This section includes 7 InterviewSolutions, each offering curated multiple-choice questions to sharpen your Current Affairs knowledge and support exam preparation. Choose a topic below to get started.
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उसने कहा था। कहानी में वातावरण का सुन्दर संयोजन हुआ है। स्पष्ट कीजिए। |
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Answer» वातावरण चित्रण कहानी का एक महत्वपूर्ण तत्त्व है। वातावरण के चित्रण से कहानी रोचक बनती है। कहानी का आरम्भ अमृतसर के बाजार से होता है। जहाँ लोगों की भीड़ है उसमें से बम्बूकार्ट वालों का निकलना आसान नहीं। किन्तु वे सब्र के साथ ‘जी’ और ‘साहब’ शब्द का प्रयोग करके लोगों को हटाते हुए आगे निकल जाते हैं। बिल्कुल स्वाभाविक वर्णन है युद्ध के मैदान के वातावरण का तो यथार्थ वर्णन है। ठण्ड अधिक है। खन्दक में पिंडलियों तक कीचड़ में धंसे हुए हैं। ठण्ड के मारे हड्डियाँ ठिठुर गई हैं। दाँत किट-किटा रहे हैं। जर्मनी वाले गोले बरसाते हैं जिससे धरती हिल जाती है। बाहर निकल नहीं सकते। सीधे गोली पड़ती है। मनोरंजन का कोई साधन नहीं है। युद्ध के मैदान में किस प्रकार धोखा दिया जाता है। सिपाही कितनी तीव्र बुद्धि से काम करते हैं। आक्रमण कैसे होता है? शत्रु पर कैसे विजय पाई जाती है। इसका सजीव वर्णन हुआ है। कहानी के अन्त का वातावरण बड़ा मार्मिक है। घायल लहनासिंह वजीरासिंह की गोद में सिर रखकर लेटा है, स्वप्न चल रहा है। उसके मुँह से निकला एक-एक शब्द वातावरण को गम्भीर बना रहा है। बचपन की स्मृति आती है। सूबेदारनी ने रोते हुए क्या भिक्षा माँगी यह स्मृति में आ रहा है। वजीरासिंह यह सब देखकर रो रहा है। यहाँ पर पाठक भी अपने आप को सँभाल नहीं पाता है। अस्तु वातावरण चित्रण की दृष्टि से भी कहानी श्रेष्ठ है। |
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कहानी की मूलभूत विशेषताओं का उल्लेख कीजिए। |
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Answer» कहानी की मूलभूत विशेषताएँ चार होती हैं – (1) कथानक – कहानी में सबसे अधिक प्रधानता कथानक की होती है। जिस कहानी का कथानक आकर्षक नहीं है उस कहानी में पाठक का मन लगेगा नहीं। उसने कहा था’ कहानी की विशेषता उसका कथानक है। कहानी आरम्भ से ही पाठक को पकड़ लेती है। इसका कथानक बड़ा मार्मिक है। इसी कारण यह हिन्दी साहित्य की बेजोड़ कहानी है। कहानी को कथानक निश्छल प्रेम, त्याग और कर्तव्यनिष्ठा पर आधारित है जो मृत्यु शैय्या पर जाकर समाप्त होता है। कहानी का आरम्भ निश्छल प्रेम से होता है, मध्य भाग में कर्तव्यनिष्ठा और सेवाभाव है। अन्त में पुनः त्याग और प्रेम है। कथानक इतना आकर्षक है कि पाठक पहली पंक्ति से ही कहानी का अन्त जानने के लिए उत्सुक हो जाता है। बचपन के प्रेम के बाद कहानी का कथानक अचानक पच्चीस वर्ष बाद पहुँच जाता है। जहाँ प्रथम विश्वयुद्ध की विभीषिका का वर्णन है। अन्त में नायक लहनासिंह का स्वप्न हृदय को छू जाता है और पाठक भावुक हो उठता है। कथानक सीधा-सपाट होते हुए भी बहुत आकर्षक है। (2) शीर्षक – कभी-कभी शीर्षक इतना आकर्षक होता है कि पाठक उसे पढ़ते ही कहानी से अत्यधिक जुड़ जाता है। इस कहानी का भी शीर्षक बहुत आकर्षक है। तीन शब्दों का छोटा शीर्षक है किन्तु जिज्ञासात्मक है। शीर्षक को पढ़कर यह जिज्ञासी होती है कि किसने, किससे क्या कहा था? सम्पूर्ण कथावस्तु पढ़ने के पश्चात् ही शीर्षक पूर्णत: स्पष्ट होता है कि इससे अच्छा शीर्षक इस कहानी का नहीं हो सकता था। (3) भाषा-शैली – कहानी की भाषा सरल