This section includes 7 InterviewSolutions, each offering curated multiple-choice questions to sharpen your Current Affairs knowledge and support exam preparation. Choose a topic below to get started.
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क्या जानने के लिए हम सब प्यासे हैं? |
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Answer» प्रतिभा तुम कहाँ रहती हो? यह जानने के लिए हम सब प्यासे हैं। |
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ससंदर्भ भाव स्पष्ट कीजिए:“कहाँ जन्म है तेरा?” मैंने पूछा जब प्रतिभा से,“महलों में? गुलगुले गलीचों पर? गुलाब की क्यारी में?वृद्धों की चिंता में? बच्चों की दंतहीन किलकारी में?बोलो तुम रहती कहाँ? जानने को हम सब हैं कितने प्यासे!” |
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Answer» प्रसंग : प्रस्तुत पंक्तियाँ हमारी पाठ्य पुस्तक ‘साहित्य वैभव’ के ‘प्रतिभा का मूल बिन्दु’ नामक कविता से ली गई हैं जिसके रचयिता डॉ. प्रभाकर माच्चे हैं। |
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प्रतिभा का मूल बिन्दु कविता का अँग्रेजी में भावार्थ लिखें। |
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Answer» In this poem, the poet Dr. Prabhakar Machwe, analyzes the source of genius, and where it comes from. Then the poet himself says about genius, that she is the queen of day-dreams. The artist points towards a lump of clay and says that that is genius, and the painter gathers his instruments to produce something artistic implying that genius is in it. The singer says that genius lies in the divine voice. Does only imagination qualify as a genius? Is genius the delicate fairy of braided thought? Can only novel astonishment be called genius? Or is it a productive technique? Is genius the language of the tantriks? Or is genius the verses of the theoreticians? Is genius the chemistry of perception? Or is it the quivering fish in deep waters? Then, the poet receives an answer from genius itself. Genius herself says that she lives in unending difficulty and suffering. She lives in the tireless believer who constantly battles to move ahead in life, and she lives in people who undertake such difficult tasks as standing on the sharp edge of a sword. |
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इस दुनिया में कौन अनचाहा रह गया? |
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Answer» कवि इस दुनिया में अनचाहा रह गया। |
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सुख की एक साँस पर क्या निछावर है? |
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Answer» सुख की एक साँस पर अमरत्व निछावर है। |
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दुनिया कैसी है? |
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Answer» दुनिया ममतामयी है। |
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कवि बच्चन का जीवन कैसे बीता? |
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Answer» कवि बच्चन का जीवन दुःख में बीता। |
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बच्चन जी जीवन की अंतिम घड़ियों में भी क्या कहते हैं? |
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Answer» बच्चन जी जीवन की अंतिम घड़ियों में भी यह सन्देश देना चाहते हैं- भले ही जीवन दुःख से बीता है लेकिन फिर भी यही कहूँगा कि ‘सुख की एक साँस पर अमरत्व निछावर है। सुख का एक पल भी अमरत्व से बढ़कर होता है। |
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कवि बच्चन क्या खोकर रंक हुए? |
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Answer» कवि बच्चन अपनी निज निधि खोकर रंक हुए। |
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बच्चन जी ने जग में क्या लुटाया और क्यों? |
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Answer» समाज के प्रति उदारवादी दृष्टिकोण रखनेवाले बच्चन जी ने गूंज-गूंज कर मिटनेवाले गीत बनाए। जब जब समाज के लोगों ने उनके सामने हाथ फैलाए, बच्चन जी ने अपने सुमधुर गीतों का कोष लुटाया जिससे उसका गीत सार्थक बन गया। इन वर्गों को लुटाकर अपने गीतों को लोगों से सुना-सुनाकर अपने गीतों को, वर्णों को खोकर वह गरीब हुआ है। यह कोष उनके लिए ‘निधि’ के समान था। इसे लुटाकर कवि अपने जीवन को सार्थक समझता है। |
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कवि बच्चन जी ने क्या लुटाया? |
