This section includes 7 InterviewSolutions, each offering curated multiple-choice questions to sharpen your Current Affairs knowledge and support exam preparation. Choose a topic below to get started.
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किसी ऐतिहासिक स्थान की यात्रा पर निबंध लिखिए : |
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Answer» मुझे पिछली गर्मियों की छुट्टियों में दिल्ली की यात्रा करने का सौभाग्य मिला। मेरे लिए यह पहली यात्रा थी। इसलिए इस यात्रा का क्षण – क्षण मेरे लिए रोमांचक था। हम स्कूल के बीस बच्चे अपने दो अध्यापकों के साथ घूमने जा रहे थे। रात सात बजे हमारी बस बेंगलूर से चली। सभी सो गए। नींद खुली तो मैनें स्वयं को दिल्ली में पाया। एक होटल के दालान में एक घंटा बस रुकी। हाथ – मुँह धोकर, चाय – नाश्ता करके सब अपनी – अपनी सीटों पर आ विराजे। बस चलने लगी। ऐतिहासिक दिल्ली को देखने – समझने के लिए कम से कम एक सप्ताह का समय चाहिए। इसके ऐतिहासिक स्मारकों में पुराना किला, लाल किला, जामा मस्जिद, सुनहरी मस्जिद, हुमायु का मकबरा, सिकन्दर लोदी का मकबरा, निजामुद्दीन औलिया की दरगाह, सफदरजंग का मदरसा, सूरजकुण्ड, कुतुबमीनार, अशोक स्तम्भ, फीरोजशाह का कोटला और योग माया मंदिर आदि दर्शनीय हैं। इनमें लालकिला, जामा मस्जिद, पुराना किला, कुतुबमीनार और अशोक स्तम्भ की विशेष बनावट और उस युग की वास्तुकला पर्यटकों को अपनी ओर आकृष्ट कर लेती है। दिल्ली अपने ऐतिहासिक स्थलों के साथ – साथ सांस्कृतिक एवं धार्मिक स्थलों के लिए भी प्रसिद्ध है। यह सभी धर्मों के स्मारकों को समेटे हुए है। बिरला मंदिर, शक्ति मंदिर, भैरों मंदिर, कालका जी का मंदिर, लोटस टेम्पल, फतहपुरी की मस्जिद, ईदगाह, स्वामी मलाई मंदिर, बौद्ध विहार, दीवान हाल और जैन लाल मंदिर आदि ऐसे धार्मिक स्थल हैं जो देश की धार्मिक व सांस्कृतिक कला के प्रतीक हैं। यहाँ पर आधुनिक इतिहास के भी अनेक दर्शनीय स्थल हैं जिनमें तीन मूर्ति भवन, राष्ट्रपति भवन, संसद् भवन, इंदिरा स्मारक, बिरलाभवन, राजघाट, शांतिवन, विजय घाट, शक्ति स्थल, किसान घाट, समता स्थल, इंडिया गेट, केन्द्रीय सचिवालय, इंदिरा गांधी स्टेडियम, जवाहरलाल नेहरू स्टेडियम, कालिन्दी कुंज, चिड़ियाघर और राष्ट्रीय संग्रहालय आदि के नाम उल्लेखनीय हैं। दिल्ली के ऐतिहासिक व दर्शनीय स्थलों को देखकर मनोरंजन के साथ – साथ ज्ञानवर्द भी होता है। मनोरंजन के अन्य स्थलों में राष्ट्रपति उद्यान, बाल भवन, बुद्ध जयंती पार्क, ओखला, डॉल म्यूजियम उल्लेखनीय हैं। वास्तव में बागों की महारानी दिल्ली ऐतिहासिक नगरी ही नहीं, अपितु आधुनिकता की परिचायक भी है। उसके दर्शन करके हम वापसी को चले। |
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शिक्षा और कम्प्यूटर पर निबंध लिखिए : |
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Answer» आधुनिक जीवन में कम्प्यूटर का विशेष महत्व है। जीवन के लगभग सभी क्षेत्रों में कम्प्यूटर का इस्तेमाल होता है। आज के आधुनिक जीवन में मनुष्य जन – जन के संपर्क में कम्प्यूटर की वजह से है। अगर आज कोई व्यक्ति कम्प्यूटर चलाना जानता है तो वह अपने बिजनेस, रोजगार को काफी हद तक फैला सकता है। आज किसी भी कार्यालय में छोटे से क्लर्क के पद के लिए भी कम्प्यूटर की जानकारी होना बहुत जरूरी है। शिक्षा के क्षेत्र में कम्प्यूटर का बड़ा योगदान है। यह शिक्षा का अच्छा स्त्रोत है। आज हर स्कूल व कॉलेज में कम्प्यूटर लैब है। कम्प्यूटर के माध्यम से अध्यापकों को भी छात्रों को पढ़ाने में सहायता मिलती है। हर संस्थान में डिजिटल लाइब्रेरी ने पुस्तकों का स्थान ले लिया है। आज तो छोटी क्लास के बच्चों को भी कम्प्यूटर के बारे में बताया और पढाया जा रहा है। इंटरनेट सूचनाओं का सागर है जिससे छात्रों के ज्ञान में अद्भुत वृद्धि हो रही है। विद्यार्थी पाठयक्रम के अलावा अन्य विशेष जानकारी हासिल करने में भी सक्षम हो रहे हैं। यही नहीं कम्प्यूटर भंडारण और डेटा प्रबंधन के लिए सबसे बढ़िया साधन है। कम्प्यूटर में आप अनेकों पुस्तकों को डिजिटल प्रारूप में अपने साथ रख सकते हैं और कभी भी पढ़ सकते हैं। विद्यार्थी अपने नोट्स तैयार करने में कम्प्यूटर की सहायता ले सकते हैं। शिक्षक भी विद्यार्थी को प्रभावी ढंग से किसी भी विषय को समझाने के लिए पावर पाइंट प्रजेंटेशन बनाकर उन्हें समझा सकते हैं। छात्रों को चार्ट, चित्र और आंकड़े दिखाये जा सकते हैं। इस प्रकार शिक्षा के क्षेत्र में आज कम्प्यूटर का उपयोग अनिवार्य बन गया है। सभी शिक्षण संस्थानों में इसकी शिक्षा धीरे – धीरे अनिवार्य बनती जा रही है। इसके द्वारा विश्व भर का ज्ञान पल भर में पी.सी. की स्क्रीन पर झलकता दिखाई दे जाता है। इसकी शिक्षा के बाद भारी भरकम पुस्तकों को रखने, संभालने और उन्हें उलटनें – पलटने की आवश्यकता समाप्त हो जायेगी। पुस्तकों से भरी बड़ी – बड़ी लाइब्रेरियों की जगह सी.डी. ले रही है जिनमें हजारों पृष्ठ की सामग्री एक छोटी सी डिबिया में सुरक्षित रह सकती है। इंटरनेट ने सारे विश्व को एक पाठशाला में बदल देने की अपनी क्षमता दिखा दी है। |
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जीवन में त्योहारों का महत्त्व पर निबंध लिखिए : |
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Answer» त्योहार सांस्कृतिक चेतना तथा मानव की उन्नत भावनाओं के प्रतीक हैं। ये जन – जीवन में जागृति के प्रेरक और आस्था के द्योतक हैं। त्योहार समष्टिगत जीवन में राष्ट्र की आशा, आकांक्षा, उत्साह एवं उमंगों के प्रदाता हैं। ये राष्ट्रीय एकता एवं अखंडता भी प्रदर्शित करते हैं। यह त्योहारों की ही प्रतापी प्रथा है, जिसने भारतवर्ष को मानव भूमि से देव भूमि बना दिया। प्रत्येक जाति एवं देश के अपने त्योहार होते हैं। ये त्योहार उस जाति एवं देश की जीवंतता के ज्वलंत प्रमाण होते हैं। अतः कोई भी जाति एवं राष्ट्र अपना सांस्कृतिक गौरव और पारंपरिक महत्व बनाए रखने के लिए इन त्योहारों को मनाना अपना पावन कर्तव्य समझता है। किसी भी समाज के तीज – त्योहार उसके लिए आनंद के प्रेरणास्त्रोत हैं। इन तीज – त्योहारों के अपने आदर्श हैं। प्रेम, एकता, त्याग, दान, दया तथा सेवा के आदर्श ही प्रत्येक त्योहार के प्राण होते हैं। इन्हीं आदर्शों से प्रेरित होकर वह समाज उन्नत और समृद्ध होता है। यही कारण है कि हम अपने त्योहारों को बड़े उल्लास से मनाते हैं। भारतीय जन जीवन में त्योहारों का बहुत महत्त्व है। इनके बिना हमारा जीवन नीरस है। त्योहार जीवन में परिवर्तन तथा उल्लास लेकर आते हैं। मानव जीवन पग – पग पर संघर्षशील तथा पीड़ा युक्त है। इस तनाव