Explore topic-wise InterviewSolutions in Current Affairs.

This section includes 7 InterviewSolutions, each offering curated multiple-choice questions to sharpen your Current Affairs knowledge and support exam preparation. Choose a topic below to get started.

1.

संसार को कवि संदेश देना चाहता है –(क) मस्ती का(ख) देश प्रेम का(ग) सत्य की खोज का(घ) त्यागमय जीवन का

Answer»

संसार को कवि संदेश देना चाहता है मस्ती का

2.

भूपों के प्रासाद किस पर निछावर हैं तथा क्यों?

Answer»

राजाओं के महलों की सुख-सुविधा कवि को आकर्षित नहीं करती। वह तो अपनी झोपड़ी (खण्डहर) से ही संतुष्ट है। आत्म-संतोष के कारण राजमहलों को वह खण्डहर पर निछावर करता है। कवि के विचार धन के पीछे भागने वाले जगत से नहीं मिलते। उसका त्याग, प्रेम और मस्ती भरे जीवन में ही विश्वास है। इसी कारण उसे महलों की सुख-सुविधाएँ तुच्छ प्रतीत होती हैं।

3.

‘फिर मूढ़ न क्यों जग जो इस पर भी सीखे?’ -सांसारिक ज्ञान के बारे में कवि का क्या विचार है?अथवाकवि ने संसार को मूर्ख क्यों कहा है?

Answer»

कवि ने संसार को मूढ़ (मूर्ख) माना है क्योंकि लोग उस सांसारिक ज्ञान के पीछे पड़े हैं जो उन्हें सत्य तक नहीं पहुँचा सकता। वे परमात्मा तक पहुँचाने वाले सच्चे आत्मिक ज्ञान की उपेक्षा कर रहे हैं। अनुपयुक्त साधन (भौतिक ज्ञान) को अपनाकर सत्य (परमात्मा) को पाने की कामना करने वाला यह संसार मूर्ख ही तो है।

4.

‘यौवन के उन्माद’ से कवि का आशय क्या है?

Answer»

‘यौवन के उन्माद’ से कवि का आशय उसके जीवन में व्याप्त वह उत्साह है जिसके साथ वह मस्ती से जीवन बिता रहा है।

5.

कवि के रोने को लोग गाना क्यों समझ लेते हैं?

Answer»

कवि शान्त, शीतल, मधुर वाणी में अपने मन की व्यथा प्रकट करता है, किन्तु लोग उसे उसका गीत समझ लेते हैं।

6.

संसार से कवि का सम्बन्ध कैसा है?

Answer»

कवि के आदर्श संसार की मान्यताओं के विपरीत हैं। कहाँ स्वार्थ से घिरा जग और कहाँ त्याग-प्रेम से परिपूर्ण कवि। इस तरह संसार से सम्बन्ध रखना कवि के लिए सम्भव नहीं है। कवि का संसार से विरोधमूलक सम्बन्ध है।

7.

कवि संसार को क्यों ठुकराता है?

Answer»

यह संसार नित्य वैभव जोड़ने में लगा रहता है। त्याग भावना से दूर रहकर जोड़ने में लगे जगत् को कवि ठोकर मारता है। कवि परहित के लिए त्याग में विश्वास करता है जबकि संसार संग्रह में लगा है। वह तो जग जीवन का भार उठाए हुए भी जगत को प्यार बाँटा करता है। अपने डर के उपहारों से सभी के मन प्रसन्न करना चाहता है। अत: वह धन-संपत्ति के पीछे भागने वाले संसार को कैसे स्वीकार का सकता है।

8.

‘जग की गाते’ से कवि का क्या तात्पर्य है?

Answer»

‘जग की गाते’ का तात्पर्य है संसार की इच्छाओं के अनुसार काम करना। दूसरों को प्रिय लगने वाली, चाटुकारितापूर्ण, ठकुरसुहाती बातों को ही कवि ने जग की गाते कहा है।

9.

‘यह अपूर्ण संसार न मुझको भाता’-इस पंक्ति के अनुसार कवि को यह संसार अधूरा क्यों लगता है?

Answer»

इस संसार में सब कुछ अपूर्ण-अधूरा है। कुछ भी स्थायी नहीं है, सभी माया-मोह में फंसे हैं तथा राग-द्वेष और स्वार्थपरता में लीन हैं। कवि का अपना अलग ही सपनों का संसार है। कवि उसी में पूर्णता पाता है।

10.

कवि ने ‘साँसों के दो तार’ किसे कहा तथा क्यों?

Answer»

कवि ने जीवन की तुलना तारों के बाजे से की है। जीवन साँसों के चलने तक उसी प्रकार चलता है जैसे तारों को छेड़ने तक उनसे संगीत की मधुर ध्वनि निकलती रहती है।

11.

कवि ने संसार को मूढ़ क्यों बताया है?

Answer»

संसार के लोग निरंतर सत्य को जानने का दावा किया करते हैं किन्तु अहंकार के कारण वे सत्य को नहीं जान पाते। फिर भी वे सत्य की खोज में लगे हैं। इसी कारण कवि ने उन्हें ‘मूढ़’ (मूर्ख) कहा है।

12.

‘जग जीवन का भार’ से कवि का क्या आशय है?

Answer»

कवि का आशय है कि संसार में रहकर मुनष्य को अनेक उत्तरदायित्वों का निर्वाह करना होता है। इस कारण जीवन आसान नहीं रह जाता। कर्तव्यों के गुरुतर भार को ही ‘जग जीवन का भार’ कहा गया है।

13.