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Answer» कवि बच्चन जी ने कविताओं का कोष/वर्णकोष लुटाया। |
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बच्चन जी ने संसार और जीवन के संबंध में क्या कहा है? |
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Answer» बच्चन जी संसार और जीवन के सम्बन्ध में कहते हैं कि जब-जब इस जग ने हाथ फैलाये, तो मैंने अपना कोष लुटा दिया। इतना ही नहीं, अपनी सम्पूर्ण निधि (संपत्ति) देकर स्वयं रंक हो गया। मैंने चाहा कि कम-से-कम तुम मेरा गान अपना लो अर्थात गाओगे तो मैं और मेरा गान अमर हो जाएगा; पर ऐसा हुआ नहीं। इस बहुरूपी संसार को मैंने सराहा, इसे ममता भी दी; फिर भी मेरी तमन्ना है कि मेरा गान अमर हो जाए। |
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बच्चन जी ने किस प्रकार के गीत बनाए? |
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Answer» कवि बच्चन जी ने गूंज-गूंजकर मिटनेवाले गीत बनाये। |
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ससंदर्भ भाव स्पष्ट कीजिए:जब-जब जग ने कर फैलायेमैंने कोष लुटाया,रंक हुआ मैं निज निधि खोकर,जगती ने क्या पाया? |
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Answer» प्रसंग : प्रस्तुत पद्यांश हमारी पाठ्य पुस्तक ‘साहित्य वैभव’ के ‘तुम गा दो, मेरा गान अमर हो जाए’ से लिया गया है जिसके रचयिता डॉ. हरिवंशराय बच्चन’ हैं। |
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ससंदर्भ भाव स्पष्ट कीजिएःजन्मों के जीवन मृत्यु मीत! मेरी हारों की मधुर जीत!झुक रहा तुम्हारे स्वागत में मन का मन शिर का शिर विनीत। |
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Answer» प्रसंग : प्रस्तुत पंक्तियाँ हमारी पाठ्य पुस्तक ‘साहित्य वैभव’ के ‘तुम आओ मन के मुग्ध मीत’ नामक कविता से ली गई हैं जिसके रचयिता डॉ. सरगु कृष्णमूर्ति हैं। |
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‘तुम आओ मन के मुग्ध मीत’ कविता के कवि कौन हैं? |
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Answer» ‘तुम आओ मन के मुग्ध मीत’ कविता के कवि डॉ. सरगु कृष्णमूर्ति हैं। |
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कवि आँधी में सुनवाने के लिए कौन-सा गीत मानते हैं? |
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Answer» कवि आँधी में सुनवाने के लिए रज का जीव गीत मानते हैं। |
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ससंदर्भ भाव स्पष्ट कीजिएःझन झनन झनन झंझा झकोर-से झंकृत यह जीवन निशीथसब क्षणिक, वणिक वत् स्वार्थ मग्न तुम एक मात्र निस्वार्थ मीत।दुख दैन्य अश्रु दारिद्र्य धार-कर गए मुझे ही मनो-नीततूफान और इस आँधी में सुनवाने रज का जीव गीत। |
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Answer» प्रसंग : प्रस्तुत पंक्तियाँ हमारी पाठ्य पुस्तक ‘साहित्य वैभव’ के ‘तुम आओ मन के मुग्ध मीत’ नामक कविता से ली गई हैं जिसके रचयिता डॉ. सरगु कृष्णमूर्ति हैं। |
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तुम गा दो, मेरा गान अमर हो जाए कविता का अँग्रेजी में भावार्थ लिखें। |
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Answer» The following is a poem by one of the most renowned poets in modern Hindi literature, Dr Harivanshrai Bachchan. The poet tells his students to sing his song, and through their singing, making his song immortal. The poet has made his song by decorating all its parts and embellishing all the sections. He feels that his song is going to echo all around and eventually die out. But the sound of the cuckoo seems to reach heaven. In order to prevent his song from dying out, the poet asks his students to sing his song and make it immortal. Whenever the universe has opened its arms, the poet has partaken of its treasure. He has in turn given up everything and become penniless. What did the universe gain? The poet says that although he has nothing to give as a gift, he would still like the students to get something. He hopes that whatever he is able to give, becomes immortal. Thus, he tells his students to sing his song, and that will make it immortal. The poet has accepted whatever is beautiful and even what is not beautiful in this world. Even though he was not loved, he has given love. He wants to see who chooses to love him in turn. Thus, he tells his students that by keeping his honour they will make it immortal and by singing his song, they can make that immortal too. Although the poet’s life has passed in pain and sadness, even till the last moments of his life he says that for even one breath of happiness, immortality is not too high a price to pay. If happiness touches the poet’s life, it makes his life immortal. Thus, the poet tells us to sing his song, and make it immortal. |