और पीड़ा को भुलाने के लिए त्योहारों की महत्वपूर्ण भूमिका रहती है। प्रत्येक राष्ट्र में त्योहारों का अत्यंत महत्व है। भारत में सर्वाधिक त्योहार मनाए जाते हैं। भारत त्योहारों का देश है। यहाँ विभिन्न जाति एवं धर्म के लोग निवास करते हैं। प्रत्येक धर्म के लोग नित्य अपना – अपना उत्सव मनाते रहते हैं। इसका कारण यह है कि भारतवर्ष एक विशाल क्षेत्र, दीर्घकालीन परंपरा वाला, अध्यात्म प्रधान, अपनी संस्कृति से युक्त, ऋतु परंपरा तथा आदर्श नायकों के कर्तृत्व वाला देश है। भारत में दो प्रकार के त्योहार मनाए जाते हैं – धार्मिक तथा राष्ट्रीय। प्रथम वर्ग के त्योहार हमारी पौराणिक संस्कृति को प्रकट करते हैं जैसे – होली, दुर्गा पूजा, रक्षाबंधन, कृष्ण जन्माष्टमी, ईद, क्रिसमस, बैसाखी आदि। दूसरे वर्ग में वे त्योहार आते हैं, जो राजनैतिक दृष्टिकोण से समृद्ध हैं तथा हमारी बौद्धिक चेतना को जागृत करते हैं जैसे – गणतंत्रता दिवस, स्वतंत्रता दिवस, शिक्षक दिवस, पर्यावरण दिवस, आदि। कुछ त्योहार प्रांत विशेष में मनाए जाते हैं जैसे – बिहु, पोंगल, ओणम, आदि। ये समस्त त्योहार भारतीय जन – जीवन में उमंग और उत्साह भरते हैं तथा जीवन को सुखमय बनाते हैं। ये त्योहार जीवन की नीरसता समाप्त करके हमारे अंदर देश – संस्कृति के प्रति लगाव और प्रेम उत्पन्न करते हैं। राजनैतिक महापुरुषों के जन्म दिवस हमें उनके आदर्शों का पालन करने की प्रेरणा देते हैं, ताकि हमारा देश उन्नति कर सके। आज भौतिकतावादी युग में त्योहारों का महत्व अधिक से अधिक बढ़ता जा रहा है। |
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खेल जगत में क्रिकेट का स्थान पर निबंध लिखिए : |
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Answer» खेल हमारे जीवन का एक प्रमुख हिस्सा है। इस शरीर को स्वस्थ, लचीला, चुस्त और फुर्तीला बनाए रखने में खेलों की उपयोगिता सर्वाधिक है। खेलों के द्वारा हमारे शरीर के विभिन्न अंगों का व्यायाम स्वतः हो जाता है। इससे हमारी समस्त मांसपेशियां सुदृढ़ हो जाती हैं। हममें रोगों से लड़ने की क्षमता बढ़ती है और हमारी इंद्रियां ठीक – ठीक काम करने लगती हैं। स्वस्थ शरीर में ही स्वस्थ मस्तिष्क का वास होता है। अतः यह स्पष्ट रूप से कहा जा सकता है कि खेल मात्र हमारे शारीरिक स्वास्थ्य को ही नहीं, बल्कि मानसिक स्वास्थ्य को भी विकसित करता है। खेल कई तरह के होते हैं जिन्हें मुख्यतः दो वर्गों में बाँटा गया है – इनडोर खेल और आउटडोर खेल। इन्डोर खेल जैसे ताश, लुडो, केरम, सांपसीड़ी, शतरंज, बिलियर्ड्स आदि ये मनोरंजन के साथ साथ बौद्धिक विकास में सहायक है, वहीं आउटडोर खेल जैसे क्रिकेट, हॉकी, फुटबॉल, टेनिस आदि शरीर को स्वस्थ बनाए रखने में लाभकारी है। हमारे देश भारत में क्रिकेट सर्वाधिक लोकप्रिय खेल है। वैसे यह खेल कम ही देशों में खेला जाता है फिर भी भारतीय उपमहाद्वीप में इसकी लोकप्रियता सर्वाधिक है। पहले भारत में हॉकी ज्यादा लोकप्रिय थी। परन्तु धीरे – धीरे यहाँ क्रिकेट सभी खेलों को पीछे छोड़ते हुए शिखर पर पहुँच गया। क्रिकेट का जादू भारतवासियों के सिर चढ़कर बोलता है। भारत के गाँव हो या शहर, गली मुहल्लों में, खुले मैदानों में, प्रत्येक स्थान पर क्रिकेट का खेल देखा जा सकता है। आज का नौजवान या तो फिल्म का हीरो बनने का सपना देखता है या क्रिकेट का खिलाड़ी। क्रिकेट ने अनेक अवसरों पर भारत को सम्मान दिलाया है। भारत दो बार क्रिकेट का विश्व कप जीत चुका है। भारत के अलावा ऑस्ट्रेलिया, वेस्टइंडीज, इंग्लैंड, न्यूजीलैंड, पाकिस्तान, श्रीलंका, दक्षिण अफ्रीका, बंगलादेश, जिम्बाब्वे, केन्या आदि देशों की टीम खेलती है। स्पष्टतः क्रिकेट विश्व के सभी देशों का प्रिय खेल नहीं है। परन्तु जहाँ भी यह खेला जाता है, वहाँ इसके दीकनों की कमी नहीं है। इस तरह खेल जगत में क्रिकेट का स्थान शीर्ष पर है। क्रिकेट ने इस देश में खेलों के प्रति लोगों के मन में आकर्षण पैदा किया है। |
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निबंध लेखन : विद्यार्थी जीवन |
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Answer» जो बालक विद्या का आर्जन करता है उसे विद्यार्थी कहते हैं। जो विद्यार्थी महान व्यक्तियों से अच्छी बातों को सीखना चाहता है। वही आदर्श विद्यार्थी बन सकता है। आदर्श विद्यार्थी को अपने हृदय में सेवा का भाव रखना चाहिए। उसको अच्छे गुणों को लेना चाहिये। उसको विनम्र और आज्ञाकारी बनना चाहिए। उसको शांतचित्त से अपने गुरु के उपदेशों को सुनना चाहिए। उसको सरलता और सादगी की ओर ध्यान देना चाहिए। उसको स्वच्छ पवित्र जीवन बिताना चाहिए। उसको स्वावलंबी बनना चाहिये। उसको अपने कर्तव्य को निभाना चाहिए। उसको समाज और देश का उपकार करना चाहिए। महापुरुषों की जीवनियों से प्रेरणा लेनी चाहिए । उसको समय का सदुपयोग करना चाहिये। आदर्श विद्यार्थी को सच्चा और सदाचारी बनना चाहिए। |
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निबंध लेखन :हरियाली और सफ़ाई |
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Answer» प्रस्तावना : विषय विश्लेषण – हरियाली : सफाई : सफ़ाई के बारे में सोचते वक्त हमको तन की सफ़ाई के बारे में, घर की सफ़ाई के बारे में तथा आसपास की सफ़ाई के बारे में भी सोचना चाहिए। तन की सफ़ाई तो हमारे हाथों में है। घर की तथा आसपास की सफ़ाई का प्रभाव हमारे ऊपर पड़ता है। इसलिये हमें हमेशा घर की तथा आसपास के प्रदेशों को साफ़ रखना है। सफ़ाई का पालन करने के उपाय ये हैं
हमारे बुजुर्ग यह बताते हैं कि जहाँ सफ़ाई रहती है वहाँ लक्ष्मी का आगमन होता है। उपसंहार : |
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निबंध लेखन :प्रिय नेता |
