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This section includes 7 InterviewSolutions, each offering curated multiple-choice questions to sharpen your Current Affairs knowledge and support exam preparation. Choose a topic below to get started.

1.

वायु प्रदूषण के प्रमुख स्रोतों का वर्णन कीजिए।

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वायु प्रदूषण के प्रमुख स्रोत–उद्योग, परिवहन के विभिन्न साधन, ताप विद्युतगृह, शहरी कचरा एवं खदानों से निकली धूल आदि।

2.

भू-निम्नीकरण को कम करने के उपाय सुझाइए।

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भू-निम्नीकरण को कम करने के उपाय भ-निम्नीकरण को कम करने के उपाय निम्नलिखित हैं-

⦁    किसानों को रासायनिक पदार्थों का प्रयोग करने के लिए प्रशिक्षण देकर भूमि के प्रदूषण को काफी हद तक कम किया जा सकता है। उदाहरणतया, डी०डी०टी० तथा अन्य हानिकारक तत्त्वों पर तुरन्त प्रतिबन्ध लगा देना चाहिए। कई देशों में ऐसा किया भी जा चुका है।
⦁    नगरीय एवं औद्योगिक अपशिष्ट जल को साफ करके सिंचाई के लिए प्रयोग किया जा सकता है और अपशिष्ट जल से होने वाले प्रदूषण को कम किया जा सकता है।
⦁    गली-सड़ी सब्जियों व फलों, पत्तों तथा पशुओं व मानवीय मल-मूत्र को उचित प्रौद्योगिकी द्वारा बहुमूल्य खाद में परिवर्तित करके लाभ उठाया जा सकता है।
⦁    गन्दी बस्तियों में रहने वाले लोगों को ‘सुलभ शौचालय’ की सुविधा उपलब्ध करवाई जानी चाहिए।
⦁    प्लास्टिक की थैलियों की जगह पर कागज की थैलियों का प्रयोग किया जाना चाहिए। प्लास्टिक की थैलियों पर प्रभावी रूप से तुरन्त प्रतिबन्ध लगाया जाना चाहिए।

3.

वायु प्रदूषण के नियन्त्रण के उपायों का वर्णन कीजिए।

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वायु प्रदूषण के नियन्त्रण के उपाय

वायु प्रदूषण के नियन्त्रण के उपाय निम्नलिखित हैं-

⦁    कारों में सीसा’ रहित पेट्रोल का उपयोग-ऐसे पेट्रोल के उपयोग से वायु-प्रदूषण कम होता है।
⦁    ईंधन का पूर्ण दहन-नई प्रौद्योगिकी अपनाकर कोयले, पेट्रोल, डीजल आदि का सभी भाग पूरा जल जाना चाहिए। इस तकनीक से वायुमण्डल का प्रदूषण बढ़ाने वाले बहुत कम प्रदूषक बचते हैं।
⦁    नई प्रौद्योगिकी से बने इंजनों का उपयोग कारखानों और मोटरवाहनों के इंजन नए और सक्षम होने चाहिए। ऐसे इंजनों से धुआँ कम निकलता है।
⦁    कारखानों की चिमनियों में फिल्टर-फिल्टर के उपयोग से कारखानों और ताप बिजलीघरों से निकलने वाले धुएँ की जहरीली गैसों और ठोस कणों को वायु में फैलने से रोका जा सकता है। उपकरणों को निरन्तर चालू हालत में रखना भी आवश्यक है।
⦁    कारखानों को घनी बस्तियों से दूर स्थापित करना-प्रदूषण फैलाने वाले कारखानों को घनी बस्तियों से दूर लगाना चाहिए।
⦁    ऊर्जा के प्रदूषणरहित संसाधनों का उपयोग-कोयला और पेट्रोलियम के उपयोग से वायु प्रदूषित होती है। सौर, पवन, ज्वारीय व समुद्री लहरों से उत्पन्न ऊर्जा प्रदूषण मुक्त होती है। ये नवीकरण योग्य संसाधन भी है। पनबिजली प्रदूषण मुक्त है। इसके भी यथासम्भव अधिकाधिक उपयोग पर बल देना चाहिए।
⦁    ऊँची चिमनी-कारखानों और ईंट भट्ठों में ऊँची चिमनियाँ लगाकर भी वायु प्रदूषण को कम किया जा सकता है।
⦁    क्लोरोफ्लोरोकार्बन (CFC) पर रोक-सी०एफ०सी० ओजोन परत को हानि पहुँचाती है। सूर्य की हानिकारक पराबैंगनी किरणों से पृथ्वी को बचाने वाली ओजोन परत की रक्षा करना आवश्यक है। सी०एफ०सी० के उपयोग पर रोक लगाकर इस कार्य को पूरा किया जा सकता है।

4.

ध्वनि प्रदूषण क्या है?

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ध्वनि प्रदूषण-आवश्यकता से अधिक ध्वनि जो कानों को अप्रिय लगती है, ‘ध्वनि प्रदूषण’ कहलाती है।

“जब ध्वनि अपनी तीव्रता के कारण शोरगुल में बदल जाए और वह मानव में चिड़चिड़ापन, बोलने में व्यवधान, सुनने में दिक्कत और कार्यकुशलता में ह्रास कर दे तो वह प्रदूषण मानी जाती है।”

5.

ध्वनि प्रदूषण पर नियन्त्रण के उपायों की चर्चा कीजिए।

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ध्वनि प्रदूषण पर नियन्त्रण के उपाय ध्वनि प्रदूषण पर नियन्त्रण के उपाय निम्नलिखित हैं-

⦁    शोर न करने वाली अथवा कम शोर करने वाली मशीनों का उपयोग किया जाना चाहिए।
⦁    तेल व ग्रीस देकर मशीनों का ठीक प्रकार से रख-रखाव करना चाहिए।
⦁    ध्वनि उत्पन्न करने वाली मशीनों को ध्वनिरोधी कमरों में स्थापित करना चाहिए।
⦁    कारखानों में कार्यरत कर्मचारियों को रुई, प्लग या दस्तान लगाने चाहिए। इन चीजों के उपयोग से ध्वनि की तीव्रता को 40-50 डेसीबल तक कम किया जा सकता है।
⦁    कारखाने आवासीय बस्तियों से दूर लगाने चाहिए।
⦁    धार्मिक व सामाजिक उत्सवों एवं शादियों में बैंड-बाजे, गाने बजाने व डी०जे० उपयोग के दौरान सीमित ध्वनि का प्रयोग करना चाहिए।
⦁    रात्रि में एक निश्चित समय के बाद लाउड स्पीकर का प्रयोग वर्जित होना चाहिए।
⦁    प्रैशर हॉर्न का प्रयोग कम-से-कम करना चाहिए।
⦁    वाहनों के इंजनों के उचित रख-रखाव, अच्छी ट्यूनिंग तथा गति सीमा निर्धारित करके वाहनों द्वारा उत्पन्न ध्वनि को कम किया जा सकता है।
⦁    सड़कों के किनारे वृक्ष लगाने चाहिए। इससे ध्वनि प्रदूषण कम होता है।

6.

अकबर द्वारा किए गए भूमि सुधारों की व्याख्या कीजिए।

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अकबर द्वारा किए गए भूमि सुधार निम्नलिखित हैं

1. भूमि की पैमाइश – इस नवीन व्यवस्था के अनुसार सर्वप्रथम अकबर ने समस्त कृषि योग्य भूमि की पैमाइश करवायी। अकबर से पूर्व शेरशाह ने भी भूमि की पैमाइश करवायी थी परन्तु तब पैमाइश के लिए रस्सी का प्रयोग किया गया था। रस्सी बरसात में सिकुड़कर छोटी हो जाती थी तथा अन्य समय में बढ़ जाती थी; अत: वह पैमाइश का उचित तरीका नहीं था। अकबर ने बाँसों को लोहे के छल्लों से जुड़वा कर भूमि नापने के उपकरण निर्मित करवाए, उसने सिकन्दर लोदी के गज को प्रामाणिक माना, जिसका लम्बाई 32 इंच के लगभग होती थी। सम्पूर्ण राज्य में इसी गज के द्वारा भूमि नापी गई। कर्मचारियों के सम्राट के कठोर आदेश थे कि भूमि की पैमाइश बिलकुल ठीक ढंग से करें तथा रिश्वत के लालच में गलत पैमाइश करने वालों को कठोर दण्ड का भय दिखाया जाता था। सरकार ने पैमाइश करने वाले व्यक्तियों को उचित वेतन दिया जिससे वे बेईमानी न करें। इस प्रकार समस्त कृषि योग्य भूमि की पैमाइश करवाई गई।

2. भूमि का वर्गीकरण – पैमाइश के पश्चात समस्त कृषि योग्य भूमि को चार भागों में विभाजित किया गया-

⦁    भूमि की उपज के अनुसार सर्वश्रेष्ठ भूमि, जिस पर प्रत्येक वर्ष कृषि की जा सकती थी तथा जिसे कभी परती नहीं छोड़ना पड़ता था। पोलज भूमि कहलाती थी;
⦁    परौती भूमि, जिस पर एक वर्ष कृषि करके उपजाऊ बनाने हेतु एक वर्ष के लिए छोड़ दिया जाता था;
⦁    चाचर वह भूमि है जिसको दो-तीन वर्ष तक परती छोड़ना पड़ता था तथा
⦁    बंजर को पाँच अथवा उससे अधिक वर्ष तक परती छोड़ना पड़ता था, जिससे वह कृषि योग्य बन सके। सरकार कर्मचारियों के पास रजिस्टर रहते थे, जिनमें समस्त प्रदेशों की चारों वर्गों की भूमि की पैमाइश लिखित रूप में रहती थी। उदाहरणार्थ-इलाहाबाद की भूमि के सम्बन्ध में रजिस्टरों में लिखा था कि वहाँ 400 बीघा पोलज, 300 बीघा परौती, 50 बीघा चाचर तथा 20 बीघा बंजर भूमि है।

3. नकद रुपयों में कर संग्रह करना – अकबर अनाज से अधिक नकद कर वसूल करना चाहता था; अत: विभिन्न प्रदेशों में अनाज की दर, प्रत्येक वर्ष, पिछले दस वर्षों के अनुपात से निर्धारित की जाता थी। गेहूँ, कपास, तिल आदि 95 वस्तुओं की दर की सूची प्रत्येक प्रदेश के लिए तैयार की जाती थी। कर सर्वप्रथम अनाज और उत्पादित की जाने वाली वस्तुओं के रूप में। निश्चित किया जाता था, तत्पश्चात उस प्रदेश की दर के हिसाब से उसका मूल्य निर्धारित करके उसे वसूल किया जाता था।

4. राज्य-कर संग्रह करने की पद्धति – राजस्व-कर वर्ष में दो बार वसूल किया जाता था- रबी की उपज से तथा खरीफ की उपज से। गाँव के मुखिया भूमि-कर वसूल करने में आमिल, गुजार, पोतदार आदि की सहायता करते थे तथा इस सहायता के लिए उन्हें 2% प्रतिशत कमीशन मिलता था। सम्राट का आदेश था कि कर वसूल करने वाले कर्मचारी पहले कृषकों से बकाया वसूल करें, तत्पश्चात उस वर्ष की उपज का कर संग्रह करें। कृषकों को कर्मचारियों के अत्याचारों से बचाने के लिए प्रत्येक कृषक को पट्टा प्रदान किया जाता था जिसमें उसके द्वारा प्रयोग की जाने वाली भूमि की पैमाइश तथा निश्चित कर अंकित रहता था। इस पट्टे द्वारा सरकार भूमि पर कृषक का अधिकार स्वीकार करती थी तथा निश्चित कर के अतिरिक्त कृषक से और कुछ भी वसूल नहीं कर सकती थी। कर प्रदान करने पर कृषक को रसीद दी जाती थी जिससे कई कर्मचारी दुबारा कर वसूल न कर सके।

5. भूमि-कर पद्धति का व्यावहारिक रूप – भूमि सुधारों के द्वारा अकबर ने रैयतवाड़ी प्रथा प्रचलित की तथा कृषकों का सरकार से सीधा सम्पर्क स्थापित किया तथा उन दोनों के बीच के वर्ग का उसने अन्त कर दिया। अकबर ने कृषकों की सुविधाओं का विशेष ध्यान रखा। भूमि पर उनका अधिकार स्वीकृत कर उन्हें पट्टे दिए गए तथा उनके कबूलियत पर हस्ताक्षर करवाए गए। खालसा भूमि पर सफल प्रयोग करने के उपरान्त उसने अपने सम्पूर्ण साम्राज्य में पूर्ण रूप से भूमि सम्बन्धी सुधारों को लागू किया तथा भागीदारी प्रथा का लगभग अन्त कर दिया। कुछ व्यक्तियों को छोड़कर अन्य सभी पदाधिकारियों से जागीर छीनकर सम्राट ने उनके लिए नकद वेतन की व्यवस्था की, जिससे किसानों पर होने वाले अत्याचार बन्द हो जाएँ।

बंजर भूमि के लिए आर्थिक सहायता प्रदान करके कृषकों की खेती करने के लिए प्रोत्साहित किया गया। आरम्भ में सरकार बंजर भूमि पर बहुत कम भूमि-कर लेती थी तथा धीरे-धीरे उसकी दर बढ़ाती थी। दुर्भिक्ष अथवा फसल के खराब होने पर राज्य के उन पीड़ित प्रदेशों पर कर माफ करके सरकार उनकी आवश्यक सहायता करती थी। कर वसूल करने वाले कर्मचारियों (आमिल, वितिक्ची, कानूनगो, पटवारी, मुकद्दम आदि) को राज्य की ओर से यह आदेश रहता था कि वे कृषकों पर अत्याचार न करें तथा उनके साथ अच्छा व्यवहार करें। सेना द्वारा यदि कृषकों के खेतों की क्षति हो जाती थी तो सरकार उसकी क्षतिपूर्ति करती थी। आवश्यकता पड़ने पर वह कृषकों को ऋण भी देती थी। यदि कृषकों के पास कर का कुछ भाग शेष रह जाता था तो वह भी बलपूर्वक वसूल नहीं किया जाता था। कर वसूल करने वाले कर्मचारियों को कृषकों की दशा की रिपोर्ट प्रतिमान भेजनी पड़ती थी।

7.

ताजमहल की प्रमुख विशेषताओं का वर्णन कीजिए।

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ताजमहल की प्रमुख विशेषताएँ निम्नवत् हैं

⦁    ताजमहल शाहजहाँ द्वारा सफेद संगमरमर से निर्मित अमूल्य और सुन्दरतम कृति है।
⦁    शाहजहाँ ने ताजमहल अपनी प्रिय पत्नी मुमताजमहल की स्मृति में बनवाया।
⦁    मुमताज महल और शाहजहाँ के कब्रे इसी सुन्दर मकबरे में बनाई गई हैं।
⦁    ताजमहल का निर्माण 22 वर्ष में पूर्ण हुआ, जिसमें प्रतिदिन 20 हजार मजूदरों ने काम किया।
⦁    ताजमहल चार खूबसूरत बागों के बीचो-बीच स्थित है।
⦁    ताजमहल के चबूतरे के चारों कोनों पर सफेद मीनारें हैं।
⦁    ताजमहल सुन्दर चित्रकारी से अलंकृत है।
⦁    चाँदनी रात में ताजमहल की शोभा अतुलनीय प्रतीत होती है।

8.

मुगलकालीन सैनिक व्यवस्था पर टिप्पणी लिखिए।

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मुगल सम्राट बाबर ने अपने सैनिक बल के आधार पर ही भारत में मुगल सत्ता स्थापित की थी। औरंगजेब के समय तक यह सत्ता अपनी शक्ति को स्थापित रख सकी। लेकिन बाद के शासक सैनिक-व्यवस्था को ठीक नहीं रख सके, जिससे उनकी प्रतिष्ठा नष्ट हो गई और मुगल साम्राज्य का पतन हो गया। मुगल सेना में मुख्यत: तीन प्रकार के सैनिक और अधिकारी होते थे

⦁    मनसबदार और उनके सैनिक – प्रत्येक सैनिक अधिकारी को मनसब (पद) प्रदान किया गया था। बादशाह के अधीन राजाओं को भी मनसबदारों की श्रेणी में सम्मिलित किया गया था। बादशाह उनको उनके मनसब के अनुसार वेतन देता था। | मनसबदार स्वेच्छा से अपने सैनिकों की भर्ती करता था।

⦁    अहदी सैनिक – अहदी सैनिक बादशाह के सैनिक थे। बादशाह की तरफ से इनकी भर्ती, वेतन, शिक्षा, वस्त्र, घोड़े आदि की व्यवस्था की जाती थी। एक अहदी घुड़सवार को 500 तक वेतन दिए जाने का उल्लेख है जबकि साधारण घुड़सवार को 12 से 15 तक वेतन मिलता था। अकबर के समय तक इनकी संख्या 12 हजार थी।

⦁    दाखिली सैनिक – ये वे सैनिक थे, जिनकी भर्ती बादशाह की तरफ से की जाती थी। यद्यपि इनको मनसबदारों की सेवा में रखा जाता था।
सेना – मुगल सेना मोटे तौर पर पाँच भागों में बँटी हुई थी। ये पाँच भाग थे- पैदल सेना, घुड़सवार सेना, तोपखाना, नौसैना और हस्ति सेना।

1. पैदल सेना – पैदल सैनिक मुख्यत: दो भागों में बँटे होते थे,

⦁    बन्दूकची और
⦁    शमशीरबाज (तलवारबाज)। इनमें लड़ने वाले सैनिकों के अतिरिक्त दास, सेवक, पानी भरने वाले आदि भी सम्मिलित होते थे।

2. घुड़सवार सेना – घुड़सवार सेना मुगल सेना का श्रेष्ठतम भाग था। इसमें मुख्यतया दो प्रकार के सैनिक थे
⦁    बरगीर; जिन्हें घोड़े, अस्त्र और शस्त्र राज्य की ओर से मिलते थे और
⦁    सिलेदार; जो अपने शस्त्र और घोड़े स्वयं लाते थे। इसके अतिरिक्त वह घुड़सवार, जो दो घोड़े रखता था, दो अस्पा कहलाता था। जिसके पास एक घोड़ा होता था वह एक अस्पा घुड़सवार होता था। निम्न-अस्पा वे घुड़सवार थे जिनके दो सैनिकों के पास केवल एक घोड़ा होता था।

3. तोपखाना – भारत में बाबर ने सर्वप्रथम तोपखाने का उपयोग किया। अकबर ने इसे और शक्तिशाली बनाया। इस क्षेत्र में अकबर का प्रमुख कार्य ऐसी छोटी-छोटी तोपों का निर्माण करना था, जो एक हाथी अथवा ऊँट की पीठ पर ले जायी जा सकती थी। डॉ०आर०पी० त्रिपाठी के अनुसार “तुर्की तोपखाने को छोड़कर अकबर का तोपखाना एशिया में किसी से कम न था क्योंकि अकबर के समय में वह श्रेष्ठता की चरम सीमा पर था।” तोपखाने में यूरोपियनों की नियुक्ति की जाती थी। कहा जाता था कि वे तोपखाने के प्रयोग में दक्ष थे।

4. नौसेना – मुगल सैनिक-शक्ति का यह कमजोर अंग था। अकबर ने पहली बार इस ओर ध्यान दिया था और इसके लिए मीर-ए-बहर की अध्यक्षता में एक अलग विभाग स्थापित किया गया था। वास्तव में मुगल सम्राट नौसेना की ओर पर्याप्त ध्यान नहीं दे सके तथा कालान्तर में यूरोपीय जातियों से पराजित हुए।

5. हस्ति सेना – अकबर ने अपनी सेना में ‘हस्ति सेना’ के संगठन पर विशेष महत्व दिया। उसे हाथियों से विशेष लगाव था। उसकी सेना में एक हजार शाही हाथी थे और बाद में इनकी संख्या पचास हजार तक पहुंच गई। इनका प्रयोग युद्ध में व सामान ढोने में किया जाता था। सम्राट जिन हाथियों का प्रयोग करता था, उन्हें ‘खास’ कहा जाता था। अन्य श्रेणियों के हाथी ‘हलकह’ कहे जाते थे।

9.

निम्नलिखित में से कौन-सा एकविमीय चित्र है? (क) आयत चित्र(ख) वर्ग चित्र(ग) कोणिक चित्र(घ) अन्तर्विभक्त चित्र

Answer»

सही विकल्प है  (घ) अन्तर्विभक्त चित्र।

10.