है। आँचलिक शब्दों का; जैसे-बाछा, सालू, बर्रा, ओबरी आदि का प्रयोग अधिक है। कहीं-कहीं उर्दू और तत्सम शब्दों के प्रयोग भी मिल जाते हैं; जैसे-कयामत, क्षयी आदि। भाषा में मुहावरों का सहज रूप में प्रयोग हुआ है। कान पक गए, जीभ चलाना, कान के पर्दे फाड़ना, पलक न कॅपी आदि मुहावरे भाषा में इस तरह आ गए हैं जैसे मोतियों की माला में मणियाँ पिरो दी गई हों। शैली में कथोपकथन की प्रधानता है। कहानी का आरम्भ ही लड़के-लड़की के कथोपकथन से होता है। मध्य में जर्मन लपटन, सूबेदारे हजारासिंह और लहनासिंह के कथोपकथन हैं। सबसे बड़ी विशेषता यह है कि वे छोटे और आकर्षक हैं। (4) वातावरण का चित्रण – वातावरण कहानी का वह तत्त्व है जो कहानी को आकर्षक बनाता है। अमृतसर के भीड़ भरे बाजार के वातावरण से कहानी आरम्भ होती है। बम्बूकार्ट वाले किस प्रकार भीड़ में से निकलते हैं। इसका अच्छा वर्णन है। प्रथम विश्वयुद्ध का समय है। युद्ध के मैदान का यथार्थ वर्णन है। उसमें चित्रात्मकता है। वर्णन को पढ़कर आँखों के सामने युद्ध के मैदान का दृश्य उभर जाता है। |
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| 3. |
“मृत्यु के कुछ समय पहले स्मृति बहुत साफ हो जाती है। कहानी के आधार पर स्पष्ट कीजिए। |
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Answer» हजारासिंह और अन्य लोगों के चले जाने के बाद घायल लहनासिंह वजीरासिंह की गोद में सिर रखकर लेट गया। उसे अपने जीवन की घटनाएँ याद आने लर्गी। उसे बचपन की बात याद आने लगी। वह बारह वर्ष का था और लड़की आठ वर्ष की थी। दोनों कई बार अचानक मिल जाते थे। वह कुड़माई के बारे में पूछता परन्तु आशों के विरुद्ध उत्तर सुनकर उसे निराशा हुई। कई वर्षों के बाद सूबेदार के घर उससे फिर मिलना हुआ। वह सूबेदार की पत्नी थी। उसने बचपन की घटना की याद दिलाई। पति और पुत्र दोनों लाम पर जाते हैं। उनकी रक्षा की भीख माँगी। फिर अपने आँगन में लगाए हुए आम के पेड़ की याद आई। चाचा-भतीजे बैठकर आम खायेंगे। इस प्रकार अनेक बातें उसे याद आ रही थीं। अन्तिम समय में पुरानी बातें याद आती ही हैं, यह स्वाभाविक ही है। |
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| 4. |
“मुझसे जो उसने कहा था वह मैंने कर दिया।” किसने किससे क्या कहा था? लहनासिंह ने अपना कर्त्तव्य कैसे निभाया? |
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Answer» सूबेदारनी ने लहनासिंह से सूबेदार के घर पर कहा था, मैंने तुझे आते ही पहचान लिया। मेरे भाग्य फूट गए। सरकार ने पति को बहादुरी का खिताब दिया, आज नमकहलाली का अवसर आया है। एक बेटा है, एक वर्ष पहले फौज में भर्ती हुआ था। आज पति और पुत्र दोनों लाम पर जाते हैं। अगर औरतों की पलटन होती तो मैं भी चली जाती। एक दिन ताँगे वाले के घोड़े के बीच में से मुझे बचाया था। आज इन दोनों की रक्षा करना। यह भीख माँगती हूँ। यह बात सूबेदरानी ने लहनासिंह से कही थी। लहनासिंह ने जान की बाजी लगाकर सूबेदारनी के पुत्र बोधासिंह की रक्षा की और वजीरासिंह से यह कहा कि मुझसे उसने जो कहा था वह मैंने कर दिया। |
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लहना को चकमा देना आसान नहीं। इसे अपने शब्दों में स्पष्ट कीजिए। |
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Answer» लहना ने अफसर से कहा मुझे चकमा देने के लिए चार आँखें चाहिए। सूबेदार तो लपटन के धोखे में आ गए लेकिन उसने लपटन के व्यवहार, उसकी भाषा एवं वेश से पहचान लिया। लपटन की शक्ल देखी, उसके बाल देखे लिए एवं पुरानी घटनाओं को याद दिलाकर जान लिया कि यह धोखेबाज है। उसने अपने गाँव के तुरकी मौलवी को भी पहचान लिया था जो गाँव में ताबीज बाँटता था तथा बच्चों को दवाई देता था। बड़ के नीचे बैठकर हुक्का पीता था। जर्मन लपटन ने उसे धोखा देने का प्रयास तो किया मगर सफल नहीं हो सका। |