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Answer» प्रधानमंत्री इन्दिरा गाँधी विश्व की महानतम महिला थीं। इनका जन्म इलाहाबाद आनन्द भवन में 19 नवंबर सन् 1917 में हुआ था। उस समय इनके पिता पं. जवाहरलाल नेहरू महात्मा गाँधी के साथ देश के स्वतंत्रता संग्राम में संलग्न थे। आनंद भवन उन दिनों स्वतंत्रता सेनानियों का गढ़ बना हुआ था। इन्दिरा जब नन्हीं सी थी तो देश के महान नेताओं की गोद में खेलने का अवसर उसे मिला। जब यह नन्हीं बालिका केवल चार वर्ष की थी तभी मेज़ पर खडे होकर अंग्रेजों के खिलाफ़ भाषण दी थी। जिसे भारत के बड़े -बड़े नेता सुन और हँसकर उस पर स्नेह की वर्षा बरसाई । इंदिरा का जन्म जब आनंद भवन में हुआ तो भारत कोकिल सरोजिनी नायुडू ने पं. जवहारलाल को एक बधाई संदेश भेजकर कहा था – “कमला की कोख से भारत की नयी आत्मा उत्पन्न हुई है।” महात्मा गाँधी तथा देश के बड़े – बड़े नेताओं के सम्पर्क में आने से इंदिरा की राजनीति में गहरी पैठ होने लगी थी। स्वतंत्रता के समय इलाहाबाद में बच्चों की एक स्वयं सेवी संस्था बनी थी जिसका नाम वानर सेना रखा गया था। इस सेना के लगभग साठ हज़ार सदस्य थे। इंदिरा जब सात वर्ष की थी तभी वानर सेना की सदस्य बनी और बारह वर्ष की आयु में उसकी नेता चुनी गयी। वानर सेना ने अंग्रेज़ सरकार की नाक में दम कर रखा था। इस सेना का काम जुलूस निकालना, इन्कलाब के नारे लगाना, काँग्रेस के नेताओं के संदेश जनता तक पहुँचाना और पोस्टर चिपकाना होता था। स्वतंत्रता आंदोलन में नेहरू परिवार व्यस्त रहने के कारण इंदिरा की प्रारम्भिक शिक्षा की व्यवस्था घर पर ही होती रही। बाद में उन्हें स्विटजरलैंड तथा भारत में शान्तिनिकेतन में शिक्षा पाने का अवसर मिला। इंदिरा को आक्सफोर्ड युनिवर्सिटी में भी प्रवेश मिला था। किन्तु अस्वस्थता एवं दूसरा महायुद्ध शुरू हो जाने के कारण वहाँ की शिक्षा पूरी न हो सकी। सन् 1942 में इंदिरा गाँधी का विवाह फिरोज़ गाँधी से हुआ। स्वतंत्रता आंदोलन में भाग लेने के कारण इन दोनों को गिरफ्तार कर लिया गया और तेरह मास जेल की सज़ा हुई। सन् 1947 में भारत स्वतंत्र हुआ और काँग्रेस की सरकार बनी। पं. जवाहरलाल नेहरू प्रथम प्रधानमंत्री बने। सन् 1955 में आप काँग्रेस कार्यसमिति की सदस्य बनी और सन् 1959 में काँग्रेस की अध्यक्ष चुनी गयी। 14 जनवरी 1966 को इंदिरा गाँधी ने भारत के प्रधानमंत्री का पद भार सँभाला। उसके बाद उन्होंने राष्ट्र की प्रगति के लिए अनेक महत्वपूर्ण कदम उठाये। जैसे – बैंकों का राष्ट्रीयकरण, रूस से संधि, पाकिस्तान से युद्ध, राजाओं के प्रिवीपर्स की समाप्ति, बीस सूत्री कार्यक्रम आदि। भारत की प्रगति के लिए इंदिरा गाँधी ने रात – दिन कार्य किया। भारत को प्रधानमंत्री इंदिरा गाँधी से भारी आशाएँ थीं। परन्तु 31 अक्तूबर 1984 को प्रातः 9 बजकर 15 मिनट पर इनके ही दो सुरक्षाकर्मचारियों ने इनको गोलियों से छलनी कर दिया। उस दिन विश्वशांति और भारत की प्रगति के लिए सर्वस्व निछावर करनेवाली प्रधानमंत्री इदिरा गाँधी के निधन पर सारा संसार शोकमग्न हो गया। |
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निबंध लेखन : सिनेमा से लाभ और हानि |
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Answer» सिनेमा या चलन-चित्र से हमें कई लाभ हैं। एक गरीब आदमी घूम फिरकर संसार के सभी सुन्दर दृश्य नहीं देखे सकता । लेकिन इनके द्वारा आसानी से थोडा समय और थोडे पैसों से देख सकता है। हम काम करते-करते थक जाते हैं। इसलिए मनोरंजन के बिना अपने काम अधिक समय तक नहीं कर .. सकते हैं। थोडे से मनोरंजन से हम में स्फूर्ति आती है और काम करने का नया उत्साह पैदा होता है। इन चलन चित्रों से हम बहुत विषय सीख सकते हैं। कई चलनचित्रों के द्वारा राष्ट्रीय भाषाओं का प्रचार भी हो रहा है। देश भक्ति संबन्धी कई प्रकार के दृश्य दिखाये जा रहे हैं। इसके ज़रिए समाज सुधार का काम आसानी से हो सकता है। समाज के दुराचार दिखाकर उनको दूर करने का प्रयत्न किया जा सकता है। सिनेमाओं से बहुत हानियाँ भी हैं। पैसा कमाने के उद्देश्य से आजकल के निर्माता उत्तम चित्र नहीं बनाते | ताकि दुष्परिणामों का असर युवकों पर पड़ता है और वे बिगडे जा रहे हैं। सिनेमाओं को अधिक देखने से आँखों के रोग बढ जाते हैं। |
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निबंध लेखन :मोबाइल फ़ोन |
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Answer» आजकल के यान्त्रिक युग में मानव को सुख – सुविधा प्रदान करनेवाले अनेक साधनों में ‘मोबाइल फ़ोन’ प्रमुख है। इसे सेलफ़ोन और हाथ फ़ोन भी बुलाया जाता है। यह बिना तारों के लंबी दूरी का इलेक्ट्रानिक उपकरण है। इसके ज़रिये विश्व के जिस देश में या प्रांत में स्थित लोगों से जब चाहे तब बोलने की सुविधा है। इसे विशेष स्टेशनों के नेटवर्क के आधार पर मोबाइलविशेष आवाज़ या डेटा संचार के लिए उपयोग करते हैं। वर्तमान मोबाइल फ़ोन में एस.एम.एस. इंटरनेट, रोमिंग, ब्लूटूथ, कैमरा, तस्वीरें, वीडियो भेजने और प्राप्त करने की अनेक सुविधाएँ हैं। हमारे भारत देश में सन् 1985 में दिल्ली में मोबाइल सेवाएँ आरंभ हुई हैं। मोबाइल फ़ोन के आविष्कार से देश और विदेशों की दूरी कम हुयी। यह सभी वर्गों के लिए बहुत उपयोगी सिद्ध हुआ है। इससे हमें समय, धन, तथा श्रम की बचत होती है। आपात् स्थिति में यह बहुत काम आनेवाला होता है। इससे मिलनेवाली सुविधाएँ:
असुविधाएँ :
इस तरह हम देखते हैं कि मोबाइल फ़ोन से अनेक सुविधाओं के मिलने पर भी कुछ असुविधाएँ भी हैं। अतः उसका इस्तेमाल सही रूप से करके अपने आवश्यक मुख्य कार्यों को संपन्न करना हमारा मुख्य कर्तव्य है। |
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निबंध लेखन :आदर्श नेता |
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Answer» प्रस्तावना : जीवन परिचय : उपसंहार : |
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स्वावलम्बन पर निबंध लिखिए : |
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Answer» ‘स्वावलंबन’ में दो शब्द हैं – ‘स्व’ और ‘आलंबन’। ‘स्व’ का अर्थ है – अपना और ‘आलंबन’ का अर्थ है – सहारा। इस प्रकार स्वावलंबन का अर्थ है अपना सहारा स्वयं बनना। दूसरे शब्दों में, अपने आत्मबल को जागृत करना ही ‘स्वावलंबन’ कहलाता है। स्वावलंबी व्यक्ति के सामने असंभव कार्य भी संभव दिखने लगता है। स्वावलंबन के दो पहलू हैं – पहला, आत्म निश्चय और दूसरा, आत्म निर्भरता। इसके ठीक विपरीत छोटे – छोटे कार्यों के लिए दूसरों पर आश्रित रहना ‘परावलंबन’ कहलाता है। परावलंबी व्यक्ति हाथ रहते हुए भी लूला और पैर रहते हुए भी लंगड़ा रहता है। जिसमें अपने पैरों पर खड़े होने की सामर्थ्य नहीं है, वह दूसरों का कंधा पकड़कर कब तक चलता रहेगा? एक झटका लगते ही धराशायी हो जाएगा। ईश्वर उसी की सहायता करता है, जो अपनी सहायता स्वयं करते हैं। विश्व का इतिहास ऐसे महापुरुषों के उदाहरणों से भरा पड़ा है, जिन्होंने स्वावलंबन का सहारा लिया है। महाकवि तुलसीदास बचपन से ही अनाथ थे। वे दाने – दाने के लिए मुहताज रहते थे, फिर भी अपनी आत्मनिर्भरता के सहारे वे स्वतंत्र लेखन करके भारत के लोककवि कहलाए। ईश्वरचंद विद्यासागर एक निर्धन परिवार की संतान थे। वे सड़क की रोशनी में पढ़ते थे। उन्होंने जो यश अर्जित किया, उसका आधार स्वावलंबन ही था। अब्राहम लिंकन जूते की सिलाई करते थे, लेकिन अपनी आत्मनिर्भरता और अपने आत्मनिश्चय को जगाकर एक दिन वे अमेरिका जैसे शक्तिशाली राष्ट्र के राष्ट्रपति पद पर जा बैठे। इसी तरह छत्रपति शिवाजी, न्यूटन, अकबर, नेपोलियन, शेरशाह तथा महात्मा गांधी इत्यादि अनगिनत नाम हैं। इस प्रकार स्वावलंबन ही जीवन है और परावलंबन मृत्यु। स्वावलंबन पुण्य है और परावलंबन पाप। अतः हर माता – पिता को चाहिए कि वह बचपन से ही अपने बच्चों में स्वावलंबन की भावना भरें। छात्रों को अपने छोटे – छोटे कार्य – कमरे की सफाई, वस्त्रों की धुलाई, भोजन बनाना आदि स्वयं करने की आदत डालनी चाहिए। ऐसे विद्यार्थी स्वावलंबी बनकर देश के योग्य नागरिक बनते हैं और उनके सहयोग से स्वावलंबी राष्ट्र का निर्माण होता है। |