मुगलकालीन वित्त-व्यवस्था पर निबन्ध लिखिए।

Answer»

मुगलकालीन वित्त-व्यवस्था का अध्ययन निम्न शीर्षकों के अन्तर्गत किया जा सकता है

1. राज्य की आय के साधन – मुगल बादशाहों की आय के मुख्य साधन युद्ध में लूटी हुई सम्पत्ति का पाँचवाँ भाग, व्यापारिक कर, टकसाल, अधीनस्थ राजाओं एवं मनसबदारों से समय-समय पर प्राप्त होने वाले उपहार, लावारिस सम्पत्ति, नमक कर, राज्य के उद्योगों से आय और लगान (भूमिकर) था। बाबर और हुमायूँ ने हिन्दुओं से ‘जजिया’ और मुसलमानों से ‘जकात’ नामक धार्मिक कर लिए। अकबर ने इन्हें समाप्त कर दिया। औरंगजेब के समय में ये धार्मिक कर पुन: लगाए गए। अधिकांश उत्तरकालीन मुगल बादशाहों ने भी इन करों को लगाने का प्रयत्न किया।

2. लगान व्यवस्था – मुगल साम्राज्य की लगभग दो-तिहाई आय लगान ( भूमिकर) से होती थी, जो एक प्रकार से आर्थिक संगठन का मुख्य आधार थी। अकबर प्रथम मुगल बादशाह था, जिसने लगान-व्यवस्था को सुचारु रूप से स्थापित किया और मध्य युग की सर्वश्रेष्ठ लगान पद्धति का निर्माण किया। उसने विभिन्न लगान अधिकारियों तथा अर्थ-मन्त्रियों को नियुक्त करके विभिन्न अन्वेषण किए। उसने टोडरमल की सहायता से जिस लगान व्यवस्था को स्थापित किया, उसे दहसाला प्रबन्ध (जाब्ता) कहा जाता है और वह मुगल लगान-व्यवस्था का सफल आधार बनी।

3. दहसाला प्रबन्ध – 1580 ई० में अकबर ने दहसाला प्रबन्ध को आरम्भ किया और उसे लगान व्यवस्था का स्थायी स्वरूप दिया गया। उस समय राजा टोडरमल अर्थ मन्त्री था और उसका मुख्य सहायक ख्वाजा शाह मंसूर था। इस बन्दोबस्त की मुख्य विशेषताएँ इस प्रकार थीं⦁    सर्वप्रथम 

सम्पूर्ण राज्य की खेती योग्य भूमि की नाप करवाई गई। भूमि की नाप के लिए रस्सी की जरीब के स्थान
पर बॉस की जरीब का प्रयोग किया गया, जिसके टुकड़े लोहे की पत्तियों से जुड़े होते थे।
⦁    क्षेत्रफल की इकाई बीघा मानी गई, जो 60 गज x 60 गज अर्थात् 3600 वर्ग गज होता था।
⦁    नापने के लिए सिकन्दरी गज के स्थान पर अकबरी गज जो 41 अंगुल का था, प्रयोग किया गया।
⦁    कृषि योग्य भूमि को चार भागों में बाँटा गया-
⦁    पोलज
⦁    पड़ौती
⦁    छच्चर (चाचर) और
⦁    बंजर भूमि।
⦁    प्रत्येक प्रकार की भूमि की पिछले दस वर्षों की पैदावार का पता लगाकर उस भूमि की औसत पैदावार का पता लगाया जाता था और उस औसत पैदावार को लगान निश्चित करने का आधार मानकर अगले दस वर्षों के लिए किसानों से लगान निश्चित कर दिया जाता था।
⦁    इस व्यवस्था के अनुसार राज्य का हिस्सा उपज का 1/3 भाग होता था।
⦁    किसानों से लगान सिक्कों के रूप में लिया जाता था। अकबर ने किसानों को भूमि का स्वामी स्वीकार किया और राज्य के किसानों से सीधा सम्पर्क स्थापित किया। इस प्रकार शेरशाह की भाँति उसकी व्यवस्था भी रैयतवाड़ी थी।
⦁    लगान के लिए किसानों को पट्टे दिए जाते थे, जिसमें उनकी भूमि और लगान का विवरण होता था। किसानों से उनकी स्वीकृति (कबूलियत) भी ली जाती थी।
⦁    भूमि सुधार को प्रोत्साहन दिया जाता था और आपत्तिकाल में लगान कम अथवा माफ भी कर दिया जाता था।
⦁    दहसाला प्रबन्ध सम्पूर्ण राज्यों में लागू नहीं किया गया था। वह प्रमुख रूप से बिहार, इलाहाबाद, मालवा, अवध, आगरा, दिल्ली, लाहौर और मुल्तान में लागू था।

अकबर की उपर्युक्त लगान-व्यवस्था की कुछ ब्रिटिश इतिहासकारों ने आलोचना की है। उनके अनुसार लगान कर्मचारी भ्रष्ट थे, जो किसानों पर अत्याचर करते थे और किसानों से अधिक मात्रा में लगान वसूल किया जाता था। परन्तु अधिकांश भारतीय इतिहासकार अकबर की लगान-व्यवस्था को श्रेष्ठ और सफल मानते हैं। इनके अनुसार उपज का 1/3 भाग मध्य युग का न्यूनतम लगान था। लगान के अतिरिक्त अकबर अन्य कोई कर नहीं लेता था। इस प्रकार अकबर की लगान-व्यवस्था के सम्बन्ध में लेनपूल ने लिखा है, “ मध्य युग के इतिहास में आज तक किसी व्यक्ति का नाम इतना ख्यातिपूर्ण नहीं माना गया है, जितना टोडरमल का और इसका कारण यह है कि अकबर के सुधारों में से कोई भी सुधार इतनी अधिक मात्रा में प्रजा के हितों की पूर्ति करने वाला न था, जितनी इस महान् अर्थशास्त्री द्वारा की गई लगान की पुनर्व्यवस्था।”

जहाँगीर के समय में लगान-व्यवस्था का मूल स्वरूप अकबर के समय की भाँति ही रहा परन्तु उसका प्रबन्ध शिथिल हो गया। डॉ० बी०पी० सक्सेना के अनुसार, राज्य की 70% भूमि जागीरदारों को दे दी गई और राज्य का सम्पर्क जागीरदारी भूमि के किसानों से न रहा। शाहजहाँ ने किसानों के कर-भार में वृद्धि कर दी। उसने लगान वसूल करने के लिए भूमि को ठेकेदारों को दिया जाना भी आरम्भ कर दिया। औरंगजेब के समय में राज्य की आर्थिक कठिनाइयों के कारण किसानों पर अधिक दबाव डाला गया। किसानों से लगान वसूल करने के लिए कठोरता भी की गई, जिससे किसानों की स्थिति खराब हो गई। उत्तरकालीन मुगल बादशाहों के समय में तो यह व्यवस्था पूर्णतया समाप्त हो गई और भूमि को ठेकेदारों को देने के अतिरिक्त और कोई कार्य शेष न रहा। इससे किसानों की स्थिति खराब हो गई और राज्य का आर्थिक ढाँचा नष्ट हो गया।

11.

मुगलकाल में साहित्य एवं चित्रकला के विकास पर प्रकाश डालिए।

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मुगलकाल में साहित्य का विकास- मुगल शासनकाल साहित्यिक दृष्टि से प्रगतिशील था। इस काल में फारसी, हिन्दी, संस्कृत, उर्दू तथा अन्य सभी प्रकार के साहित्य का विकास हुआ। मुगल सम्राटों ने साहित्य की प्रगति में योगदान दिया और इसे संरक्षण प्रदान किया। इस काल के साहित्यिक विकास को निम्न रूप में अभिव्यक्त किया जा सकता है

1. फारसी साहित्य – मुगलों के समय में फारसी राजभाषा बन गई थी। अकबर के शासनकाल तक फारसी का ज्ञान इतना फैल चुका था कि अब राजस्व के दस्तावेज फारसी के साथ-साथ स्थानीय भाषा (हिन्दी) में भी रखने की जरूरत खत्म हो गई। प्रथम मुगल सम्राट बाबर स्वयं तुर्की और फारसी का विद्वान था। उसने अपनी आत्मकथा ‘तुजुके-बाबरी’ अथवा बाबरनामा’ की रचना तुर्की में की। एल्फिंस्टन के अनुसार बाबर की यह जीवनी ही सारे एशिया में वास्तविक ऐतिहासिक सामग्री है। बाबर का कविता संग्रह ‘दीवान’ (तुर्की) बहुत प्रसिद्ध हुआ। हुमायूं मुगल शासकों में अत्यन्त शिक्षित था। वह न केवल तुर्की तथा फारसी साहित्य का अच्छा ज्ञाता था अपितु दर्शन, गणित आदि का भी ज्ञाता था। दुर्भाग्यवश वह साहित्यिक प्रोत्साहन को विशेष योगदान नहीं दे सका।

अकबर का काल सांस्कृतिक प्रगति के साथ-साथ साहित्यिक पुनरुत्थान का भी युग था। मौलिक रचनाओं के साथ-साथ अनुदित रचनाएँ भी बाहुल्यता में प्रकाश में आईं। अकबर के शासनकाल के दौरान अबुल फजल का ‘अकबरनामा’ और ‘आइने-अकबरी’, निजामुद्दीन अहमद का ‘तबकाते अकबरी’, गुलबदन बेगम का ‘हुमायूँनामा’, अब्बास सरवानी का ‘तौफीक-ए-अकबरशाही’, बदायूँनी का मुन्तखब-उत-तवारीख’, अहमद यादगार का ‘तारीखे सलातीने अफगाना’, बयाजिद सुल्तान का ‘तारीखे हुमायूँ और फैजी सरहिन्दी का ‘अकबरनामा’ आदि प्रमुख ग्रन्थ हैं। इस काल में अकबर के प्रोत्साहन से महाभारत का अनुवाद ‘रज्यनामा’ नाम से नकीब खाँ, बदायूँनी, अबुल फजल, फैजी आदि के सम्मिलित प्रयत्नों से फारसी में किया गया। बदायूँनी ने रामायण का अनुवाद किया। उसने अथर्ववेद का अनुवाद आरम्भ किया और उसको हाजी इब्राहिम सरहिन्दी ने पूरा किया। ‘लीलावती’ का अनुवाद फैजी ने किया। राजतरंगिणी का अनुवाद शाह मुहम्मद शाहाबादी ने, कालियदमन का अबुल फजल ने और नल-दमयन्ती का फैजी ने अनुवाद किया।

2. हिन्दी साहित्य – मुगलकाल में फारसी साहित्य के समान हिन्दी साहित्य की भी खूब उन्नति हुई। यद्यपि अकबर से पूर्व हिन्दी साहित्य का विकास प्रारम्भ हो चुका था और ‘पद्मावत’ तथा ‘मृगावत’ जैसे उच्चकोटि के ग्रन्थों की रचना हो चुकी थी तथापि अकबर की सहिष्णु नीति से हिन्दी साहित्य अत्यन्त समृद्ध हुआ। राजा बीरबल, राजा मानसिंह, राजा भगवानदास, नरहरि और हरिनाथ अकबर के राजदरबार से सम्बन्धित विद्वान थे। नन्ददास, विट्ठलनाथ, परमानन्ददास, कुम्भनदास आदि कवियों ने व्यक्तिगत प्रयत्नों से हिन्दी साहित्य को समृद्ध बनाया। इस काल में तुलसीदास ने लगभग 25 ग्रन्थों की रचना की, जिनमें ‘रामचरितमानस’ और ‘विनय पत्रिका प्रमुख हैं। सूरदास ने ‘सूरसागर’, रहीम ने ‘रहीम सतसई और रसखान ने प्रेमवाटिका’ नामक काव्य ग्रन्थों की रचना की।
मीराबाई के भजन भी हिन्दी साहित्य में महत्वपूर्ण स्थान रखते हैं। अकबर का समय हिन्दी साहित्य का स्वर्णकाल था। जहाँगीर के दरबार में राजा सूरजसिंह, अगरूप गोसाई और बिशनदास जैसे हिन्दी के विद्वान थे। जहाँगीर का भाई दानियाल हिन्दी में कविता करता था। शाहजहाँ के संरक्षण में सुन्दर कविराय, सेनापति, कविन्द्र आचार्य, शिरोमणि मिश्र, बनारसीदास आदि हिन्दी के विद्वान थे। इनके अतिरिक्त अहमदाबाद के दादू ने, जिन्होंने दादू-पन्थी सम्प्रदाय को प्रारम्भ किया, अनेक धार्मिक कविताओं की रचना की। हिन्दी के महान् कवि बिहारी को राजा जयसिंह का संरक्षण प्राप्त हुआ था। इसी समय में केशवदास ने कविप्रिया, रसिकप्रिया और रामचन्द्रिका की रचना की। औरंगजेब ने हिन्दी को संरक्षण नहीं दिया।

3. संस्कृत साहित्य – मुगलकाल में संस्कृत साहित्य की श्रेष्ठ मौलिक रचनाओं का अभाव रहा, परन्तु तब भी संस्कृत भाषा की स्थिति दिल्ली सुल्तानों के काल से अच्छी रही। अकबर ने संस्कृत को राज्याश्रय प्रदान किया। ‘पारसी प्रकाश’ नामक संस्कृत व फारसी का कोष इसी समय लिखा गया। महेश ठाकुर ने अकबर के समय का संस्कृत में इतिहास लिखा। जैन विद्वानों में पद्मसुन्दर कृत ‘अकबरशाही शृंगार-दर्पण’, सिद्धचन्द्र उपाध्याय कृत ‘भानुचन्द चरित्र’, देव मिलन कृत ‘हीर सौभाग्यम्” आदि महत्वपूर्ण संस्कृत ग्रन्थ हैं। संस्कृत के महान् पण्डित कवीन्द्र आचार्य सरस्स्वती और पण्डित जगन्नाथ शाहजहाँ के राजकवि थे। शाहजहाँ के दरबार में अनेक संस्कृत कवि अपनी कविताओं पर पुरस्कार प्राप्त करते थे। औरंगजेब और उसके उत्तराधिकारियों ने संस्कृत को न तो संरक्षण दिया और न प्रोत्साहन।

4. उर्दू साहित्य – अमीर खुसरो पहला विद्वान था, जिसने उर्दू भाषा को अपनी कविताओं का माध्यम बनाया। उसके पश्चात् सूफी सन्तों और भक्ति मार्ग के कुछ सन्तों ने भी अपने विचारों के प्रचार के लिए इसका प्रयोग किया तथा इसे लोकप्रिय बनाने में सहायता दी, परन्तु उर्दू को किसी भी तुर्क अथवा शक्तिशाली मुगल बादशाहों ने सरंक्षण नहीं दिया। मुहम्मदशाह (1719-1748 ई०) पहला बादशाह था, जिसने उर्दू को प्रोत्साहन दिया। उसने प्रसिद्ध कवि शम्सुद्दीन वली को दरबार में सम्मान दिया। इसके पश्चात् उर्दू का विकास होता गया और उर्दू दिल्ली तथा उत्तर प्रदेश में पर्याप्त लोकप्रिय हो गई। उन्नीसवीं सदी में अंग्रेजों ने भी उर्दू को प्रोत्साहन दिया।

5. बंगला साहित्य – बंगला साहित्य का उत्थान भी इस युग में सम्भव हो सका। बंगाल में चैतन्य महाप्रभु द्वारा प्रसारित कृष्णभक्तिमार्गी अनेक सन्त भक्तों ने भजन, पद तथा गीत निर्मित किए। चैतन्य के जीवन-चरित्र पर अनेक ग्रन्थ लिखे गए, जिन्होंने बंगाल के निवासियों को भगवत् प्रेम तथा उदारता की भावना से ओत-प्रोत कर दिया। इस समय कई महाकाव्यों तथा ‘भागवत्’ का बंगला भाषा में अनुवाद किया गया तथा चण्डी देवी और मनसा देवी पर ग्रन्थों की रचनाएँ हुई। काशी, रामदास, जयचन्द (चैतन्य चरितामृत) और मुकुन्दराम चक्रवर्ती (कवि-कंकन-चण्डी) इस युग के प्रमुख विद्वान थे।

6. मराठी साहित्य – इस समय का मराठी साहित्य भी धार्मिक एवं भक्ति की भावनाओं से ओत-प्रोत है। प्रारम्भ में ‘रामायण’, ‘महाभारत’ तथा ‘भागवत्’ को आधार मानकर कुछ ग्रन्थों की मराठी में रचना की गई, जिनमें ‘हरि-विजय’, ‘राम विजय’, ‘शिवलीलाकृत’ आदि प्रमुख हैं। इस काल के मराठी विद्वानों में रघुनाथ पण्डित’, ‘मुक्तेश्वर’ तथा ‘समर्थ गुरु रामदास प्रमुख हैं। रामदास भक्त, कवि एवं उपदेशक थे, जिन्होंने राष्ट्रप्रेम की भावनाएँ प्रसारित की। इनका प्रमुख ग्रन्थ ‘दास-बोध’ है। तुकाराम भी इसी युग की विभूति हैं, जिनके भक्ति से ओत-प्रोत पद मराठी साहित्य की अमूल्य निधि हैं।

7. गुजराती साहित्य – हिन्दी, बंगला तथा मराठी भाषाओं के समान गुजराती भाषा में भी इस समय उच्चकोटि के साहित्यिक ग्रन्थों की रचना की गई। गुजरात के प्रसिद्ध कवि अरबा ने अकबर के काल में ‘चित-विचार’, ‘संवाद-शतपद’, ‘कैवल्य गीता’ आदि अनेक ग्रन्थों की रचना की। तदुपरान्त प्रेमानन्द ने भक्ति रस के पदों से गुजराती साहित्य में एक अपूर्व परिवर्तन ला दिया। उन्होंने 26 ग्रन्थों की रचना की तथा उनके पद आज भी गुजरात में लोकप्रिय हैं। इसके पश्चात सामल ने पौराणिक कथाओं का सुन्दर ढंग से वर्णन करने की ख्याति प्राप्त की। इनके अतिरिक्त वल्लभ’, ‘मुकुन्द’, ‘देवीदास’, ‘शिवदास’, ‘विष्णुदास’ आदि अन्य प्रसिद्ध कवि इस युग में उपन्न हुए।
8. पुस्तकालय – मुगल बादशाहों को हस्तलिखित पुस्तकें संकलित करने में विशेष अभिरुचि थी। हुमायूँ ने लाहौर में एक पुस्तकालय बनवाया, जिसकी सीढ़ियों से गिरकर उसकी मृत्यु हुई। अकबर ने पुस्तकालय में 24,000 हस्तलिखित पुस्तकों का संग्रह किया था, जिनमें अनेक पुस्तकों में सुन्दर-सुन्दर चित्र अंकित थे। जहाँगीर तथा शाहजहाँ ने भी अपने महान् पूर्वजों का अनुसरण करते हुए पुस्तकालय में महत्वपूर्ण ग्रन्थों का संग्रह करवाया था।

मुगलकाल में चित्रकला का विकास – भवन निर्माण कला के समान ही चित्रकला को भी मुगल सम्राटों ने राज्याश्रय प्रदान किया तथा इस समय चित्रकला का चरम् विकास हुआ। भारत में प्राचीनकाल से ही हिन्दू राजाओं के दरबारों में चित्रकला को प्रोत्साहन मिलता रहा था तथा उस समय के भित्तिचित्र तथा मनुष्यों के चित्र आज भी दर्शनीय हैं, परन्तु सल्तनत काल में मुस्लिम सुल्तानों ने चित्रकला को प्रोत्साहित नहीं किया अपतुि फिरोज तुगलक ने तो दीवारों पर चित्र बनाने अथवा मनुष्यों के चित्र बनाने पर प्रतिबन्ध भी लगा दिया था, अतः सल्तनत काल में चित्रकला नष्ट हो गई। मुगलकाल में उसका पुनरुत्थान हुआ। इस समय भारतीय तथा ईरानी चित्रकला का सुन्दर सम्मिश्रण हुआ।

1. बाबर और हुमायूँ – बाबर अपने पूर्वजों के समान चित्रकला का शौकीन था तथा उसने चित्रकला को प्रोत्साहित किया। वह प्रकृति का प्रेमी था तथा उसकी आत्मकथा ‘तुजुके-बाबरी’ इस बात की पुष्टि करती है कि प्राकृतिक रमणीय दृश्यों को देखकर वह कितना आनन्दित हो उठता था। परन्तु उसके काल के विशेष चित्र इस समय उपलब्ध नहीं हैं। उसके उत्तराधिकारी हुमायूँ को भी चित्रकला का शौक था तथा ईरान से लौटते समय वह अपने साथ दो ईरानी चित्रकारों मीर सैयद अली तबरीजी और ख्वाजा अब्दुल समद को भारत लाया था। हुमायूं का निर्वासन के दौरान सफाविद दरबार में सर्वप्रथम फारसी कला से परिचय हुआ। वहाँ के शासक तहमास्प ने फारसी कला को अत्यधिक प्रश्रय दिया लेकिन वह धीरे-धीरे कट्टरवाद की ओर अग्रसर हो गया।

2. अकबर – अकबर को चित्रकला से विशेष अनुराग था तथा उसके दरबार में लगभग सौ हिन्दू तथा मुसलमान चित्रकार रहते थे। इनमें अब्दुल समद, फारुख बेग, जमशेद, दशवन्त, बसावन, मुकुन्द, लालगेसू, हरिवंश, जगन्नाथ, भवानी तथा धर्मराज प्रमुख चित्रकार थे। उसके दरबार के 17 प्रमुख चित्रकारों में अधिकतर हिन्दू ही थे तथा ईरानी अथवा विदेशी कलाकारों की संख्या बहुत कम थी। विदेशी चित्रकारों में मीर सैयद अली, अब्दुल समद, अकारिजा और फर्रुखबेग मुख्य थे। अकबर ने चित्रकला में भी देशी तथा विदेशी तत्वों का सुन्दर सम्मिश्रण करने में सफलता प्राप्त की तथा उसके काल की कला पूर्णतः भारतीय थी। अकबर ने जफरनामा, चंगेजनामा, कालियादमन, रज्मनामा, नल-दमयन्ती तथा रामायण के चित्रों का निर्माण करवाया। फतेहपुर सीकरी की दीवारों पर उसने सुन्दर चित्रकारी करवाई। दरबार में साप्ताहिक प्रदर्शनियों की व्यवस्था करके तथा पुरस्कार प्रदान करके उसने चित्रकला को प्रोत्साहन दिया। उसने चित्रकारों को उच्च मनसब प्रदान किए तथा उनके लिए चित्रशालाओं की व्यवस्था की।

3. जहाँगीर – नि:सन्देह मुगल चित्रकला का स्वर्ण-युग जहाँगीर का काल माना जाता है। जहाँगीर स्वयं चित्रकार था तथा प्रकृति के दृश्यों से उसे अगाध प्रेम था। वह चित्रकला की सूक्ष्म वृत्तियों से परिचित था तथा चित्रकारों का ध्यान उनकी त्रुटियों की ओर आकर्षित करता रहता था। कहा जाता है कि वह चित्र देखकर चित्रकार का नाम बतला सकता था। उसके काल में पौधों, वृक्षों, पुष्पों तथा पशु-पक्षियों के चित्र निर्मित हुए। प्राकृतिक दृश्यों को भी अनेक चित्रकारों ने अपनी तूलिका से विविध रंगों एवं आकृतियों में चित्रित किया।
जहाँगीर के काल में चित्रकारी पुष्ट तथा परिपक्व होकर पूर्णता को प्राप्त हुई। सम्राट को भारतीय चित्रकला की शैली पसन्द थी तथा उसने ईरानी प्रभाव से चित्रकला को मुक्त किया तथा विदेशी तत्वों का भारतीय शैली से सुन्दर सामंजस्य स्थापित किया। इस प्रकार जहाँगीर का काल मुगल चित्रकला का स्वर्ण-युग था। इस समय चित्रकला में नवीनता, मौलिकता, स्वाभाविकता, गतिशीलता तथा सजीवता थी। प्राकृतिक दृश्यों का सूक्ष्म, भावपूर्ण तथा स्वाभाविक चित्रण एवं व्यक्ति चित्र और युद्धों व आखेट के दृश्य चित्रों का निर्माण इस कला की विशेषता थी। इस समय के चित्रकारों में उस्ताद मंसूर, आगार खाँ, फारुखबेग, मुहम्मद नादिर, केशव, बिशनदास, मनोहर, माधव, गोवर्धन, तुलसी आदि प्रमुख थे। लेकिन पर्सी ब्राउन के अनुसार- “जहाँगीर के निधन के साथ ही मुगल चित्रकला की आत्मा विलीन हो गई।

4. शाहजहाँ – वैसे तो शाहजहाँ के काल में भी चित्रकला को प्रोत्साहन मिला, परन्तु शाहजहाँ को चित्रकला से उतना प्रेम नहीं था, जितना भवन निर्माण कला से। उसके काल में चित्रकला अलंकरण से युक्त होकर अपनी मौलिकता तथा सजीवता को खो बैठी। शाहजहाँ ने रंगो के स्थान पर बहमल्य पत्थरों का प्रयोग आरम्भ करवाया। उसके द्वारा निर्मित भवनों में चित्रकला शाही वैभव को प्रदर्शित करती है, जिसमें स्वर्ण तथा बहुमूल्य रत्नों का अत्यधिक प्रयोग किया गया है, परन्तु इस समय चित्रकला का धीरे-धीरे पतन आरम्भ होने लगा। इस काल के चित्र नीरस तथा भाव विहीन हैं, जिनमें केवल रंगों को प्रधानता दी गई है। शाहजहाँ ने अपने शासनकाल के 8वें वर्ष में अपने शासन के आधिकारिक इतिहास ‘पादशाहनामा’ लिखने का आदेश दिया था, जिसके मूल पाठ के साथ दिए गए चित्र दरबारी समारोहों और महत्वपूर्ण घटनाओं का चित्रण करते हैं।

इस समय के चित्रों का प्रमुख विषय सामन्ती दरबार के दृश्यों तथा रत्नजड़ित वस्त्राभूषण आदि का प्रदर्शन मात्र रह गया था, जिसमें कला की सूक्ष्मता का सर्वथा अभाव था। शाहजहाँ के काल के व्यक्ति चित्र (Portraits) वास्तव में अत्यन्त सुन्दर, सजीव तथा भावपूर्ण थे। भावव्यंजना, मुख मुद्रा तथा आन्तरिक अभिव्यक्ति में ये चित्र श्रेष्ठ थे, परन्तु इन चित्रों की माँग बढ़ने पर व्यक्ति चित्र के स्वतन्त्र चित्रण के स्थान पर उनकी प्रतिकृतियाँ बनाई जाने लगीं, जिन्होंने कला को निम्न स्तर पर पहुंचा दिया। इसी प्रकार पशुओं के चित्रों में भी अस्वाभाविकता की झलक स्पष्ट दिखाई पड़ती है। शाहजहाँ के काल के

प्रमुख चित्रकार मीर हाशिम, मुहम्मद नादिर, विचित्र, चित्रमन, अनूप तथा चिन्तामणि थे।
मुगलकालीन चित्रकला की विशेषताएँ- मुगलकाल में चित्रकला के अनेक विषय थे, जैसे- आखेट, युद्ध, शाही राजसभा, सामन्तों के जीवन के दृश्य, पौराणिक कहानियों के विभिन्न दृश्य, व्यक्ति चित्र, पशु-पक्षियों, वृक्षों, पुष्पों तथा पौधों के चित्र आदि। ये चित्र हिन्दूकाल के चित्रों के समान धार्मिक भावनाओं पर आधारित नहीं थे। इन चित्रों को दरबारी चित्र कहा जा सकता है क्योंकि जनता की भावनाओं का चित्रण इनमें नहीं है।

मुगलकाल की चित्रकला शैली की दृष्टि से सजीव एवं स्वाभाविक है। धीरे-धीरे ईरानी कला के प्रभाव से मुक्त होकर वह पूर्णतया भारतीय हो गई। इसकी विशेषता रेखाओं की गोलाई और कोमलता, आकृतियों में गति और स्फूर्ति, हस्तमुद्राओं में सजीवता और उनके प्रयोग की बाहुल्यता है। इस समय के चित्रकारों ने चटकीले तथा रुपहले रंगों का खूब प्रयोग किया है। इस काल के व्यक्ति चित्रों में आकृति का अंकन अत्यन्त सूक्ष्म व स्वाभाविक है परन्तु मुगल वैभव तथा विकास की परिधि में
बँधी होने के कारण यह कला उन्मुक्त नहीं हो पाई, जिसके कारण इसमें एक प्रकार की कृत्रिमता तथा जड़ता उत्पन्न हो गई।

12.