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लहनासिंह एक सच्चा सिपाही था। सिद्ध कीजिए। |
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Answer» एक सच्चे सिपाही की सबसे बड़ी विशेषता है कि वह साहस नहीं छोड़ता। तुरन्त निर्णय लेता है और कर्त्तव्य से पीछे नहीं हटता। ये तीनों बातें लहनासिंह में थीं। वह साहसी थी । उसको दो घाव लग चुके थे पर उसने हिम्मत नहीं हारी। पट्टियाँ कसकर लहू को रोक दिया और सत्तर जर्मन सिपाहियों का सामना करती रहा। खड़े-खड़े गोलियाँ चला रहा था और जर्मनों को मृत्यु शैय्या पर सुला रहा था। उसने जर्मन अफसर को पहचान कर तुरन्त निर्णय कर लिया कि उसे क्या करना है। वजीरासिंह को तुरन्त सूबेदार को लौटाने के लिए भेज दिया और जर्मन अफसर की गतिविधियों पर पूरा ध्यान रखा। उसने दो कर्तव्य निभाये। एक, बोधासिंह के प्रति क्योंकि वह वचनबद्ध था। दूसरी, अपनी ड्यूटी के प्रति भी कर्तव्य का निर्वाह किया। खन्दक में खड़े होकर उसने खाई को भी देखा और बोधा को भी देखा। हजारासिंह उसे खन्दक की रक्षा के लिए छोड़ गया था जिसका उसने पूरी तरह से पालन किया। स्पष्ट है वह साहसी, बुद्धिमान और कर्तव्यनिष्ठ था। |
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लपटन के होश में आने पर लहनासिंह ने व्यंग्य में क्या कहा? और अंततोगत्वा उसके साथ क्या किया? |
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Answer» लपटन जब होश में आया तो लहनासिंह व्यंग्यपूर्वक हँसा और पूछा मिजाज कैसा है? आज मुझे आप से ज्ञात हुआ कि सिख सिगरेट पीते हैं। यह जाना कि जगाधरी जिले में नीलगाय होती हैं जिनके दो फुट चार इंच के सींग होते हैं। यह सीखा कि मुसलमान मन्दिरों में जल चढ़ाते हैं। लपटन साहब खोते पर चढ़ते हैं। ऐसी उर्दू कहाँ से सीख आए। हमारे लपटन साहब तो ‘डेम’ के बिना बोलते ही नहीं। इतने में लपटन ने जेब में पिस्तौल निकालकर गोली चलाई लेकिन लहनासिंह ने उसे मौत के घाट उतार दिया। |
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State the significance of ‘Neel Darpan’ |
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Answer» Deenbandhu Mitra in his play ‘Neel Darpan’ brought to the notice of the society the wretched conditions of the peasants who were forced to cultivate indigo. |
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“जैसे मैं जानता न होऊँ।” सूबेदार हजारासिंह लहनासिंह के बारे में क्या जानता था? |
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Answer» हजारासिंह जानता है कि लहनासिंह बोधासिंह का पूरा ध्यान रखता है। रात-रात भर जागकर उसकी जगह पहरा देता है। अपना कम्बल उसे ओढ़ा देता है और स्वयं सिगड़ी के सहारे ठण्डी रात बिता देता है। अपने सूखी लकड़ी के तख्तों पर उसे सुला देता है। वह खन्दक में कीचड़ में पड़ा रहता है। बोधासिंह के कराहने पर उसका हाल पूछता है, पानी पिलाता है। ठण्ड लगने पर अपना ओवरकोट और जरसी उसे पहना देता है। हजारासिंह लहनासिंह के इस त्याग और सेवा को अच्छी तरह जानता था। |
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‘लहनामिंह की स्थिति परकटे पक्षी की तरह है जो उड़ना चाहता है पर विवश है।’ स्पष्ट कीजिए। |