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निबंध लेखन :वृक्षारोपण |
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Answer» हमारी संस्कृति वन – प्रधान है। ऋवेद, जो हमारी सनातन शक्ति का मूल है, वन – देवियों की अर्चना करता है। मनुस्मृति में वृक्ष विच्छेदक को बड़ा पापी माना गया है। – “जो आदमी वृक्षों को नष्ट करता है, उसे दण्ड दिया जायें।” तालाबों, सड़कों या सीमा के पास के वृक्षों का काटना, गुरुतर अपराध था। उसके लिए दण्ड भी बड़ा कड़ा रहता था। उसमें कहा गया है कि जो वृक्षारोपण करता है, वह तीस हज़ार पितरों का उद्धार करता है। अग्निपुराण भी वृक्ष – पूजा पर ज़ोर देता है। वृक्षों का रोपण स्नेहपूर्वक और उनका पालन – पुत्रवत करना चाहिए। पुत्र और तरु में भी भेद है, क्योंकि पुत्र को हम स्वार्थ के कारण जन्म देते हैं। परन्तु तरु – पुत्र को तो हम परमार्थ के लिए ही बनाते हैं। ऋषि – मुनियों की तरह हमें वृनों की पूजा करनी चाहिए, क्योंकि वृक्ष तो द्वेषवर्जित हैं। जो छेदन करते हैं, उन्हें भी वृक्ष छाया, पुष्प और फल देते हैं। इसीलिए जो विद्वान पुरुष हैं, उनको वृक्षों का रोपण करना चाहिए और उन्हें जल से सींचना चाहिए। हम स्वर्ग की बातें क्या करें। हम वृक्षारोपण करके यहाँ ही स्वर्ग क्यों न बनायें। इतिहास में महान सम्राट अशोक ने कहा है – “रास्ते पर मैने वट – वृक्ष रोप दिये हैं, जिनसे मानवों और पशुओं को छाया मिल सकती है। आम्र वृक्षों के समूह भी लगा दिये।” आज प्रभुत्व सम्पन्न भारत ने इस महाराजर्षि के राज्य – चिह्न ले लिये हैं। 23 सौ वर्ष पूर्व उन्होंने देश में जैसी एकता स्थापित की थी, वैसी ही हमने भी प्राप्त कर ली है। क्या हम उनके इस सन्देश को नहीं सुनेंगे? हम सन्देश को सुनकर निश्चय ही ऐसा प्रबन्ध करेंगे, जिससे भारत के भावी प्रजा जन कह सकें कि हमने भी हर रास्ते पर वृक्ष लगाये थे, जो मानवों और पशुओं को छाया देते हैं। हमारी संस्कृति में जो सुन्दरतम और सर्वश्रेष्ठ है, उसका उद्भव सरस्वती के तट के वनों में हुआ। नैमिषारण्य के वन में शौनक मुनि ने हमको महाभारत की कथा सुनायी – “महाभारत जो भारतीय आत्मशक्ति का स्रोत है। हमारे अनेक तपोवना में ही ऋषि – मुनि वास करते थे, आजीवन अपने संस्कार, आत्म – संयम और भावनाओं को सुदृढ बनाते थे। हमारे जीवन का उत्साह वृन्दावन के साथ लिपटा हुआ है। वृन्दावन को हम कैसे भुला सकते हैं? वहीं कृष्ण भगवान ने यमुना – तट पर नर्तन करते हुए डालियों और पुष्पों के ताल के साथ अपनी वेणु बजायी। उनकी ध्वनि आज भी हमारे कानों में सुनायी देती है। हमें पूर्वजों की ज्वलन्त संस्कृति मिली है, लेकिन हम उसके योग्य नहीं रहे। हम अपने वनों को काट डालते हैं। हम वृक्षों का आरोपण करना भूल गये। वृक्ष – पूजा का हमारे जीवन में स्थान नहीं रहा। हमारी स्त्रियों में से शकुन्तला की आत्मा चली गयी है। शकुन्तला वृक्षों को पानी दिये बिना आप पानी ग्रहण नहीं करती थी। आभूषण प्रिय होते हुए भी वह यह सोचकर पल्लवों को नहीं तोड़ती थीं कि इससे वृक्षों को दुःख होगा। पार्वती ने देवदारु को पुत्र के समान समझकर, माँ के दूध के समान पानी पिलाकर बडा किया। मंजरित वृक्षों का सौंदर्य हम नहीं भूल सकते। हम नहीं भूल सकते भव्य वृक्षों का अद्भुत गौरव, वृद्ध ऋषियों के समान जगत – कल्याण में ही जीवन – साफल्य समझने वाले बनों को। यदि प्रत्येक पुरुष और स्त्री वृक्षों के महत्व को समझे और पुत्रवत उनका परिपालन करे तो भारत का हर नगर हर गाँव जीवनोल्लास से ओत – प्रोत हो जाएगा। |
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व्यायाम का महत्त्व पर निबंध लिखिए : |
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Answer» मानसिक सुख को प्राप्त करने का मुख्य साधन शारीरिक स्वास्थ्य है। मानव जीवन में स्वास्थ्य ही सर्वस्व हैं। शरीर को स्वस्थ रखने के लिए लोग अनेक उपाय करते हैं पर उनमें सबसे अधिक सरल और सुगम उपाय व्यायाम है। जीवन व्यायाम के बिना कभी स्फूर्तिमय नहीं रहता। इसलिए व्यायाम मानव जीवन के लिए अत्यधिक आवश्यक है। शारीरिक अंगों द्वारा समुचित ढंग से परिश्रम करने को व्यायाम कहते हैं। व्यायाम के विभिन्न भेद हैं। भिन्न – भिन्न प्रकार के आसन, दण्ड – बैठक, खुले मैदान में दौड़ना, घूमना, प्राणायाम करना, कुश्ती लड़ना, तैरना, हॉकी, फुटबाल, वालीबाल, क्रिकेट, टेनिस, कबड्डी, बेडमिन्टन खेलना आदि सभी को व्यायाम के अन्तर्गत रख सकते हैं। इन व्यायामों में शरीर के विभिन्न अंगों से समुचित काम लिया जाता है जिससे मांस – पेशियों में बल आता है और उनका विकास समुचित तरीके से होता है। हड्डियों में मजबूती आती है तथा परिश्रम करने से पसीना अधिक निकलता है जिससे रक्त का संचार ठीक ढंग से होता है और वह साफ हो जाता है। मानव – जीवन में व्यायाम का विशेष स्थान है। जिस प्रकार रेल के इंजन को चलाने के लिए कोयले और पानी की आवश्यकता होती है, उसी प्रकार शरीर को क्रियाशील बनाये रखने के लिए व्यायाम रूपी कोयले की आवश्यकता होती है। व्यायाम से सारा शरीर सुडौल, सुगठित एवं दृढ़ बन जाता है। रक्त संचार ठीक तरह तथा तीव्र गति से होता है। हृदय की गति में वेग पैदा हो जाता है तथा पाचक शक्ति भी अपना कार्य ठीक तरह से करती है। सभी इन्द्रियाँ ठीक तरह से अपना कार्य करती रहती हैं। हृदय में उत्साह, आत्म – विश्वास तथा निडरता रहती है। मन भी कभी अप्रसन्न नहीं होता। रोग तो व्यायामशील व्यक्ति के पास फटक ही नहीं सकते।। व्यायाम का सबसे अधिक प्रभाव व्यक्ति के मस्तिष्क पर पड़ता है। व्यायाम द्वारा मस्तिष्क का विकास होता है। अंग्रेजी में कहावत है – ‘Healthy mind in a healthy body’ अर्थात् स्वस्थ शरीर में स्वस्थ मस्तिष्क होता है। व्यायाम द्वारा शरीर में एक अनुपम स्फूर्ति का श्रोत बहने लगता है। आज के वैज्ञानिक युग में व्यायाम अत्यंत आवश्यक है। व्यायाम के लिए खुली हवा और खुली जगह आवश्यक होती है ताकि श्वास लेने के लिए स्वच्छ वायु मिल सके। शरीर के लिए व्यायाम अत्यंत आवश्यक है। जीवन में अधिक समय तक सुखी और निरोग रहने का एक मात्र साधन व्यायाम ही है। |