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तुम आओ मन के मुग्धमीत कविता का भावार्थ लिखें। |
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Answer» 1) मैं तमस्तों में भीत-भीत-झट आओ मेरे किरणमीत। कवि कहते हैं- अंधकार में डूबकर भयभीत हो गया हूँ। तू आ, मेरे किरण रूपी मीत। मुझे आत्मा के टिमटिमाते हुए सूर्य व चन्द्र के प्रकाश में ले जा। मेरे मधुर मीत! मेरे पाप को पुण्य . में बदल दो। 2) जन्मों के जीवन मृत्यु मीत! मेरी हारों की मधुर जीत! कवि कहते हैं- मेरे जन्म-मरण के पराजयों को जय में बदल दो। मैं तुम्हारा स्वागत शीश झुकाकर करता हूँ। तुम मेरे जीवन में कल्याण राग की तरह आओ जिससे मेरा अतीत भी ..आनंदमय हो उठे। कंटको के समान जीवन में, जलते हृदय में कोमल गीत गुनगुना उठे। 3) कितने दिन कितनी संध्याएँ कितने युग यों ही गए बीत कवि कहते हैं- कितने दिनों से तुम्हारी प्रतीक्षा कर रहा हूँ? मैं भयग्रस्त हो गया हूँ। इस स्वार्थी संसार में केवल तुम्ही एक मेरे निस्वार्थी मित्र हो। 4) दुख दैन्य अश्रु दारिद्र्य धार-कर गए मुझे ही मनो-नीत कवि कहते हैं- हे मीत! दुःख, दरिद्रता और दीनता से ग्रसित इस संसार में, मैं आँधी और तूफान के थपेड़ों को सहन करते हुए जी रहा हूँ। हे मीत (मित्र) तुम शुद्ध पवित्र बन आओ जिससे मेरे पाप भी धुल जाएँगे। 5) तुम नहीं सोच सकते कंपित-गुंफित है कितनी करुण प्रीत। कवि कहते हैं- इससे मुझे छुटकारा दिला दे मेरे मित्र! मुझमें करुणा भर दे, व्याकुलता मिटा दे, जीवन में प्रीति भर दे। |
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सम्भावना के विरुद्ध उत्तर सुनकर लड़के ने क्या क्रियाएँ कीं? |
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Answer» लड़के को यह आशा नहीं थी कि लड़की की इतनी जल्दी कुड़माई हो जाएगी। उसके हृदय में लड़की के प्रति एक अव्यक्त प्रेम उत्पन्न हो गया था जिसमें निश्छलता थी। सम्भावना के विरुद्ध उत्तर सुनकर उसे निराशा हुई जिसका प्रभाव उसके हृदय पर पड़ गया। मनोवैज्ञानिक तथ्य है कि जब हमारी इच्छा के विरुद्ध कुछ बात हो जाती है तो क्रोध आ जाता है और तब हम अस्वाभाविक क्रियाएँ करने लगते हैं। लड़के पर भी ऐसा ही प्रभाव पड़ा। उसने रास्ते में उपद्रव किया। उसने रास्ते में एक लड़के को धकेल दिया, छाबड़ी वाले की दिनभर की कमाई खोई, कुत्ते को पत्थर मारा, गोभीवाले के ठेले में दूध उड़ेल दिया, किसी से अन्धे की उपाधि पाई। यह सब क्रियाएँ सम्भावना के विरुद्ध उत्तर सुनकर की। |
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लड़का-लड़की का मिलन किस प्रकार हुआ? उनके बीच क्या बातें हुई? |
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Answer» बम्बूकार्ट वालों के बीच में से निकलकर लड़का-लड़की चौक की एक दुकान पर मिले। लड़को मामा के केश धोने के लिए दही लेने आया था और लड़की बड़ियाँ लेने आई थी। दुकानदार एक ग्राहक से उलझ रहा था इसलिए दोनों को बात करने का अवसर मिल गया। दोनों ने एक-दूसरे का स्थान भी जान लिया। ग्राहक से छुटकारा पाकर उसने दोनों को सौदा दिया। रास्ते में लड़के ने सहज रूप में पूछ लिया ‘तेरी कुड़माई हो गई?’ लड़की शरमाकर ‘धत्’ कहकर चली गई। सब्जीवाले, दूधवाले के यहाँ दोनों का अकस्मात् फिर मिलन हुआ। लड़के ने फिर वही प्रश्न किया। एक दिन लड़की ने उसे निराश कर दिया और कह दिया ‘ हो गई।’ |
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‘मातृभूमि के लिए’ खण्डकाव्य की कथावस्तु (कथानक या सारांश) संक्षेप में लिखिए।या‘मातृभूमि के लिए खण्डकाव्य के आधार पर चन्द्रशेखर आजाद के जीवन की प्रमुख घटनाओं का संक्षेप में उल्लेख कीजिए।या‘मातृभूमि के लिए’ खण्डकाव्य के आधार पर चन्द्रशेखर आजाद का जीवन-चरित्र संक्षेप में लिखिए।या‘मातृभूमि के लिए’ खण्डकाव्य के आधार पर चन्द्रशेखर आजाद की राष्ट्रनिष्ठा का संक्षिप्त वर्णन कीजिए। |