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Answer» परकटा पक्षी डैनों के अभाव में उड़ने में असमर्थ होता है। यही स्थिति लहनासिंह की है। वह जर्मनों पर धावा करना चाहता है किन्तु बड़े अफसर का आदेश नहीं था। खन्दक में पड़े-पड़े हइडियाँ अकड़ गई हैं। वह कहता है कि मार्च का हुक्म मिल जाता तो अकेला ही सात जर्मनों को मार दें। जर्मनी के सिपाही कायर हैं, संगीन देखते ही मुँह फाड़ देते हैं। वैसे छिपकर वार करते हैं। एक बार धावा किया था तो चार मील तक जर्मनों को खदेड़ दिया था। किन्तु अब क्या करे। अफसर आक्रमण करने का आदेश ही नहीं देते। सिपाही होने के कारण लड़ने का जोश आता है। पर आदेश के अभाव में सारे अरमान ठण्डे पड़ जाते हैं। वास्तव में उसकी स्थिति परकटे पक्षी की ही थी। |
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लहनासिंह ने लौटकर क्या देखा और क्या किया? |
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Answer» अन्दर से लौटकर लहनासिंह खाई के मुहाने पर दीवार से चिपककर खड़ा हो गया। उसने देखा कि लपटन साहब ने जेब से बेल के बराबर के तीन गोले निकाले। तीनों को खन्दक में जगह-जगह रखा और तीनों को एक तार से बाँध दिया। तार के आगे सूत की गुत्थी थी जिसे सिगड़ी के पास रख दिया था और उस गुत्थी को दियासलाई से जलाने का प्रयास किया कि लहनासिंह ने दोनों हाथों से उठाकर उल्टी बन्दूक को साहब की कुहनी पर दे मारा जिससे दियासलाई गिर गई और एक कुन्दा साहब की गर्दन पर मारा। जिससे साहब बेहोश हो गए। उनकी जेब से तीन-चार लिफाफे और एक डायरी निकालकर अपने पास रख ली। |
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संदेह होने पर लहनासिंह ने वजीरासिंह से क्या कहा? |
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Answer» लहनासिंह ने वजीरासिंह से कहा कि, यह भारतीय लपटन साहब नहीं है बल्कि उनकी वर्दी पहनकर कोई जर्मन आया है। हम पर कयामत आ गई है। पूबेदारे बिना इसका मुँह देखे चला गया है। हमारे साथ धोखा हुआ है। अब हम पर आक्रमण होगा और हम मारे जाएँगे। सूबेदार हजारासिंह कीचड़ में चक्कर काटते फिरेंगे और यहाँ खाई पर आक्रमण होगा। इसलिए देर मत करो और पलटन के पैरों के निशान देखकर दौड़े चले जाओ और सूबेदार को फौरन लौटा लाओ। अभी वे दूर नहीं गए होंगे। मेरी बात मानकर तुरन्त चले जाओ अन्यथा सभी मारे जायेंगे। |
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आगन्तुक जर्मन लपटन ने हजारासिंह से क्या मिथ्या भाषण किया? और क्यों? |
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Answer» जर्मन लपटन जो भारतीय लपटन की वर्दी पहनकर आया था। उसने हजारासिंह से कहा कि इसी समय धावा करना होगा। मील भर दूरी पर पूर्व में जर्मन खाई है जहाँ पचास से अधिक जर्मन सिपाही नहीं हैं। पेड़ों के नीचे रास्ता है। रास्ता घुमावदार है। मैं पन्द्रह जवान खड़े कर आया हूँ। यहाँ दस आदमी छोड़कर तुम चले जाओ और खन्दक जीत लो। अगले आदेश तक वहीं रहना। वह चाहता था कि यहाँ खन्दक में थोड़े सिपाही रह जायेंगे और मेरे आदमी आक्रमण कर देंगे तथा खन्दक पर विजय प्राप्त कर लेंगे। सूबेदार हजारासिंह वहीं भटकता रहेगा। |
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“उसे सन्देह नहीं रहा था।” लहनासिंह को किस बात का सन्देह नहीं रहा और सन्देह कैसे दूर किया? |