‘मैं कभी न जग का ध्यान किया करता हूँ-कथन से कवि का क्या आशय है? अथवा कवि जग का ध्यान क्यों नहीं करता?

Answer»

संसार स्वार्थी है। कवि त्याग और निस्वार्थ प्रेम के आदर्श में विश्वास करता है। संसार का आचरण उससे भिन्न है। अत: कवि जग का ध्यान नहीं करता।

14.

‘मैं सीख रहा हूँ सीखा ज्ञान भुलाना’-कवि ने क्या सीखा है? उसे वह भुलाना क्यों चाहता है?

Answer»

कवि ने ज्ञान तो प्राप्त किया है परन्तु उसका ज्ञान भौतिक अनुभवों पर आधारित है। उसमें त्याग नहीं संग्रह की वृत्ति है; गुणों के कारण किसी का सम्मान करने की भावना नहीं, चापलूसों तथा ठकुरसुहाती करने वालों को महत्त्व देने का भाव है। अत: यह लक्ष्य (सत्य) प्राप्ति में बाधक है। कवि इस अपूर्ण ज्ञान को भुला देना चाहता है।

15.

शीतल वाणी में आग लिए फिरने’ से कवि का क्या अभिप्राय है?

Answer»

कवि के विचार लोगों में ओज और उत्साह भरने वाले हैं। कवि संसार के हित के लिए अनुचित और अनुपयोगी विश्वासों का विरोध करता है। वह अपनी बात कहने के लिए अप्रिय शब्दों का प्रयोग नहीं करता। वह वाणी की कठोरता में नहीं मधुरता में विश्वास करता है।’आग’ से कवि का संकेत अपने मन की व्यथा भी है। जिसे वह शीतल वाणी में रचित अपने गीतों में छिपाए हुए है।

16.

‘शीतल वाणी में आग’-के होने का क्या अभिप्राय है?

Answer»

अभिप्राय है कि कवि की वाणी (कविता) यद्यपि से हृदय को शांति और शीतलता प्रदान करने वाली है किन्तु उसमें प्रियतम के विरह में व्याकुल कवि के हृदय की वेदनारूपी आग भी सुलगती रहती है। इसे केवल कवि ही जानता है।

17.

कवि ने संसार को बताया है –(क) अति सुंदर(ख) अपूर्ण(ग) संवेदनशील(घ) निर्दय

Answer»

कवि ने संसार को बताया है अपूर्ण

18.

‘दीवानों का वेश लिए फिरने’ से कवि का आशय क्या है?

Answer»

कवि अपने मन की पीड़ा जताकर किसी की सहानुभूति या दया पाना नहीं चाहता। अत: वह अपने हाव-भाव, व्यवहार और कविता में मस्ती और दीवानगी लिए जी रहा है।

19.

‘मैं बना-बना कितने जग रोज मिटाता’-से कवि का क्या तात्पर्य है?

Answer»

कवि होने के कारण वह अपनी कल्पना में अनेक लोकों की रचना करता है। अपने रचे हुए जगत् को जब वह अपने आदर्शों के अनुकूल नहीं पाता तो उनको मिटा देता है। यह सृजन और विनाश उसका नित्य का कार्य है। फिर वह उस संसार की चिन्ता क्यों करे जिससे उसके विचार नहीं मिलते।

20.

'निज उर के उद्गार’ और ‘निज उर के उपहार’ से कवि का आशय क्या है?

Answer»

कवि का आशय है कि वह दूसरों को खुश करने के लिए कविता नहीं लिखता। उसकी कविता में उसके मन के भाव प्रकट होते हैं। कविता में प्रकट उसके प्रेम भरे भाव उसकी ओर से लोगों को दी गई भेंट है।

21.

कवि ने स्वयं को दीवाना क्यों कहा है?

Answer»

कवि नहीं चाहता कि उसे एक कवि के रूप में स्मरण किया जाए। वह तो स्वयं को प्रेम का दीवाना बताता है। केवल काव्य-रचना से संसार में प्रसिद्धि पाना उसका लक्ष्य नहीं है। वह तो संसार को प्रेम और मस्ती का ऐसा संदेश देना चाहता है, जिसे सुनकर सारा संसार झूमने, झुकने और लहराने को बाध्य हो जाय। यही कारण है कि कवि स्वयं को “दुनिया का एक नया दीवाना घोषित करना है।

22.

“जग जीवन का भार” से आशय है(क) जीवन के कष्ट(ख) चिन्ताएँ(ग) उत्तरदायित्व(घ) निराश जीवन

Answer»

(ग) उत्तरदायित्व

23.

काव्यांशों की सप्रसंग व्याख्याएँ।कर यत्न मिटे सब, सत्य किसी ने जाना?नादान वहीं है, हाय, जहाँ पर दाना!फिर मूढ़ न क्या जग, जो इस पर भी सीखे?मैं सीख रहा हूँ, सीखा ज्ञान भुलाना!