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Answer» डॉ० जयशंकर त्रिपाठी द्वारा रचित ‘मातृभूमि के लिए’ खण्डकाव्य तीन सर्गों में विभक्त है– प्रथम सर्ग में चन्द्रशेखर आजाद के काशी में छात्र-जीवन का प्रसंग है। चन्द्रशेखर आजाद का जन्म मध्य प्रदेश के भाँवरा ग्राम में हुआ था। बड़े होने पर वे कोशी नगरी में संस्कृत पढ़ने गये। उस समय भारत में ब्रिटिश शासन का दमन-चक्र चल रहा था। भारतीय जनता के दमन के लिए रॉलेट ऐक्ट बनाया गया था। इस राष्ट्र-विरोधी ऐक्ट का विरोध करने के लिए अमृतसर में सन् 1919 ई० में जलियाँवाला बाग में एक विशाल सभा आयोजित की गयी थी। उसी समय जनरल डायर ने वहाँ पहुँचकर गोलियों की बौछार करके निरीह जनता को भून डाला। अंग्रेजों की उक्त दमन की घटना को पढ़कर किशोर चन्द्रशेखर का मुख क्रोध से तमतमा उठा और आँखें करुणा से भर आयीं। उसने भारतमाता को यातना से मुक्ति दिलाने का निश्चय किया। द्वितीय सर्ग में चन्द्रशेखर आजाद के संघर्ष का वर्णन किया गया है। देश में असहयोग आन्दोलन के मन्द पड़ते ही चन्द्रशेखर का झुकाव शस्त्र-क्रान्ति की ओर हो गया। उन्हें स्वतन्त्रता-संग्राम के लिए बमों और पिस्तौलों का निर्माण कराने के लिए धन की आवश्यकता हुई। इन्होंने सरदार भगतसिंह, अशफाक उल्ला खाँ, रामप्रसाद बिस्मिल, मन्मथनाथ गुप्त, शचीन्द्रनाथ बख्शी आदि के साथ मिलकर 9 अगस्त, 1925 ई० को काकोरी स्टेशन के पास रेलगाड़ी से सरकारी खजाने को लूटने में अभूतपूर्व सफलता प्राप्त की। इस काण्ड में पकड़े जाने पर कुछ क्रान्तिकारियों को फाँसी और कुछ को जेल की सजा हुई, परन्तु चन्द्रशेखर आजाद और भगतसिंह सरकार की नजर से बच निकले। सन् 1928 ई० में साइमन कमीशन भारत में हो रहे स्वाधीनता के झगड़ों की जाँच के लिए आया। इस कमीशन के सारे सदस्य अंग्रेज थे। जहाँ भी यह कमीशन गया, वहीं उसका बहिष्कार और अपमान करके रोष प्रकट किया गया। पंजाब केसरी लाला लाजपत राय पर पुलिस अफसर स्कॉट ने लाठियों का घातक प्रहार किया, जिससे कुछ ही दिनों के बाद उनका देहान्त हो गया। | चन्द्रशेखर आजाद ने भगत सिंह और राजगुरु से मिलकर लाला लाजपत राय के हत्यारे पुलिस ऑफिसर स्कॉट को मारने की योजना बनायी। स्कॉट के स्थान पर साण्डर्स मारा गया। इस घटना से ब्रिटिश हुकूमत पर मानो बिजली गिर पड़ी। तृतीय सर्ग में ‘आजाद’ के जीवन के अन्तिम समय की क्रियाशीलता और बाधाओं का वर्णन किया गया है। आजाद’ जब बहुत थक जाते थे, तब वे प्रकृति के बीच जाकर विश्राम करते थे। मध्य प्रदेश की सातार नदी के तट पर हनुमान जी का मन्दिर और पर्वत की गुफा उनका ऐसा ही विश्राम-स्थल था। एक दिन आजाद फूलबाग की सभा में सशस्त्र क्रान्ति के विरुद्ध एक नेता का भाषण सुन रहे थे। वहीं पर खड़े गणेश शंकर विद्यार्थी ने उनके उत्तेजित मन को शान्त किया और कहा-“देख आजाद! नेता की, अनजानी बातों को मत सुनना। उन्हें इस बात का भय था कि आजाद कहीं इस सभा को भंग ने कर दें। फरवरी, सन् 1931 ई० को प्रयाग के अल्फ्रेड पार्क में बैठकर वे कुछ मित्रों से बातें कर रहे थे। उसी समय वहाँ पुलिस की गाड़ी आकर रुकी और पुलिस ने उन्हें चारों ओर से घेर लिया। आजाद ने अपनी पिस्तौल में गोलियाँ भरीं और पुलिस से मोर्चा लिया। पहली ही गोली में उन्होंने एक अफसर का जबड़ा उड़ा दिया। नॉट बाबर नाम के अंग्रेज एस० पी० की कलाई उड़ा दी। वह निरन्तर पुलिस पर गोलियाँ बरसाते रहे, परन्तु जब उस एकाकी वीर के पास अकेली गोली बची, तो उसे उसने अपनी कनपटी पर मारकर वीरगति प्राप्त कर ली। आजाद ने जिस जामुन के पेड़ की ओट लेकर संघर्ष किया था, वह पेड़ भारतीय जनता का पूजा-स्थल बन गया। |
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‘राम-राम यह भी कोई लड़ाई है।” लहनासिंह के शब्दों में उसकी प्रतिक्रिया लिखिए। |
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Answer» चार दिन से दिन-रात खेन्देके में बैठे हड्डियाँ अकड़ गईं। यहाँ लुधियाना से अधिक जाड़ा है। ऊपर से वर्षा और जमीन दिखाई नहीं देती। पिंडलियों तक कीचड़ में धंसे हैं। घण्टे दो घण्टे में धमाका होता है जिससे खन्दक हिल जाती है, धरती उछल जाती है। गोलों से कैसे बचें ? हर समय जलजला आता रहता है। खन्दक से बाहर साफा या कुहनी निकली कि गोली पड़ी। न मालूम जर्मन मिट्टी में लेटे हैं या पत्तों में छिपे हैं। सामने आकर नहीं लड़ते। यदि संगीन चढ़ाकर मार्च करने का हुक्म मिल जाय तो सात-सात जर्मनों को एक साथ मार दें। यह तो कायरों की लड़ाई है। सामने आकर लड़े तो लड़ाई का आनन्द है। यह कैसी लड़ाई है। |
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ससंदर्भ भाव स्पष्ट कीजिएःदुख दैन्य अश्रु दारिद्र्य धार-कर गए मुझे ही मनो-नीततूफान और इस आँधी में सुनवाने रज का जीव गीत। |
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Answer» प्रसंग : प्रस्तुत पंक्तियाँ हमारी पाठ्य पुस्तक ‘साहित्य वैभव’ के ‘तुम आओ मन के मुग्ध मीत’ नामक कविता से ली गई हैं जिसके रचयिता डॉ. सरगु कृष्णमूर्ति हैं। |
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तुम आओ मन के मुग्धमीत कविता का अँग्रेजी में भावार्थ लिखें। |