मुगलकाल में स्त्रियों की दशा पर संक्षिप्त टिप्पणी कीजिए।

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मुगलकाल में स्त्रियों का कोई स्थान नहीं था। वे केवल विलास के लिए उपयुक्त समझी जाती थीं। बहु विवाह प्रथा, पर्दा प्रथा, तथा अशिक्षा के दुर्दशों ने स्त्री-समाज को पतित बना दिया था। तदापि कुछ प्रसिद्ध स्त्रियाँ इस काल में हुई, जिनमें गुलबदन बेगम, नूरजहाँ, जहाँआरा, रोशनआरा तथा जेबुन्निसा के नाम उल्लेखनीय हैं। इसके अतिरिक्त अहमदनगर की चाँदबीबी, गोंडवाना की दुर्गाबाई, शिवाजी की माता जीजाबाई तथा राजाराम की विधवा ताराबाई भी नारी रत्न थीं, जिन्होने अपनी प्रतिभा प्रदर्शित कर ख्याति प्राप्त की। हिन्दू स्त्रियों में बाल-विवाह, सती–प्रथा आदि अनेक कुप्रथाएँ विद्यमान थीं, जिनके कारण उनका समाज में घोर अध:पतन हो रहा था।

13.

मुगलकालीन सामाजिक, आर्थिक तथा धार्मिक दशाओं का वर्णन कीजिए।

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मुगलकाल की सामाजिक दशा

1. समाज का विभाजन – मुगलकालीन समाज में मुख्यत: दो वर्ग थे- उच्च वर्ग तथा निम्न वर्ग। इन दोनों वर्गों के बीच मध्यम वर्ग (हकीम, दुकानदार आदि) भी था, जो संख्या में बहुत कम होने के कारण नगण्य-सा माना जा सकता है। मुगलकालीन समाज सामन्तवादी प्रथा पर आधारित था, जो मध्ययुग की एक विशेषता रही है। समाज में सर्वोच्च स्थान बादशाह तथा उसके उन सम्मानित सामन्तों के होते थे, जिनका सम्राट से सीधा सम्पर्क होता था तथा जिनको विविध प्रकार के ऐश्वर्य तथा विशेषाधिकार प्राप्त थे। यद्यपि इस सामन्त वर्ग आरम्भ में विदेशी लोगों का वर्चस्व था, परन्तु मुगल सामन्त भारत से बाहर कभी धन नहीं ले गए। इसलिए विदेशी सामन्त वर्ग के होते हुए भी उसका दुष्प्रभाव देश की आर्थिक स्थिति पर नहीं पड़ा।

इस सामन्त वर्ग के नीचे छोटे कर्मचारियों द्वारा निर्मित मध्यम वर्ग था तथा भारत की अधिकांश जनता, जो ग्रामों में रहकर कृषि अथवा घरेलू उद्योग-धन्धे करती थी, निम्न वर्ग में आती थी। मुगलकाल में सल्तनत काल के समान समाज हिन्दू और मुसलमान वर्गों में विभाजित नहीं था। यह काल हिन्दू तथा मुस्लिम संस्कृति के बीच सामंजस्य का काल रहा। अकबर के काल से सामन्त तथा निम्न दोनों ही वर्गों में हिन्दू तथा मुसलमान समान रूप से सम्मिलित थे।

2. वस्त्राभूषण – मुगलकाल में बादशाह तथा उसका सामन्त वर्ग बहुमूल्य वस्त्रों का प्रयोग करता था। जरी के बहुमूल्य वस्त्र, रेशमी तथा मलमल के वस्त्रों का उच्च वर्ग में प्रयोग होता था। ढाका की मलमल तथा मुर्शीदाबाद का रेशम उस समय अत्यधिक प्रसिद्ध थे। उच्च सामन्त वर्ग के सभी व्यक्तियों की, चाहे वे मुसलमान हों अथवा हिन्दू, वेशभूषा समान थी तथा जाति-चिह्न के बिना उन्हें पहचान पाना असम्भव था। बादशाह भेट तथा खिलअत के रूप में अमीरों को बहुमूल्य वस्त्र प्रदान करता था तथा अबुल फजल के कथनानुसार उसे अकबर के लिए प्रतिवर्ष 1000 पोशाक निर्मित करवानी पड़ती थीं। उच्च वर्ग में अचकन तथा पाजामा पहनने का रिवाज था, परन्तु साधारण हिन्दू वर्ग अधिकतर धोती-कुर्ता पहनता था। आभूषणों का प्रयोग दोनों जातियाँ समान रूप से करती थीं

3. आमोद-प्रमोद – मुगलकाल में आमोद-प्रमोद के प्रमुख साधन शिकार, पोलो, पशु-युद्ध, कुश्ती लड़ना तथा कबूतर उड़ाना थे। घरेलू खेलों में चौपड़, पासा तथा शतरंज के खेल प्रमुख थे। उच्च वर्ग के लोग मदिरापान के दुर्व्यसन से वंचित नहीं थे वरन् मुगल सम्राटों का मदिरापान तथा अफीम सेवन का व्यसन तो विख्यात है। बाबर के आमोद-प्रमोद, हुमायूँ का अफीम के नशे में मस्त रहना, अत्यधिक मदिरापान के कारण अकबर के दो पुत्रों की अल्पायु में ही मृत्यु हो जाना और जहाँगीर का मदिरा प्रेम आदि बातें इस मत की पुष्टि करती हैं।

4. स्त्रियों की दशा – इस समय समाज में स्त्रियों का कोई स्थान नहीं था। वे केवल विलास के लिए उपयुक्त समझी जाती थीं। बहुविवाह प्रथा, पर्दा प्रथा तथा अशिक्षा के दुर्गुणों ने स्त्री-समाज को पतित बना दिया था, तथापि कुछ प्रसिद्ध स्त्रियाँ इस काल में भी हुई, जिनमें गुलबदन बेगम, नूरजहाँ, जहाँआरा, रोशनआरा तथा जेबुन्निसा के नाम विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं। इनके अतिरिक्त अहमदनगर की चाँदबीबी, गोंडवाना की दुर्गाबाई, शिवाजी की माता जीजाबाई तथा राजाराम की विधवा पत्नी ताराबाई भी नारी-रत्न थी, जिन्होंने अपनी प्रतिभा प्रदर्शित करके ख्याति प्राप्त की। हिन्दू स्त्रियों में बाल-विवाह, सती–प्रथा आदि अनेक कुप्रथाएँ विद्यमान थीं, जिसके कारण उनके समाज का घोर अध:पतन हो रहा था।

5. सामाजिक पतन – शाहजहाँ के शासनकाल के अन्तिम वर्षों में भारतीय समाज के पतन के चिह्न स्पष्टतः दृष्टिगोचर होने लगे थे तथा औरंगजेब के काल में सामाजिक पतन आरम्भ हो गया था। इस समय उच्च सामन्त वर्ग की नैतिकता, पवित्रता, साहस तथा शक्ति विनष्ट हो गई थी। विलासिता, मदिरापान तथा दुराचार उस समाज के सामान्य अवगुण बन गए थे। अमीर रिश्वतखोरी तथा भ्रष्टाचार में लिप्त रहते थे तथा राजदरबार में कुचक्र एवं षड्यन्त्र रचना उनका एकमात्र कार्य रह गया था। मस्जिदों में भी ये सामान्य दुर्गुण दृष्टिगोचर हो रहे थे। उच्च वर्ग के साथ-साथ अन्य वर्गों का नैतिक पतन भी होने लगा था। सरकारी कर्मचारी निर्लज्जतापूर्वक रिश्वत लेते थे तथा प्रजा पर अत्याचार करते थे, जिनको रोकने वाला कोई नहीं था। औरंगजेब के पश्चात मुगल सम्राट प्रजा के प्रति अपने समस्त कर्तव्यों को भूलकर विलासिता में लिप्त हो गए। इस प्रकार 18 वीं शताब्दी में भारत के सामाजिक पतन की पराकाष्ठा हो गई। अशिक्षा, नैतिक पतन, अधर्म, भ्रष्टाचार और मदिरापान आदि दुर्गुणों ने समाज को अधोगति तक पहुँचा दिया।

6. सामाजिक प्रथाएँ – मुगलकाल में हिन्दू व मुस्लिम दोनों जातियों में अनेक प्रकार की सामाजिक रूढ़ियाँ तथा प्रथाएँ समान रूप से विद्यमान थीं। दोनों ही ज्योतिष में विश्वास रखते थे, पीरों के मजारों की पूजा करते थे तथा गुरु की भक्ति करते थे। इस समय समाज में समान रूप से अन्धविश्वास तथा अनेक कुप्रथाएँ पनप चुकी थीं। हिन्दुओं में सती प्रथा, बाल-विवाह प्रथा तथा दहेज की प्रथाएँ प्रचलित थीं। विधवा पुनर्विवाह पंजाब तथा महाराष्ट्र के कुछ भागों के अतिरिक्त अन्य कहीं प्रचलित नहीं था। हिन्दुओं के प्रमुख त्योहार होली, दीवाली, रक्षाबन्धन आदि थे, जिन्हें मुसलमान भी उत्साहपूर्वक मनाते थे। मुसलमानों के त्योहार ईद तथा मुहर्रम को हिन्दू लोग भी मनाते थे।

यद्यपि हिन्दू समाज में इस समय छुआछूत तथा जाति-भेद विद्यमान था तथापि हिन्दू वर्ग की सहिष्णुता की भावना ने उनको मुसलमानों के अधिक निकट ला दिया था। उच्च वर्ग के अतिरिक्त साधारण वर्ग सामान्यतः ईमानदार तथा धर्मभीरु था। ट्रैवनियर ने लिखा है- “नैतिकता में हिन्दू अच्छे हैं, विवाह करने पर वे कदाचित ही अपनी पत्नियों के प्रति अश्रद्धा और अविश्वास रखते हैं। उनमें व्यभिचार का अभाव है और उनके अस्वाभाविक अपराधों के विषय में तो कभी कोई सुनता ही नहीं है। इस प्रकार दरिद्र होते हुए भी साधारण प्रजा का चरित्र उच्चकोटि का था तथा वह सामान्यत: मितव्ययी होने के कारण सुखपूर्वक जीवन व्यतीत करती थी।

मुगलकाल की आर्थिक दशा – मुगलों के शासनकाल में भारत एक समृद्ध देश था, जिसका प्रमुख श्रेय यहाँ के व्यापारियों को था, जिन्होंने विदेशों के साथ व्यापारिक सम्पर्क स्थापित करके देश को सोने-चाँदी तथा बहुमूल्य पत्थरों से परिपूर्ण कर दिया। यद्यपि इस समय भी भारत एक कृषिप्रधान देश ही था तथा यहाँ की अधिकांश ग्रामीण जनता की जीविका कृषि पर निर्भर करती थी, परन्तु कृषि तथा व्यापार के सुन्दर सामंजस्य के कारण देश में समृद्धि थी तथा आवश्यक वस्तुओं के मूल्य कम थे।

‘हुमायूँनामा’ में भारत में प्रचलित सस्ते मूल्यों का विवरण प्राप्त होता है। इसके अनुसार अमरकोट में एक रुपए में एक बकरा बिकता था। इसी प्रकार अन्य खाद्य सामग्री भी काफी सस्ती थी। अकबर के कृषि सम्बन्धी तथा आर्थिक सुधारों के कारण भाव और भी सस्ते हो गए तथा दरिद्रों को भी पर्याप्त मात्रा में खाद्य सामग्री उपलब्ध थी। उस समय दरिद्रों की दशा चिन्तनीय नहीं थी। तथा वे सन्तोषपूर्वक जीवन व्यतीत करते थे।

1. कृषि – सदैव की भाँति मुगलकाल में भी भारत का प्रमुख व्यवसाय कृषि ही था। अकबर के भूमि सुधारों से कृषकों की दशा में सुधार हुआ। गन्ना, नील, कपास तथा रेशम प्रमुख उत्पादित वस्तुएँ थीं। तम्बाकू की कृषि भी मुगलकाल में आरम्भ हो गई थी। कृषि के सामान्य उपकरण अधिकतर वही थे, जो आज तक प्रचलित हैं। सिंचाई के उपयुक्त साधनों के अभाव में कृषक अधिकतर प्रकृति पर निर्भर रहते थे तथा अतिवृष्टि या अनावृष्टि के समय दुर्भिक्ष पड़ने पर उनकी दशा अत्यन्त दयनीय हो जाती थी। सरकार की सहायता मिलने पर भी उनकी स्थिति में कोई विशेष सुधार नहीं होता था। अकाल के पश्चात महामारी का प्रकोप होता था, जिससे असंख्य व्यक्ति मृत्यु के शिकार हो जाते थे। दुर्भिक्ष के अतिरिक्त बहुधा युद्धों तथा सेनाओं के आवागमन के कारण भी कृषकों को काफी कष्ट उठाना पड़ता था और बादशाह की निरन्तर चेतावनी के उपरान्त भी कई बार सैनिक उनके खेतों को रौंद डालते थे।

अकबर के पश्चात जहाँगीर तथा शाहजहाँ के काल में अनेक बार दुर्भिक्ष पड़ा, जिसके कारण जनता की दशा इतनी शोचनीय हो गई कि उसका वर्णन करना असम्भव है। इस काल में आने वाले विदेशी यात्रियों ने दुर्भिक्ष पीड़ितों की दयनीय दशा का वर्णन किया है। यातायात के समुचित साधनों के अभाव में उनकी दशा बद से बदतर हो जाती थी। 18 वीं शताब्दी की अराजकता तथा अव्यवस्था में तो कृषकों की दशा अत्यन्त दयनीय हो गई और वे ऋणग्रस्त हो गए।

2. उद्योग-धन्धे – यद्यपि मुगलकाल में आधुनिक ढंग की मशीनें तथा कारखाने उपलब्ध नहीं थे परन्तु हस्त उद्योग-धन्धे उस काल में प्रचलित थे तथा अपने देश की खपत से अधिक माल तैयार करके व्यापारीगण भारत का बना हुआ माल विदेशों में भी ले जाते थे। व्यापार द्वारा भारत को लाभ होता था, जिससे देश उत्तरोत्तर धनी बनता जा रहा था। इस समय भारत का सबसे महत्वपूर्ण उद्येाग कपड़ा बुनना, राँगाई तथा छपाई करना था।

बंगाल तथा बिहार के प्रान्त सूती कपड़ा बुनने के लिए प्रसिद्ध थे, जहाँ प्रत्येक घर में कपड़ा बुना जाता था। ऊनी वस्त्र कश्मीर में निर्मित किए जाते थे। गुजरात भी सूती वस्त्रों के लिए विख्यात था। यहाँ के व्यापारियों की ईमानदारी की प्रशंसा बारबोसा तथा मनूची जैसे विदेशी यात्रियों ने भी की है।
वस्त्र उद्योग के अतिरिक्त अन्य छोटे-छोटे उद्योग-धन्धे भी इस समय भारत में प्रचलित थे। विदेशों के साथ व्यापार करने के लिए जहाजों का भी निर्माण होता था। यद्यपि भारतीय बहुत उत्तम जहाज निर्मित करना नहीं जानते थे तथापि यह उद्योग भी इस समय प्रचलित था। विविध प्रकार के टूक, कलमदान, शमादान, अलंकृत तश्तरियाँ. छोटी-छोटी सन्दकचियाँ तथा इसी प्रकार की अन्य वस्तुएँ, जो सामन्तों के आवासगृहों को सुसज्जित करने के काम में आती थीं, भारत में निर्मित होती थीं।

3. अन्तरप्रान्तीय व्यापार – भारत के भिन्न-भिन्न भागों में व्यापार प्रचुर मात्रा में होता था। व्यापार के लिए समृद्ध नगरों का निर्माण करवाया गया था, जो सड़कों अथवा नदियों के द्वारा परस्पर सम्बन्धित थे। लाहौर, बुरहानपुर, अहमदाबाद, बनारस, पटना,, बर्दवान, ढाका, दिल्ली तथा आगरा आदि इस काल के प्रसिद्ध व्यापारिक नगर थे। बुरहानपुर और आगरा उत्तर भारत में व्यापार के मुख्य केन्द्र थे। बंगाल से वहाँ खाद्यान्न और रेशमी कपड़ा आता था तथा मालाबार से काली मिर्च भी पहुँचती थी। गुजरात में जैन और बोहरा मुसलमान, राजस्थान में ओसवाल, माहेश्वरी और अग्रवाल, कोरोमण्डल तट पर चेट्टी और मालाबार में मुसलमान व्यापारी थे। व्यापार नदियों तथा सड़कों दोनों मार्गों से होता था। मुगल सम्राटों ने व्यापार के लिए सड़कों का निर्माण करवाया, जो दोनों ओर छायादार वृक्षों से आच्छादित थीं। थोड़ी-थोड़ी दूर पर सरायों का प्रबन्ध था, जहाँ यात्रियों के ठहरने की पूर्ण सुविधा प्राप्त थी। चोरों तथा डाकुओं से सड़कों की सुरक्षा के लिए सरकारी कर्मचारी नियुक्त होते थे।

4. विदेशी व्यापार – मुगलकाल में भारत के विभिन्न बाह्य देशों से सम्पर्क थे, जिनके साथ भारत का व्यापार होता था। विदेशों के साथ भी जल मार्ग तथा स्थल मार्ग के द्वारा व्यापारिक सम्बन्ध स्थापित थे। इस समय उत्तर-पश्चिम प्रान्तों में दो प्रमुख स्थल मार्ग थे- प्रथम, लाहौर से काबुल होते हुए बाहर जाता था तथा द्वितीय, मुल्तान से कंधार होकर। इन स्थल मार्गों के अतिरिक्त अनेक बन्दरगाह थे जिनसे जल मार्गों के द्वारा व्यापार होता था। सिन्ध में लाहौरी बन्दर, गुजरात में सूरत, भड़ौच, खम्भात, बम्बई (वर्तमान-मुम्बई) में गोआ, मालाबार में कालीकट तथा कोचिन प्रमुख बन्दरगाह थे तथा पूर्वी तटों पर मछलीपट्टम, नीमापट्टम और बंगाल में श्रीपुर, सतगाँव और सोनारगाँव नामक बन्दरगाह थे। इन सभी बन्दरगाहों में सूरत का बन्दरगाह प्रमुख था, जहाँ से सबसे अधिक विदेशों के लिए व्यापार होता था।

भारत सामान्यतः सुती और रेशमी वस्त्र, नील, अफीम, काली मिर्च तथा विलास की सामग्री बाहर भेजता था तथा बाहर से इन वस्तुओं के बदले में सोना, चाँदी, ताँबा, घोड़े, कच्चा रेशम, बहुमूल्य रत्न, सुगन्धित द्रव तथा मखमल आदि वस्तुएँ मंगाई जाती थी। फ्रांस से ऊनी वस्त्र, फारस व इटली से रशम, फारसे से कालान फारस व इटली से रेशम, फारस से कालीन, चीन से कच्चा रेशम और अरब तथा मध्य एशिया से घोड़े मॅगाए जाते थे। मुगल बादशाह विदेश जाने वाली और विदेश से आनी वाली वस्तुओं पर 3.5% तक कर लेते थे। चुंगी की दर कम होने के कारण व्यापार को अत्यधिक प्रोत्साहन मिला तथा भारत निरन्तर धन सम्पन्न देश बनने लगा था। यह समृद्धि मुगल युग को स्वर्ण युग के रूप में परिणत करने में सहायक बनी।

मुगलकाल की धार्मिक दशा

प्रो० एस०आर० शर्मा के मतानुसार मुगल साम्राज्य गैर-कट्टरपंथी राज्य था। अकबर, जो वास्तविक रूप से मुगल वंश का संस्थापक था, उदार और सहिष्णु था तथा उसने धर्म को राजनीति से पृथक करके एक अलौकिक साम्राज्य स्थापित किया था। मजहबी राज्य में सम्राट को धार्मिक अधिकार प्राप्त होते हैं तथा सम्राट एवं धर्माचार्यों का विरोध करना पाप समझा जाता है, परन्तु मुगलकाल में इस प्रकार की व्यवस्था नहीं थी। इस काल में न्यायालय भी अधिकतर धर्म से प्रभावित हुए बिना निष्पक्ष रूप से अपना कार्य करते थे।
मुगल सम्राटों ने मुसलमान होते हुए भी धर्मान्धता की नीति का अनुसरण नहीं किया तथा देश के सभी व्यक्तियों को उत्थान का समान अवसर प्रदान किया। यहाँ तक कि औरंगजेब जैसे धर्मान्ध सम्राट के काल में भी (जिसने धर्म प्रभावित राज्य स्थापित करने का प्रयास किया था) अनेक कट्टर मुसलमान तक सम्राट की न्याय नीति के विरोधी थे; अतः मुगल राज्य संस्था को धर्म निरपेक्ष कहना अधिक न्यायसंगत प्रतीत होता है।

14.