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Answer» लहनासिंह को निश्चय हो गया लपटन साहब भारतीय अफसर नहीं है। उसने सिगड़ी के उजाले में आगन्तुक का मुंह और बाल देख लिये थे, जो कैदियों की तरह कटे थे। उसने लपटन साहब से कई प्रश्न भी किये । हम हिन्दुस्तान कब लौटेंगे, यहाँ शिकार के मजे नहीं हैं। आप खोते पर सवार हो गए थे। आपका खानसामा मन्दिर में जल चढ़ाने गया था। बहुत बड़ी नील गाय देखी। आपके कन्धे में गोली लगी। इन सारे प्रश्नों के उत्तर सुनकर उसका सन्देह दूर हो गया और यह निश्चय हो गया कि यह जर्मन है। सबसे पहले सिगरेट देने पर ही उसे सन्देह हो गया था। |
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उसने कहा था’ कहानी किस कारण इतनी लोकप्रिय हो गई है? |
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Answer» गुलेरी जी’ की यह कहानी बड़ी चर्चित और लोकप्रिय है। इसमें मनोवैज्ञानिकता का पुट है। कहानी अमृतसर के चहल-पहल भरे बाजार से आरम्भ होती है। यह निश्छल प्रेम, त्याग और कर्तव्यनिष्ठा के कठोर धरातल को पार करती हुई मृत्यु शैय्या पर जाकर विश्राम लेती है। इसमे दु:ख-सुख दोनों का समन्वय है। इसलिए कहानी अधिक लोकप्रिय हो गई है। |
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‘उसने कहा था’ कहानी की भाषागत विशेषता है-(क) आँचलिक शब्दों का प्रयोग(ख) तत्सम शब्दों का प्रयोग(ग) तद्भव शब्दों का प्रयोग(घ) उर्दू शब्दों का प्रयोग। |
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Answer» (क) आँचलिक शब्दों का प्रयोग |
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कवि का मन अपने ‘मुग्ध मीत’ के लिए कैसे झंकृत हो रहा है? |
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Answer» कवि का मन अपने मुग्ध मीत के लिए झंझा के समान, बारीश के समान झंकृत हो रहा है। क्योंकि कवि इस स्वार्थी संसार की वणिक वृति, रिश्तों में भी व्यापारी बुद्धि से भयग्रस्त है। इस स्वार्थी संसार में मुग्ध मीत ही निःस्वार्थी है। |
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कवि की दुःखी आत्मा का परिचय दीजिए। |
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Answer» कवि अपनी दुखित और पीड़ित आत्मा के लिए कहता है कि हे मेरे मीत! मुझे चारों ओर से दुःख, दीनता व दरिद्रता ने घेर लिया है। इन सबसे मैं दुःखी हो गया हूँ। अब तुम आओ मेरे मित्र और मुझे इन झंझावातों से छुटकारा दिलाओ। |
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कवि अपने मित्र को किन-किन शब्दों में पुकारता है? |
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Answer» कवि डॉ. सरगु कृष्णमूर्ति जी अपने मित्र को मुग्धमीत, मधुरमीत, जन्मों के जीवन-मृत्यु मीत, हारों की मधुर जीत, साकार-निराकार व सगुण-निर्गुण के मीत, देवताओं के आनंद गीत, आशा और शोभा के मीत आदि शब्दों से पुकारते हैं। |
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कवि अपने मित्र की जुदाई से कैसे व्याकुल हो रहा है? |
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Answer» कवि सरगु जी कहते हैं कि हे मेरे मीत! तुमसे बिछुड़कर इतने दिन हो गए हैं कि लग रहा है- युग बीत गए हैं। फिर भी मैं तुम्हारी प्रतीक्षा कर रहा हूँ, जैसे पेड़-पौधे वर्षा की कामना करते हैं। सम्पूर्ण संसार किसी-न-किसी स्वार्थ में फँसा है, जब कि तुम एक हो जो निस्वार्थी हो। |
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कवि हारों की मधुर जीत किसे मानते हैं? |
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Answer» कवि हारों की मधुर जीत अपने मित्र को मानते हैं। |
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अपने मुग्ध मीत से बिछुड़कर कवि की आत्मा कैसे तड़प रही है? |