Answer»

कठिन शब्दार्थ–यत्न = उपाय। मिटे = मिट गए, संसार से चले गए। नादान = अज्ञानी । दाना = बुद्धिमान, ज्ञानी । मूढ़ = मूर्ख। सीखे = ज्ञान पाने का यत्न करे। सीख रहा = प्रयत्न कर रहा हूँ॥

संदर्भ तथा प्रसंग-प्रस्तुत काव्यांश हमारी पाठ्यपुस्तक में संकलित कवि हरिवंश राय बच्चन की कविता ‘आत्म-परिचय’ से लिया गया है। इस अंश में कवि सत्य की खोज में लगे लोगों को नादान बताते हुए, ज्ञान के अहंकार से मुक्त होने का संदेश दे रहा है।

व्याख्या- कवि कहता है कि संसार में सभी लोग परम सत्य की खोज में लगे हैं परन्तु उनके नानाविध प्रयत्न सफल नहीं होते और वे थक-हारकर बैठ जाते हैं या फिर यत्न करते-करते ही संसार से चले जाते हैं। सांसारिक बातों को जानकर ही लोग स्वयं को ज्ञान सम्पन्न समझते हैं। परन्तु वास्तव में वे अज्ञानी ही हैं। सच्चे ज्ञान के अभाव में सत्य का साक्षात्कार नहीं हो सकता, इस बात को जानकर भी वे अनजान बने रहते हैं। इतने पर भी लोग सांसारिक ज्ञान को सीखने में लगे हुए हैं। ऐसे लोगों को मूर्ख ही कहा जा सकता है। यह जानने के बाद मैंने जो कुछ अब तक सीखा है, उसे भुलाने की चेष्टा कर रहा हूँ।

विशेष-
(i) कवि ने संसार को मूढ़ कहा है। सत्य का साक्षात्कार सच्चे ज्ञान के बिना संभव नहीं है, परंतु यह संसार के लोग सांसारिक ज्ञान में फंसे रहकर भी सत्य को पाने के सपने देखते हैं।
(ii) ‘दाना’ शब्द नादान का विपरीतार्थक शब्द है। नादान नासमझ व्यक्ति को कहा जाता है और दाना बुद्धिमान को।
(iii) उपर्युक्त पद्यांश की भाषा सरल एवं भावानुकूल है। कवि ने तत्सम शब्दावलीयुक्त खड़ी बोली का प्रयोग किया है। गीत छंद का प्रयोग हुआ है। कवि ने लय और तुक का ध्यान रखा है।
(iv) उपर्युक्त काव्यांश में ‘कर यत्न मिटे सब, सत्य किसी ने जाना?’ में प्रश्नालंकार का प्रयोग हुआ है। साथ ही विरोधाभास अलंकार का प्रयोग भी है।

24.

‘आत्मपरिचय’ में कवि का यह कथन ‘शीतल वाणी में आग लिए फिरता हूँ’ का विरोधाभास स्पष्ट कीजिए।

Answer»

यद्यपि आग और शीतलता परस्पर विरोधी हैं, किन्तु कवि को आशय है कि उसकी शांत, शीतल वाणी वाली कविता में, उसके हृदय की व्यथा की आग छिपी है।

25.

काव्यांशों की सप्रसंग व्याख्याएँ।मैं और, और जगे और, कहाँ का नाता,मैं बना-बना कितने जग रोज मिटाता,जग जिस पृथ्वी पर जोड़ा करता वैभवमैं प्रति पग से उस पृथ्वी को ठुकराता!

Answer»

कठिन शब्दार्थ- और = भिन्न, अलग। नाता = संबंध बना-बना = कल्पना कर-कर के। मिटाता = त्याग देता, भुला देता॥ जोड़ा करता = इकट्ठा किया करता है। वैभव = संपत्ति । प्रति = प्रत्येक। पग = पैर। ठुकराता = ठोकर मारता॥

संदर्भ तथा प्रसंग-प्रस्तुत काव्यांश हमारी पाठ्यपुस्तक में संकलित कवि हरिवंशराय बच्चन की कविता ‘आत्म-परिचय’ से लिया गया है। कपि अपना तथा संसार का लक्ष्य अलग-अलग बता रहा है। उसे सांसारिक वैभव से कोई लगाव नहीं है।

व्याख्या-कवि कहता है कि इस संसार से उसका कोई सम्बन्ध नहीं है। उसके और संसार के लक्ष्य अलग-अलग हैं। कवि सत्य की खोज के लिए आध्यात्मिक ज्ञान को पाने में लगा है और यह संसार भौतिक सुख-सुविधाओं के संग्रह में लीन है। कवि होने के नाते वह अपनी कल्पना में अनेक लोकों का निर्माण करता है और अनुपयुक्त देखकर उनको मिटा देता है।
संसार के लोग दिन-रात जिस धरती पर धन-संपत्ति जोड़ने में लगे रहते हैं, उस भौतिक सुखों से पूर्ण धरती से उसे कोई लगाव नहीं है। वह इस वैभव के भूखे सांसारिक जीवन को ठुकराकर सत्य और प्रेम के पथ पर चलते रहना चाहता है।

विशेष-
(i) कवि ने स्पष्ट कहा है कि उसके और इस भौतिक सुखों के संग्रह करने वाले सांसारिक जीवन के रास्ते अलग-अलग हैं। उसने वैभव को ठुकरा कर प्रेम और सत्य के ज्ञान का मार्ग चुन लिया है।
(ii) कवि को जगत की चिन्ता नहीं है। वह तो एक कल्पनाशील कवि होने के कारण नित्य ही नए-नए संसार रचा करता और मिटाया करता है।
(iii) काव्यांश में कवि ने सांसारिक विषयों में अपनी अरुचि का और आध्यात्मिक चिंतन के प्रति आकर्षण का संकेत किया है।
(iv) सरल भाषा में गहन-गम्भीर भावों को व्यक्त किया है।
(v) ‘और’ तथा ‘और’ के अर्थ भिन्न होने के कारण यमक अलंकार है।

26.

काव्यांशों की सप्रसंग व्याख्याएँ।मैं रोया, इसको तुम कहते हो गाना,मैं फूट पड़ा, तुम कहते, छंद बनाना,क्यों कवि कहकर संसार मुझे अपनाए,मैं दुनिया का हूँ, एक नया दीवाना!