मुगलकाल में हिन्दी साहित्य की प्रगति का विवरण दीजिए।

Answer»

मुगलकाल में फारसी साहित्य के समान हिन्दी साहित्य की भी खूब उन्नति हुई। अकबर की सहिष्णुता नीति से हिन्दी साहित्य अत्यन्त समृद्ध हुआ। राजा बीरबल, राजा मानसिंह, राजा भगवान दास, नरहरि और हरिनाथ अकबर के राजदरबार से सम्बन्धित विद्वान थे। नन्ददास, बिट्ठलनाथ, परमानन्ददास आदि कवियों के व्यक्तिगत प्रयत्नों ने हिन्दी साहित्य को समृद्ध बनाया। इस काल में तुलसीदास ने 25 ग्रन्थों की रचना की जिसमें ‘रामचरितमानस’ और ‘विनय पत्रिका प्रमुख है। सूरदास ने ‘सूससागर’ रहीम ने ‘रहीम सतसई’ और रसखान ने ‘प्रेमवाटिका’ नामक ग्रन्थों की रचना। की। जहाँगीर का भाई हिन्दी में कविता करता था। शाहजहाँ के संरक्षण में सुन्दर कविराम, कविन्द्र आचार्य, शिरोमणि मणि बनारसीदास आदि हिन्दी के विद्वान थे।

15.

मुगलकाल में कृषकों की दशा का वर्णन कीजिए।

Answer»

सदैव की भाँति मुगलकाल में भी भारत का प्रमुख व्यवसाय खेती था। सिंचाई के उपयुक्त साधनों के अभाव में कृषक अधिकतर प्रकृति पर निर्भर रहते थे। अतिवृष्टि या अनावृष्टि के समय दुर्भिक्ष पड़ने पर कृषकों की दशा अत्यन्त दयनीय हो जाती थी। सरकार की सहायता मिलने पर भी उनकी दशा में कोई विशेष सुधार नहीं होता था। दुर्भिक्ष के अतिरिक्त बहुधा युद्धों और सेनाओं के आगमन के कारण भी कृषकों को काफी कष्ट उठाना पड़ता था। बादशाह की निरन्तर चेतावनी के बाबजूद भी कई बार सैनिक उनके खेतों को रौंद डालते थे।

16.

मुगलकालीन चित्रकला पर प्रकाश डालिए।

Answer»

भवन निर्माण कला के समान ही चित्रकला को भी मुगल सम्राटों ने राजाश्रय प्रदान किया। बाबर और हुमायूं चित्रकला के शौकीन थे। अकबर को चित्रकला से विशेष अनुराग था। अकबर ने चित्रकला में भी देशी तथा विदेशी तत्वों का सुन्दर सम्मिश्रण करने में सफलता प्रदान की। फतेहपुर सीकरी की दीवारों पर उसने सुन्दर चित्रकारी करवाई। दरबार में साप्ताहिक प्रदर्शनियों की व्यवस्था करके उसने चित्रकला को प्रोत्साहन दिया। जहाँगीर का काल मुगल चित्रकला का स्वर्ण-युग था। जहाँगीर स्वयं चित्रकार था। इस समय चित्रकला में नवीनता, मौलिकता, स्वाभाविकता, गतिशीलता एवं सजीवता थी। प्राकृतिक दृष्यों का सूक्ष्म, भावपूर्ण तथा स्वाभाविक चित्रण एवं व्यक्ति चित्र और युद्धों व आखेट के चित्रों का निर्माण इस कला की विशेषता थी। शाहजहाँ के उत्तराधिकारी औरंगजेब के काल में चित्रकला का पतन हो गया। इस्लाम धर्म का कट्टर अनुयायी होने कारण व किसी भी कला को राजाश्रय प्रदान करना पाप समझता था। उसने अपने दरबार के सभी चित्रकारों को निकलवा दिया। बीजापुर के महल और सिकंदरा में अकबर के मकबरें की चित्रकारी को नष्ट करवा दिया।

मुगलकाल की चित्रकला शैली की दृष्टि से सजीव एवं स्वाभाविक है। मुगलकाल के चित्र हिन्दूकाल के चित्रों के समान धार्मिक भावनाओं पर आधारित नहीं थे। इन चित्रों को दरबारी चित्र कहा जा सकता था। मुगलकाल के चित्रकारों में मीर सैयद, अब्दुल समद, फारुख बेग, जमशेद दशवन्त, हरिवंश, जगन्नाथ, धर्मराज, उस्ताद मंसूर विशनदान, मनोहर आदि प्रमुख थे।

17.

“मुगल शासक स्थापत्य कला के संरक्षक थे।” स्पष्ट कीजिए।

Answer»

मुगल शासन में भारत में स्थापत्य कला का बहुमुखी विकास हुआ। मुगलों ने शानदार किलों, राजमहलों, दरवाजों, सार्वजनिक इमारतों, मस्जिदों, मकबरों आदि का निर्माण करवाया। इस दृष्टि से मुगलकाल को गुप्तकाल के बाद उत्तर भारत का दूसरा स्वर्ण-युग कहा जा सकता है। मुगलों की स्थापत्य कला ने भारतीय स्थापत्य के इतिहास में नवीन युग का प्रादुर्भाव किया। इस युग में मध्य एशियाई तथा भारतीय दोनों शैलियों का समन्वय हुआ जो अकबर के समय में चमत्कर्ष पर पहुंच गया। अकबर के काल में इस्लामी और हिन्दू कला के मिश्रण से स्थापत्य कला का विकास हुआ। शेरशाह का मकबरा, बुलन्द दरवाजा, ताजमहल, आगरा का लाल किला, दिल्ली का लाल किला, जामा मस्जिद, अकबर का मकबरा, मोती मस्जिद आदि मुगलकाल की स्थापत्य कला के उदाहरण आज भी विद्यमान हैं जो यह स्पष्ट करते हैं कि मुगल शासक स्थापत्य कला के संरक्षक थे।

18.

“शाहजहाँ का काल मुगल स्थापत्य का स्वर्ण-काल था।” विवेचना कीजिए।

Answer»

शाहजहाँ के शासनकाल में मुगल स्थापत्य कला अपनी चरम सीमा पर पहुँच गई थी। उसका काल विद्वानों द्वारा मुगल स्थापत्य कला का ‘स्वर्ण-युग’ कहा जाता है। शाहजहाँ ने नवीन इमारतों के अलावा आगरा और लाहौर के किलो में अकबर द्वारा बनवाई गई कई इमारतों को तुड़वाकर नवीन इमारतें भी बनवाई। आगरा के किले में दीवाने आम, दीवाने खास, शीश महल, शाहबुर्ज, खासमहल, मच्छीभवन, झरोखा दर्शन का स्थान, अंगूरी बाग, नगीना मस्जिद और मोती मस्जिद उसके द्वारा बनवाई गई इमारतों में प्रमुख हैं। ये सभी इमारतें अत्यन्त सुन्दर हैं। हालाँकि शाहजहाँ के भवन दृढ़ता तथा मौलिकता में अकबर के भवनों की अपेक्षा निम्न कोटि के हैं परन्तु सौन्दर्य रमणीयता, अलंकरण व सादगी में उनका कोई सानी नहीं है।

1639 ई० में शाहजहाँ ने दिल्ली के पास शाहजहाँनाबाद नगर की नींव डाली। दिल्ली में यमुना नदी के दाएँ किनारे एक किला बनवाया, जो लाल किले के नाम से विख्यात है। इस किले के भीतर सफेद संगमरमर की सुन्दर इमारतें बनवाई गई हैं, जिनमें मोती महल, हीरा महल और रंग महल विशेष उल्लेखनीय हैं। दीवाने आम और दीवाने खास आदि सरकारी इमारतों के अतिरिक्त नौबतखाना, शाही निवास, नौकरों के निवास आदि भी बने हुए हैं। दीवाने खास में चमकीले संगमरमर के फर्श, उसकी दीवारों पर फूल-पत्तियों की सुन्दर नक्काशी और मेहराबों का सुनहला रंग इतना आकर्षक है कि वहाँ लिखा है- “अगर भूमि पर कहीं स्वर्ग है तो वह यहीं हैं, यहीं है, यहीं है।’ यहाँ पानी और फव्वारों का प्रबन्ध अत्यन्त भव्य है।
 
शाहजहाँकालीन मस्जिदों में दिल्ली की जामा मस्जिद देश की सबसे प्रसिद्ध मस्जिद है। एक दूसरी जामा मस्जिद शाहजहाँ की बड़ी पुत्री जहाँआरा ने आगरा में बनवाई। पर्सी ब्राउन ने आगरा की जामा मस्जिद को दिल्ली की जामा मस्जिद से स्थापत्य कला की दृष्टि से भव्य और सुन्दर बताया है। मोती मस्जिद जिसे शाहजहाँ ने आगरा के किले में बनवाया था, स्थापत्य कला की दृष्टि से एक उच्चकोटि की कृति है। दूध की तरह सफेद संगमरमर से बनी हुई यह मस्जिद अपने नाम ‘मोती की तरह ही है।

लेकिन जिस इमारत के लिए शाहजहाँ को आज भी याद किया जाता है, वह है ताजमहल, जो उसने अपनी पत्नी मुमताज महल की याद में बनवाया, जिसे 22 वर्षों में लगभग चार करोड़ रुपए की रकम से बनाया गया था। जन्नत के बागों की तरह खूबसूरत चार बाग के बीचों-बीच स्थित इस संगमरमर की इमारत का ज्यामितीय ग्रिडों की श्रृंखला के अनुसार यथानुपात निर्माण किया गया था। चबूतरे के चारों कोनों पर चार सफेद मीनारें हैं और इसकी बगल में यमुना नदी बहती है। सुन्दर चित्रकारी से अलंकृत जालियाँ, बेल-बूटों से सजी हुई दीवारें तथा लम्बाई,
 
चौड़ाई और ऊँचाई की दृष्टि से इमारत को एक इकाई का रूप प्रदान करने वाली कला न केवल ताजमहल के सौन्दर्य को बढ़ाने वाली है अपितु ताजमहल एक सम्पूर्ण इकाई के रूप में संगमरमर में ढाला गया एक स्वपन है, जो एक महान् सौन्दर्य का प्रतीक माना जा सकता है। हावेल ने इसे ‘भारतीय नारीत्व की साकार प्रतिमा कहा है। ताजमहल के निर्माण की योजना के बारे में यह धारणा गलत सिद्ध कर दी गई है कि इसके नक्शे को बनाने में किसी यूरोपियन कलाकार ने सहयोग दिया था। यह प्रमाणित किया जा चुका है कि इसका मुख्य कलाकार उस्ताद अहमद लाहौरी था, जिसे शाहजहाँ ने ‘नादिर-उज-असर’ की उपाधि प्रदान की थी।

शाहजहाँ ने मयूर सिंहासन भी बनवाया था, जिसकी छत मयूर स्तम्भों पर आधारित थी। ये स्तम्भ हीरे, पन्ने, मोती तथा लाल रत्नों से बने हुए थे। इस सिंहासन के बनने में 14 लाख रुपए से अधिक व्यय हुआ था। 1739 ई० में नादिरशाह इस सिंहासन को लूटकर अपने साथ ईरान ले गया था।
लाहौर के किले में दीवाने आम, शाहबुर्ज, शीशमहल, नौलखा महल और ख्वाबगाह आदि शाहजहाँ के समय में बनाई गई मुख्य इमारतें हैं। इनके अतिरिक्त काबुल, कश्मीर, अजमेर, कन्धार, अहमदाबाद आदि विभिन्न स्थानों पर भी शाहजहाँ ने अनेक मस्जिदें, मकबरे आदि बनवाए थे।

19.

निम्नलिखित पर टिप्पणी लिखिए(क) मुगलकालीन स्थापत्य कला 

Answer»

() मुगलकालीन स्थापत्य कला – मुगल सम्राट वास्तुकला या स्थापत्य कला अथवा भवन निर्माण कला के महान् पोषक एवं संरक्षक थे। मुगल कला अनेक प्रभावों का सम्मिश्रण थी तथा अपने पूर्वकाल की कला की अपेक्षा अधिक विशिष्ट और अलंकरणयुक्त थी। इसकी रमणीयता और अलंकरण; सल्तनतकालीन काल की सादगी और धीमकायता के विपरित था। मुगलकाल में निर्मित स्थापत्य कला की प्रमुख विशेषताएँ विराट गोल गुम्बद, पतले स्तम्भ तथा विशाल खुले हुए प्रदेश द्वार हैं।

1. बाबर तथा हुमायूँ – मुगल साम्राज्य का संस्थापक बाबर था, जिसे भारत की भवन निर्माण कला पसन्द नहीं आई। उसने कुस्तुनतुनियाँ से कलाकारों को बुलवाया और उनके द्वारा उसने कुछ इमारतों का निर्माण करवाया। उसने लगभग 1500 कारीगरों से प्रतिदिन कार्य करवाया तथा आगरा, ग्वालियर, बयाना और धौलपुर में कुछ भवनों का निर्माण करवाया परन्तु उसके काल के भवन अधिकाशंत: नष्ट हो चुके हैं, केवल पानीपत में काबुली बाग की मस्जिद तथा रुहेलखण्ड में सम्भल की जामा मस्जिद शेष हैं जो उसके कला प्रेम की द्योतक हैं। बाबर के उत्तराधिकारी हुमायूँ को इतना समय नहीं मिला कि वह भवनों का निर्माण करवा सकता, परन्तु हिसार जिले के फतेहाबाद में उसके द्वारा निर्मित मस्जिद आज भी विद्यमान है जिसमें ईरानी कला का बाहुल्य है

2. शेरशाह सूरी – हुमायूं के भारत से चले जाने के बाद शेरशाह सूरी ने अपना साम्राज्य स्थापित किया। वह भी कला का महान पोषक था तथा अनेक दुर्गों का निर्माण करवाया जो शिल्पकला के सर्वोत्कृष्ट उदाहरण प्रस्तुत करते हैं। दिल्ली में आज भी उसके द्वारा निर्मित दुर्ग के कुछ अवशेष प्राप्त होते हैं, जो उसकी आकस्मिक मृत्यु के कारण अपूर्ण रह गया था। शेरशाह के काल की सुन्दरतम कृति बिहार में सासाराम में उसका मकबरा है जो झील के बीचों-बीच निर्मित किया गया है। यह मकबरा भव्यता, सुन्दरता तथा सुडौलपन में अद्वितीय है। इसमें देशी तथा विदेशी कलाओं का सुन्दर सम्मिश्रण है।

3. अकबर – मुगल सम्राटों में अकबर प्रथम सम्राट था जिसके काल की अनेक कला-कृतियाँ आज भी उपलब्ध हैं। अकबर ने देशी तथा विदेशी दोनों कलाओं के सुन्दर तत्त्वों का समावेश अपनी कला में किया तथा कला को व्यापक संरक्षण प्रदान किया। यद्यपि अकबर की कला में भारतीय तथा ईरानी तत्त्व विद्यमान हैं परन्तु उसमें भारतीय तत्त्वों का बाहुल्य है। बौद्ध तथा जैन शैली को भी सम्राट ने उदारतापूर्वक अपनाया है।

उसके काल के अधिकांश भवन आगरा तथा फतेहपुर सीकरी में निर्मित हुए। आगरा का प्रसिद्ध दुर्ग अकबर ने निर्मित करवाया जिसमें दीवान-ए-आम, जहाँगीरी महल आदि प्रसिद्ध कृतियाँ हैं। फतेहपुर सीकरी की समस्त इमारतें सुदृढ़ लाल पत्थर द्वारा निर्मित हैं जिसमें दीवान-ए-आम, जोधाबाई का महल तथा अन्य दो रानियों के महल, संगमरमर की जामा मस्जिद, दक्षिण विजय को चिरस्मरणीय बनाने के लिए निर्मित विशाल बुलन्द दरवाजा, बौद्ध विहारों के आधार पर निर्मित पंचमहल तथा विशुद्ध संगमरमर की शेख सलीम चिश्ती की दरगाह विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं। इसके अतिरिक्त बीरबल का महल तथा बादशाह की ख्वाबगाह भी दर्शनीय इमारतें हैं।
अकबर की अन्य इमारतों में हुमायूँ का मकबरा है, जो दिल्ली में है और ईरानी कला के अनुरूप बनाया गया है। इलाहाबाद के दुर्ग का निर्माण भी अकबर ने करवाया जिसमें चालीस स्तम्भों का प्रासाद हिन्दू शैली के आधार पर निर्मित है। सिकन्दरा में अकबर ने अपने मकबरे का निर्माण आरम्भ करवाया था जिसकी योजना उसी ने बनाई थी तथा जिसके ऊपर एक सुनहरी छत वाला संगमरमर का गुम्बद बनवाने का सम्राट का विचार था। परन्तु उसके पूर्ण होने से पूर्व ही सम्राट की मृत्यु हो गई तथा उसके पुत्र जहाँगीर ने उस मकबरे को पूर्ण करवाया।

4. जहाँगीर – अकबर के उत्तराधिकारी जहाँगीर को भवन निर्माण कला से उतना प्रेम नहीं था जितना चित्रकला से; अतः उसके काल में अधिक भवनों का निर्माण नहीं हुआ। परन्तु एक तो उसने अपने पिता द्वारा आरम्भ किए गए सिकन्दरा के मकबरे को पूर्ण करवाया जिसके दर्शनार्थ वह बहुधा पैदल जाया करता था। और जहाँगीर के काल की दूसरी कलाकृति आगरा में नूरजहाँ के पिता एतमादुद्दौला का मकबरा है जो शुद्ध संगमरमर का बना हुआ है और उसमें विभिन्न रंगों के बहुमूल्य पत्थर जड़े हुए हैं। जहाँगीर का मकबरा लाहौर में है, जिसे उसकी मृत्यु के पश्चात नूरजहाँ ने बनवाया था।

5. शाहजहाँ – शाहजहाँ भवन निर्माण कला का प्रेमी सम्राट था तथा उसके काल में मुगल युग की सर्वाधिक सुन्दर कलाकृतियाँ निर्मित हुईं। शाहजहाँ के भवन दृढ़ता तथा मौलिकता में अकबर के भवनों से निम्न कोटि के हैं परन्तु सौन्दर्य, रमणीयता, अलंकरण तथा सरलता से बेजोड़ हैं। शाहजहाँ ने बहुमूल्य पत्थरों तथा स्वर्ण का अत्यधिक प्रयोग किया है जिससे उसके भवनों की जगमगाइट एवं आकर्षण में चार चाँद लग गए हैं। शाहजहाँ ने दिल्ली में शाहजहाँनाबाद का दुर्ग निर्मित करवाया जिसके भवनों में दीवान-ए-आम जो लाल पत्थर से बना है, दीवान-ए-खास जो शुद्ध संगमरमर से बना है, रंगमहल, खासमहल आदि विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं। दीवान-ए-खास अधिक अंलकरण युक्त है जहाँ पर मयूर सिंहासन पर सम्राट बैठा करता था। उसकी छत पर सोने की नक्काशी दर्शनीय है। श्वेत संगमरमर के इस भवन पर लिखा हुआ यह शेर सत्य ही प्रतीत होता है कि यदि पृथ्वी पर कहीं स्वर्ग है तो वह यहीं पर है
गर फिरदौस बर रू-ए-जमीं अस्त।
हमीं अस्त, हमीं अस्त, हमीं अस्तो॥

दिल्ली में जामा मस्जिद शाहजहाँ के काल की अन्यतम कृति है, जो लाल पत्थर द्वारा निर्मित है। दिल्ली के अतिरिक्त आगरा में शाहजहाँ के काल की सर्वश्रेष्ठ इमारतें उपलब्ध होती हैं। अकबर के द्वारा निर्मित आगरा के दुर्ग में शाहजहाँ ने सफेद संगमरमर की मोती मस्जिद तथा मुसम्मन बुर्ज का निर्माण करवाया। इसी मोती मस्जिद में, बन्दी के रूप में शाहजहाँ ने अपने जीवन के अन्तिम आठ वर्ष व्यतीत किए तथा मुसम्मन बुर्ज में, ताजमहल को देखते-देखते उसने अपने प्राण त्यागे।।
शाहजहाँ तथा मुगलकाल की सर्वश्रेष्ठ कृति आगरा का ताजमहल है जो सम्राट ने अपनी दिवंगत पत्नी मुमताजमहल की स्मृति में बनवाया था। यह शुद्ध संगमरमर द्वारा निर्मित मकबरा 22 वर्षों में बनकर तैयार हुआ तथा इस पर तीन करोड़ रुपया व्यय हुआ। सौन्दर्य, अलंकरण तथा कला की दृष्टि से यह अद्वितीय एवं सर्वश्रेष्ठ इमारत है।

6. औरंगजेब – शाहजहाँ के पश्चात औरंगजेब मुगल सम्राट बना। वह धर्मानुरागी शासक था। वह संयमित जीवन जीने का आदि था तथा शरियत के अनुसार शासन संचालित करता था। उसने रास-रंग के सभी आयोजनों पर रोक लगा दी। वह जनहित के कार्यों में रुचि रखता था। उसने जनता की मेहनत की धनराशि वास्तुशिल्प पर खर्च न कर जनता के हित में खर्च करने का आदेश दिया और सभी प्रकार की ललित कलाओं के निर्माण व आयोजन पर कड़ी रोक लगा दी गई। उसके काल में तीन मस्जिदों के अतिरिक्त अन्य किसी भवन का निर्माण नहीं हुआ। इन मस्जिदों में दिल्ली के किले में
संगमरमर की छोटी-सी मोती मस्जिद, लाहौर की एक मस्जिद तथा बनारस में बनवाई गई मस्जिदें प्रमुख हैं।।

20.

किन्हीं दो मुगल बादशाहों के नाम लिखिए, जिन्होंने अपनी आत्मकथा लिखी।

Answer»

अपनी आत्मकथा लिखने वाले दो मुगल बादशाह बाबर और जहाँगीर थे। बाबर ने अपनी आत्मकथा ‘तुजुके बाबरी’ तथा जहाँगीर ने अपनी आत्मकथा ‘तुजुके जहाँगीरी’ के नाम से लिखी।

21.

उद्यान निर्माण कला में मुगलों की अभिरूचि एवं उनकी देन का संक्षिप्त वर्णन कीजिए।

Answer»

बाबर को बागवानी का बहुत शौक था। उसने आगरा और लाहौर के पास कुछ बगीचे बनवाए। जहाँगीर द्वारा निर्मित उद्यान जैसे- कश्मीर का निशातबाग, लाहौर का शालीमार और पंजाब की तलहटी का पिंजौर बाग आज तक कायम हैं, जो उसकी कला-प्रेमी प्रकृति के ज्वलन्त प्रमाण हैं।

22.