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Answer» कवि कहता है कि मेरा जीवन अंधकारमय हो गया है। अतः हे मित्र तुम प्रकाश की किरण बनकर आ जाओ। मैं सूर्य-चंद्र की तरह प्रकाशमान हो सकूँ। तुम्हारे आने से प्रातः हुई और कोमल प्रीति मुस्कुराई। हे मेरे मित्र! जीवन-मृत्यु के साथी। मेरे पाप मिट जाए और आत्मा पवित्र हो जाये। मैं नतमस्तक हो तुम्हारा स्वागत करता हूँ। |
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कवि गुण-परीत किसे कहते हैं? |
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Answer» कवि गुण-परीत मित (मित्र) को कहते हैं। |
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ससंदर्भ भाव स्पष्ट कीजिए:दुःख से जीवन बीता फिर भीशेष अभी कुछ रहता,जीवन की अंतिम घड़ियों मेंभी तुम से यह कहता। |
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Answer» प्रसंग : प्रस्तुत पद्यांश हमारी पाठ्य पुस्तक ‘साहित्य वैभव’ के ‘तुम गा दो, मेरा गान अमर हो जाए’ से लिया गया है जिसके रचयिता डॉ. हरिवंशराय बच्चन’ हैं। |
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तुम गा दो, मेरा गान अमर हो जाए कविता का भावार्थ लिखें। |
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Answer» 1) तुम गा दो, मेरा गान अमर हो जाए। कवि ‘बच्चन’ जी कहते हैं कि – पाठकों! तुम मेरा गीत गा दो, वह अमर हो जायेगा। मैंने अपने ये गीत वर्ण, चरण आदि को सजाकर बनाये हैं। मेरे ये गीत गूंज-गूंजकर मिटनेवाले गीत हैं। कोयल को मीठी तान मानो गगन तक पहुंच गई है। तुम गा दो, मेरा गान अमर हो जाए। शब्दार्थ :
2) जब-जब जग ने कर फैलाये जब भी जग ने हाथ फैलाए मैंने यह कोष लुटाया। अपना सब कुछ देकर मैं रंक बन गया। जगती ने क्या पाया? मेरे पास भेंट हेतु कुछ नहीं, फिर भी तुम पा लो। मेरा दिया हुआ दान भी अमर हो जाए। तुम गा दो, मेरा गीत अमर हो जाए। शब्दार्थ :
3) सुन्दर और असुन्दर जग में सुन्दर और असुन्दर जग में मैंने क्या न सराहा, अनचाहे ममता दी, देखू अब किसकी इच्छा मेरे लिए रुकती है! तुम मेरा मान रख लो। तुम गा दो, मेरा गीत अमर हो जाए। शब्दार्थ :
4) दुःख से जीवन बीता फिर भी दुःख से जीवन बीता, फिर भी जीवन की अंतिम घड़ियों तक तुमसे कहता हूँ – सुख की एक साँस पर अमरत्व न्योछावर है, तुम छू दो मेरा प्राण, अमर हो जाए! तुम गा दो, मेरा गान अमर हो जाए। |
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कवि अपने मित्र को एकमात्र क्या संबोधित करते हैं? |
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Answer» कवि अपने मित्र को एकमात्र निस्वार्थ मीत कहकर संबोधित करते हैं। |
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कवि मित्र को देवलोक का कौन-सा गीत मानते हैं? |
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Answer» कवि मित्र को देवलोक का आनंद गीत मानते हैं। |
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कवि के जीवन में कल्याण राग के आगमन से क्या झन झना उठता है? |
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Answer» कवि के जीवन में कल्याण राग के आगमन से अतीत झन झना उठता है। |
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कवि किससे बिछुड़कर रह गया है? |
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Answer» कवि अपने मुग्ध मित्र से बिछुड़कर रह गया है। |
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‘तुम गा दो, मेरा गान अमर हो जाए’ कविता के कवि कौन हैं? |
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Answer» ‘तुम गा दो, मेरा गान अमर हो जाए’ कविता के कवि डॉ. हरिवंशराय बच्चन’ जी हैं। |