Answer»

कठिन शब्दार्थ-रोया = अपनी पीड़ा व्यक्त की। गाना = कविता, गीत। फूट पड़ा = मन की वेदना प्रकट की। छंद बनाना = कविता रचना। दीवाना = मस्ती से जीने वाला।

संदर्भ तथा प्रसंग-प्रस्तुत काव्यांश हमारी पाठ्यपुस्तक में संकलित कवि हरिवंशराय बच्चन की कविता ‘आत्म-परिचय’ से लिया गया है। इस अंश में कवि चाहता है कि संसार उसे एक कवि के रूप में नहीं एक मस्ती से जीने वाले व्यक्ति के रूप अपनाए।

व्याख्या-कवि कहता है कि जब वह अपने मन की पीड़ा को प्रकट करता है तो लोग उसे गीत कहने लगते हैं। जब उसके हृदय में भरी वेदना गीत बन कर फूट पड़ी तो लोग कहने लगे कि वह काव्य रचना कर रहा है। लोग उसको कवि मानकर उसका सम्मान करना चाहते हैं किन्तु कवि को अपनी यह पहचान स्वीकार नहीं है। वह तो चाहता है कि लोग उसे एक नए प्रेम दीवाने के रूप में जाने। छंदों के रूप में उसकी वेदना ही फूट-फूटकर रोई है। वह कवि नहीं बल्कि एक पागल-प्रेमी है।

विशेष-
(i) कवि रोता है तो उसका रुदन उसके गीतों में प्रकट होता है। लोगों को भ्रम होता है कि वह गीत गा रहा है। उसके हृदय के रुदन को लोग उसका गाना समझ लेते हैं। मैं फूट पड़ा’ से कवि का तात्पर्य है कि उसके मन की पीड़ा ही शब्दों का रूप धारण करके बरबस बाहर आ जाती है। वह उसे रोक नहीं पाता॥
(ii) कवि नहीं चाहता कि लोग उसे कवि माने । वह तो प्रेम-दीवाना है। वास्तव में वह स्वयं को कवि नहीं मानता क्योंकि वह कविता की रचना का प्रयास ही नहीं करता। उसके मन में स्थित विश्व-प्रेम के प्रति दीवानगी के भाव बिना किसी प्रयास के स्वत: ह। हृदय से बाहर आ जाते हैं।
(iii) कवि की गाथा भावों को सटीकता से व्यक्त करने में समर्थ है। ‘फूट पड़ना’, ‘छंद बनाना’, मुहावरे कवि के कथन को प्रभावी बना रहे हैं।
(iv) ‘क्यों कवि कहकर’ में अनुप्रास अलंकार है।

27.

बच्चन जी की कविता का मूल भाव लिखिए।

Answer»

समाज के प्रति मनुष्य का दायित्व एवं विश्व के प्रति उदारवादी दृष्टिकोण इस कविता का विषय है। आज विश्व में हर जगह दुःख दर्द का ही प्रभाव है। हर्ष, उल्लास, प्रेम का भावना चाहते है। मधुर गान वाली कोकिला का गान दुःख दर्द का गान है। दुनिया के लोगों से कवि कहते है कि उसका जीवन दुःख में ही बीता है। आज जीवन के अंतिम दिनों में कवि पाठको से उनका गाना गाकर अमर करने को कहते है।

28.

बच्चन जी पाठकों को क्या-क्या भेंट देते हैं? 

Answer»

बच्चन जी ने गूंज-गूंजकर मिटनेवाले गीत बनाये। वे चाहते है कि पाठक उनके गीत को गाकर उसे अमर कर दे। पाठकों के प्रति अपनी कृतज्ञता वे कुछ ऐसा भेंट देकर करना चाहते है जिसे देकर उन्हें कोई हानि न हो और बदले में पाठकों को सब कुछ मिल जाए। इस दान को स्वीकार करके पाठक उनके दान को अमर कर जायेंगे।

29.

काव्यांशों की सप्रसंग व्याख्याएँ।मैं निज उर के उद्गार लिए फिरता हूँ,मैं निज उर के उपहार लिए फिरता हूँ,है यह अपूर्ण संसार न मुझको भाता,मैं स्वप्नों का संसार लिए फिरता हूँ।मैं जला हृदय में अग्नि, दहा करता हूँ,सुख-दुख दोनों में मग्न रहा करता हूँ;जग भव-सागर तरने को नावे बनाए,मैं भव मौजों पर मस्त बहा करता हूँ।

Answer»

कठिन शब्दार्थ- निज = अपने। उर = हृदय। उद्गार = भावनाएँ, विचार। उपहार = प्रेमभाव, सद्भावनाएँ। अपूर्ण = अधूरा, मधुर भावनाओं से रहित। न भाता = अच्छा नहीं लगता। स्वप्नों का संसार = मन को सुहाने वाली भावनाएँ। जला हृदय में अग्नि = सांसारिक दुखों से त्रस्त मन। दहा करता हूँ = दुखी हुआ करता हूँ। मग्न = एक भाव से, अप्रभावित। भव-सागर = संसार रूपी सागर, जन्म-मरण का चक्र। तरने को = उद्धार पाने को। नाव = पुण्य कार्य। भव मौजों पर = सांसारिक जीवन की मस्ती॥

संदर्भ तथा प्रसंग-प्रस्तुत काव्यांश हमारी पाठ्यपुस्तक में संकलित कवि हरिवंश राय बच्चन की कविता ‘आत्मपरिचय’ से लिया गया है। इसे अंश में कवि कह रहा है कि वह अपनी कविता द्वारा सभी के कल्याण की कामना करता रहता है। वह अपने सपनों के संसार में मग्न रहता है, वह सुख-दुख को समान भाव से ग्रहण करते हुए मस्ती के साथ जीवन बिताया करता है।