‘हुमायूँ ने सम्पूर्ण जीवन लुढ़कते हुए ही व्यतीत किया व अन्त में लुढ़ककर ही उसकी जीवन लीला समाप्त हो गई। इस कथन की व्याख्या कीजिए।

Answer»

हुमायूँ का जन्म 6 मार्च, 1508 ई० को काबुल में हुआ था। उसकी माता का नाम माहम सुल्ताना बेगम और पिता का नाम बाबर था। सन् 1520 ई० में हुमायूँ को 12 वर्ष की अवस्था में बदख्शाँ का शासक बनाया गया। बदख्शाँ में हुमायूँ ने लगभग दस वर्ष तक शासन किया। हुमायू ने 18 वर्ष की अवस्था में युद्धों में भाग लेना शुरू कर दिया था। हुमायूँ जिस समय गद्दी पर बैठा उस समय वह चारों ओर से कठिनाइयों और समस्याओं से घिरा हुआ था। पानीपत और खानवाँ के युद्ध में बाबर की क्रूरता के कारण हिन्दू और मुसलमान उसके विरोधी बन गए थे।

अत: जब हुमायूं सिंहासन पर बैठा तब उसे हिन्दुओं और मुसलमानों का सहयोग न मिल सका। बाबर का अधिक समय युद्धों में व्यतीत हुआ था। इन युद्धों में उसे विशाल धनराशि प्राप्त हुई थी, किन्तु उसने यह धन राशि अपने सरदारों और सम्बन्धियों में बाँट दी थी। अत: हुमायूँ को खाली राजकोश विरासत में मिला था। सिंहासन पर बैठते ही हुमायूँ को अपने सम्बन्धियों के षड्यंत्रों तथा अफगान सरदारों के विद्रोहों का सामना करना पड़ा था। सन् 1530 ई० से 1540 ई० तक वह इन समस्याओं में उलझा रहा तथा 1540 ई० में परिस्थितिवश उसे पराजित होकर 15 वर्षों के लिए भारत छोड़कर जाना पड़ा।

हुमायूं में नेतृत्व का अभाव था। जहाँ तक सम्भव होता, वह कठिनाइयों को टालता रहता था। अपने दस वर्षों के शासनकाल उसने नेतृत्व शक्ति तथा अपने सैनिकों एवं अधिकारियों को नियन्त्रण में रखने की योग्यता का अभाव प्रदर्शित किया। उसे न तो सैन्य संगठन का ज्ञान था और न ही सैन्य संचालन का। उसे इस बात का भी ज्ञान नहीं था कि शत्रु पर कब और किस प्रकार आक्रमण करना चाहिए। शेर खाँ की बढ़ती शक्ति का ठीक अनुमान न लगा पाना और उसके विरुद्ध कुशल नेतृत्व के साथ संघर्ष न करना उसकी असफलता के कारण थे।

हुमायूँ का अर्थ होता है – भाग्यशाली, परन्तु वास्तव में हुमायूँ बहुत ही दुर्भाग्यशाली था। कदम-कदम पर उसके भाग्य ने उसे धोखा दिया। यदि भाग्य साथ देता तो उसे कभी पराजय का मुंह न देखना पड़ता। जिस समय हुमायू आगरा पहुँचा वहाँ उसे शेर खाँ के आने का समाचार मिला। कन्नौज नामक स्थान पर दोनों की सेनाओं के बीच भयंकर युद्ध हुआ। इस युद्ध में हुमायूँ ने एक हाथी पर चढ़कर अपनी जान बचाई। यह युद्ध अफगानों और मुगलों का अन्तिम युद्ध था, जिसमें हुमायूं के विकास का सितारा डूब गया। कन्नौज युद्ध में पराजय के बाद हुमायूँ ने भारत में शरण मिलने की आशा छोड़कर काबुल की ओर प्रस्थान किया; किन्तु वहाँ उसके भाई कामरान ने उसकी सहायता नहीं की। इस प्रकार हुमायूँ को विदेशों में भाग्य आजमाने के लिए भटकना पड़ा इसके बाद के 15 वर्ष हुमायूँ को एक निर्वासित और भगोड़े के रूप में दर-ब-दर की ठोकर खानी पड़ी।

हुमायँ ने फारस के शाह की सहायता से अपने खोए हुए प्रदेशों को प्राप्त करने की कोशिश की। कंधार, काबुल और बदख्शाँ पर विजय प्राप्त करता हुआ दिल्ली की ओर बढ़ा। उस समय दिल्ली पर अयोग्य शासक सिकन्दर सूर का शासन था। सर हिन्द नामक स्थान पर सिकन्दर सूर को हराकर हुमायूं को पुनः सन् 1555 ई० में दिल्ली का शासन प्राप्त हो गया। हुमायूँ अपनी इस विजय का आनन्द अधिक दिनों तक न ले सका। 24 जनवरी, 1556 ई० को अजान की आवाज सुनकर वह जल्दी से अपने पुस्तकालय के जीने की सिढ़ियों से उतरने लगा और पैर फिसल जाने से लुढ़कता हुआ नीचे गिरा, जिससे उसकी खोपड़ी की हड्डी टूट गई। तीन दिन बाद 27 जनवरी, 1556 को उसकी मृत्यु हो गई। इस प्रकार हुमायूँ ने सम्पूर्ण जीवन लुढ़कते हुए ही व्यतीत किया और अन्त में लुढ़ककर ही उसकी जीवन लीला समाप्त हो गई।

23.

बाबर के आक्रमण के समय भारत की राजनीतिक दशा का वर्णन कीजिए।

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बाबर के आक्रमण के समय भारत की राजनीतिक दशा- बाबर ने अपनी आत्मकथा ‘तुजुक-ए-बाबरी’ अथवा ‘बाबरनामा’ में लिखा है कि उसके आक्रमण के समय भारत में पाँच मुस्लिम राज्य और दो काफिर (हिन्दू) राज्य थे। देहली, मालवा, बंगाल, गुजरात व बहमनी राज्य मुस्लिम शासकों के अधीन थे तथा मेवाड़ व विजयनगर हिन्दू शासकों के अधीन थे। बाबर का यह कथन सही है कि “सोलहवीं शताब्दी के आरम्भ में भारत केवल ऐसे राज्यों का समूह था, जो किसी भी आक्रमणकारी का, जो उसे विजित करने की शक्ति और इच्छा रखता हो, सरलता से शिकार हो सकता था।”

(i) पंजाब – बाबर के आक्रमण के समय पंजाब का सूबेदार दौलत खाँ लोदी था। यद्यपि वह दिल्ली साम्राज्य के अधीन था, लेकिन अपने आपको स्वतन्त्र शासक के रूप में देखना चाहता था। इतिहासकारों के अनुसार उसने अपनी स्वतन्त्रता की घोषणा कर दी थी और इब्राहीम लोदी को समाप्त करने के लिए काबुल के शासक बाबर से पत्र-व्यवहार कर रहा था। उसने बाबर को भारत पर आक्रमण करने के लिए आमन्त्रित किया था।

(ii) गुजरात – सुदूर पश्चिम में स्थित गुजरात का शासक मुजफ्फरशाह था। उसने गुजरात पर 1511 ई० से लेकर 1526 ई० तक राज्य किया। अपने शासनकाल में वह मालवा और मेवाड़ के पड़ोसी राज्यों के साथ युद्धों में व्यस्त रहा। पानीपत के युद्ध के कुछ ही दिन पूर्व उसका देहान्त हो गया और तब उसका पुत्र बहादुरशाह गुजरात का शासक बना। वह बड़ा योग्य और सफल शासक सिद्ध हुआ। आगे चलकर उसका मुगल सम्राट हुमायूं से काफी संघर्ष हुआ।

(iii) दिल्ली – बाबर के आक्रमण के समय उत्तरी भारत का सबसे प्रसिद्ध राज्य दिल्ली था। इसका सम्पूर्ण वैभव समाप्त हो चुका था। कहने को तो दिल्ली का सुल्तान विशाल साम्राज्य का स्वामी था, किन्तु व्यवहारिक दृष्टि से उसका प्रभाव केवल दिल्ली और उसके आसपास के कुछ प्रदेशों तक ही सीमित रह गया था। बाबर के आक्रमण के समय दिल्ली का सुल्तान इब्राहीम लोदी था। उसके कठोर और मनमाने व्यवहार से उसके सूबेदार, सैनिक, अधिकारी और राज दरबारी तंग आ चुके थे। वे सब उसके पतन के आकाँक्षी थे।
फलस्वरूप दिल्ली राज्य के विभिन्न भागों में विद्रोह हो रहे थे। लाहौर के सूबेदार दौलत खाँ लोदी ने अपने आपको स्वतन्त्र शासक घोषित कर दिया था। वह काबुल के शासक बाबर से भी गठजोड़ कर रहा था और उसे दिल्ली पर आक्रमण के लिए उकसा रहा था। दरिया खाँ लोदी बिहार में स्वतन्त्र शासक बन बैठा था। सारांशतः बाबर के आक्रमण के समय दिल्ली राज्य पूर्णतया अव्यवस्थित था और निरन्तर दुर्बल होता जा रहा था।

(iv) बिहार – फिरोज तुगलक के शासनकाल में बिहार स्वतन्त्र हो गया था। बाबर के आक्रमण के समय बिहार शक्तिशाली मुस्लिम राज्य था।

(v) मालवा – तैमूर के आक्रमण के तुरन्त बाद मालवा के सूबेदार दिलावर खाँ ने स्वयं को स्वतन्त्र घोषित कर दिया था। | मालवा के शासक महमूद खिलजी द्वितीय के शासनकाल में मेदिनीराय नामक एक राजपूत सरदार का दबदबा बढ़ गया था। उससे अप्रसन्न होकर मुस्लिम सरदारों ने उसका विरोध किया। मेदिनीराय ने महाराणा सांगा की सहायता से उन्हें परास्त | कर दिया। इस प्रकार मालवा के सरदारों में आपसी फूट बढ़ गई।

(vi) उड़ीसा (ओडिशा) – यह राज्य काफी समय से हिन्दू राजाओं के अधीन था। यह समृद्ध एवं शक्तिशाली राज्य था, किन्तु दिल्ली से अत्यधिक दूर स्थित होने के कारण उत्तर भारत की राजनीति में उसकी विशेष भूमिका न थी।

(vii) सिन्ध- महमूद तुगलक की मृत्यु होते ही सिन्ध राज्य स्वतन्त्र हो गया था। बाबर के भारत पर आक्रमण के समय यहाँ अरबों का अधिकार स्थापित हो गया था। सिन्ध पर अरब वालों का प्रभाव था। यहाँ की राजनैतिक व्यवस्था अत्यन्त ही असन्तोषजनक थी।

(viii) बंगाल – बाबर के आक्रमण के समय बंगाल एक स्वतन्त्र राज्य के रूप में स्थापित था, जहाँ का प्रशासक नुसरतशाह था। वह बड़ा योग्य और गुणवान व्यक्ति था। लोग उसके शासनकाल में आर्थिक दृष्टि से समृद्ध और सन्तुष्ट थे।

(ix) कश्मीर – कश्मीर भी एक महत्वपूर्ण राज्य था। यहाँ सत्ता के लिए आन्तरिक संघर्ष चल रहा था। यहाँ के प्रधान वजीर ने अपने स्वामी सुल्तान मुहम्मदशाह को बाबर की सहायता से अपदस्थ कर स्वयं सत्ता हथिया ली।

(x) मेवाड़ – मेवाड़ उत्तरी भारत का सबसे प्रसिद्ध हिन्दू राज्य था, जिस पर राणा साँगा अथवा राणा संग्रामसिंह का शासन था। कर्नल टॉड के अनुसार राणा साँगा का प्रभाव लगभग सम्पूर्ण राजपूताने पर था। राणा साँगा ने मालवा के अनेक भागों पर अधिकार कर लिया था। उसने गुजरात के शासक को भी हराया था। राणा साँगा का उद्देश्य भारत में फिर से हिन्दू राज्य स्थापित करना था। राणा साँगा निःसन्देह उत्तरी भारत का ही नहीं सम्पूर्ण भारत के शक्तिशाली शासकों में से था, जिससे बाबर को टक्कर लेनी थी।

(xi) पुर्तगाल शक्ति – यद्यपि बाबर के आक्रमण के समय पुर्तगालियों की शक्ति अधिक नहीं थी फिर भी उन्होंने गोआ पर अधिकार जमा लिया था। अपनी गतिविधियों के कारण उन्होंने भारत के पश्चिमी समुद्र तट के राजनीतिक एवं व्यापारिक जीवन में अस्थिरता ला दी थी।

(xii) खानदेश – ताप्ती नदी की घाटी में बसा हुआ खानदेश छोटा-सा किन्तु एक समृद्धशाली राज्य था। मलिक राजा फारुकी, मलिक नसीर खाँ तथा आदिल खाँ फारुकी खानदेश के प्रसिद्ध शासक थे। आदिल खाँ फारुकी की मृत्यु के पश्चात् महमूद प्रथम यहाँ का शासक बना। यह बाबर का समकालीन था।

(xiii) बहमनी राज्य – बहमनी राज्य अपने वैभव को खोकर जीर्ण-शीर्ण हो चुका था। उसके स्थान पर अब बीजापुर, बरार, बीदर, अहमदनगर और गोलकुण्डा के पाँच स्वतन्त्र राज्य स्थापित हो चुके थे। इन राज्यों के शासकों में भी परस्पर संघर्ष होता रहता था। इनकी आपसी फूट से उत्साहित होकर विजयनगर का शक्तिशाली हिन्दू राजा कृष्णदेवराय उन्हें अपने आक्रमण का शिकार बनाता रहता था। इस प्रकार बाबर के आक्रमण के समय दक्षिण में मुस्लिम शक्ति अपने अन्तिम दिन गिन रही थी।

(xiv) विजयनगर – यह हिन्दू राज्य सुदूर दक्षिण में स्थित था। बाबर के आक्रमण के समय यहाँ का राजा कृष्णदेवराय था। के०एम० पणिक्कर के शब्दों में वह अशोक, चन्द्रगुप्त विक्रमादित्य, हर्ष और भोज की परम्परा में एक महान् सम्राट था, जिसका राज्य अपने वैभव के शिखर पर था।” बाबर ने भी विजयनगर के बारे में लिखा है कि राज्य एवं सैनिक दृष्टि से काफिर राजकुमारों में विजयनगर का राजा सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण है।”

उपर्युक्त विवेचन से स्पष्ट है कि बाबर के आक्रमण के समय केन्द्रीय शक्ति का पतन हो चुका था तथा समस्त देश में स्वतन्त्र शासक अपनी सत्ता बढ़ाने के लिए पारस्परिक प्रतिद्वन्द्विता में लीन थे। उनमें एकता का अभाव था। लेनपूल ने उस समय की दशा का वर्णन करते हुए लिखा है कि विजेता जाति (मुसलमान) अशांतकारियों की एक भीड़ में बदल गई थी। दिल्ली सल्तनत के बड़े-बड़े प्रान्तों के अपने शासक थे। छोटे-छोटे नगरों, जिलों, यहाँ तक कि दुर्गों आदि पर वहाँ के सरदारों ने अधिकार कर लिया था। इस प्रकार बाबर के लिए भारत पर आक्रमण हेतु उपयुक्त परिस्थितियाँ थीं।

24.

विभिन्न समूह ‘अल्पसंख्यक’ शब्द को किस तरह परिभाषित कर रहे थे? ।

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विभिन्न समूह ‘अल्पसख्यक’ शब्द को निम्नलिखित तरह से परिभाषित कर रहे थे

⦁    कुछ लोग मुसलमानों को ही अल्पसंख्यक कह रहे थे। उनका तर्क था कि मुसलमानों के धर्म, रीति-रिवाज़ आदि हिंदुओं से बिलकुल अलग हैं और वे संख्या में हिंदुओं से कम हैं।

⦁    कुछ लोग दलित वर्ग के लोगों को हिंदुओं से अलग करके देख रहे थे और वह उनके लिए अधिक स्थानों का | आरक्षण चाहते थे।

⦁    कुछ लोग आदिवासियों को मैदानी लोगों से अलग देखकर आदिवासियों को अलग आरक्षण देना चाहते थे।

⦁    लीग के कुछ सदस्य सिख धर्म के अनुयायियों को अल्पसंख्यक का दर्जा देने और अल्पसंख्यक की सुविधाएँ देने की | माँग कर रहे थे।

⦁    मद्रास के बी. पोकर बहादुर ने अगस्त, 1947 में संविधान सभा में अल्पसंख्यकों को पृथक् निर्वाचिका देने की बजाय संयुक्त निर्वाचिका की वकालत की और कहा-“उसी के भीतर एक ऐसा राजनीतिक ढाँचा बनाया जाए जिसके अंतर्गत अल्पसंख्यक भी जी सकें और अल्पसंख्यक और बहुसंख्यक समुदायों के बीच मतभेद कम हो।”

⦁    मुसलमान बुद्धिजीवी भी जब पृथक् निर्वाचक की हिमायत करने लगे तो आर० वी० धुलेकर और सरदार वल्लभभाई पटेल जैसे लोगों ने पृथक् निर्वाचिका का विरोध करते हुए जो शब्द कहे, उनका भावार्थ था-अंग्रेज़ तो चले गए, मगर जाते-जाते हिंदू-मुसलमानों में फूट डालकर शरारत का बीज बो गए।

⦁    गोविंद वल्लभ पंत ने संविधान में अल्पसंख्यकों के लिए अलग निर्वाचिका का विरोध करते हुए कहा कि-“मेरा मानना है कि पृथक् निर्वाचिका अल्पसंख्यकों के लिए आत्मघातक साबित होगी।” उन्होंने आगे  कहा-“निष्ठावान नागरिक बनने के लिए सभी लोगों को समुदाय और खुद को बीच में रखकर सोचने की आदत छोड़नी होगी।”

⦁    एन० जी० रंगा ने जवाहर लाल नेहरू द्वारा पेश किए गए उद्देश्य प्रस्ताव का स्वागत करते हुए कहा कि अल्पसंख्यकों के बारे में बहुत बातें हो रही हैं। अल्पसंख्यक कौन हैं? तथाकथित पाकिस्तानी प्रांतों में रहने वाले हिंदू, सिख और यहाँ तक मुसलमान भी अल्पसंख्यक नहीं हैं। जी नहीं, असली अल्पसंख्यक तो इस देश की जनता है। यह जनता इतनी दबी-कुचली और इतनी उत्पीड़ित है कि अभी तक साधारण नागरिक के अधिकारों का लाभ भी नहीं उठा पा रही है।

25.

प्रांतों के लिए ज्यादा शक्तियों के पक्ष में क्या तर्क दिए गए?

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केंद्र सरकार एवं राज्य सरकारों अर्थात् प्रांतों के अधिकारों के प्रश्न पर भी संविधान सभा में पर्याप्त बहस हुई। संविधान सभा के कुछ सदस्य शक्तिशाली केन्द्र के समर्थक थे, जबकि कुछ अन्य सदस्य प्रांतों के लिए अधिक शक्तियों के पक्ष में थे। ऐसे सदस्यों द्वारा प्रांतों को अधिक शक्तियाँ दिए जाने के पक्ष में अनेक महत्त्वपूर्ण तर्क दिए गए। संविधान के मसविदे में तीन सूचियों-केंद्रीय सूची, राज्य सूची और समवर्ती सूची–को बनाया गया था। केन्द्रीय सूची के विषय केवल केंद्र सरकार और राज्य सूची के विषय केवल राज्य सरकारों के अधीन होने थे। समवर्ती सूची के विषय केंद्र और राज्य दोनों की संयुक्त जिम्मेदारी थे। उल्लेखनीय है कि केन्द्रीय सूची में बहुत अधिक विषयों को रखा गया था। इसी प्रकार प्रांतों की इच्छाओं की कोई परवाह न करते हुए समवर्ती सूची में भी बहुत अधिक विषयों को रख दिया गया था।

मद्रास के सदस्य के० सन्थनम ने राज्य के अधिकारों की पुरजोर वकालत की। उन्होंने न केवल प्रांतों अपितु केन्द्र को भी शक्तिशाली बनाने के लिए शक्तियों के पुनर्वितरण की आवश्यकता पर बल दिया। उनका तर्क था कि आवश्यकता से अधिक जिम्मेदारियाँ होने पर केन्द्र प्रभावशाली रूप से कार्य करने में समर्थ नहीं हो पाएगा। केंद्र के कुछ दायित्वों में कमी करके उन्हें राज्य सरकारों को सौंप देने से अधिक शक्तिशाली केंद्र का निर्माण किया जा सकता था। सन्थनम ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि यह दलील देना कि “संपूर्ण शक्तियाँ केंद्र को सौंप देने से वह शक्तिशाली हो जाएगा” केवल एक गलतफहमी है। सन्थनम का तर्क था कि शक्तियों का विद्यमान वितरण विशेष रूप से राजकोषीय प्रावधान, प्रांतों को पंगु बनाने वाला था। इसके अनुसार भू-राजस्व के अतिरिक्त अधिकांश कर केंद्र सरकार के अधिकार में थे। इस प्रकार, धन के अभाव में राज्यों में विकास परियोजनाओं को कार्यान्वित करना संभव नहीं था। शक्तियों के प्रस्तावित वितरण के विषय में सन्थनम ने स्पष्ट शब्दों में कहा, “मैं ऐसा संविधान नहीं चाहता जिसमें इकाई को आकर केंद्र से यह कहना पड़े कि ‘मैं अपने लोगों की शिक्षा की व्यवस्था नहीं कर सकता।

मैं उन्हें साफ-सफाई नहीं दे सकता, मुझे सड़कों में सुधार और उद्योगों की स्थापना के लिए खैरात दे दीजिए।’॥ प्रांतों को अधिक शक्तियाँ दिए जाने के पक्ष में के० सन्थनम का तर्क था कि केन्द्रीय नियंत्रण में बहुत अधिक विषयों को रखे जाने तथा बिना सोचे-समझे शक्तियों के प्रस्तावित वितरण को लागू किए जाने के परिणाम अत्यधिक हानिकारक होंगे, इसके परिणामस्वरूप कुछ ही वर्षों में सारे प्रांत केन्द्र के विरुद्ध विद्रोह’ पर उतारू हो जाएँगे। प्रांतों के अनेक अन्य सदस्य भी चाहते थे कि प्रांतों को अधिक शक्तियाँ प्रदान की जाएँ। मैसूर के सर ए० रामास्वामी मुदालियार भी प्रांतों को अधिक शक्तियाँ दिए जाने के पक्ष में थे। उनका विचार था कि संविधान में शक्तियों के अत्यधिक केंद्रीयकरण के परिणामस्वरूप ‘केंद्र बिखर जाएगा। ऐसे सदस्यों ने समवर्ती सूची एवं केंद्रीय सूची में कम-से-कम विषयों को रखे जाने पर बल दिया। | इस प्रकार प्रांतों को अधिक शक्तियाँ दिए जाने के पक्ष में अनेक तर्क प्रस्तुत किए गए।

26.

When Constituent Assembly was constituted and how many members it has?

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The Constituent Assembly was constituted in 1946 A.D. It has 389 members.

27.

बँटवारे के सवाल पर कांग्रेस की सोच कैसे बदली?