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कवि बच्चन जी क्या गाकर अमर करने की बात कहते हैं? |
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Answer» कवि बच्चन जी गीत (गान) गाकर अमर करने की बात कहते हैं। |
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कवि जन्मों के जीवन-मृत्यु मीत किसे मानते हैं? |
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Answer» कवि जन्मों के जीवन-मृत्यु मीत मुग्ध मीत को मानते हैं। |
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कवि अपने मित्र का स्वागत कैसे करता है? |
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Answer» कवि अपने मित्र का स्वागत झुककर तथा पूरे मन के साथ सिर नवाकर करता है। |
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कवि सीखे हुए ज्ञान को –(क) निरंतर स्मरण कर रहा है।(ख) जीवन में उतार रहा है।(ग) भुलाने की चेष्टा कर रहा है।(घ) औरों को सिखा रहा है। |
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Answer» (ग) भुलाने की चेष्टा कर रहा है। |
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कवि को संसार के प्रति क्या दृष्टिकोण है? |
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Answer» कवि संसार के और अपने जीवन-लक्ष्य को विपरीत मानता है। संसार भोगों के प्रति आसक्त है और कवि की भोगों में । कोई रुचि नहीं है। |
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भव-सागर से तरने के लिए कवि क्या उपाय करता है? |
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Answer» भव-सागर को पार करना अत्यन्त कठिन है। संसार भव-सागर तरने को नाव बनाता है परन्तु कवि सागर में उठने वाली लहरों को ही सागर को पार करने का साधन बना लेता है। कवि का तात्पर्य यह है कि वह संसार की कठिनाइयों के बीच से गुजरकर अपनी सफलता की मंजिल पर पहुँचता है। |
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‘दाना’ शब्द का अर्थ क्या है? स्पष्ट कीजिए। |
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Answer» ‘दाना’ शब्द नादान’ को विपरीत अर्थ वाला शब्द है। ‘दाना’ का अर्थ बुद्धिमान है। |
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कवि ‘संसार-सागर’ को कैसे पार कर रहा है? |
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Answer» कवि संसाररूपी सागर से तरने के लिए पुण्यरूपी नावे को सहारा नहीं बनाता। वह तो मस्ती के साथ, लहरों के सहारे जीवन बिता रहा है। |
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‘भूपों के प्रासाद’ कवि किस पर निछावर कर सकता है? |
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Answer» कवि को अपने व्यथित और उदास जीवन से कोई शिकायत नहीं । वह विलासपूर्ण जीवन (राजभवन) को अपने खंडहर तुल्य जीवन पर निछावर कर सकता है। |
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उन्मादों में अवसाद’ का आशय स्पष्ट कीजिए। |
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Answer» कवि के कहने का आशय है कि वह युवावस्था को मस्ती के साथ बिताना चाहता है, किन्तु प्रिय को न पा सकने की व्यथा उसे उदास बनाए रखती है। |
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कवि के मन में किसकी याद है? इस याद का कवि पर क्या प्रभाव होता है? |