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निबंध लेखन :26 जनवरी |
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Answer» 26 जनवरी को गणतंत्र दिवस कहते हैं। 1950 में इसी दिन पहले-पहल स्वतंत्र भारत का नया संविधान बनाया गया था । उसकी यादगार में इस दिन सारे देश में आनंद और उत्साह से मनाते हैं क्योंकि 26 जनवरी को ही देश को पूर्ण स्वाधीन की शपथ ली गयी थी । इसके पहले ” स्वाधीनता दिवस’ नाम से मनाया जा रहा था । यह गणतंत्र दिवस सारे भारत में बड़ी धूम-धाम से मनाया जाता है। लेकिन हमारी राजधानी दिल्ली में इसकी शोभा निराली होती है। इस दिन सभी को छुट्टी मिलती है। बाज़ार बन्द रहते हैं। दिल्ली में जल, स्थल और वायुसेना के टुकडियाँ राष्ट्रपति को वंदना करती है। इस समारोह को देखने के लिए दूरदूर से लोग दिल्ली पहुंचते हैं। इस दिन राष्ट्रपति सजधजकर अभिवादन स्वीकार करते हैं। प्रधान मंत्री राष्ट्रपति का स्वागत करते हैं। |
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निबंध लेखन : 26 जनवरी |
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Answer» जनवरी को गणतंत्र दिवस कहते हैं। 1950 में इसी दिन पहले-पहल स्वतंत्र भारत का नया संविधान बनाया गया था | उसकी यादगार में इस दिन सारे देश में आनंद और उत्साह से मनाते हैं क्योंकि 26 जनवरी को ही देश को पूर्ण स्वाधीन की शपथ ली गयी थी । इसके पहले “स्वाधीनता दिवस” नाम से मनाया जा रहा था। यह गणतंत्र दिवस सारे भारत में बड़ी धूम-धाम से मनाया जाता है। लेकिन हमारी राजधानी दिल्ली में इसकी शोभा निराली होती है। इस दिन सभी को छुट्टी मिलती है। बाज़ार बन्द रहते हैं। दिल्ली में जल, स्थल और वायुसेना के टुकड़ियाँ राष्ट्रपति को वंदना करती है। इस समारोह को देखने के लिए दूर-दूर से लोग दिल्ली पहुंचते हैं। इस दिन राष्ट्रपति सजधजकर अभिवादन स्वीकार करते हैं। प्रधान मंत्री राष्ट्रपति का स्वागत करते हैं। |
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देशाटन पर निबंध लिखिए : |
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Answer» देशाटन का अर्थ है देश में भ्रमण करना, घूमना। घर बसाना मानव के लिए जरूरी है। लेकिन घर की चार दीवारों में बंद रहना अहितकर है। मानव ज्ञान – पिपासु होता है। पुस्तकें, समाचार पत्र, रेडियों, दूरदर्शन, कम्प्यूटर आदि मानव के ज्ञान को विस्तृत करते हैं, मगर देशाटन एक ऐसा साधन है जो मानव के ज्ञान की परिधि को बहुत विस्तृत करता है। अतः देशाटन ज्ञानार्जन का प्रमुख साधन कहा जाता है। प्रत्येक मनुष्य में दूसरे व्यक्तियों तथा स्थानों के प्रति सहज उत्सुकता होती है। इस उत्सुकता की पूर्ति के लिए मनुष्य विभिन्न देशों की यात्रा करता है। कुछ लोग व्यापारिक कार्यों के सिलसिले में दूसरे देशों में जाते हैं और अपना कार्य करने चले जाते हैं। कुछ लोग धर्म – प्रचार के लिए जाते हैं और अपना कार्य करते हैं। कुछ लोग राजनीतिक दृष्टिकोण से यात्रा करते हैं। इस प्रकार अनेक कारण हैं। उनमें देशाटन भी एक है। आज के वैज्ञानिक और अर्थवादी युग में देशाटन का अपना एक विशेष महत्व है। पुस्तकीय ज्ञान अधूरा और अप्रत्यक्ष होता है। जब कि देशाटन के द्वारा हमारे ज्ञान का समग्र रूप होता है। इतिहास, भूगोल, विज्ञान आदि विषय बहुत ही गहन होते हैं। अगर हम उन प्रदेशों की यात्रा करते हैं तो हमारे कई संदेहों का निवारण होता है। किसी भी प्रांत या देश की जानकारी पुस्तकों में पढ़ने के बजाय वहाँ की यात्रा करके अनुभव के द्वारा अच्छी तरह जाना जा सकता है। एक ही जगह में रहनेवाला मनुष्य कूपमंडूक की तरह होता है। वह संकुचितता के दायरे में बंधा रहता है। जब कि भिन्न – भिन्न प्रांतों की यात्रा करनेवाला मनुष्य उदार और सहृदयी होता है। हम अपने ही प्रांत में रहते हैं तो दूसरे प्रांत की संस्कृति से बिलकुल अपरिचित रह जाते हैं। देशाटन लोगों को एकता के सूत्र में बाँध देता है। देशाटन जीवन की संकीर्ण भावना को दूर कर लोगों के मन में उल्लास और उत्साह का संचार करता है। लोगों को उत्साहित करके कार्योन्मुख करता है। शिक्षा प्रणाली में देशाटन को एक अविभाज्य अंग होना चाहिए। देशाटन को निरूदेश्य न मानकर विज्ञान – यात्रा मानना चाहिए। देश की सर्वतोमुखी उन्नति के लिए देशाटन बहुत ही जरूरी है। इसलिए हर देश विभिन्न प्रकार की प्रतिनिधि – मंडलियों के द्वारा देशाटन की योजनाएँ बनाता हैं। देशाटन व्यक्तिगत जीवन में ही नहीं, राष्ट्रीय जीवन में भी विज्ञान की वृद्धि में, स्नेह संपर्क की प्रगति में और बहुआयामी उन्नति में सहायक सिद्ध होता है। व्यवसायी वर्ग को देशाटन से आर्थिक लाभ होता है। कृषिकों के लिए भी देशाटन से अनेक लाभ होते हैं। वे भी देशाटन के ज्ञान से अपनी कृषि में सुधार करके अपनी स्थिति सुधारने का प्रयत्न कर सकते हैं। भारतीय पद्धति में देशाटन अर्थ, धर्म, काम और मोक्ष सभी फलों का टौता है। परमेश्वर की सौंदर्य सृष्टि में अनेक विचित्रतायें हैं और इनका ज्ञान देशाटन द्वारा प्राप्त हो सकता है। इसलिए देशाटन जीवन का धर्म है। इसके बिना जीवन की सर्वांगीण उन्नति संभव नहीं है। |
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समय का सदुपयोग पर निबंध लिखिए : |
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Answer» मनुष्य जीवन में समय का बड़ा महत्व है। जो समय का सदुपयोग करता है, वह जीवन में सफल होता है और जो समय का दुरुपयोग करता है, वह असफल होता है। समय अबाध गति से बढ़ता जाता है। जिसने समय के महत्व को जान लिया, उसने जीवन के रहस्य को जान लिया। समय का सदुपयोग करने से साधारण व्यक्ति भी महान बन जाता है। समय बड़ा मूल्यवान है। अतः इसका हम जितना उपयोग करेंगे, उतना ही हमें लाभ होगा। जीवन का प्रत्येक क्षण हमारे भाग्य – निर्माता के रूप में हमारे समक्ष आता है। बुद्धिमान व्यक्ति अपने जीवन के प्रत्येक क्षण का सदुपयोग करते हैं। समय का सदुपयोग करनेवाले पठन – पाठन, खेल, व्यायाम, सामाजिक उत्सव, मनोरंजन, चिन्तन – मनन सबके लिए समय निकाल पाते हैं। वे अपने जीवन के प्रत्येक क्षण का आनंद लेते हैं। जिस देश का प्रत्येक नागरिक समय का सदुपयोग करता है, वही राष्ट्र तरक्की कर सकता है। जापान इसका जीता – जागता उदाहरण है। समय का दुरुपयोग करनेवाले सदा जीवन में विफल होते हैं। वे अपने भाग्य को कोसते रहते हैं। बीते समय की याद में अपना भविष्य अंधकारमय बना लेते हैं। समय बीत जाने पर पछताने से कोई लाभ नहीं है। समय को बरबाद करनेवाले अपने, समाज का और राष्ट्र का अहित ही करते हैं। समय का दुरुपयोग मनुष्य को कायर तथा अकर्मण्य बना देता है। विद्यार्थी जीवन में समय के सदुपयोग की अति आवश्यकता है। समय का पालन करनेवाले छात्र सदा प्रसन्न चित्त रहते हैं। मनुष्य का जीवन क्षणभंगुर है। अतः समय रहते उसे कुछ – न – कुछ करते रहना चाहिए। समय का इस प्रकार उपयोग करना चाहिए कि बीते समय पर हमें पछताना न पड़े, बल्कि बीता समय हमारे लिए सुनहरा अवसर लाए। |