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Answer» The poet, Dr Saragu Krishnamurthy, describes the arrival of his dear friend, and the effect it has upon him, in this poem. The poet tells his friend to turn the defeats of his mortal existence into victories. I (the poet) welcome you (his friend) by bowing my head. Come into my life like the Raaga Kalyaan (virtuous or auspicious) such that even all my past becomes praiseworthy. In this life full of thorns, arise like a gentle song in my burning heart. The poet says that he has been waiting for his friend for many days. He has become frightened. In this selfish world, the poet says, you (his friend). are the only selfless (unselfish) friend that I have. The poet tells his friend that in this world full of sadness, wickedness and wretchedness, he has been living through the devastating effect of lightning and storms on him. He tells his friend to come into his life as a clean and pure object such that the dust of his sins gets washed away. The poet says that he wants his friend to give him release from all these things. He asks his friend to fill him with generosity and to remove restlessness from him. He wants his friend to fill his life with love. |
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चाचा मंगलसेन चिलम थामे क्या देख रहा था? |
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Answer» चाचा मंगलसेन चिलम थामे सपने देख रहा था कि वह समधियों के घर में बैठा है और वीरजी की सगाई हो रही है। |
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चाचा मंगलसेन का चरित्र-चित्रण कीजिए। |
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Answer» मंगलसेन वीरजी के रिश्ते में चाचा लगते थे। वे सेवानिवृत फौजी थे और अब बुढ़ापे में वीरजी के घर में टिके हुए थे। वीरजी के बाबूजी अपने भाई का अपमान करते रहते थे। मंगलसेन को गरीबी और लाचारी ने एक हास्यास्पद व्यक्ति में तब्दील कर दिया था। |
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‘उसने कहा था’ कहानी की पृष्ठभूमि में किस युद्ध का वातावरण चित्रित है? |
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Answer» 'उसने कहा था’ कहानी, प्रथम विश्वयुद्ध जो 1914 ई. से 1918 ई. में इंग्लैण्ड और जर्मनी के बीच हुआ था, की पृष्ठभूमि पर आधारित है। युद्धकालीन चित्रण सजीव है। युद्ध क्षेत्र में सैनिकों को क्या कष्ट सहन करना पड़ता है, उसका यथार्थ वर्णन है। |
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‘बिना फेरे घोड़ा बिगड़ता है और बिना लड़े सिपाही’-कथन की युक्तियुक्त विवेचना कीजिए। |
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Answer» उपर्युक्त पंक्ति में लेखक की लोकानुभूति छिपी है। घोड़े को घुमाना और संध्या को धूल में लिटाना बहुत आवश्यक है। अगर घोड़े को घुमायें नहीं तो वह अड़ियल हो जाता है और फिर आसानी से ताँगे में चलता नहीं है। यदि उसे संध्या में धूल में लिटाएँ नहीं तो उसकी दिनभर की थकान दूर नहँ होती । इसलिए उसे फिरोना आवश्यक है। इसी प्रकार सिपाही में लड़ने के समय जोश आता है। यदि उसे युद्ध के मैदान में लड़ने का अवसर न मिले तो वह सुस्त और आलसी हो जाता है, उसका जोश समाप्त हो जाता है। लड़ने की बात सुनकर उसका खून उबलने लगता है। इसलिए सिपाही का लड़ना आवश्यक है। |
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‘मातृभूमि के लिए खण्डकाव्य के आधार पर तृतीय सर्ग (बलिदान सर्ग) का सारांश लिखिए।या‘मातृभूमि के लिए’ खण्डकाव्य के तीसरे सर्ग के आधार पर चन्द्रशेखर आजाद के अन्तिम बलिदान के दृश्य का वर्णन कीजिए।या‘मातृभूमि के लिए खण्डकाव्य की किसी एक प्रमुख घटना का वर्णन कीजिए।या‘मातृभूमि के लिए’ खण्डकाव्य के मार्मिक दृश्यों का अंकन कीजिए।या‘मातृभूमि के लिए’ खण्डकाव्य के आधार पर उस घटना का वर्णन कीजिए जिसने आपको सबसे अधिक प्रभावित किया हो।या‘चन्द्रशेखर आजाद का जीवन विराट संघर्ष और राष्ट्रप्रेम के उदात्त पक्ष का प्रतीक था।” इस कथन पर प्रकाश डालिए।या‘मातृभूमि के लिए’ खण्डकाव्य के आधार पर चन्द्रशेखर आजाद के त्याग और बलिदान का वर्णन कीजिए।[ संकेत-इस प्रश्न के उत्तर हेतु द्वितीय एवं तृतीय सर्ग के सारांश को संक्षिप्त रूप में लिखें।]या‘मातृभूमि के लिए’ में वर्णित आजाद के जीवन के प्रेरक प्रसंगों का वर्णन कीजिए।[ संकेत-इस प्रश्न के उत्तर हेतु आजाद के ‘विद्यार्थी जीवन’ की एवं ‘अल्फ्रेड पार्क’ के प्रसंग को संक्षेप में लिखें। |