व्याख्या-कवि कहता है कि मैं अपने हृदय के भावों को अपनी कविता द्वारा व्यक्त करता रहता हूँ। मेरी कविता में सारे संसार के कल्याण की कामना रहती है। यही संसार को मेरा प्रेम-उपहार है। मेरी दृष्टि में यह संसार अधूरा है, जो मुझे प्रिय नहीं है। इसीलिए मैं अपने सपनों के संसार में मग्न रहता हूँ जहाँ कोई चिन्ता और अभाव नहीं है।

यद्यपि संसार के कष्ट, अभाव और दुख-दर्द उसके मन को निरन्तर जलाते हैं, परन्तु उसके लिए सुख-दुख दोनों समान हैं। लोग इस संसार को माया और भ्रम मानकर इस संसाररूपी सागार से पार होने के उपाय किया करते हैं। वे पुण्य-कार्यों को नाव बनाकर संसार से मुक्ति चाहा करते हैं लेकिन कवि मस्ती के साथ संसार-सागर की लहरों पर बहता रहता है। आशय यह है कि कवि संसार की कठिनाइयों से विचलित न होकर प्रसन्नतापूर्वक उनके बीच से होकर अपनी मार्ग तलाशता है।

विशेष-
(i) यह संसार अपूर्ण है। इसमें प्रेम नहीं है। यह स्थायी नहीं है। इसमें अभाव, चिन्ताएँ और ईर्ष्या-द्वेष हैं। अत: कवि को यह संसार अच्छा नहीं लगता। वह अपने सपनों के प्रेम से भरे हुए संसार में जीना चाहता है।
(ii) भाषा सरल, प्रवाहपूर्ण तथा परिमार्जित खड़ी बोली है। कवि ने परिचयात्मक शैली में अपने मनोभाव व्यक्त किए हैं।
(iii) ‘मन-मौजों पर मस्त’ में अनुप्रास तथा भवसागर’ में रूपक अलंकार है।
(iv) काव्यांश शांत रस की अनुभूति कराता है।

30.

काव्यांशों की सप्रसंग व्याख्याएँ।मैं दीवानों का वेश लिए फिरता हूँ,मैं मादकता नि:शेष लिए फिरता हूँ,जिसको सुनकर जग झूम, उठे, लहराए,मैं मस्ती का सन्देश लिए फिरता हूँ।

Answer»

कठिन शब्दार्थ- वेश = रूप। मादकता = मस्ती, मोहकता। नि:शेष = सारी, सम्पूर्ण । झूम = प्रसन्न होकर। झुके = सम्मान दे, महत्त्व स्वीकार करे। लहराए = मस्त हो जाए। सन्देश = विचार, मन की बात॥

सन्दर्भ तथा प्रसंग-प्रस्तुते पद्यांश हमारी पाठ्यपुस्तक में संकलित कवि हरिवंशराय बच्चन की कविता : आत्म-परिचय’ से लिया गया है। इस अंश में कवि सारे जगत को मस्ती भरे प्रेम का संदेश दे रहा है।

व्याख्या-कवि कहता है कि दीवानगी केवल इसके मन में ही नहीं है, उसकी वेशभूषा से भी दीवानापन झलकता है। उसका सारा जीवन प्रेम और मस्ती से भरा हुआ है। कवि जहाँ भी जाता है, वहाँ लोगों को मस्त रहने और जीवन को अपने अनुसार जीने का संदेश देता है। उसका संदेश लोगों को गहराई से प्रभावित करता है और उसको झूमने, झुकने और मस्ती से लहराने के लिए बाध्य कर देता है।

विशेष-
(i) काव्यांश में लेखक ने जीवन को सहज मस्ती का और सबके प्रति प्रेम-भाव बनाये रखकर जीने का संदेश दिया है।
(ii) संसार के झंझट तो चलते रहेंगे, लेकिन व्यक्ति को मस्ती और प्रेम से जीवन बिताना चाहिए। सुख और दुख दोनों को समान भाव से ग्रहण करना चाहिए। काव्यांश से यह संदेश भी प्राप्त होता है।
(iii) भाषा भावों के अनुरूप और प्रवाहपूर्ण है।
(iv) कथन-शैली, व्यक्तियों के मन में सहज जीवन की प्रेरणा देने वाली है।
(v) ‘झूम, झुके’ में अनुप्रास अलंकार है।

31.

“मैं निज रोदन में राग लिए फिरता हूँ’ कहने से कवि का क्या आशय है?

Answer»

कवि स्वयं को अपने अज्ञात प्रियतम का वियोगी और उसकी याद में विकल बताता है। उसकी यह विरह व्यथा उसके गीतों में व्यक्त होती रहती है। इस प्रकार वह अपने रुदन या पीड़ा को भी गीत के रूप में ही प्रकट करता आ रहा है।

32.