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निबंध लेखन : सिनेमा से लाभ और हानि |
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Answer» सिनेमा या चलन-चित्र से हमें कई लाभ हैं। एक गरीब आदमी घूम फिरकर संसार के सभी सुन्दर दृश्य नहीं देख सकता । लेकिन इनके द्वारा आसानी से थोडा समय और थोडे पैसों से देख सकता है। हम काम करते-करते थक जाते हैं। इसलिए मनोरंजन के बिना अपने काम अधिक समय तक नहीं कर सकते हैं। थोडे से मनोरंजन से हम में स्फूर्ति आती है और काम करने का नया उत्साह पैदा होता है। इन चलन चित्रों से हम बहुत विषय सीख सकते हैं। कई चलनचित्रों के द्वारा राष्ट्रीय भाषाओं का प्रचार भी हो रहा है। देश भक्ति संबन्धी कई प्रकार के दृश्य दिखाये जा रहे हैं। इसके ज़रिए समाज सुधार का काम आसानी से हो सकता है। समाज के दुराचार दिखाकर उनको दूर करने का प्रयत्न किया जा सकता है। सिनेमाओं से बहुत हानियाँ भी हैं। पैसा कमाने के उद्देश्य से आजकल के निर्माता उत्तम चित्र नहीं बनाते । ताकि दुष्परिणामों का असर युवकों पर पड़ता है और वे बिगडे जा रहे हैं। सिनेमाओं को अधिक देखने से आँखों के रोग बढ जाते हैं। |
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निबंध लेखन :विज्ञान से लाभ और हानियाँ |
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Answer» आज का युग विज्ञान का युग है। विज्ञान ने प्रकृति पर जीत लिया है। विज्ञान ने मानव जीवन पर क्रांतिकारी परिवर्तन लाया है। विज्ञान के कारण कई आविष्कार हो रहे हैं। इस से मानव का कल्याण और विनाश देनों संभव है। यह हमारे हाथ में है। इसे सद्विनियोग करें तो विश्व कल्याण होगा। नहीं तो विश्व नाश। विज्ञान के लाभ :
विज्ञान से नष्टः
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निबंध लेखन :व्यायाम से लाभ |
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Answer» व्यायाम से बहुत लाभ हैं। व्यायाम शक्ति देने वाला है और सफलता का साधन भी है। इसीलिए व्यायाम स्वास्थ्य और सफलता की कुंजी कहलाता है। नियम के अनुसार व्यायाम करेंगे तो हमेशा नीरोग रहते हैं। तंदुरुस्ती बनी रहती है। व्यायाम करने की बहुत रीतियाँ हैं। कुस्ती लडना, कसरत करना, खेलना-कूदना, दन्ड-बैठक आदि व्यायाम के भेद माने जाते हैं। टहलना और घूमना भी एक प्रकार का व्यायाम है। व्यायाम करने से श्वासक्रिया खूब होती है। उससे शरीर का रक्त शुद्ध होता है। शुद्ध रक्त से स्वास्थ्य बना रहता है और जल्दी कोई बीमारी नहीं होती | व्यायाम करने से पाचन शक्ति बढती है और शरीर में स्फूर्ति आती है। |
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निबंध लेखन : 26 जनवरी |
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Answer» जनवरी को गणतंत्र दिवस कहते हैं। 1950 में इसी दिन पहले-पहल स्वतंत्र भारत का नया संविधान बनाया गया था । उसकी यादगार में इस दिन सारे देश में आनंद और उत्साह से मनाते हैं क्योंकि 26 जनवरी को ही देश को पूर्ण स्वाधीन की शपथ ली गयी थी। इसके पहले “स्वाधीनता दिवस” नाम से मनाया जा रहा था । यह गणतंत्र दिवस सारे भारत में बड़ी धूम-धाम से मनाया जाता है। लेकिन हमारी राजधानी दिल्ली में इसकी शोभा निराली होती है। इस दिन सभी को छुट्टी मिलती है। बाज़ार बन्द रहते हैं। दिल्ली में जल, स्थल और वायुसेना के टुकड़ियाँ राष्ट्रपति को वंदना करती है। इस समारोह को देखने के लिए दूर-दूर से लोग दिल्ली पहुँचते हैं। इस दिन राष्ट्रपति सजधजकर अभिवादन स्वीकार करते हैं। प्रधान मंत्री राष्ट्रपति का स्वागत करते हैं। |
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निबंध लेखन :आधुनिक विज्ञान की प्रगति |
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Answer» प्रस्तावना : विज्ञान से ये लाभ हैं –
विज्ञान से कई नष्ट भी हैं –
उपसंहार : |
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निबंध लेखन :अगर मैं पंछी होता, तो ….. |
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Answer» प्रस्तावना : विषय विश्लेषण : महत्व : उपसंहार : |
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स्वतन्त्रता दिवस पर निबंध लिखिए : |
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Answer» स्वतंत्रता दिवस हमास महान् राष्ट्रीय पर्व है। यह पर्व प्रति वर्ष पन्द्रह अगस्त को समस्त भारत में अति उत्साह और हर्ष के वातावरण में मनाया जाता है। यही वह पवित्र दिवस है, जब शताब्दियों की पराधीनता के बाद भारत स्वाधीन हुआ था। सन् 1947 की पन्द्रह अगस्त को ही हमें स्वतंत्रता प्राप्त हुई थी। राष्ट्रीय स्तर पर इस पर्व का मुख्य आयोजन दिल्ली के लाल किले में होता है। इस समारोह को देखने के लिए भारी जनसमूह उमड़ पड़ता है। लाल किला मैदान व सड़कें जनता से खचाखच भरी होती हैं। यहाँ प्रधानमंत्री के आगमन के साथ ही समारोह का शुभारम्भ हो जाता है। सेना के तीनों अंगों जल, थल और नौसेना की टुकड़ियाँ तथा एन.सी.सी. के केडेट सलामी देकर प्रधानमंत्री का स्वागत करते हैं। प्रधानमंत्री लाल किले की प्राचीर पर बने मंच पर पहुँच कर जनता का अभिनन्दन स्वीकार करते हैं और राष्ट्रीय ध्वज लहराते हैं। ध्वजारोहण के समय राष्ट्र ध्वज को सेना द्वारा इकत्तीस तोपों की सलामी दी जाती है। इसके बाद प्रधानमंत्री राष्ट्र की जनता को बधाई देने के बाद देश की भावी योजनाओं पर प्रकाश डालते हैं। साथ ही पिछले वर्ष पन्द्रह अगस्त से इस वर्ष तक की काल में घटित प्रमुख घटनाओं पर चर्चा करते हैं। भाषण के अंत में तीन ब हिन्द’ का घोष करते हैं जिसे वहाँ उपस्थित जनसमूह बुलन्द आवाज में दोहराता है। यह राष्ट्रीय पर्व प्रतिवर्ष प्रत्येक नगर में बड़े धूम – धाम से मनाया जाता है। विद्यालयों में छात्र अपने इस ऐतिहासिक उत्सव को बड़े उल्लास और उत्साह के साथ आयोजित करते हैं वास्तव में यह भारत के गौरव और सौभाग्य का पर्व है, जो हमारे हृदयों में नवीन आशा. नवीन स्फूर्ति, उत्साह और देश भक्ति का संचार करता है। यह उत्सव हमें स्मरण कराता है कि स्वाधीनता को पाना जितना कठिन है, उसे सुरक्षित रखना उससे भी अधिक कठिन है। अतः सभी भारतवासियों को सभी प्रकार के भेद – भाव भुलाकर राष्ट्र की उन्नति के लिए तत्पर रहना चाहिए। |
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जनसंख्या विस्फोट पर निबंध लिखिए : |