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Answer» तृतीय सर्ग में ‘आजाद के जीवन के अन्तिम समय की क्रियाशीलता और बाधाओं का वर्णन किया गया है। ‘आजाद जब बहुत थक जाते थे, तब वे प्रकृति के बीच जाकर विश्राम करते थे। मध्य प्रदेश की सातार नदी के तट पर हनुमान जी का मन्दिर और पर्वत की गुफा उनका ऐसा ही विश्राम-स्थल था। वे फाल्गुन के सुहावने दिनों में ऊषाकाल के समय संघर्ष से थककर अपने मित्र रुद्र के साथ बैठकर भावी संघर्ष की योजना बना रहे थे। मित्रों की याद करके बदला लेने के लिए बार-बार उनका चेहरा तमतमा उठता था। उन्होंने अपने मित्र से कहा कि “अंग्रेजों ने भारतमाता के पुत्रों के खून से उसका आँचल रँग दिया है। इस कृत्य के लिए मैं अंग्रेजों को छोड़ नहीं सकता। आर्मी के संगठन को मजबूत करके क्रान्ति का बिगुल बजाते हुए मुझे अपना दायित्व पूरा करना ही होगा। एक दिन आजाद फूलबाग की सभा में सशस्त्र क्रान्ति के विरुद्ध एक नेता का भाषण सुन रहे थे। वहीं पर खड़े गणेश शंकर विद्यार्थी ने उनके उत्तेजित मन को शान्त किया और कहा-“देख आजाद! नेता की अनजानी बातों को मत सुननी। उन्हें इस बात का भय था कि आजाद कहीं इस सभा को भंग ने कर दें। उनका यह विचार भ्रम-मात्रे ही था; क्योंकि आजाद स्वतन्त्रता की लड़ाई के लिए शासन से अपने आपको सुरक्षित रखना चाहते थे। उन्होंने बताया कि वे प्रयाग जाकर जवाहरलाल नेहरू, पुरुषोत्तम दास आदि मित्रों से मिलकर भावी योजना बनाना चाहते थे और उसके बाद उनका अहमदाबाद जाने का विचार था। फरवरी, सन् 1931 ई० को प्रयाग के अल्फ्रेड पार्क में बैठकर वे कुछ मित्रों से बातें कर रहे थे। उसी समय वहाँ पुलिस की गाड़ी आकर रुकी और पुलिस ने उन्हें चारों ओर से घेर लिया। आजाद ने क्षणभर में अपने मित्रों को विदा करके अपनी पिस्तौल में गोलियाँ भरीं और पुलिस से मोर्चा लिया। पहली ही गोली मैं उन्होंने एक अफसर का जबड़ा उड़ा दिया। नॉट बाबर नाम के एक अंग्रेज एस०पी० ने वृक्ष की ओट से गोलियाँ दागनी शुरू कर दीं। ‘आजाद’ अकेले ही उससे मोर्चा ले रहे थे। उन्होंने एक घण्टे तक डटकर विशाल पुलिस दल का मुकाबला किया और एक गोली से एस०पी० की कलाई उड़ा दी। वह निरन्तर पुलिस पर गोलियाँ बरसाते रहे, परन्तु जब उस एकाकी वीर के पास अकेली गोली बची, तो उसे उसने अपनी कनपटी पर मारकर वीरगति प्राप्त कर ली। नॉट बाबर को उनके मरने पर सन्देह था, इसलिए उसने आजाद के तलुवे में गोली मारकर अपना सन्देह दूर किया। आजाद के विस्मयकारी बलिदान से सारा देश स्तब्ध रह गया। आजाद ने जिस जामुन के पेड़ की ओट लेकर संघर्ष किया था, वह पेड़ भारतीय जनता का पूजास्थल बन गया। अंग्रेज सरकार ने आतंकित होकर उसको भी समूल कटवा दिया। |
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यदि आप लहनासिंह के स्थान पर होते तो युद्धभूमि में क्या करते? तर्क सहित उत्तर दीजिए। |
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Answer» प्रत्येक नागरिक के लिए देश और उसकी सुरक्षा अत्यंत आवश्यक होती है। व्यक्तिगत स्वार्थ को छोड़कर देश के लिए जीवन जीना सच्चे नागरिक का कर्तव्य है। लहनासिंह ने भी एक सच्चे सिपाही का उत्तरदायित्व निभाया। ठण्ड में खन्दक में खड़े रहकर भी कष्ट सहता रहा, पीछे नहीं हटा। यदि हम लहनासिंह के स्थान पर होते तो हम भी एक सच्चे सिपाही का कर्तव्य निर्वाह करते। सचेत रहते और शत्रु की प्रत्येक गतिविधि पर ध्यान देते। अपनी चिन्ता न करके शत्रु का सामना करते। साथियों के साथ प्रेम से मिलकर रहते, एक-दूसरे को उत्साहित करते । मन में निराशा और दु:ख का भाव नहीं लाते । सहन शक्ति पैदा करते। ऋतु परिवर्तन एवं उसके प्रभाव से प्रभावित नहीं होते। शत्रु को मुँहतोड़ जबाव देना हमारा लक्ष्य होता । हर पल सावधान रहते। न जाने शत्रु कब धावा बोल दे, इसके लिए सदैव तैयार रहते। देश के लिए मर मिटना हमारा लक्ष्य होता। लहनासिंह की तरह तुरन्त निर्णय लेते। |
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‘उसने कहा था’ कहानी के शीर्षक की सर्वाधिक बड़ी विशेषता है –(क) शीर्षक छोटा है।(ख) जिज्ञासात्मक है।(ग) रहस्यात्मक है।(घ) घटनाधारित है। |
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Answer» (ख) जिज्ञासात्मक है। |
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‘मातृभूमि के लिए’ खण्डकाव्य के आधार पर चन्द्रशेखर आजाद का संकल्प उदाहरणसहित स्पष्ट कीजिए।या‘मातृभूमि के लिए’ खण्डकाव्य के संकल्प (प्रथम) सर्ग की कथावस्तु संक्षेप में लिखिए।या‘मातृभूमि के लिए खण्डकाव्य के आधार पर ‘संकल्प’ (प्रथम) सर्ग का सारांश लिखिए।या‘मातृभूमि के लिए खण्डकाव्य के आधार पर तत्कालीन भारत की स्थिति का वर्णन संक्षेप में कीजिए।या‘मातृभूमि के लिए खण्डकाव्य के आधार पर सिद्ध कीजिए कि अंग्रेजों ने भारतवर्ष पर बहुत अत्याचार किये।या‘मातृभूमि के लिए’ खण्डकाव्य के प्रथम सर्ग का सारांश लिखिए। |
