (null deflection) के संगत लंबाई हैंA. 10.5cmB. 11.5 cmC. 12.5 cmD. 13.5 cm |
| Answer» Correct Answer - C | |
| 46. |
चित्र में विभवमापी का परिपथ प्रदर्शित हैं । विभवमापी के तार AB की लंबाई 50 cm हैं तथा दो सेल के विद्युत - वाहक बल क्रमशः `epsi_(1)` = 2V तथा `epsi_(2)` अज्ञात हैं । सेलों का आंतरिक प्रतिरोध नगण्य हैं । तथा `R_(1) = 15 Omega` और `R_(2) = 5 Omega` हैं । जब दोनों स्विच `k_(1)` तथा `k_(2)` खुले हों तब संतुलन बिंदु ( null point) की बिंदु A से दूरी 31.25 cm पर प्राप्त होती हैं । जब `k_(1)` तथा `k_(2)` दोनों बंद हो तब संतुलन बिंदु की A से दूरी घटकर मात्र 5 cm रह जाती हैं । तार AB का प्रतिरोध `10 Omega` मान लें । सेल `epsi_(2)` का आंतरिक प्रतिरोध हैंA. `4.5 Omega`B. `5.5 Omega`C. `6.5 Omega`D. `7.5 Omega` |
| Answer» Correct Answer - D | |
| 47. |
टेलीविजन , रेडियो जैसे इलेक्ट्रॉनिक साधनों के विद्युत - परिपथ की जाँच के क्रम में मल्टीमीटर का उपयोग किया जाता हैं । इस यंत्र में एक मिलीऐमीटर (milliameter) को विभिन्न प्रतिरोधों से जोड़कर विभिन्न परास (range) की धारा , विभवांतर तथा प्रतिरोधों का मापन किया जाता हैं । चित्र में मल्टीमीटर का परिपथ दिखाया गया हैं जिसके टर्मिनल P से धारा प्रवेश करती हैं और जो मिलीऐमीटर से तथा इसके श्रेणी तथा समांतरक्रम में जुड़े प्रतिरोधकों से प्रवाहित होकर अन्य किसी टर्मिनल Q , R ,S बाहर निकलती हैं । धारा को किस टर्मिनल से बाहर निकलना हैं यह इस बात पर निर्भर करता हैं कि मल्टीमीटर का उपयोग ऐमीटर , वोल्टमीटर या प्रतिरोध मापक के रुप में किस परास (range) के मापन के लिया किया जाना हैं । दिए गए चित्र में मिलीऐमीटर की कुंडली का प्रतिरोध `0.9 Omega ` तथा इससे 10 mA की धारा प्रवाहित होने पर यह पूर्ण स्केल विक्षेप ( full scale deflection ) देता हैं । यदि मल्टीमीटर के टर्मिनल P तथा R से क्रमशः धारा का प्रवेश एंव निकास हो तब यह व्यवस्था एक ऐमीटर जैसा कार्य करेगी जिसका परास ( range ) हैंA. 10 mAB. 100mAC. `1 A`D. `10 A` |
| Answer» Correct Answer - B | |
| 48. |
चित्र में विभवमापी का परिपथ प्रदर्शित हैं । विभवमापी के तार AB की लंबाई 50 cm हैं तथा दो सेल के विद्युत - वाहक बल क्रमशः `epsi_(1)` = 2V तथा `epsi_(2)` अज्ञात हैं । सेलों का आंतरिक प्रतिरोध नगण्य हैं । तथा `R_(1) = 15 Omega` और `R_(2) = 5 Omega` हैं । जब दोनों स्विच `k_(1)` तथा `k_(2)` खुले हों तब संतुलन बिंदु ( null point) की बिंदु A से दूरी 31.25 cm पर प्राप्त होती हैं । जब `k_(1)` तथा `k_(2)` दोनों बंद हो तब संतुलन बिंदु की A से दूरी घटकर मात्र 5 cm रह जाती हैं । तार AB का प्रतिरोध `10 Omega` मान लें । सेल `epsi_(2)` का विद्युत वाहक बल हैंA. 0.5 VB. 0.9 VC. 1.3 VD. 1.8 V |
| Answer» Correct Answer - A | |