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Answer» भारत को स्वतंत्र हुए पैंसट साल से ज्यादा हुए हैं। इन वर्षों में देश ने अनेक क्षेत्रों में प्रगति की है। कृषि, विज्ञान, उद्योग – धंधे आदि में हमारा देश बहुत तेजी से प्रगति कर रहा है, किंतु फिर भी उसका लाभ दिखाई नहीं पड़ रहा है। आम आदमी आज भी गरीब है। देश में आज भी लोग भूख से मर रहे हैं। बहुतों के पास तन ढकने के लिए पर्याप्त वस्त्र नहीं हैं। वे झुग्गी – झोंपड़ियों में रहते हैं। सहज ही प्रश्न उठता है कि इसका कारण क्या है? और इस प्रश्न का सीधा – सरल उत्तर है – भारत की बढ़ती हुई जनसंख्या। आज हमारी हर बड़ी समस्या के मूल में जनसंख्या की समस्या है। यातायात और परिवहन के साधनों में अपार वृद्धि हुई है। रेलों – बसों की संख्या अधिक है फिर भी भीड़ – भाड़ दिखाई पड़ती है। आप शांति और सुविधा से यात्रा नहीं कर सकते। अस्पतालों में, प्लेटफ़ार्मो पर, विद्यालयों में, बाजारों में, कार्यालयों में, किसी भी सार्वजनिक स्थान पर दृष्टि डालिए आपको लोगों के सिर ही सिर दिखाई पड़ेंगे। इस भीड़ – भाड़ का परिणाम यह है कि हमारी सारी आधारभूत सुविधाएँ, हमारे सारे संसाधन कम पड़ते जा रहे हैं। अस्पताल जितने खोले जाते हैं, मरीजों की संख्या उससे कई गुना बढ़ जाती है। हर वर्ष हजारों नए विद्यालय खुलते हैं, पर अनेक छात्रों को मनचाहे विद्यालय में प्रवेश नहीं मिलता। कक्षाओं में छात्रों की संख्या इतनी हो जाती है कि बैठने के लिए पर्याप्त स्थान नहीं होता। यह दशा तब है जब आज भी लाखों बच्चे विद्यालय में प्रवेश नहीं लेते हैं। बेरोजगारी की समस्या जनसंख्या वृद्धि की समस्या की ही उपज है। अनेक प्रकार के उद्योग – धंधे खुले हैं। कृषि क्षेत्र में आशा से बढ़कर प्रगति हुई है। नए रोजगार के लाखों अवसर बने, फिर भी बेरोजगारों की संख्या में कमी नहीं हुई, बल्कि बेरोजगारी की समस्या और अधिक भयंकर होती जा रही है। बेरोजगारी से अनेक सामाजिक बुराइयाँ जन्म लेती हैं। अपराध बढ़ते हैं, असामाजिक तत्व पनपते हैं। सुख – चैन और शांति भरा जीवन सपना हो जाता है। हमारा देश जनसंख्या की दृष्टि से संसार का दूसरा सबसे बड़ा देश है। सारे विश्व की जनसंख्या का लगभग छठा भाग भारत में बसा है जबकि भारत का क्षेत्रफल विश्व के क्षेत्रफल का लगभग 2.4 प्रतिशत ही है। आज हमारी जनसंख्या एक अरब बीस लाख से अधिक हो चुकी है। यदि इस पर शीघ्र ही अंकुश नहीं लगाया गया तो भीषण संकटों का सामना करना पड़ेगा। जनसंख्या की वृद्धि रोकने के लिए कुछ ठोस उपाय करने होंगे। सबको इस समस्या के प्रति सजग करना होगा। देशवासियों को बताना होगा कि जनसंख्या वृद्धि को रोकना क्यों आवश्यक है। जनसंख्या रोकना हमारा परम कर्तव्य है और इस कर्तव्य का पालन सच्ची देशभक्ति है। |
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समाज सेवा पर निबंध लिखिए : |
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Answer» मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है। वह समाज से अलग नहीं रहना चाहता। मनुष्य की प्रत्येक इकाइयाँ मिलकर ही समाज का निर्माण करती हैं। समाज में मनुष्य एक – दूसरे पर आश्रित है। इसीलिए समाज – सेवा की भावना मानव के हृदय में उच्चतम भावना है। सेवा की यह भावना मनुष्य मात्र की उन्नति के लिए आवश्यक है। नवयुवक समाज के सुदृढ़ अंग हैं। अतः समाज – सेवा द्वारा समाज को उन्नत बनाने का सबसे बड़ा दायित्व हमारे नवयुवक पर है। खेद है कि आज पाश्चात्य सभ्यता की चकाचौंध में फँसकर हमारे देश के नवयुवक, नवयुवतियाँ आमोद – प्रमोद में लीन रहकर समाज – सेवा से विमुख हो रहे हैं। हमारे कॉलेज के विद्यार्थियों को आज की शिक्षा ने इससे बहुत दूर फेंक दिया है। वे परिश्रम से भागते हैं। शरीर की सजावट के सामने उनके पास अपने जर्जर समाज तथा दीन – दुखी भाइयों को देखने का अवकाश नहीं है। शिक्षित नवयुवक आज खेतों में काम करना अपमान समझते हैं। यही कारण है कि हमारे पास ईश्वर प्रदत्त उपजाऊ भूमि और जलपूर्ण नदियाँ तथा मनुष्यकृत अनेक साधन होने पर भी हम दाने – दाने के लिए दूसरों के मुहताज हैं। हमारा देश गाँवों में बसता है। गाँवों में शिक्षा और स्वच्छता का अभाव है। अशिक्षित और गन्दे होने के कारण गाँवों का घोर पतन हो गया है। समाज – सेवी भाइयों को चाहिए कि वे गाँवों को अपना मुख्य कार्यक्षेत्र बनाएँ और मजदूरों, किसानों तथा अन्य ग्रामवासियों को शिक्षित बनाकर उन्हें स्वच्छता का पाठ पढ़ायें। इस प्रकार हमारा ग्रामीण समाज शीघ्र ही उन्नत होकर सुखी बन जायेगा। आज देश में अनेक प्रकार के रोग फैले हुए हैं। दीन जनता के पास रोगों से बचने के लिए न कोई उपाय है और न उनकी चिकित्सा के लिए पैसे। लाखों असहाय दरिद्र लोग रोगवश अकाल में ही काल – क्वलित हो जाते हैं। हमारे वैद्य और डाक्टरों का कर्तव्य है कि वे निःस्वार्थ और त्याग भावना से निर्धन रोगियों की सेवा करें और उन्हें अकाल – मृत्यु से बचाकर जीवन प्रदान करें। रोगी की औषधि और परिचर्या निःशुल्क होनी चाहिए। इस भाँति स्वस्थ जीवन प्राप्त करके समाज अपनी अभीष्ट उन्नति कर सकेगा। हमारे समाज का नैतिक पतन हो गया है। चारों ओर भ्रष्टाचार, चोर – बाजारी, रिश्वत तथा धोखेबाजी फैली हुई है। इसलिए समाज – सेवकों का कर्त्तव्य है कि वे अपने चरित्र – बल से समाज की विनाशकारी तथा अनैतिकता की जड़ को उखाड़कर दूर फेंक दें। समाज का तभी उद्धार होगा। समाज में अन्धविश्वास और छुआछूत का भी बोलबाला है। भाग्यवाद ने समाज को आलसी और अकर्मण्य बना दिया है। जादू – टोना, भूत – प्रेत, मन्त्र – तन्त्र आदि ने उसको सहज बुद्धि पर पर्दा डाल दिया है। ऊँच – नीच के विचार ने परस्पर घृणा का बीज बो दिया है। समाज – सेवकों को इन घृणित तत्वों को हृदय से निकाल कर उनमें सद्भावों की प्रतिष्ठा करनी है। समाज की उन्नति के लिए स्त्री – जाति की संकीर्णताएँ दूर करनी अत्यावश्यक है। बिना स्त्रियों की उन्नति के समाज की उन्नति अधूरी है। स्त्रियाँ ही चरित्रवान् नागरिकों की जननी है। वास्तव में इनकी ही उन्नति पर समाज की उन्नति निर्भर है। आज समाज में स्त्रियों का अपना स्थान है। उन्हें उचित स्थान देना होगा। भारत हमेशा से समाज – सेवा में अग्रणी रहा है। उसने सबसे पहले ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ का उच्च सिद्धान्त बनाकर विश्व – बन्धुत्व का दिव्य सन्देश दिया है। आज हम इसी उच्च सिद्धान्त को अपनाकर समाज तथा राष्ट्र की उन्नति कर सकते हैं। |
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निबंध लेखन :मानव जीवन में जल का महत्वपूर्ण स्थान है |