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Answer» डॉ० जयशंकर त्रिपाठी द्वारा रचित ‘मातृभूमि के लिए’ खण्डकाव्य तीन सर्गों में विभक्त है ⦁ संकल्प प्रथम सर्ग में चन्द्रशेखर आजाद के काशी में छात्र-जीवन का प्रसंग है। चन्द्रशेखर आजाद का जन्म मध्य प्रदेश के भाँवरा ग्राम में हुआ था। बड़े होने पर वे काशी नगरी में संस्कृत पढ़ने गये। उस समय भारत में ब्रिटिश शासन का दमन-चक्र चल रहा था। भारतीय जनता के दमन के लिए रॉलेट ऐक्ट बनाया गया था, जिसके अनुसार देशभक्तों पर राजद्रोह का मुकदमा चलाकर उन्हें दण्डित किया जाता था। पुलिस जिसको भी द्रोही कह देती थी, वही दण्डित कर दिया जाता था। इस राष्ट्र-विरोधी ऐक्ट का विरोध करने के लिए अमृतसर में सन् 1919 ई० में जलियाँवाला बाग में एक विशाल सभा आयोजित की गयी थी। वहाँ देशभक्तों के भाषण हो रहे थे, उसी समय जनरल डायर ने वहाँ पहुँचकर गोलियों की बौछार करके निरीह जनता को भून डाला। मरने वालों में बच्चों और औरतों की संख्या अधिक थी। इतने से ही डायर की भूख शान्त नहीं हुई। कितने ही बेगुनाहों को हथकड़ियाँ डालकर जेल में ढूंस दिया गया। 150 गज लम्बी सँकरी गली से नर-नारियों को पेट के बल चलाकर यातनाएँ दी गयीं।। अंग्रेजों की उक्त दमन की घटना ‘मर्यादा’ नामक राष्ट्रीय पत्र की सुर्वी में (प्रमुखता से) प्रकाशित हुई। इस घटना को पढ़कर किशोर चन्द्रशेखर का मुख क्रोध से तमतमा उठा और आँखें करुणा से भर आयीं। उसने संस्कृत सूत्रों को रटना छोड़कर भारतमाता को यातना से मुक्ति दिलाने का निश्चय किया और भारतमाता के गुलाम रहते अपना जीवन व्यर्थ समझा। आजाद ने संकल्प लिया कि जब तक वह भारतमाता को स्वतन्त्र नहीं करा देगा, तब तक अंग्रेजों से लड़ता रहेगा- इस जन्मभूमि के लिए प्राण उसी समय महात्मा गाँधी ने अंग्रेजों का असहयोग करने के लिए आह्वान किया। उनकी एक पुकार पर देशभक्त छात्रों ने विद्यालय तथा राष्ट्रभक्तों ने नौकरी छोड़ दी और स्वतन्त्रता-संग्राम में कूद पड़े। वे सरकारी कार्यालयों पर धरना देते थे। जब पुलिस अश्रु-गैस के गोले छोड़ती और लाठियाँ बरसाती थी तब देशभक्त लाठियाँ खाते और सवारों से कुचले जाते थे, फिर भी इंकलाब का नारा लगाने से न रुकते थे। चन्द्रशेखर को देशद्रोह के अभियोग में बन्दी बना लिया गया था। मजिस्ट्रेट के द्वारा परिचय पूछने पर उन्होंने अपना नाम ‘आजाद’, पिता का नाम ‘स्वाधीन’ तथा घर ‘जेलखाना’ बताया। मजिस्ट्रेट बालक के साहस को देखकर स्तम्भित रह गया। उसने उसे 15 बेंत लगाये जाने का दण्ड दिया। चन्द्रशेखर प्रत्येक बेंत के प्रहार पर ‘भारतमाता की जय’ के नारे लगाता रहा। उसके इस कार्य ने जनता में असीम साहस का संचार किया- पर बालक वह अंगारा था जैसे ही वह कारागार से मुक्त हुआ, उसका भव्य स्वागत किया गया और उसके शौर्य का बखान किया गया। तभी से उस बालक को ‘आजाद’ कहकर सम्मानित किया जाने लगा। |
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लहनासिंह दियासलाई का बहाना बनाकर अन्दर क्यों गया? |
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Answer» वह समझ गया कि हम पर आफत आ गई है। हम पर आक्रमण होगा। वह वजीरासिंह को जगाकर सूबेदार को वापिस बुलाना चाहता था अन्यथा सूबेदार भटकता रहेगा और खन्दक पर आक्रमण हो जाएगा। उसने वजीरासिंह को सारी कहानी सुनाकर शीघ्र ही जाने को तैयार किया और स्वयं लपटन की हरकतों पर ध्यान देने लगा। |
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आगन्तुक लपटन को देखकर लहनासिंह का माथा क्यों ठनका? |
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Answer» एक तो उसने सिगरेट देने की बात कही जबकि सिख सिगरेट नहीं पीते दूसरे उसने सिगड़ी के प्रकाश में उसका मुँह देख लिया, बाल देख लिए। पट्टेदार बालों के स्थान पर कैदियों के से बाल थे। यह सब देखकर उसका माथा ठनका। |
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“आँख मारते-मारते लहनासिंह सब समझ गया।” लहनासिंह क्या समझ गया? |
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Answer» आगन्तुक जर्मन लपटन ने जब उसे सिगरेट पीने को दी तो लहनासिंह समझ गया कि यह भारतीय लपटन नहीं है। भारतीय वर्दी में जर्मन लपटन है। हमारे लपटन साहब मारे गये हैं या कैद हो गये हैं। हमारे साथ धोखा हुआ है। यह धोखेबाज है और इसने हमें धोखा दिया है। |
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अच्छा मेरी जरसी पहन लो।’ लहनासिंह ने बोधासिंह को अपनी जरसी क्यों दी और क्या कहकर सन्तुष्ट किया? |
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Answer» बोधासिंह को कैंपकपी सी छूट रही थी । दाँत बज रहे थे। इसीलिए लहनासिंह ने उपर्युक्त कथन कहते हुए बोधासिंह को अपनी जरसी दी और यह कहकर संतुष्ट किया कि “मेरे पास सिगड़ी है और मुझे गर्मी लगती है। पसीना आ रहा है। मेरे पास दूसरी जरसी है जो विलायत से मेम ने बुनकर भेजी है।” |
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लहनासिंह खन्दक में क्यों रुक गया? |
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Answer» लहनासिंह बोधासिंह की देखभाल के लिए खंदक में रुक गया। |