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Answer» कवि के मन में अपने प्रियतम की याद है। उसके प्रिय ने उसके जीवन में आकर उसे संगीतमय बना दिया है। वह उसी के प्रेम की स्मृतियों में निरंतर मग्न रहता है। अपने प्रियतम की यादें कवि को मन ही मन रुलाती हैं। यों दुनिया को दिखाने के लिए वह बाहर से हँसता रहता है परन्तु प्रेम की पीड़ा उसे अन्दर ही अन्दर रुलाती है। |
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कवि के बाहर से हँसने और भीतर से रोने का कारण क्या है? |
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Answer» प्रिय की मधुर यादें उसकी कविता में प्रसन्नता व्यक्त कराया करती हैं किन्तु प्रिय के अभाव की उदासी भीतर-ही-भीतर उसे रुलाया करती है। |
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‘सुख-दुःख दोनों में मग्न’ से कवि का क्या आशय है? |
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Answer» कवि का आशय है कि वह सुख और दुःख दोनों में समान भाव से जीवन बिताता है। |
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सत्य को जानना कवि की दृष्टि में असम्भव क्यों है? |
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Answer» कवि का मानना है कि सत्य की खोज कठिन कार्य है। ज्ञानी और अज्ञानी दोनों ही सत्य की खोज में लगे हैं, परन्तु उस तक नहीं पहुँच पाते। अज्ञानी तो अज्ञानी हैं ही परन्तु ज्ञानियों को भी वैसा सच्चा ज्ञान नहीं है, जो सत्यान्वेषण के लिए आवश्यक होता है। वे ज्ञानी होने के मिथ्या अहंकार से ग्रस्त हैं, अत: सत्य को नहीं जान पाते। |
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‘जला हृदय में अग्नि दहा करता हूँ, में कवि का संकेत किस ओर है? |
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Answer» इस पंक्ति में कवि का संकेत जीवन में आने वाली समस्याओं तथा चिन्ताओं की ओर है। ये चिन्तायें उसे निरन्तर कष्ट देती हैं। |
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साँसों के दो तार’ प्रतीक हैं –(अ) जीवन(ब) जिज्ञासा(स) विवशता(द) उपेक्षा |
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Answer» ‘साँसों के दो तार’ प्रतीक हैं जीवन |
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कवि ने जीवन के लिए किसे आवश्यक माना है? |
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Answer» कवि ने जीवन में प्यार और मस्ती को आवश्यक माना है। जीवन के प्रति तटस्थ भव को भी कवि आवश्यक मानता है। |
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कवि स्नेह-सुधा का पान कैसे करता है? |
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Answer» कवि अपने सभी परिचितों और परिजनों के प्रति स्नेह का भाव रखता है। यही उसके द्वारा ‘स्नेहरूपी सुधा का पान’ किया जाना है। |
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कवि चाहता है कि संसार उसे अपनाए –(क) एक महान कवि के रूप में(ख) मार्गदर्शक के रूप में(ग) एक नए दीवाने के रूप में(घ) एक दार्शनिक के रूप में |
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Answer» (ग) एक नए दीवाने के रूप में |
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‘जग पूछ रहा उनको’-संसार किसको पूछता है? |
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Answer» संसार स्वार्थी है। जो उसके स्वार्थ को पूरा करता है, वही उसे प्रिय लगता है। जो उसके मन के अनुकूल बातें कहता है, जो ठकुरसुहाती कहने में विश्वास रखता है, संसार भी उस व्यक्ति को पसंद करता है। |
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