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भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस प्रारंभ से ही विभाजन का विरोध करती रही थी। किन्तु अंत में परिस्थितियों से विवश होकर उसे अपनी सोच बदलनी पड़ी और विभाजन के लिए तैयार होना पड़ा। अंग्रेजों के प्रयासों के परिणामस्वरूप मुस्लिम लीग अपने जन्म के प्रारंभ से ही सांप्रदायिक नीतियों का अनुसरण करने लगी थी। लीग ने बंगाल विभाजन का समर्थन किया था और स्वदेशी एवं बहिष्कार आंदोलन में कोई भाग नहीं लिया था। यद्यपि 1916 ई० में कांग्रेस और लीग में समझौता हो गया था, किन्तु 1920 और 1937 ई० में कांग्रेस द्वारा संयुक्त प्रांत में मुस्लिम लीग के साथ मिलकर मंत्रिमंडल बनाने से इनकार कर दिए जाने पर कांग्रेस और लीग के संबंध और अधिक बिगड़ गए थे। कांग्रेस ने बार-बार लीग को संतुष्ट करने का प्रयत्न किया, जिसके परिणामस्वरूप लीग की अनुचित माँगें तीव्र गति से बढ़ने लगीं। लीग ने कांग्रेसी मंत्रिमंडलों पर जनमत की अवहेलना करने, मुस्लिम संस्कृति को नष्ट करने और मुसलमानों के धार्मिक, सामाजिक तथा राजनैतिक अधिकारों में हस्तक्षेप करने का आरोप लगाया।

जिन्नाह ने 1937 ई० में लीग के लखनऊ अधिवेशन में स्पष्ट शब्दों में घोषणा की “अब हिन्दी भारत की राष्ट्रभाषा होगी और वन्दे मातरम् राष्ट्रगीत होगा। कांग्रेस के झंडे को प्रत्येक व्यक्ति को स्वीकार करना पड़ेगा और उसका आदर करना पड़ेगा।” राष्ट्रवादी नेताओं ने लीग के नेताओं को समझाने का बार-बार प्रयास किया, किन्तु संप्रदायवाद से समझौता कर सकना या उसे संतुष्ट कर सकना संभव नहीं था। 1937 से 39 की अवधि में कांग्रेस के नेताओं ने बार-बार जिन्नाह से मुलाकात करके उसे मनाने का प्रयास किया, किन्तु जिन्नाह ने कभी कोई ठोस माँग सामने नहीं रखी। इसके विपरीत वह इस बात पर अड़े रहे कि वह कांग्रेस से तभी बात करेंगे जब कांग्रेस यह मान लेगी कि वह केवल हिन्दुओं का प्रतिनिधित्व करती है। इस प्रकार सम्प्रदायवाद को जितना संतुष्ट करने का प्रयास किया गया उतना ही वह और उग्र होता गया। दूसरे विश्व युद्ध के दौरान सभी कांग्रेसी मंत्रिमंडलों द्वारा नवम्बर 1939 ई० में त्यागपत्र दे दिए जाने पर मुस्लिम लीग अत्यधिक प्रसन्न हुई।

22 दिसम्बर, 1939 ई० को लीग ने संपूर्ण भारत में ‘मुक्ति दिवस’ मनाया। मार्च 1940 ई० में लाहौर अधिवेशन में लीग ने एक प्रस्ताव प्रस्तुत करके माँग की कि हिन्दुस्तान के उत्तर-पश्चिम और पूर्वी क्षेत्रों जैसे जिन भागों में मुसलमानों की संख्या अधिक है, उन्हें इकट्ठा करके स्वतंत्र राज्य बना दिया जाए। लीग ने भारत छोड़ो आंदोलन का विरोध किया और अंतरिम सरकार में कांग्रेस द्वारा मुसलमानों को नामजद करने के अधिकार को स्वीकार नहीं किया। लीग ने कैबिनेट मिशन योजना को अस्वीकार कर दिया और पाकिस्तान की प्राप्ति के लिए प्रत्यक्ष संघर्ष का रास्ता अपनाने का निश्चय कर लिया। 16 अगस्त, 1946 ई० को लीग ने ‘प्रत्यक्ष कार्यवाही दिवस’ मनाया जिसके परिणामस्वरूप बंगाल, बिहार, पंजाब, उत्तर प्रदेश, सिंध व उत्तर-पश्चिम सीमा प्रांत में भयंकर हिन्दू-मुस्लिम दंगे हो गए। सारे देश का वातावरण दूषित हो गया और मुस्लिम सांप्रदायिकता अपने चरम उत्कर्ष पर पहुँच गई।

लीग का नारा था, ‘लड़कर लेंगे पाकिस्तान!’ किन्तु इस नारे ने ब्रिटिश साम्राजियों के विरुद्ध संघर्ष का रूप धारण न करके सांप्रदायिक दंगे का रूप धारण कर लिया। कुछ प्रारंभिक विरोध के बाद वायसराय लार्ड वेवल के प्रयत्नों से मुस्लिम लीग अंतरिम सरकार में, सम्मिलित हो तो गई किन्तु उसने कांग्रेस के प्रति असहयोग का दृष्टिकोण अपनाया। लीग ने नेहरू के नेतृत्व को स्वीकार नहीं किया और प्रायः मंत्रीमंडल की नीतियों का विरोध करती रही। इस समय तक भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस भी यह भली-भाँति समझ चुकी थी की लीग के कट्टर सांप्रदायिक दृष्टिकोण को बदलना संभव नहीं है। लीग के कार्यकलापों से सांप्रदायिक दंगे फैलने लगे थे जिनसे पूरे देश में गृहयुद्ध का वातावरण बन गया था। ब्रिटिश सरकार जून, 1948 ई० तक सत्ता भारतीयों को सौंप देने की घोषणा कर चुकी थी। वायसराय लार्ड माउंटबेटन का विचार था कि लीग तथा कांग्रेस के मध्य समझौता असंभव था और देश का विभाजन ही समस्या का एकमात्र हल था।

अतः उसने महात्मा गाँधी, सरदार पटेल और जवाहरलाल नेहरू जैसे महत्त्वपूर्ण कांग्रेसी नेताओं को भारत विभाजन के लिए मनाने के प्रयत्न प्रारंभ कर दिए। यद्यपि कांग्रेस ने विभाजन का सदैव विरोध किया था और गाँधी जी स्पष्ट शब्दों में यह घोषणा कर चुके थे कि देश का विभाजन उनके मृत शरीर पर होगा, किन्तु अब ऐसा आभास होने लगा कि देश को भयंकर विनाश और रक्तपात से बचाने के लिए विभाजन को स्वीकार करने के अतिरिक्त और कोई चारा नहीं था। अंग्रेजों ने भारत छोड़ने की तिथि जून, 1948 ई० के स्थान पर 15 अगस्त, 1947 ई० निश्चित कर दी थी। अतः अब कांग्रेस को अनिवार्य रूप से ‘गृहयुद्ध या पाकिस्तान’ इन दोनों में से एक का चुनाव करना था।

अन्ततः भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस को अपनी सोच बदलनी पड़ी और प्रमुख राष्ट्रवादी नेता इस निष्कर्ष पर पहुँचे कि भारत विभाजन को स्वीकार करना और लीग के बिना शेष भारत को अधिक शक्तिशाली एवं संगठित बनाना ही भारत की रक्षा का श्रेयस्कर उपाय था। 3 जून, 1947 ई० को वायसराय ने भारत विभाजन की योजना की घोषणा कर दी, जिसे भारत के सभी राजनैतिक दलों ने स्वीकार कर लिया। स्थिति की विवेचना करते हुए जवाहरलाल नेहरू ने कहा था कि, “हालात की मजबूरी थी। और यह महसूस किया गया कि जिस मार्ग का हम अनुसरण कर रहे थे उससे गतिरोध को हल नहीं किया जा सकता था। जब दूसरे हमारे साथ रहना ही नहीं चाहते थे, तो हम उन्हें क्यों और कैसे मजबूर कर सकते थे। इसलिए हमने देश का बँटवारा स्वीकार कर लिया ताकि हम भारत को शक्तिशाली बना सकें।”

28.

विभाजन को दक्षिणी एशिया के इतिहास में एक ऐतिहासिक मोड़ क्यों माना जाता है?

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भारत के विभाजन को दक्षिणी एशिया के इतिहास में एक ऐतिहासिक मोड़ माना जाता है। नि:संदेह, यह विभाजन स्वयं में अतुलनीय था, क्योंकि इससे पूर्व किसी अन्य विभाजन में न तो सांप्रदायिक हिंसा का इतना तांडव नृत्य हुआ और न ही इतनी विशाल संख्या में निर्दोष लोगों को अपने घरों से बेघर होना पड़ा। विद्वानों के अनुसार विभाजन के परिणामस्वरूप एक करोड़ से भी अधिक लोग अपने-अपने वतन से उजड़कर अन्य स्थानों पर जाने के लिए विवश हो गए। वे भारत और पाकिस्तान के बीच रातों-रात खड़ी कर दी गई सीमा के इस पार या उस पार जाने को विवश हो गए और जैसे ही उन्होंने इस ‘छाया सीमा’ के उस ओर पैर रखा, वे घर से बेघर हो गए। पलक झपकते ही उनकी सम्पत्ति, घर, दुकानें, जमीनें, रोजी-रोटी के साधन सब उनके हाथों से निकल गए। जिस जमीन में उनकी जड़े थीं, वही उनके लिए पराई हो गई।

लाखों अपने प्रियजनों से बिछड़ गए। किसी ने अपने पिता को खोया, किसी ने भाई को, तो किसी का सुहाग उसकी आँखों के सामने ही उजाड़ दिया गया। उनके दोस्त, उनकी बचपन की यादें उनसे छीन लिए गए। अपनी स्थानीय एवं क्षेत्रीय संस्कृतियों से वंचित होकर वे तिनका-तिनका जोड़कर अपने नए घोंसलों को बनाने में जुट गए। विद्वानों के अनुसार विभाजन के परिणामस्वरूप होने वाली हिंसा इतनी भीषण थी कि इसके लिए विभाजन’, ‘बँटवारे’ अथवा ‘तक़सीम’ जैसे शब्दों का प्रयोग करना सार्थक प्रतीत नहीं होता। इसमें कोई संदेह नहीं कि विभाजन के परिणामस्वरूप जो स्मृतियाँ, घृणाएँ, छवियाँ और पहचानें अस्तित्व में आईं उनका आज भी सीमा के इस ओर तथा उस ओर के इतिहास का निर्धारण करने में महत्त्वपूर्ण योगदान है।

29.

मौखिक इतिहास के फ़ायदे/नुकसानों की पड़ताल कीजिए। मौखिक इतिहास की पद्धतियों से विभाजन के बारे में। हमारी समझ को किस तरह विस्तार मिलता है?अथवामौखिक इतिहास के लाभों और हानियों का वर्णन कीजिए। ऐसे किन्हीं चार स्रोतों का उल्लेख कीजिए जिनसे विभाजन का इतिहास स्रोतों में पिरोया गया है। 

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इतिहास के पुनर्निर्माण में हमें अनेक स्रोतों से सहायता मिलती है, जिनमें मौखिक स्रोतों का भी महत्त्वपूर्ण स्थान है। यद्यपि मौखिक इतिहास के अपने लाभ और हानियाँ हैं तथापि यह सत्य है कि मौखिक इतिहास की पद्धतियाँ विभाजन के विषय में हमारी समझ को विस्तार प्रदान करती हैं।

मौखिक इतिहास के लाभ

1. मौखिक इतिहास हमें विभाजन से संबंधित अनुभवों एवं स्मृतियों को और अधिक सूक्ष्मता से समझने का अवसर प्रदान करता है।

2. मौखिक इतिहास के आधार पर इतिहासकार उन भावनात्मक समस्याओं एवं कष्टों का, जिनसे जनसामान्य को विभाजन के दौर में गुजरना पड़ा, का सजीव वर्णन करने में समर्थ हुए हैं। हमें याद रखना चाहिए कि सरकारी दस्तावेजों का संबंध नीतिगत एवं दलगत विषयों तथा विभिन्न सरकारी योजनाओं से होता है। अतः उनसे इस प्रकार की जानकारियों को प्राप्त करना संभव नहीं हो पाता।

3. विभाजन के परिणामस्वरूप सामान्य लोगों को किन हालातों से गुजरना पड़ा अथवा विभाजन को लेकर जनसामान्य के क्या अनुभव रहे, इसका पता हमें मौखिक इतिहास से ही लगता है। सरकारी रिपोर्टों एवं फाइलें तथा महत्त्वपूर्ण सरकारी अधिकारियों के व्यक्तिगत लेख इस पर पर्याप्त प्रकाश नहीं डालते।

4. सामान्यतः हम जिस इतिहास का अध्ययन करते हैं, वह सामान्य लोगों से संबंधित विषयों पर कोई महत्त्वपूर्ण प्रकाश नहीं डालता, क्योंकि उनके जीवन एवं कार्यों को प्रायः पहुँच के बाहर अथवा महत्त्वहीन मानकर नज़रअंदाज कर दिया जाता है। किन्तु मौखिक इतिहास इन विषयों पर महत्त्वपूर्ण प्रकाश डालता है। उदाहरण के लिए, मौखिक स्रोतों से हमें पता लगता है कि विभाजन के परिणामस्वरूप सम्पन्न लोगों को विपन्नता के दौर से गुजरना पड़ा। घर की। चारदीवारी में सुख का जीवन जीने वाली महिलाओं को पेट भरने के लिए मज़दूरों के रूप में काम करना पड़ा। बड़े-बड़े व्यापारियों को अपना और परिवार का पेट भरने के लिए छोटी-मोटी नौकरियाँ करनी पड़ीं और शरणार्थियों का जीवन जीने के लिए विवश होना पड़ा।

5. मौखिक इतिहास विभाजन के दौरान जनसामान्य और विशेष रूप से महिलाओं द्वारा झेली जाने वाली पीड़ा को | समझने में हमें महत्त्वपूर्ण सहायता प्रदान करता है।
मौखिक इतिहास की हानियाँ

⦁    अनेक इतिहासकारों के विचारानुसार मौखिक जानकारियाँ सटीक नहीं होतीं। अतः उनसे घटनाओं के जिस क्रम का निर्माण किया जाता है, उसकी यथार्थता संदिग्ध होती है।
⦁    इतिहासकारों के मतानुसार मौखिक विवरणों का संबंध केवल सतही विषयों से होता है। यादों में संचित किए जाने वाले छोटे-छोटे अनुभवों से इतिहास की विशाल प्रक्रियाओं के कारणों का पता लगाने में कोई महत्त्वपूर्ण सहायता | नहीं मिलती।
⦁    व्यक्तिगत अनुभवों के आधार पर किसी सामान्य निष्कर्ष पर पहुँचना सरल नहीं होता।
⦁    मौखिक इतिहास में वास्तविक अनुभवों के साथ निर्मित स्मृतियाँ भी जुड़ जाती हैं। प्रायः कुछ दशक बाद लोग किसी घटना के विषय में काफी कुछ भूल जाते हैं।
⦁    सामान्यतः विभाजन के दौरान कड़वे अनुभवों से गुज़रने वाले लोग आपबीती के विषय में बात करने को तैयार नहीं होते। उदाहरण के लिए, बलात्कार की पीड़ा को झेलने वाली एक महिला को किसी अज़नबी के सामने अपने उन दर्दनाक अनुभवों को व्यक्त करने के लिए तैयार करना कोई सरल कार्य नहीं है।
⦁    मौखिक जनकारियों से घटनाओं का तिथिबद्ध विवरण प्राप्त करना कठिन है।
विभाजन विषयक समझ को विस्तार प्रदान करना

उल्लेखनीय है कि मौखिक इतिहास की पद्धतियाँ विभाजन के विषय में हमारी समझ को विस्तार प्रदान करती हैं। हमें यह याद रखना चाहिए कि विभाजन के मौखिक इतिहास को संबंध केवल सतही विषयों से नहीं है। विभाजन से। संबंधित मौखिक बयानों को न तो अविश्सनीय कहा जा सकता है और न ही महत्त्वहीन। मौखिक विवरणों अथवा बयानों से निकलेवाले निष्कर्षों की तुलना अन्य साक्ष्यों से निकलनेवाले निष्कर्षों से करके एक सामान्य एवं विश्वसनीय निष्कर्ष पर सरलतापूर्वक पहुँचा जा सकता है। हमें यह भी याद रखना चाहिए कि विभाजन के दौरान जनसामान्य को और विशेष रूप से महिलाओं को जिस पीड़ा से गुजरना पड़ा उसे समझने के लिए हमें अनेक रूपों में मौखिक स्रोतों पर निर्भर रहना पड़ता है। उदाहरण के लिए, सरकारी रिपोर्टों से यह तो सरलतापूर्वक पता लगाया जा सकता है कि भारतीय और दला-बदली की गई।

किन्तु सरकारी रिपोर्टों से यह पता नहीं लगता कि ‘बरामद की जाने वाली महिलाओं को किन-किन मानसिक व्यथाओं से गुजरना पड़ा अथवा किन-किन पीड़ाओं को झेलना पड़ा। उन मानसिक व्यथाओं और पीड़ाओं का पता तो उन महिलाओं की जुबानी’ ही लग सकता है, जिन्होंने उन्हें झेला। इस प्रकार मौखिक इतिहास की पद्धतियाँ विभाजन के विषय में हमारी समझ को विस्तृत बनाती हैं। मौखिक इतिहास की पद्धतियों से इतिहासकारों को विभाजन जैसी घटनाओं के दौरान जनसामान्य को किन-किन मानसिक एवं शारीरिक पीड़ाओं को झेलना पड़ा, का बहुरंगी एवं सजीव वृत्तांत लिखने में महत्त्वपूर्ण सहायता मिलती है। मौखिक विवरणों अथवा बयानों से निकलनेवाले निष्कर्षों की तुलना अन्य साक्ष्यों से निकलनेवाले निष्कर्षों से करके एक सामान्य एवं विश्वसनीय निष्कर्ष पर सरलतापूर्वक पहुँचा जा सकता है। यदि साक्षात्कार लेने वाला किसी की व्यक्तिगत पीड़ा और सदमें को आंकने का प्रयास न करके सूझ-बूझ से लोगों के दर्द के अहसास को समझने का प्रयास करे तो मौखिक इतिहास उसकी विभाजन विषयक समझ को विस्तार प्रदान करने में महत्त्वपूर्ण सहायता प्रदान कर सकता है।

30.

आम लोग विभाजन को किस तरह देखते थे?

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सामान्य लोग प्रारंभ में देश के विभाजन को केवल थोड़े समय के एक जुनून के रूप में देखते थे। उनका विचार था कि विभाजन स्थायी नहीं होगा। कुछ समय बाद जैसे ही शान्ति और कानून व्यवस्था स्थापित हो जाएगी, वे अपने घरों को वापस लौट जाएँगे। उन्हें विश्वास था कि शताब्दियों से एक समाज में एक-दूसरे के सुख-दुख के साथी बनकर रहने वाले लोग एक-दूसरे का खून बहाने पर उतारू नहीं होंगे। देश का विभाजन उनके दिलों के विभाजन का कारण नहीं बनेगा। स्थिति सामान्य होते ही वे फिर मिल-जुलकर एक ही समाज में रहेंगे। वास्तव में सामान्य लोग चाहे वे हिन्दू थे अथवा मुसमलान धर्म के नाम पर एक-दूसरे का सिर काटने को इच्छुक नहीं थे। अनेक नेता और स्वयं गाँधी जी भी अंत तक विभाजन की सोच का विरोध करते रहे। थे।

7 सितम्बर, 1946 ई० को प्रार्थना सभा में अपने भाषण में गाँधी जी ने कहा था, “मैं फिर वह दिन देखना चाहता हूँ जब हिन्दू और मुसलमान आपसी सलाह के बिना कोई काम नहीं करेंगे। मैं दिन-रात इसी आग में जल जा रहा हूँ कि उस दिन को जल्दी-से-जल्दी साकार करने के लिए क्या करूं। लीग से मेरी गुजारिश है कि वे किसी भी भारतीय को अपना शत्रु न मानें…।” इसी प्रकार 26 सितम्बर, 1946 ई० को महात्मा गांधी ने ‘हरिजन’ में लिखा था, “जो तत्त्व भारत को एक-दूसरे के खून के प्यासे टुकड़ों में बाँट देना चाहते हैं, वे भारत और इस्लाम दोनों के शत्रु हैं। भले ही वे मेरी देह के टुकड़े-टुकड़े कर दें, किन्तु मुझसे ऐसी बात नहीं मनवा सकते, जिसे मैं गलत मानता हूँ।” जनसामान्य का गाँधी जी में अटूट विश्वास था। उन्हें लगता था कि गांधी जी किसी भी कीमत पर देश का विभाजन नहीं होने देंगे। इसलिए वे आसानी से अपने घरों को छोड़ने और अपने रिश्ते-नातों को तोड़ने के लिए तैयार नहीं थे। देश के विभाजन और उसके परिणामस्वरूप होने वाली हिंसा ने उन्हें झकझोर डाला था, किन्तु फिर भी अनेक हिन्दू-मुसलमान अपने जान खतरे में डालकर एक-दूसरे की जान बचाने की कोशिश करते रहे। इससे सिद्ध होता है कि सामान्य हिन्दू-मुसलमानों का विभाजन से कोई लेना-देना नहीं था।

31.

विभाजन के खिलाफ़ महात्मा गाँधी की दलील क्या थी?

Answer»

गाँधी जी प्रारंभ से ही देश के विभाजन के विरुद्ध थे। वह किसी भी कीमत पर विभाजन को रोकना चाहते थे। अतः वह अंत तक विभाजन का विरोध करते रहे। देश के विभाजन का विरोध करते हुए उन्होंने कहा था कि विभाजन उनकी लाश पर होगा। 7 सितम्बर, 1946 ई० को प्रार्थना सभा में अपने भाषण में गाँधी जी ने कहा था, “मैं फिर वह दिन देखना चाहता हूँ जब हिन्दू और मुसमलान आपसी सलाह के बिना कोई काम नहीं करेंगे। मैं दिन-रात इसी आग में जला जा रहा हूँ कि उस दिन को जल्दी-से-जल्दी साकार करने के लिए क्या करूं। लीग से मेरी गुजारिश है कि वे किसी भी भारतीय को अपना शत्रु न मानें…। हिन्दू और मुसलमान, दोनों एक ही मिट्टी से उपजे हैं; उनका खून एक है, वे एक जैसा भोजन करते हैं, एक ही पानी पीते हैं, और एक ही जबान बोलते हैं।” इसी प्रकार 26 सितम्बर, 1946 ई० को महात्मा गाँधी ने ‘हरिजन’ में लिखा था, “किन्तु मुझे विश्वास है कि मुस्लिम लीग ने पाकिस्तान की जो माँग उठायी है, वह पूरी तरह गैर-इस्लामिक है और मुझे इसको पापपूर्ण कृत्य कहने में कोई संकोच नहीं है। इस्लाम मानवता की एकता और भाईचारे का समर्थक है न कि मानव परिवार की एकजुटता को तोड़ने का।

जो तत्व भारत को एक-दूसरे के खून के प्यासे टुकड़ों में बाँट देना चाहते हैं, वे भारत और इस्लाम दोनों के शत्रु हैं। भले ही वे मेरी देह के टुकड़े-टुकड़े कर दें, किन्तु मुझसे ऐसी बात नहीं मनवा सकते, जिसे मैं गलत मानता हूँ।” किन्तु गाँधी जी का विरोध ‘नक्कार खाने में तूती’ के समान था। गाँधी जी सांप्रदायिक पूर्वाग्रहों और भावनाओं से जूझते रहे, किन्तु बेकार। अंततः देश का विभाजन हो गया और भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस को उसे स्वीकार करना पड़ा। सत्य और अहिंसा के पुजारी भग्नहृदय महात्मा गाँधी असहाय थे तथापि वे निरंतर सांप्रदायिक सद्भाव स्थापित करने के प्रयासों में लगे रहे। उन्हें विश्वास था कि वे अपने प्रयासों में सफल होंगे। लोग हिंसा और घृणा का रास्ता छोड़ देंगे और भाइयों के समान मिलकर सभी समस्याओं का समाधान कर लेंगे। गाँधी जी ने निडर होकर सांप्रदायिक दंगों से ग्रस्त विभिन्न स्थानों का दौरा किया और सांप्रदायिता के शिकार लोगों को राहत पहुँचाने के प्रयास किए। उन्होंने प्रत्येक स्थान पर अल्पसंख्यक समुदाय को (वह हिन्दू हो या मुसलमान) सांत्वना प्रदान की। उन्होंने भरसक प्रयास किया कि हिन्दू-मुसलमान एक-दूसरे का खून न बहाएँ अपितु परस्पर मिल-जुलकर रहें।

32.