काव्यांशों की सप्रसंग व्याख्याएँ।मैं निज रोदन में राग लिए फिरता हूँ,शीतल वाणी में आग लिए फिरता हूँ,हो जिस पर भूपों के प्रासाद निछावर,मैं वह खंडहर का भाग लिए फिरता हूँ।

Answer»

कठिन-शब्दार्थ- रोदन = रोना। राग = संगीत शीतल = सुनने में मधुर लगने वाली। वाणी = कविता, बोली। आग = मन की व्यथा। भूप = राजा । प्रासाद = राज-भवन, महल। खंडहर = टूटा हुआ भवन।

संदर्भ तथा प्रसंग-प्रस्तुत काव्यांश हमारी पाठ्यपुस्तक में संकलित कवि हरिवंशराय बच्चन की कविता ‘आत्म-परिचय’ से लिया गया है। कवि परस्पर विरोधी कथनों के द्वारा अपनी मनोभावनाओं से परिचित करा रहा है।

व्याख्या-कवि इसी कविता में कह चुका है कि वह किसी अज्ञात प्रिय की याद अपने हृदय में छिपाए जी रहा है। उस प्रियतम (परमेश्वर) के वियोग में व्याकुल कवि का हृदय जब रोता है, तो उसका वह रुदन कवि के गीतों के रूप में सबके सामने प्रकट हो जाता है। कवि के ये गीत सुनने में शीतल और मधुर होते हैं, किन्तु इनके भीतर उसकी विरह व्यथा भी अलग दहकती रहती है। कवि फिर भी अपने खंडहर जैसे जीवन से संतुष्ट है। वह अपने इस जीवन के सामने राजभवनों के सुखों को भी तुच्छ समझता है। वह प्रिय की स्मृतियों से जुड़े, भग्न-भवन जैसे जीवन को संतुष्ट भाव से जिए जा रहा है।

विशेष-
(i) कवि के रुदन में संगीत छिपा है। उसकी शीतल वाणी में आग छिपी है। वह अपने जीवनरूपी खंडहर के एक छोटे से भाग पर राजाओं के महल न्यौछावर कर सकता है। लगता है कवि का हृदय विरोधाभासों का निवास है।
(ii) अपनी कोमल और अति संवेदनशील भावनाएँ, कवि ने अपने सटीक शब्द-चयन से व्यक्त कर दी हैं।
(iii) भाषा सशक्त है। विरोधाभासी शैली मन को चकित करती है।
(iv) काव्यांश में विरोधाभास अलंकार है।
(v) छायावादी झलक काव्यांश में आकर्षण उत्पन्न कर रही है।

33.

काव्यांशों की सप्रसंग व्याख्याएँ।मैं यौवन को उन्माद लिए फिरता हूँ,उन्मादों में अवसाद लिए फिरता हूँ,जो मुझको बाहर हँसा, रुलाती भीतर,मैं हाय किसी की याद लिए फिरता हूँ।

Answer»

कठिन शब्दार्थ- यौवन = जवानी। उन्माद = मस्ती, पागलपन। अवसाद = दुख, वेदना। बाहर = प्रकट रूप में। भीतर = मन में।

संदर्भ तथा प्रसंग-प्रस्तुत काव्यांश हमारी पाठ्यपुस्तक में संकलित कवि हरिवंश राय बच्चन की कविता से लिया गया है। कवि इस अंश में अपनी परस्पर विरोधी मनोभावनाओं को व्यक्त कर रहा है।

व्याख्या-कवि कहता है कि वह युवावस्था की मस्ती या उत्साह से भरा हुआ है। उत्साह की अधिकता उसे कभी-कभी पागल-सा बना देती है। वह चाहता है कि सारा जगत् उसी की तरह उत्साह से परिपूर्ण हो जाय। वह सभी को प्रेम की शिक्षा देना चाहता है किन्तु अपने प्रयत्न में सफलता न मिलती देख उसका हृदय निराशा और वेदना से भर जाता है। कवि कहता है कि उसके हृदय में किसी अज्ञात प्रेमी की याद छिपी है। यह याद मुझे प्रकट रूप में तो हँसते रहने को विवश करती रहती है। किन्तु मेरा मन उस अज्ञात को पाने के लिए रोता रहता है।

विशेष-
(i) कवि ने इस अंश में अपने मन के विचित्र अन्तर्द्वन्द्व को व्यक्त किया है। उन्माद और अवसाद दोनों का एक साथ रहना परस्पर विरोधी भाव है। इसका आशय यही है कि कवि जगत में अपने अनुकूल वातावरण न पाकर निराशा से भर जाता है।
(ii) बाहर से हँसना और भीतर से रोना तथा किसी अज्ञात की यादों में खोना, इस अंश में छायावाद और रहस्यवाद की झलक दिख रही है।
(iii) भाषा सरल, परिमार्जित, भावानुकूल और प्रवाहपूर्ण है।
(iv) शैली परिचयात्मक तथा भावुकता में भीगी हुई है।

34.

काव्यांशों की सप्रसंग व्याख्याएँ।मैं जग-जीवन का भार लिए फिरता हूँ,फिर भी जीवन में प्यार लिए फिरता हूँ,कर दिया किसी ने झंकृत जिनको छूकर,मैं साँसों के दो तार लिए फिरता हूँ,मैं स्नेह-सुरा का पान किया करता हूँ,मैं कभी न जग का ध्यान किया करता हूँ,जग पूछ रहा उनको, जो जग की गाते,मैं अपने मन का गान किया करता हूँ।

Answer»

कठिन शब्दार्थ- जग-जीवन = संसारिक जीवन। भार = उत्तरदायित्व, जिम्मेदारी। झंकृत = उत्पन्न कर दी, मधुर बनाया। साँसों के दो तार = जीवनरूपी वीणा। स्नेह सुरा = प्रेम की मस्ती। पान = पीना, आनंद लेना। जग की गाते = अन्य लोगों को सुहाने वाली बातें करते हैं। मन का गान = अपने मन को सुहाने वाली बातें।