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वजीरासिंह की बात सुनकर सब खिलखिलाकर क्यों हँस पड़े? |
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Answer» वजीरासिंह पलटन का विदूषक था। खाई से पानी बाहर फेंकते हुए उसने कहा ‘मैं पाधा बन गया हूँ। करो जर्मनी के बादशाह का तर्पण।’ उसकी इस मजाकिया बात को सुनकर सब खिलखिलाकर हँस पड़े और उदासी के बादल छंट गये। |
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लड़के ने हँसी में चिढ़ाने के लिए पूछा-लड़के ने लड़की से क्या पूछा? |
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Answer» लड़के ने पूछा ‘तेरी कुड़माई हो गई’? लड़की ने कहा ‘हाँ हो गई’। लड़के को यह सुनकर निराशा हुई |
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हजारासिंह रिलीफ की प्रतीक्षा क्यों कर रहा था? उसके शब्दों में लिखिए। |
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Answer» रिलीफ के आने पर खन्दक से छुट्टी मिलेगी। हड्डियों को पाने वाली ठण्ड से बचेंगे। अपने हाथों झटका करेंगे और पेट . भर खाकर सो रहेंगे। फिरंगी मेम की मखमली घास का आनन्द लेंगे और उसके द्वारा दिये गये दूध और फल का आनन्द लेंगे। |
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अमृतसर के गाड़ी वालों की जबान और बम्बूकार्ट वालों की बोली में क्या अन्तर है? |
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Answer» अमृतसर के गाड़ी वालों की जबान कड़वी थी जिसे सुनकर सभी को बुरा लगता था। बम्बूकार्ट वालों की जबान में मिठास थी जिसे सुनकर किसी को बुरा नहीं लगता था। वे ‘जी’ और ‘साहब’ शब्दों का प्रयोग करके ही लोगों को रास्ते से हटाते थे। |
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“लाडी होरा को भी यहीं बुला लोगे? या वही दूध पिलाने वाली फिरंगी मेम”-लहनासिंह के उपर्युक्त कथन में निहित है –(क) व्यंग्य(ख) झिड़कना(ग) कटुता(घ) उपहास। |
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Answer» “लाडी होरा को भी यहीं बुला लोगे? या वही दूध पिलाने वाली फिरंगी मेम”-लहनासिंह के उपर्युक्त कथन में निहित है उपहास। |
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लहनासिंह हँसकर बोला-“क्यों लपटन साहब? मिजाज कैसा है?” लहनासिंह के हँसने में निहित भाव था –(क) व्यंग्य(ख) मजाक(ग) क्रोध(घ) चिढ़ाना |
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Answer» लहनासिंह हँसकर बोला-“क्यों लपटन साहब? मिजाज कैसा है?” लहनासिंह के हँसने में निहित भाव था व्यंग्य। |
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| 46. |
लहनासिंह, बोधासिंह का बहुत अधिक ध्यान रखता था –(क) साथी होने के कारण(ख) सेवा भाव होने के कारण(ग) सूबेदारनी को वचन देने के कारण(घ) कर्तव्य पालन के कारण। |
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Answer» (ग) सूबेदारनी को वचन देने के कारण |
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‘बिना फेरे घोड़ा बिगड़ता है और बिना लड़े सिपाही।’ यह कथन है –(क) लहनासिंह का(ख) हजारासिंह का(ग) बोधासिंह का(घ) वजीरासिंह का। |
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Answer» (क) लहनासिंह का |
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उसने कहा था’ कहानी की मूल संवेदना क्या है? |
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Answer» कहानी बड़ी मार्मिक है। कहानी की मूल संवेदना निश्छल प्रेम, त्याग और कर्तव्यनिष्ठा है। लहनासिंह बचपन में अंकुरित प्रेम के लिए अपने जीवन का उत्सर्ग करता है और जो वचन दिया था उसके लिए त्याग करता है। दूसरी ओर वह एक सिपाही है जिसका लक्ष्य देश की रक्षा करना है। वह अपने कर्तव्य का निर्वाह करता है। जर्मन अधिकारी को मौत के घाट उतार देता है। शरीर में लगे घावों की चिन्ता छोड़कर शत्रुओं का सामना करता है। वह प्रेम और देश दोनों के लिए त्याग करता है और अपने कर्तव्य का निर्वाह करता है। इस प्रकार लहनासिंह का प्रेम, त्याग और कर्तव्यपरायणता ही कहानी की मूल संवेदना है। |
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पलटने का विदूषक किसे माना जाता था? |
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Answer» विदूषक का शाब्दिक अर्थ है ‘मसखरा’ अर्थात् पलटन में जो सबको हँसाए, सबका मनोरंजन करे तथा सिपाहियों की उदासीनता और थकान दूर करे। कहानी में वजीरासिंह विदूषक है। उसने अपने आपको ‘पाधा’ कहकर सबको प्रसन्न कर दिया। |
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‘तेरी कुड़माई हो गई?’ कथन में निहित भाव है –(क) अवसाद(ख) असफलता(ग) निश्छल प्रेम(घ) वेदना। |
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Answer» (ग) निश्छल प्रेम |
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