अलबरूनी ने कौन-सी पुस्तक लिखी थी?

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अलबरूनी ने तहकीके हिन्द’ नामक पुस्तक लिखी थी।

33.

जेरूसलम कहाँ पर स्थित है और क्यों प्रसिद्ध है?

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जेरूसलम पश्चिमी एशिया (इजराइल राष्ट्र) में स्थित एक धार्मिक नगर है। यह इस्लाम, यहूदी और ईसाई धर्मों का संगम-स्थल व पवित्र तीर्थस्थान तथा ओमर मस्जिद के लिए विश्वप्रसिद्ध है।

34.

जापान के आधुनिकीकरण का संक्षेप में वर्णन कीजिए। या “जापान का आधुनिकीकरण दक्षिण-पूर्वी एशिया के इतिहास की एक महत्त्वपूर्ण घटना थी।” व्याख्या कीजिए।

Answer»

जापान का आधुनिकीकरण मेजी पुनस्र्थापना के बाद जापान में आधुनिकीकरण की भावना का बड़ी तेजी के साथ विकास हुआ। जापान ने राजनीतिक, सामाजिक, आर्थिक तथा सांस्कृतिक आदि सभी क्षेत्रों के पश्चिमी विचारों और सिद्धान्तों को अपना लिया। इस प्रकार जापान का आधुनिकीकरण विश्व के इतिहास की एक महत्त्वपूर्ण घटना बन गई। जापान में आधुनिकीकरण की भावना का प्रसार होने का सबसे महत्त्वपूर्ण कारण यह था कि जापानी लोग पश्चिमी ज्ञान-विज्ञान को सीखकर अपने देश को इतना अधिक शक्तिशाली बनाना चाहते थे जिससे वह पश्चिमी देशों का सामना कर सकें। जापान अपने को चीन के समान केवल भाग्य पर छोड़ने के लिए तैयार नहीं था, इसलिए जापान ने बड़ी तेजी के साथ अपना आधुनिकीकरण किया।

1. सेना का आधुनिकीकरण :
मेजी युग से पूर्व जापान की सेना का संगठन समुराई लोगों द्वारा | होता था और ये समुराई विभिन्न सामन्तों की सेवा में रहकर कार्य किया करते थे। मेजी युग में शाही उद्घोषणा में इस प्राचीन प्रणाली का परित्याग कर दिया गया और सभी व्यक्तियों को सेना में भर्ती होने का अवसर प्रदान किया गया। सन् 1872 ई० में जापान में अनिवार्य सैनिक सेवा लागू कर दी गई और सभी के लिए यह आवश्यक कर दिया गया कि वे सैनिक शिक्षा प्राप्त करें और एक निश्चित अवधि तक सैनिक जीवन व्यतीत करें। वास्तव में, यह एक क्रान्तिकारी कदम था। इसके द्वारा सभी व्यक्तियों को सेना में बिना किसी भेदभाव के उच्च पद प्राप्त करने का ‘अवसर प्राप्त हुआ।

2. शिक्षा का आधुनिकीकरण :
जापान में शिक्षा का भी आधुनिकीकरण हुआ। लाखों की संख्या में जापानी छात्र शिक्षा प्राप्त करने के लिए यूरोप तथा अमेरिका गए। उन्होंने अपने देश लौटकर शिक्षा के क्षेत्र में क्रान्ति उत्पन्न कर दी। अभी तक जापान में मुख्य रूप प्राचीन साहित्य व धर्म ग्रन्थों की शिक्षा प्रदान की जाती थी परन्तु अब जापानी शिक्षा में पश्चिमी ज्ञान-विज्ञान को भी स्थान दिया जाने लगा। लगभग सभी जापानी स्कूलों में अंग्रेजी भाषा अनिवार्य रूप से पढ़ाई जाने लगी। 1872 ई० में जापान में अनिवार्य शिक्षा पद्धति को लागू किया गया और इसकी पूर्ति के लिए जापान के प्रत्येक ग्राम तथा नगर में प्राथमिक स्कूलों की स्थापना की गई।

प्रत्येक बालक व बालिका के लिए कम-से-कम 4 वर्ष तक शिक्षा प्राप्त करना अनिवार्य कर दिया गया। जापानी स्कूलों में राष्ट्र-प्रेम की शिक्षा देने की विशेष व्यवस्था की गई। 1902 ई० के बाद स्त्रियों की उच्च शिक्षा की पर्याप्त व्यवस्था की गई। क्लाइड के अनुसार, पुरुषों के लिए विश्वविद्यालय आरम्भ करने में जापान ने फ्रांसीसी नमूना अपनाने की प्रवृत्ति दिखाई और सारी शिक्षा प्रणाली पर रोजगार सम्बन्धी प्रशिक्षण के जर्मन सिद्धान्त की छाप पड़ गई थी। किसी भी दृष्टि से देखने पर यह निश्चित है कि वह शिक्षा में एक बड़ी क्रान्ति थी। 1867-71 ई० की राजनीति और आर्थिक क्रान्ति से इसका महत्त्व कुछ कम नहीं है।

जापानी शिक्षा के सम्बन्ध में क्लाइड ने आगे लिखा है-“इसलिए शिक्षा निश्चित प्रयोजनों तक सीमित रही। राष्ट्रीय एकता, निर्विवाद निष्ठा, आधुनिक वैज्ञानिक और आर्थिक प्रणालियों के ज्ञान और राष्ट्रीय सुरक्षा की पूर्णता।” इस प्रकार राष्ट्रीय एकता एवं सुरक्षा, देशभक्ति, आर्थिक तथा व्यावसायिक उन्नति जापान की शिक्षा प्रणाली का उद्देश्य था। इस प्रकार शिक्षा के क्षेत्र में क्रान्तिकारी परिवर्तन करके जापान आधुनिकीकरण की ओर अग्रसर हुआ।

3. राजनीति का आधुनिकीकरण :
राजनीतिक जीवन में भी जापान ने आधुनिकीकरण का अनुसरण 1868 ई० में शोगुनों के शासन का अन्त करके शासन सत्ता को अपने हाथ में लेकर किया। सम्राट मेजी ने जो घोषणा-पत्र प्रकाशित किया था, उसमें शासन के नवीन सिद्धान्तों का प्रतिपादन किया गया था और यह भी कहा गया था कि शासन की समस्त शक्ति सम्राट के हाथ में रहेगी परन्तु जापान में एक विचार सभा’ की स्थापना की जाएगी, जिसकी सम्मति और परामर्श के अनुसार राज्य की नीति का निर्धारण किया जाएगा। इस सभा में लोकमत को विशेष स्थान दिया जाएगा।
इसके बाद जापान में शासन में सुधार करने के लिए आन्दोलन होने लगे और वैधानिक शासन की स्थापना करने का प्रयास किया जाने लगा। 1874 ई० में इतागाकी और उसके समर्थकों ने सम्राट की सेवा में एक आवेदन-पत्र भेजा, जिसमें यह प्रार्थना की गई कि 1868 ई० की घोषणा के अनुसार जापान में एक विचार सभा की स्थापना की जाए और यह सभा लोकमत का प्रतिनिधित्व करे। इतागाकी के उदार दल ने जापान में संसद की स्थापना और पश्चिमी देशों के अनुकरण पर लोकतन्त्रवाद के विकास का समर्थन किया। 1881 ई० में काउण्ट तोकूमी ने जापान में एक नए दल को संगठन किया और वैधानिक शासन स्थापित करने की जोरदार माँग की।

इस स्थिति में जापान के सम्राट ने यह अनुभव किया कि देश में शासन सुधार करना आवश्यक है; अतः 1881 ई० में सम्राट ने एक घोषणा प्रकाशित करवाई जिसमें यह आश्वासन दिया गया कि 1890 ई० तक जापान में संसद की स्थापना कर दी जाएगी। 1889 ई० में सम्राट ने जापान के नए संविधान की घोषणा कर दी। इस संविधान के अनुसार सम्राट को शासन का प्रधान बनाया गया और उसे विस्तृत अधिकार दिए गए। एक मन्त्रिमण्डल के गठन की व्यवस्था की गई, जिसे सम्राट के प्रति उत्तरदायी बनाया गया। एक संसद की स्थापना की गई, जिसके दो सर्दन रखे गए और जिसकी अवधि 7 वर्ष निश्चित की गई। 1889 ई० के संविधान द्वारा जापान को शासन काफी आधुनिक हो चुका था।

4. औद्योगिक क्षेत्र का आधुनिकीकरण :
उन्नीसवीं शताब्दी के मध्य तक जापान के उद्योगों की स्थापना आदि की ओर कोई विशेष ध्यान नहीं दिया था और इस कारण इस क्षेत्र में वह कोई विशेष उन्नति न कर सका था। मेजी सरकार ने जापान का औद्योगीकरण करने की दिशा में विशेष ध्यान दिया। 1890 ई० में जापान में भाप-शक्ति से चलने वाले कारखानों की संख्या 250 तक पहुँच गई। इसके बाद जापान का तेजी के साथ औद्योगीकरण प्रारम्भ हुआ। 1905 ई० तक जापान औद्योगीकरण के क्षेत्र में बहुत आगे बढ़ गया। 1905 ई० तक जापान संसार के सबसे उन्नत व्यवसाय और व्यापार प्रधान देशों में स्थान प्राप्त कर चुका था। अब जापान औद्योगिक क्षेत्र में बहुत तेजी के साथ आधुनिकीकरण की ओर बढ़ने लगा था।

5. सामाजिक क्षेत्र का आधुनिकीकरण : 
जापान के सामाजिक जीवन में भी आधुनिकीकरण का प्रवेश हुआ। जापान के लोगों ने अपने समाज का संगठन यूरोपीय ढंग पर करना शुरू कर दिया। उन्होंने पाश्चात्य लोगों के रहन-सहन, व्यवहार तथा पहनावे की नकल करनी आरम्भ कर दी। सामन्तशाही, जोकि जापान की प्राचीन व्यवस्था की प्रतीक थी, का अन्त कर दिया गया। सरकार ने समाज-सुधार की ओर विशेष ध्यान दिया। 1905 ई० में एक खान नियम पारित किया गया। 1911 ई० में एक फैक्टरी नियम पारित किया गया। इसके अनुसार, रोजगार प्राप्त करने की आयु 12 वर्ष निश्चित कर दी गई। 1921 ई० में सामाजिक ब्यूरो की गृह विभाग के अन्तर्गत स्थापना की गई।

कारखानों में स्त्रियों और बच्चों के कार्य करने के 10 घण्टे निश्चित कर दिए। गए। 1929 ई० में 11 बजे रात के बाद स्त्रियों तथा बच्चों का काम करना अवैध घोषित कर दिया गया। इसके साथ-ही-साथ जापान के समाचार-पत्रों ने समाज का आधुनिकीकरण करना शुरू कर दिया सिविल तथा सैनिक न्यायिक नियमों को पश्चिमी ढंग पर निर्मित किया गया। इसके अतिरिक्त, धार्मिक जीवन का भी आधुनिकीकरण आरम्भ हुआ। 19वीं शताब्दी के अन्त तक जापान में ईसाई धर्म का व्यापक प्रचार हुआ। इस प्रकार स्पष्ट है कि जापान का आधुनिकीकरण दक्षिण-पूर्वी एशिया के इतिहास की एक महत्त्वपूर्ण घटना है।”

35.

“सन यात-सेन आधुनिक चीन के निर्माता थे।” इस कथन की समीक्षा कीजिए।(या) क्या आप सन यात-सेन को आधुनिक चीन का कल्पनावादी थार्थवादी निर्माणकर्ता मानते हैं? (या) सन यात-सेन के कार्यों और उपलब्धियों का मूल्यांकन कीजिए।

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सन यात-सेन के कार्यों का मूल्यांकन

सन यात-सेन को आधुनिक चीन का जन्मदाता, निर्माता तथा महान् क्रान्तिकारी माना जाता है। आधुनिक चीन के निर्माता डॉ० सन यात-सेन की 1925 ई० में मृत्यु के समय ऐसा लगता था कि उनके द्वारा क्रान्ति के प्रति किए गए सभी प्रयास असफल हो गए हैं परन्तु शीघ्र ही उनके विचारों ने सफलता प्राप्त की। आज चीन का प्रत्येक राजनीतिक दल अपने को सन यात-सेन का सच्चा अनुयायी समझ कर गौरव का अनुभव करता है। चीन के विशाल और बड़े भू-भाग पर मार्शल च्यांग काई शेक ने अनेक वर्षों तक डॉ० सन यात-सेन के नाम पर इस प्रकार राज्य किया जिस प्रकार खलीफा मुहम्मद उमर ने पैगम्बर मुहम्मद के नाम पर राज्य किया था। इतना ही नहीं, चीन के साम्यवादी नेता माओ-त्से-तुंग ने भी अपनी सफलता के लिए डॉ० सन यात-सेन के नाम का उपयोग किया। इस प्रकार सन यात-सेन का चरित्र और व्यक्तित्व महान् था। चीन उनकी अमूल्य सेवाओं को कभी भुला नहीं पाएगा। संक्षेप में उनका मूल्यांकन इस प्रकार से किया जा सकता है।

1. महान संगठनकर्ता :
संन यात-सेन एक उच्च संगठनकर्ता थे। उन्होंने मंचू राजवंश का अन्त करने और चीन में गणतंन्त्र की स्थापना करने के लिए क्रान्तिकारी संस्था तुंग-मिंग-हुई का संगठन किया था और बाद में उन्होंने कुओमीनतांग दल का पुनर्गठन किया था।

2. महान् देशभक्त :
सन यात-सेन एक सच्चे देशभक्त थे। उन्होंने देश के एकीकरण और संगठन के लिए अपना सब कुछ बलिदान कर दिया था। 1911 ई० में वे राष्ट्रपति चुने गए थे। लेकिन उन्होंने देश की एकता को बनाए रखने के लिए युआन शी-काई के पक्ष में राष्ट्रपति पद से त्याग-पत्र दे दिया था। इसी प्रकार 1924 ई० में वे चीन की एकता के लिए ही अस्वस्थ होने पर भी पीकिंग वार्ता में भाग लेने गए थे और जब उन्हें सफलता न मिली तो उनको गहरा आघात पहुँचा और उसी से नका निधन हो गया। इसके साथ-ही-साथ उन्होंने देश में राष्ट्रीय एकता की स्थापना के लिए राष्ट्रीयता की भावना का प्रचार अपने सिद्धान्तों से किया और देश की जनता में राष्ट्रीयता की भावना जाग्रत की।

3. परम लोकतन्त्रवादी : 
डॉ० सेन के आधुनिक चीन में जागरण को लाने के लिए बड़ी महत्त्वपूर्ण भूमिका अदा की थी। वे लोकतन्त्र के कट्टर समर्थक थे और जनता की शक्ति में उनका पूर्ण विश्वास था। उन्होंने राजनीतिक लोकतन्त्र के सिद्धान्त पर प्रतिपादन कर देश का एकीकरण करने का प्रयास किया था।

4. दो विरोधी गुणों का चरित्र :
सन यात-सेन के विषय में मुख्य रूप से दो प्रकार की विचारधाराएँ पाई जाती हैं। कुछ आलोचकों को कहना है कि सेन कल्पना की उड़ान भरने वाले राष्ट्रवादी थे। व्यक्ति कल्पना के संसार में जीवन की वास्तविकता तथा यर्थाथता से दूर चला जाता है। इस प्रकार का मत सेन के विषय में प्रस्तुत किया जाता है कि उनकी क्रान्तिकारी योजनाएँ परिस्थितियों के प्रतिकूल होती थीं, जिसके कारण उन्हें अपने जीवन में अनेक बार सफलताओं का सामना करना पड़ा। वे लोकतन्त्र के पक्के समर्थक थे परन्तु यह समझ में नहीं आता कि वे चीन की जनता को किस प्रकार लोकतन्त्र स्थापित करने और उसे कायम रखने के लिए तैयार समझते थे।

देश में गणतन्त्र स्थापित करने के मार्ग में अनेक कठिनाइयाँ थीं। देश की अधिकांश जनता अशिक्षित थी, एकता की प्रतीक राष्ट्रीय भावना का देश में पूर्ण अभाव था, देश की भाषा की लिपि बहुत कठिन और न समझने योग्य थी, यातायात के साधनों की भारी कमी थी, लोगों में गरीबी और भुखमरी फैली हुई थी तथा वे हमेशा अपने भोजन की चिन्ता में लीन रहते थे। इतना सब कुछ होने पर सेन चीन में गणतन्त्र की स्थापना के समर्थक थे जबकि गणतन्त्र की सफलता के लिए देश में शिक्षित तथा जनहित और राष्ट्र-निर्माण के कार्यों में रुचि लेने वाली जनता का होना आवश्यक होता है। कुछ आलोचकों का मत इसके ठीक विपरीत है। उनका कहना है कि सेन कल्पना के संसार में विचरण करने वाले विचारक न होकर एक सच्चे क्रान्तिकारी थे। उन्होंने हमेशा ही क्रान्ति के लिए सक्रिय कार्य किया।

देश के विभिन्न दलों को एकता के सूत्र में बाँधकर राजवंश विरोधी विद्रोहों का आयोजन किया। देश की जनता में नई चेतना और नए जागरण का संदेश प्रसारित किया। विदेशों में निवास करने वाले चीनियों को संगठित किया तथा चीन में गणतन्त्र की स्थापना कराई। जब गणतन्त्र के प्रथम राष्ट्रपति युआन शी-काई ने लोकतन्त्र के साथ विश्वासघात किया तो सबसे पहले युआन को राष्ट्रपति पद दिलवाने वाले सन यात-सेन ने ही उसका कड़ा विरोध किया और देश में पुन: राजतन्त्र स्थापित न होने दिया। उन्होंने देश का पथ-प्रदर्शन करने के लिए देश की एकमात्र राष्ट्रीय संस्था कुओमीनतांग का पुनर्गठन किया।

इसके अतिरिक्त उन्होंने देश को एकता के सूत्र में बाँधने के लिए राष्ट्रीय की पवित्र भावनाओं का प्रचार किया। चीनी जनता को विकास के मार्ग पर ले जाने के लिए उन्होंने देश को इतिहास-प्रसिद्ध अपने तीन सिद्धान्तों का मूल मन्त्र दिया जिसे चीनी जनता ने अपने धर्मग्रन्थ के रूप में स्वीकार किया। इन दोनों विचारधाराओं का अध्ययन करने के पश्चात् हम इस निष्कर्ष पर पहुँचते हैं कि वास्तव में डॉ० सन यात-सेन असाधारण व्यक्तित्व में आदर्शवाद और यथार्थवाद का सुन्दर सम्मिश्रण था।

5. सन यात-सेन का मूल्यांकन :
डॉ० सन यात-सेन को अपने जीवन में सफलताओं की अपेक्षा असफलताओं का अधिक सामना करना पड़ा। फिर भी उनके महान् कार्यों को नहीं भुलाया जा सकता। वास्तव में, सन यात-सेन ने चीन के लिए वही किया जो जर्मनी के एकीकरण के लिए बिस्मार्क ने, इटली के लिए मैजनी और कावूर, रूस के लिए लेनिन और अमेरिका के लिए जॉर्ज वाशिंगटन ने किया था। वे चीन के राष्ट्रपिता तथा आधुनिक चीन के निर्माता और विश्व के महान क्रान्तिकारी थे। क्लाइड ने भी उनकी मृत्यु के सम्बन्ध में लिखा है-“सेन राष्ट्रवादी आन्दोलन के सम्पूर्ण आदर्शवाद के प्रतीक बन गए। पुनर्गठित कुओमीनतांग का सारा क्रान्तिकारी उत्साह उनमें मूर्तिमान हो गया।
कन्फ्यूशियस पुरातन चीन का दार्शनिक सन्त था। 20वीं सदी के चीन में वही भूमिका सन यात-सेन को मिल कन्फ्यूशियसवाद का स्थान सन यात-सेनवाद को मिला।” फ्रेंज शर्मन ने भी लिखा है-“सन यात-सेन ने 40 वर्षों तक चीनी लोगों की स्वाधीनता के लिए क्रान्तिकारी कार्य किए और अपना सर्वस्य बलिदान कर दिया।” इसी प्रकार विनायके का मत है-“उनके सम्बन्ध में उनके विरोधियों को जो भी शंकाएँ थीं,  वह रातों-रात भुला दी गईं। मृत्यु से पूर्व अनेक लोग उन्हें स्वप्नद्रष्टा एवं उत्पाती मानते थे परन्तु अब वह सम्पूर्ण ज्ञान एवं विवेक के स्रोत बन गए।

36.