संदर्भ तथा प्रसंग-प्रस्तुत काव्यांश हमारी पाठ्यपुस्तक में संकलित कवि हरिवंशराय बच्चन की रचना ‘आत्मपरिचय’ से लिया गया है। कवि बता रहा है कि वह जीवन के उत्तरदायित्वों को निभाते हुए, सभी के प्रति प्यार और कृतज्ञता व्यक्त करता है। वह जग सुहाती बातें न करके अपने मन के गीत गाया करता है।

व्याख्या-कवि बच्चन कहते हैं कि मेरे ऊपर अनेक सांसारिक उत्तरदायित्व हैं, जिनके कारण मेरा जीवन भार-स्वरूप हो गया है परन्तु मेरे मन में सभी के प्रति प्रेम तथा स्नेह के भाव विद्यमान हैं। दुनियादारी में फंसकर मैं अपने प्रेम-भाव की उपेक्षा नहीं करना। चाहता। किसी ने अपने प्रेमपूर्ण स्पर्श से मेरे जीवनरूपी सितार को संगीतमय कर दिया है। उस मधुर प्रेम-राग के सहारे मैं इस जीवन को बिता रहा हूँ।

मैं सदैव प्रेम की मदिरा में मस्त रहता हूँ। मैं इस संसार की अन्य अनावश्यक बातों की चिन्ता कभी नहीं करता। यह संसार उनकी ही प्रशंसा करता है, जो उसकी हाँ-में-हाँ मिलाया करते हैं, अर्थात् वही कवि संसार में प्रशंसनीय होते हैं जो दूसरों को खुश करने वाली कविताएँ लिखते हैं। परन्तु मैं अपने मन को सुख देने वाले विचारों को ही अपनी कविताओं में प्रकट करता हूँ।

विशेष-
(i) कवि को अपने सम्बन्धियों, मित्रों, प्रियजनों से गहरा स्नेह है। यह प्रेम उसके मन पर मदिरा के समान प्रभाव डालता। है और उसे मस्त बना देता है।
(ii) केवि प्रेम को जीवन के लिए आवश्यक मानता है। किसी की निन्दा-स्तुति का उसे कोई भय नहीं है।
(iii) ‘जग-जीवन’, ‘साँसों के तार’ तथा ‘स्नेह-सुरा’ में रूपक अलंकार है। यहाँ लक्षणा शब्द-शक्ति तथा माधुर्य गुण की छटा दर्शनीय है। भाषा सरल, प्रवाहपूर्ण, विषयानुकूल, कोमल, सरस तथा मधुर लय से परिपूर्ण है। प्रस्तुत गीत पर फारसी के कवि उमर खय्याम का प्रभाव स्पष्ट दिखाई पड़ता है।

35.

कवि अपने मित्र से क्या कहता है?

Answer»

कवि अपने मित्र से कहता है कि वह अंधकार में डरा हुआ है और वह आकर अंधकार मिठा दे।

36.

प्रतिभा का मूल बिन्दु कविता का भावार्थ लिखें।

Answer»

1) “कहाँ जन्म है तेरा?” मैंने पूछा जब प्रतिभा से,
“महलों में? गुलगुले गलीचों पर? गुलाब की क्यारी में?
वृद्धों की चिंता में? बच्चों की दंतहीन किलकारी में?
बोलो, तुम रहती कहाँ? जानने को हम सब हैं कितने प्यासे!”

कवि यह जानना चाहता है कि प्रतिभा का जन्म कहाँ हुआ है? अतः वह पूछता है- तुम्हारा जन्म कहाँ हुआ? महलों में? गलीचों पर? गुलाब की क्यारी में? वृद्धों की चिंता में? बच्चों की किलकारी में? बोलो, तुम कहाँ रहती हो?

1) “कहाँ जन्म है तेरा?” मैंने पूछा जब प्रतिभा से,
“महलों में? गुलगुले गलीचों पर? गुलाब की क्यारी में?
वृद्धों की चिंता में? बच्चों की दंतहीन किलकारी में?
बोलो, तुम रहती कहाँ? जानने को हम सब हैं कितने प्यासे!”

कवि यह जानना चाहता है कि प्रतिभा का जन्म कहाँ हुआ है? अतः वह पूछता है- तुम्हारा जन्म कहाँ हुआ? महलों में? गलीचों पर? गुलाब की क्यारी में? वृद्धों की चिंता में? बच्चों की किलकारी में? बोलो, तुम कहाँ रहती हो?

3) क्या निरी कल्पना प्रतिभा है, क्या निरी सूझ की तितिल-परी?
क्या प्रतिभा केवल नवनवीन विस्मय – उपजाऊ ऊहा है?
प्रतिभा क्या है सन्ध्या-भाषा? सिद्धों का पाहुड़-दूहा है?
प्रतिभा अनुभूति-रसायन है? गहरे ‘जीवन’ की चल-शफरी?

क्या कल्पना मात्र प्रतिभा है? क्या निरी सूझ की तितिल-परी प्रतिभा है? क्या प्रतिभा केवल नवीन विस्मय है? या उपजाऊ तर्क है? क्या प्रतिभा तांत्रिकों की भाषा है? या सिद्धों के दोहे? क्या प्रतिभा अनुभूति रसायन है? या गहरे पानी की चंचल. मछली?

4) प्रतिभा बोली – “यातना, निरन्तर कष्ट-सहन की ताकत में
मैं बसती हूँ संघर्ष-निरत साधक में, असिधारा-व्रत में।”

कवि को प्रतिभा से उत्तर मिला – मैं सदा निरन्तर कष्ट, यातना आदि में बसती हूँ। मैं बसती हूँ संघर्ष में निरन्तर प्रयास करने वाले साधक में और मैं रहती हूँ – तलवार की तीखी धार पर खड़े होने जैसी कठिन प्रतिज्ञा लेनेवाले मनुष्य में।

37.