मेजी युग में जापान की प्रगति की विवेचना कीजिए। अथवा “जापान के इतिहास में मेजी युग सुधारों के लिए विख्यात है।” स्पष्ट कीजिए।

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मेजी युग में जापान की प्रगति मेजी पुनस्र्थापना से जापान में एक नए युग का आरम्भ हुआ। इस युग में जापान के सामाजिक, आर्थिक, सांस्कृतिक और राजनीतिक सभी क्षेत्रों में अभूतपूर्व प्रगति हुई और जापान, जो कि एक पिछड़ा हुआ देश था, विश्व का एक शक्तिशाली देश बन गया। मेजी युग में जापान ने निम्नलिखित क्षेत्रों में अत्यधिक प्रगति की

1. औद्योगिक प्रगति :
मेजी सरकार ने सर्वप्रथम देश के औद्योगिक विकास की ओर ध्यान दिया। जापानी यह अनुभव कर रहे थे कि इस क्षेत्र में वे पश्चिमी देशों की तुलना में बहुत पिछड़े हुए हैं और जब तक वे अपना पर्याप्त आर्थिक विकास नहीं कर लेते तब तक वे पश्चिमी देशों का सामना नहीं कर सकते, इसीलिए उन्होंने तीव्र गति से पाश्चात्य औद्योगीकरण को अपनाना प्रारम्भ कर दिया। जापान में नए-नए उद्योगों की स्थापना की जाने लगी और यूरोप तथा अमेरिका से नई-नई मशीनें मॅगाई जाने लगीं। सरकार की ओर से जापान में उद्योग-धन्धे स्थापित करने के लिए बहुत प्रोत्साहन दिया गया। इसके परिणामस्वरूप कुछ ही वर्षों के अन्दर जापान में औद्योगिक क्रान्ति’ हो गई और जापान एक औद्योगिक देश बन गया।

2. यातायात व संचार के साधनों का विकास :
मेजी सरकार ने यातायात और संचार के साधनों के विकास की ओर भी विशेष ध्यान दिया। 1872 ई० में जापान में रेलवे लाइनें बिछाने का कार्य प्रारम्भ हुआ और 1894 ई० तक सम्पूर्ण देश में रेलवे लाइनों का जाल बिछ गया। 1872 ई० में टोकियो तथा याकोहामा के बीच 19 मील लम्बी रेलवे लाइन बिछाई गई। 1874 ई० में कोबा तथा ओसाका के मध्य रेलगाड़ी चलने लगी। 1893 ई० में जापान में 1,500 मील लम्बी रेलवे लाइनें बिछा दी गईं। इस रेलवे मार्ग ने देश के आन्तरिक व्यवसाय तथा व्यापार की उन्नति में काफी सहायता पहुँचाई। इसके फलस्वरूप जापान में राष्ट्रीयता के विकास में भी काफी सहायता मिली।

इसके साथ ही सरकार ने डाक विभाग का भी संगठन किया। 1868 ई० में पहली बार टेलीग्राफ का प्रयोग किया गया। कुछ वर्षों में ही जापान में अनेक डाकघरों की स्थापना हो गई। रेलवे तथा डाक के विकास के साथ-साथ मेजी सरकार ने जहाजों के निर्माण की ओर ध्यान दिया तथा 19वीं सदी के अन्त तक नौ-सैनिक शक्ति में आश्चर्यजनक प्रगति कर ली। 1870 ई० के लगभग जापान में सौ-सौ टन के जहाजों का निर्माण होने लगा। 1883 ई० में नागासाकी के कारखाने में 10 और हयोगो के कारखाने में 23 भाप से चलने वाले जहाज तैयार हुए। 1890 ई० तक जापान विश्व की एक प्रमुख सामुद्रिक शक्ति वाला देश बन गया।

3. मुद्रा सुधार :
मेजी सरकार ने मुद्रा विनिमय में भी सुधार किया। अब तक जापान में विनिमय के लिए सोना तथा चाँदी का प्रयोग होता था और इसके साथ-साथ शोगुन शासन तथा अनेक सामन्तों ने अपने-अपने सिक्के चला रखे थे। इसके अतिरिक्त सोने तथा चाँदी के सिक्कों का ऐसा सम्बन्ध था कि विदेशी अपने देश से चाँदी मँगा लेते थे और 1858 ई० को सन्धि तथा बाद में हुए जापानी सरकार के साथ अन्य समझौते के अनुसार उसे जापान की चाँदी से बदल लेते थे और बाद में इस जापानी चाँदी को सोने में बदलकर उसका निर्यात करते थे।
इसके परिणामस्वरूप जापान का सोना विदेशों को चला जाता था। सन्धि परिवर्तन तथा विनिमय नियन्त्रण के द्वारा ही इस स्थिति में सुधार और निराकरण हो सकता था। सरकार के सामने ऐसी कागजी मुद्रा चलाने के अतिरिक्त और कोई चारा ही न था जो मुद्रा सोने-चाँदी में न बदली जा सके।

4. बैंकिंग सुविधाओं का विकास :
मुदा-विनिमय तथा बैंकों की समस्या को हल करने की दिशा में पहला कदम मेजी सरकार ने 1872 ई० में उठाया। ईतो ने अमेरिकन विनिमय मुद्रा तथा बैंकिंग प्रणाली का विशेष अध्ययन कर यह सुझाव दिया कि अमेरिकन प्रणाली के आधार पर राष्ट्रीय बैंकों का विनिमय कर दिया जाए। 1873 ई० में जापान में पहला राष्ट्रीय बैंक (National Bank) स्थापित किया गया और दो धनी परिवारों को आदेश दिया गया कि वे बैंक को चलाने के लिए आवश्यक धन लगाएँ। प्रारम्भ में बैंकिंग का विकास काफी धीमा था और 1876 ई० तक जापान में केवल 4 बैंक थे। इसी वर्ष बैंकों के नियमन में संशोधन किया गया। और नोटों को mमुद्रा में बदलने की अनुमति दे दी गई।

इसके बाद जापान में बैंकिंग का बड़ी तेजी के साथ विकास हुआ। 1879 ई० तक जापान में 151 राष्ट्रीय बैंकों की स्थापना हो गई थी। बैंकिंग के विकास के साथ ही अपरिवर्तनीय नोटों की संख्या में वृद्धि हुई। इन नोटों की संख्या-वृद्धि और 1877 ई० के सत्सुमा विद्रोह के प्रसार के फलस्वरूप जापान में कीमतें असाधारण रूप से बढ़ गईं और जनता को अनेक कष्टों का सामना करना पड़ा।

5. कृषि का विकास :
क्लाइड के अनुसार, “आरम्भिक मेजी कालीन जापान में औद्योगीकरण की यह प्रणाली ऐसे समाज में चलाई गई जो अधिकांशतः कृषिप्रधान था, इसलिए यह आश्चर्यजनक नहीं कि मेजी के नेता उसी क्रान्तिकारी उत्साह से कृषि की नई व्यवस्था में जुट गए जो उन्होंने राजनीति और उद्योग में दिखाया था। इस काल में कृषि का भी खूब विकास हुआ।

6. शिक्षा के क्षेत्र में सुधार :
मेजी शासनकाल में जापान में शिक्षा के क्षेत्र में अनेक महत्त्वपूर्ण सुधार किए गए। जापान प्रारम्भ से ही पश्चिम के ज्ञान-विज्ञान का अध्ययन करने के लिए बहुत उत्सुक था। 1811 ई० में शोगुन शासन ने पश्चिमी भाषाओं के ग्रन्थों की जापानी भाषा में अनुवाद करने के लिए जो ‘बाशो शीराबेशी’ नामक संस्था स्थापित की थी, उसे 1857 ई० में एक शिक्षण संस्था का रूप दे दिया गया, जिसमें पश्चिमी भाषाओं और विज्ञानों की शिक्षा दी जाती थी। कुछ जापानियों ने इसी उद्देश्य से पश्चिमी देशों की यात्रा भी की थी।

अतः पुनस्र्थापना के बाद शिक्षा के क्षेत्र में बड़ी तेजी के साथ प्रगति हुई। 1868 ई० की शाही शपथ घोषणा में कहे गए इस वाक्य कि ‘हर स्थान से ज्ञान प्राप्त किया जाए’ के अनुसार 1871 ई० में शिक्षा विभाग की स्थापना की गई। एक कानून बनाकर यह व्यवस्था कर दी गई कि प्रत्येक व्यक्ति ऊँचा और नीचा, स्त्री और पुरुष शिक्षा प्राप्त करे जिससे कि सारे समाज में कोई परिवार और परिवार का कोई भी व्यक्ति अशिक्षित और अज्ञानी न रह जाए।”

7. सामाजिक क्षेत्र में सुधार :
मेजी युग में जापान के सामाजिक जीवन में, पश्चिमी सम्पर्क के कारण आश्चर्यजनक परिवर्तन हुए। जापानी लोगों ने विदेशी कपड़ों को पहनना शुरू कर दिया। तिनका का हैट लगाए, बेंत लिए, सफेद सूती दस्ताने और एड़ीदार जूते पहले व्यक्ति याकोहामा के बाजारों में गर्मी की शाम को घूमते हुए नजर आने लगे। वे अमेरिकी नमूने के सूट पहनने लगे। 1872 ई० में सभी सरकारी अधिकारियों के लिए पाश्चात्य वेशभूषा धारण करना अनिवार्य कर दिया गया। सूट पहनने का फैशन इतना अधिक बढ़ गया कि लन्दन की उत्तम दर्जियों की गली ‘साबिलटो की नकल कर जापान में दर्जियों का भी सोबिटो’ मुहल्ला बस गया। जापानी लोग हाथ मिलाकर अभिवादन करने लगे। स्त्रियों ने भी विक्टोरियन ढंग के कपड़े पहनने शुरू कर दिए।

1887 ई० में जापान में सबसे पहले बिजली का प्रयोग शुरू हुआ और तब से बिजली का प्रयोग निरन्तर बढ़ता गया। इसके साथ ही जापान में यूरोपीय ढंग पर मकान बनने लगे और उनकी सजावट भी यूरोपीय शैली के आधार पर की जाने लगी। नगरों में बहुत अधिक संख्या में सवारियाँ चलने लगी। 869 ई० में हाथ में चलने वाली एक हल्के पहियों की गाड़ी का प्रचलन हुआ। इसे ‘जीनरो केशा’ (मनुष्य की शक्ति से चलने वाली गाड़ी) कहते थे। आधुनिक रिक्शा इसी का विकसित रूप है।

8. धार्मिक क्षेत्र में सुधार :
मेजी पुनस्र्थापना के बाद जापान में धार्मिक जीवन में भी परिवर्तन हुआ। बौद्ध धर्म के स्थान पर शिन्तों धर्म का विशेष प्रचार हुआ और यह जापान का राजधर्म बन । गया। इस धर्म ने राष्ट्रीयता के विकास में काफी सहायता पहुँचाई। जापानी जनता अपने सम्राट के प्रति असीम श्रद्धा और अटूट राजभक्ति रखने लगी। इसके परिणामस्वरूप जापानी लोगों में राष्ट्रीय चेतना तथा एकता की भावना का उदय हुआ। इस प्रकार मेजी पुनस्र्थापना के बाद जापान के लगभग सभी क्षेत्रों में क्रान्तिकारी परिवर्तन और प्रगति हुई। इस युग में ही आधुनिक जापान का जन्म हुआ जो शीघ्र ही अपनी उच्चता के चरम शिखर पर पहुँच गया। वस्तुत: जापान के इतिहास में मेजी युग’ सुधारों का महत्त्वपूर्ण काल था।

37.

च्यांग-काई-शेक का साम्यवादियों से संघर्ष क्यों हुआ?

Answer»

1927 ई० में च्यांग-काई-शेक ने हैंकों पर विजय प्राप्त की और बोरोडिन (Borodin) के प्रभांव से वहाँ पर साम्यवादी ढंग की सरकार स्थापित की गई। इस प्रकार ‘कुओमीनतांग में वामपक्ष का उदय हुआ। दक्षिणपन्थी दल की दृष्टि में वह डॉ० सन यात-सेन के राष्ट्रीयता के सिद्धान्त की अपेक्षा आर्थिक समानता को अधिक महत्त्वपूर्ण समझता था। विचारों की इस भिन्नता ने धीरे-धीरे गृहयुद्ध का रूप धारण कर लिया। च्यांग ने हैंको की वामपन्थी सरकार को भंग कर दिया और उसके स्थान पर नानकिंग में राष्ट्रीय सरकार की स्थापना कर दी।

उसने व्यापारियों और पूँजीपतियों के सहयोग से, देश को साम्यवादी प्रभाव से मुक्त करने का निश्चय किया। इस कार्य में जापान ने भी सहयोग दिया साम्यवादियों ने च्यांग के साथ अनेक युद्ध किए, परन्तु अन्त में उन्हें क्वांगसी प्रान्त छोड़ने के लिए विवश होना पड़ा। च्यांग-काई शेक ने चार बार साम्यावादियों पर भारी क्रमण किए परन्तु उनकी गुरिल्ला नीति व लाल सेना के उत्साह के कारण ये आक्रमण विफल रहे। उसके पाँचवें विशाल व भयंकर आक्रमण के फलस्वरूप साम्यवादियों को क्वांगसी प्रान्त छोड़कर शैन-सी-जाने का निश्चय करना पड़ा। इस आक्रमण में चीन के अपार धन और जन की हानि हुई।

38.

च्यांग-काई-शेक के उत्तरी अभियान का संक्षेप में वर्णन कीजिए।

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कुछ योद्धा सरदार (War Lords) अपनी शक्ति का उत्तर-चीन में दुरुपयोग कर चीन की राष्ट्रीय एकता को नष्ट कर रहे थे। सन यात-सेन कुछ परिस्थितियों के कारण उनके विरुद्ध कोई सक्रिय कदम नहीं उठा पाए थे। अत: इसकी जिम्मेदारी उन्होंने च्यांग-काई-शेक को सौंप दी। च्यांग ने राष्ट्रीय एकता की स्थापना करने के लिए सैनिक अभियान प्रारम्भ करने की योजना बनाई। चीन की राष्ट्रीय एकता स्थापित करने तथा जापानी साम्राज्यवाद की कठपुतली बने उत्तरी योद्धा सरदारों द्वारा चीन की अखण्डता तथा सार्वभौमिकता को दी जा रही चुनौती एवं उनका प्रभाव नष्ट करने के लिए च्यांग-काई-शेक की अध्यक्षता में राष्ट्रीय सेना ने कैण्टन से उत्तर की ओर प्रस्थान किया। 60 हजार सैनिकों की यह सेना राष्ट्रीय भावनाओं से परिपूर्ण थी। च्यांग-काई-शेक के नेतृत्व में राष्ट्रीय सेना ने सर्वप्रथम हैंको (Hankow) पर अधिकार कर लिया फिर नानकिंग और शंघाई पर उनका अधिकार हो। गया। जून 1928 ई० में पीकिंग शासन समाप्त कर दिया और कुओमीनतांग दल की सरकार चीन की सर्वेसर्वा बन गई।

39.

योगो के कारखाने में भाप से चलने वाले जहाज कब से तैयार होने लगे?(क) 1872 ई० से(ख) 1886 ई० से(ग) 1883 ई० से(घ) 1882 ई० से

Answer»

सही विकल्प है (ग) 1883 ई० से

40.

आधुनिक चीन का निर्माता किसे माना जाता है?(क) ली चुंग(ख) सन यात-सेन(ग) युआन-शी-काई(घ) च्यांग-काई-शेक

Answer»

सही विकल्प है (ख) सन यात-सेन

41.

सन यात-सेन के प्रमुख कार्यों का वर्णन कीजिए।

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चीन में सन यात-सेन ने निम्नलिखित कार्य किए
⦁    चीन में शिक्षा प्रणाली में सुधार के लिए पाश्चात्य शिक्षा का प्रसार किया।
⦁    सन यात-सेन ने जापान के याकोहामा को अपना कार्य-क्षेत्र बनाकर प्रवासी चीनी क्रान्तिकारियों को जाग्रत किया।
⦁     1905 ई० में सन यात-सेन ने चीन में ‘तुंग-मिंग-हुई’ नामक क्रान्तिकारी संस्था की स्थापना की।
⦁     सन यात-सेन ने 1906, 1907 तथा 1910 के छुटपुट विद्रोहों की भूमिका तैयार की और 1911 ई० की क्रान्ति को सम्भव बनाया।
⦁    चीन में गणतन्त्र की स्थापना के लिए वे निरन्तर संघर्ष करते रहे और अन्ततः असफलता प्राप्त की।
⦁    आधुनिक चीन में जागरण लाने के लिए उन्होंने बड़ी योग्यता के साथ देश को एकीकरण के धरातल पर लाने का प्रयास किया।

42.

जापान में मेजी की सरकार ने औद्योगिक प्रगति किस प्रकार की?

Answer»

जापान में मेजी सरकार ने सर्वप्रथम देश के औद्योगिक विकास की ओर ध्यान दिया। जापानी यह अनुभव करते थे कि विकास के लिए पाश्चात्य औद्योगीकरण आवश्यक है; अतः जापान में नए-नए उद्योगों की स्थापना होने लगी। वहाँ यूरोप तथा अमेरिका से मशीने मँगाई जाने लगी। जापान सरकार ने भी इसे बहुत प्रोत्साहन दिया। कुछ ही वर्षों में जापान एक औद्योगिक देश बन गया। जापान के कारखानों में कपड़ा, रेशम तथा लोहे का सामान भारी मात्रा में तैयार होने लगा। सैनिक दृष्टि से महत्त्वपूर्ण लोहे के व्यवसाय के लिए खाने खोदी गईं। लोहा-इस्पात उद्योग का काफी विकास किया गया। भाप-शक्ति के विकास पर विशेष बल दिया गया। अब औद्योगिक क्षेत्र में जापान किसी भी यूरोपीय देश का सामना कर सकता था।

43.

मेजी संविधान में निहित मूल अधिकारों का वर्णन कीजिए।

Answer»

जापान की जनता को मेजी संविधान में कुछ मौलिक अधिकार दिए गए थे। जापान के प्रत्येक नागरिक को भाषण करने, लिखने, सभा करने, संस्था बनाने और इच्छानुसार किसी भी धर्म को स्वीकार करने की स्वतन्त्रता प्राप्त होगी। वे अपनी योग्यतानुसार सरकारी पद को प्राप्त करने का अधिकार रखते थे। वे अपना निवास स्थान बदल सकते थे। राजकर्मचारी बिना आज्ञा के किसी व्यक्ति के घर में घुसकर तलाशी नहीं ले सकते थे। जनता को सम्पत्ति रखने में बेचने ी पूरी स्वतन्त्रता थी। उन पर बिना मुकदमा चलाए दण्ड नहीं लगाया जा सकता था।

44.

डॉ० सन यात-सेन के राजनीतिक आदर्श क्या थे?

Answer»

डॉ० सन यात-सेन की राजनीतिक विचारधारा रूस के साम्यवादी दर्शन से प्रभावित थी और उन्होंने अपने देश में साम्यवादी ढंग से परिवर्तन लाने का प्रयत्न भी किया, फिर भी वे साम्यवादी दर्शन के अन्धभक्त नहीं थे। उन्होंने अपने राजनीतिक विचारों में निम्नलिखित आदर्शों को रखा था

⦁    राष्ट्रीयता-चीन में सदियों से जहाँ एक ओर सांस्कृतिक एकता मौजूद थी, वहीं दूसरी ओर राजनीतिक एकता का अभाव था। इस अभाव का अनुभव करके उन्होंने देश में राष्ट्रीयता का बिगुल बजाया।
⦁     राजनीतिक लोकतन्त्र-डॉ० सन यात-सेन लोकतन्त्र के पक्के समर्थक थे। उन्होंने चीन में क्रान्ति करके गणतन्त्र की स्थापना को अपने जीवन का लक्ष्य बना लिया।
⦁     जनता की आजीविका-सन यात-सेन ने मानव जीवन में भोजन की भारी आवश्यकता का अच्छी तरह अनुभव कर लिया था और यही कारण था कि उन्होंने कृषक वर्ग के उत्थान की ओर अधिक ध्यान दिया। उनका मत था कि भूमि उसकी हो, जो भूमि जोतता और बोता है।

45.

मेजी संविधान की प्रमुख विशेषताएँ बताइए।

Answer»

मेजी संविधान की प्रमुख विशेषताएँ निम्नलिखित थीं

⦁    सम्राट की सर्वोच्चता-मेजी संविधान पूँजीवाद सामन्तवाद का अद्भुत मिश्रण था। यह सम्राट की ओर से उपहार था और इसमें परिवर्तन भी सम्राट ही कर सकते थे।
⦁     परामर्शदात्री परिषद्-संविधान के अनुसार दो परामर्शदात्री परिषदों
(1) मन्त्रिपरिषद् तथा
(2) प्रीवि-परिषद्
का गठन किया गया। मन्त्रिपरिषद् का कार्य शासन सम्बन्धी कार्यों का संचालन करना था। प्रीवि-परिषद् का निर्माण स्वयं सम्राट करता था।
⦁     द्विसदनीय संसद-इस संसद में दो सदन रखे गए। उच्च सदन में धनी-मानी व्यक्ति होते थे तथा निम्न सदन में सारे देश की जनता के प्रतिनिधि थे।
⦁     संसद का अधिवेशन-जापानी संसद का प्रमुख अधिवेशन प्रतिवर्ष तीन माह का होता था। इसके सदस्यों को वाद-विवाद करने का अधिकार था।
⦁     मौलिक अधिकार-मेजी संविधान की एक अन्य विशेषता यह थी कि इसके अन्तर्गत जनता को कुछ मौलिक अधिकार दिए गए थे।

46.

मेजी सरकार ने सामन्त प्रथा का अन्त करने के लिए क्या कार्य किए?

Answer»

सामन्त प्रथा का अन्त करने के लिए मेजी सरकार ने निम्नलिखित कार्य किए

⦁    1868 ई० में सरकार ने यह व्यवस्था की कि प्रत्येक सामन्त की जागीर में एक राजकर्मचारी की नियुक्ति हो।
⦁     1869 ई० में नेताओं की प्रेरणा पर अनेक सामन्तों ने अपनी जागीरें मेजी सम्राट को लौटा दी। सम्राट ने इन सामन्तों को अपनी-अपनी जागीर का सूबेदार बना दिया।
⦁     सम्राट ने अन्य सामन्तों को भी आदेश दिया कि वे जागीरें सम्राट को लौटा दें। देश-प्रेम की भावना के कारण किसी सामन्त ने आदेश का उल्लंघन नहीं किया।
⦁     1871 ई० में सम्राट ने सभी सामन्तों को मासिक पेन्शन देने की सुविधा दी। परन्तु इससे राजकोष पर भार अधिक बढ़ गया; अतः 1873 ई० में मासिक पेन्शन की जगह एक निश्चित रकम देने की आज्ञा दी गई।

47.

मेजी संविधान कब पारित हुआ?(क) 1884 ई० में(ख) 1872 ई० में(ग) 1889 ई० में(घ) 1842 ई० में

Answer»

सही विकल्प है (ग) 1889 ई० में

48.

जापान के धार्मिक क्षेत्र के दो सुधार बताइए।

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⦁    जापान में बौद्ध धर्म के स्थान पर शिन्तो धर्म का प्रचार हुआ और यह जापान का राजधर्म बन गया।
⦁     इसके परिणामस्वरूप जापानी लोगों में राष्ट्रीय चेतना तथा एकता की भावना का उदय हुआ।

49.

शोगुन प्रणाली के पतन के प्रमुख कारण लिखिए।

Answer»

शोगुन प्रणाली के पतन के प्रमुख कारण निम्नलिखित हैं

⦁    आन्तरिक असन्तोष-शोगुन ने अपने दण्डात्मक कार्यों से सामन्त परिवारों को कष्ट पहुँचाया था। यहाँ तक कि उन्हें विवाह करने के लिए भी पहले आज्ञा लेनी पड़ती थी। इसके अतिरिक्त अन्य अनेक कारणों से भी सामन्तों में असन्तोष था।
⦁    समुराइयों का विरोध-शोगुन शासन में आर्थिक स्थिति खराब होने से समुराई सैनिकों को नौकरी से निकाल दिया गया। इससे इन सैनिकों में असन्तोष फैल गया था और वे शोगुनों के विरोधी बन बैठे थे।
⦁     सामन्तों द्वारा शोगुन शासन का विरोध-सामन्तों का विचार था कि जापान पर आने वाली विपत्तियों का प्रमुख कारण शोगुन शासन प्रणाली है: अतः सामन्तों ने जनता को शोगुनों के विरुद्ध कर दिया था।
⦁     कृषक वर्ग का असन्तोष-जापान का कृषक वर्ग भी करों के कारण शोगुनों से असन्तुष्ट था।  चोशू सामन्तों और शोगुन सामन्तों में संघर्ष-चोशू सामन्तों के विदेशियों के प्रति विरोध दृष्टिकोण को देखते हुए शोगुन ने उनकी शक्ति को कुचलने का निश्चय किया; अतः उनके ” मध्य संघर्ष हुआ। इस संघर्ष में शोगुनों की सहायता किसी ने नहीं की।

50.

जापान के प्राथमिक विद्यालयों का पंचवर्षीय पाठ्यक्रम कब प्रारम्भ किया गया?

Answer»

जापान के प्राथमिक विद्यालयों का पंचवर्षीय पाठ्यक्रम 1899 ई० में प्रारम्भ किया गया।