प्रतिभा पाने के लिए पाठकों को कवि कौन-सा संदेश देते हैं? 

Answer»

प्रतिभा को प्राप्त करने के लिए कवि पाठकों को संदेश देते हुए कहते हैं- प्रतिभा हमेशा यातना, निरन्तर कष्ट सह सकने की ताकत में, संघर्षरत साधक में तथा असिधारा व्रत अर्थात् तलवार की तीखी धार पर चलने की कठोर प्रतिज्ञा जैसी इच्छा शक्ति रखने वाले मनुष्य में बसती है।

38.

‘प्रतिभा का मूल बिन्दु’ कविता का भाव संक्षेप में लिखिए।

Answer»

प्रस्तुत ‘प्रतिभा का मूल बिन्दु’ कविता में कवि द्वारा सैद्धांतिक समीक्षा की गई है, जिसमें आत्यंतिक कल्पनाओं का, अनुमान का प्रयोग न करके जीवन के निरन्तर संघर्ष-पथ को कवि शानाता है। प्रतिभा सतत प्रयास तथा परिश्रम की जननी मानी जाती है।

39.

कवि माचवे जी के अनुसार प्रतिभा के लक्षण लिखिए। 

Answer»

कवि माचवे जी के अनुसार प्रतिभा दिवास्वप्न की रानी है, मिट्टी के लौंदे की ओर संकेत है, फलक, तूली, वर्ण, निरी कल्पना, नवीन विस्मय, उपजाऊ अनुमान, अलौकिक गूढ़ मंत्र, सिद्धों की वाणी या अनुभूति रसायन ये सब प्रतिभा के लक्षण हैं।

40.

कवि प्रतिभा का मूल कहाँ-कहाँ ढूँढते हैं?

Answer»

कवि प्रतिभा के मूल को सर्वत्र ढूँढते हैं। कवि प्रतिभा को महलों में, गुलगुले गलीचों पर, गुलाब की क्यारी में, वृद्धों की चिंता में और बच्चों की किलकारी में, चित्रकार की तुलिका में, शिल्पी की कला में, गायिका के स्वर में ढूँढ़ते है। प्रतिभा का मूल ढूँढने के लिए इधर-उधर भागते हैं।

41.

‘प्रतिभा का मूल बिन्दु’ कविता के कवि का नाम लिखिए।

Answer»

‘प्रतिभा का मूल बिन्दु’ कविता के कवि डॉ. प्रभाकर माचवे हैं।

42.

कवि प्रतिभा से क्या पूछते हैं? 

Answer»

कवि प्रतिभा से पूछते हैं – ‘तेरा जन्म कहाँ हुआ?’

43.

कवि ने दिवास्वप्न की रानी किसे कहा है? 

Answer»

कवि ने प्रतिभा को दिवास्वप्न की रानी कहा है।

44.

चित्रकार ने किसको समेट लिया है? 

Answer»

चित्रकार ने फलक, वर्ण और तूली को समेट लिया है।

45.

प्रतिभा कहाँ बसती है?

Answer»

प्रतिभा यातना, निरंतर कष्ट-सहन की ताकत में, संघर्ष-निरत साधक में और असिधारा-व्रत में बसती है।

46.

शिल्पी ने किसकी ओर संकेत किया है?

Answer»

शिल्पी ने मिट्टी के लौंदे की ओर संकेत किया है।

47.

प्रतिभा का मूल क्या सहने की ताकत में है?

Answer»

प्रतिभा का मूल निरंतर कष्ट और यातना सहने की ताकत में हैं।

48.

गायिका क्या कह गयी? 

Answer»

गायिका कह गई कि – “क्या तूने दिव्य-स्वर की मदिरा पी है?”

49.

ससंदर्भ भाव स्पष्ट कीजिए:प्रतिभा बोली – “यातना, निरन्तर कष्ट-सहन की ताकत मेंमैं बसती हूँ संघर्ष-निरत साधक में, असिधारा-व्रत में।”

Answer»

प्रसंग : प्रस्तुत पंक्तियाँ हमारी पाठ्य पुस्तक ‘साहित्य वैभव’ के ‘प्रतिभा का मूल बिन्दु’ नामक कविता से ली गई हैं, जिसके रचयिता डॉ. प्रभाकर माचवे हैं।
संदर्भ : माचवे जी ने प्रतिभा की व्याख्या प्रस्तुत की है। प्रतिभा का विकास किस तरह होता है, यह समझाने का वे प्रयत्न करते हैं।
स्पष्टीकरण : प्रतिभा कई सारे रूपों में प्रकट होती है। वह महलों की स्थापत्य कला में, गलीचों की बनावट में और बच्चों की किलकारी में प्रकट होती है। यह सब कलाएँ मनुष्य की प्रतिभा की ही देन है। यह प्रतिभा निरंतर कष्ट सहने या यातना सहने से ही प्रकट होती है। यह भी एक साधना की तरह है। विचार के स्तर पर, कल्पना के स्तर पर खूब संघर्ष करने के बाद ही कोई नई चीज प्रतिभा दे पाती है। प्रतिभा बैठे बैठाये विकसित नहीं होती है। उसे निरन्तर अभ्यास से हासिल करना पड़ता है। प्रतिभा को साधना तलवार की धार पर खड़े होने के समान है। प्रतिभा अनुशासन से आती है।
विशेष : प्रयोगवादी दौर की कविता। प्रतिभा की प्रक्रिया को समझाया गया है।

50.

कौन असिधारा व्रत में बसती है?

Answer»

प्रतिभा असिधारा व्रत में बसती हैं।