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Answer» जल हमारे लिए अत्यंत आवश्यक घटक है। यह प्रकृति का अनमोल उपहार है। जल के बिना हमारा जीवन संभव नहीं है। ऐसा माना जाता है कि जल ही जीवन है। यह अमृत समान है। मनुष्य के साथ – साथ पशु – पक्षी, पेड – पौधे सभी के लिए अत्यंत आवश्यक है। सब का जीवन जल पर निर्भर है। दैनिक जीवन के लिए बहुत आवश्यक हैं। पानी, पीना, नहाना, भोजन करना, कपडे धोना, फसलें पैदा करना आदि के लिए जल बहुत महत्वपूर्ण है। जल के बिना हमारे जीवन की कल्पना करना कठिन है। जल समुद्र, नदी, तालाब, पोखर, कुआँ, नहर इत्यादि में पाया जाता है। आजकल हर जगह पानी की बर्बादी हो रही है। जल प्रदूषित हो रहा है। जल की कमी के कारण हमें फसलों की उपज कम होती है। अनाज के दाम बढ जाते हैं। पर्यावरण को काफी नुकसान होता है। पीने का पानी महंगा बन जायेगा। इसलिए हम सब को –
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निबंध लेखन :पुस्तकें ज्ञान के भंडार हैं |
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Answer» प्रस्तावना : पढ़ने के लिए जिस स्थान पर पुस्तकों का संग्रह होता है, उसे पुस्तकालय कहते हैं। भारत में मुम्बई, कलकत्ता , चेन्नै, दिल्ली, हैदाराबाद आदि शहरों में अच्छे पुस्तकालय हैं। तंजाऊर का सरस्वती ग्रंथालय अत्यंत महत्व का है। मानव जीवन में पुस्तकालय का अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान है। विषय विश्लेषण : पुस्तकालय चार प्रकार के हैं। 1. व्यक्तिगत पुस्तकालय 2. सार्वजनिक पुस्तकालय 3. शिक्षा – संस्थाओं के पुस्तकालय 4. चलते – फिरते पुस्तकालय पुस्तकों को पढ़ने की रुचि तथा खरीदने की शक्ति रखनेवाले व्यक्तिगत पुस्तकालयों का संचालन करते हैं। इतिहास, पुराण, नाटक, कहानी, उपन्यास, जीवनचरित्र आदि सभी तरह के ग्रंथ सार्वजनिक पुस्तकालयों में मिलते हैं। इनमें सभी लोग अपनी पसंद की पुस्तकें पढ़ सकते हैं। नियत शुल्क देकर सदस्य होने पर पुस्तकें घर ले जा सकते हैं। शिक्षा संस्थाओं के पुस्तकालयों से केवल तत्संबंधी विद्यार्थी ही लाभ पा सकते हैं। देहातों तथा शहरों के विभिन्न प्रांतों के लोगों को पुस्तकें पहुँचाने में चलते – फिरते पुस्तकालय बहुत सहायक हैं। इनके नियमित रूप से पढ़ने से मनोरंजन के साथ – साथ ज्ञान – विज्ञान की भी वृद्धि होती है। पुस्तकें पढ़ने से ये लाभ हैं : इनके नियमित रूप से पढ़ने से मनोरंजन के साथ – साथ ज्ञान – विज्ञान की भी वृद्धि होती है। 1. अशिक्षा दूर होती है। 2. बुद्धि का विकास होता है। 3. कुभावनाएँ दूर होती हैं। विभिन्न देशों की सामाजिक, राजनीतिक, धार्मिक और आर्थिक परिस्थितियों का परिचय मिलता है। उपसंहार : |
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निबंध लेखन :सिनेमा से लाभ और हानि |
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Answer» सिनेमा या चलन-चित्र से हमें कई लाभ हैं। एक गरीब आदमी घूम फिरकर संसार के सभी सुन्दर दृश्य नहीं देख सकता । लेकिन इनके द्वारा आसानी से थोडा समय और थोडे पैसों से देख सकता है। हम काम करते-करते थक जाते हैं। इसलिए मनोरंजन के बिना अपने काम अधिक समय तक नहीं कर सकते हैं। थोडे से मनोरंजन से हम में स्फूर्ति आती है और काम करने का नया उत्साह पैदा होता है। इन चलन चित्रों से हम बहुत विषय सीख सकते हैं। कई चलनचित्रों के द्वारा राष्ट्रीय भाषाओं का प्रचार भी हो रहा है। देश भक्ति संबन्धी कई प्रकार के दृश्य दिखाये जा रहे हैं। इसके ज़रिए समाज सुधार का काम आसानी से हो सकता है। समाज के दुराचार दिखाकर उनको दूर करने का प्रयत्न किया जा सकता है। सिनेमाओं से बहुत हानियाँ भी हैं। पैसा कमाने के उद्देश्य से आजकल के निर्माता उत्तम चित्र नहीं बनाते । ताकि दुष्परिणामों का असर युवकों पर पड़ता है और वे बिगडे जा रहे हैं। सिनेमाओं को अधिक देखने से आँखों के रोग बढ जाते हैं। |
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निबंध लेखन :दूरदर्शन |
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Answer» प्रस्तावना : विषय विश्लेषण : लाभ : नष्ट : |
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निबंध लेखन :“मानव सभ्यता के विकास में कम्प्यूटर का महत्त्व”.. |
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Answer» प्रस्तावना : भूमिका (लाभ) : विषय प्रवेश : विश्लेषण : उपसंहार : |
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हमारा प्यारा भारतवर्ष पर निबंध लिखिए : |
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Answer» संसार के नक्शे पर बहुत सारे देश विद्यमान हैं। सभी देशों की अपनी – अपनी संस्कृति, सभ्यता, भाषा, प्रकृति और रंग – रूप आदि हैं। उन सबका अपना – अपना महत्त्व भी निश्चय ही है। वहाँ के रहने वाले नागरिकों के मन में अपने – अपने देश के प्रति भक्ति, प्रेम, श्रद्धा और विश्वास सब – कुछ है; लेकिन उन देशों का कई दृष्टियों से वह महत्त्व नहीं, जो मेरे प्यारे देश भारतवर्ष का है। संसार के प्रायः अन्य सभी देशों में एकरूपता है। परन्तु जहाँ तक मेरे देश भारतवर्ष का प्रश्न है, अनेकता और अनेकरूपता को इसकी इतनी महत्त्वपूर्ण विशेषता माना गया है कि उस पर शेष देशों की अलग – अलग सारी विशेषताएँ, सारे रूप न्योछावर किये जा सकते हैं। प्रकृति की गोद में बसे भारत के उत्तर में हिमालय की विशाल और दूर – दूर तक फैली हुई पर्वतमाला है। कश्मीर, मसूरी, शिमला आदि दर्शनीय पहाड़ी स्थल इसी पर्वतमाला की देन है। बाकी तीन दिशाओं में तीन सागर हैं, कि जो कन्याकुमारी में आकर घुल – मिलकर एक हो गए हैं। यहाँ बहने वाली पवित्र नदियों की तो गिनती कर पाना भी संभव नहीं है। इसी प्रकार कहीं पहाड़ी धरती है, तो कहीं कोसों तक रेगिस्तान फैले हुए हैं। इसी प्रकार कहीं दूर – दूर तक खेतों की हरियाली से भरे मैदान हैं, तो कहीं मीलों तक फैले घने जंगल। प्रकृति का इस प्रकार का अनेक रूपों वाला विस्तार संसार के अन्य किसी भी देश में नहीं है। संसार के अन्य देशों में सर्दी – गर्मी आदि में से कोई एक ऋतु ही मुख्य रूप से हमेशा बनी रहती है। ऋतुओं की कुल संख्या भी चार ही मानी गई है, जबकि भारत में बारी – बारी से छः ऋतुएँ आकर अपना ऐश्वर्य दिखाकर और अपना प्रभाव दिखा जाती हैं। वसन्त ऋतु, ग्रीष्म ऋतु, वर्षा ऋतु, शरद् ऋतु, शीत ऋतु और शिशिर ऋतु – प्रकृति के इतने रंग – रूप मेरे प्यारे भारत के सिवा और कहीं भी नहीं मिलते! – यों तो मेरे प्यारे देश की भारतीयता नामक एक ही संस्कृति मानी गई है; पर इसकी रचना अन्य कई संस्कृतियों के प्रभावों से हुई है। उन प्रभावों को ग्रहण करके भी अपनापन कभी नहीं गँवाया। भारतीय संस्कृति से ही महानदी से निकलने वाली नहरों के समान बौद्ध, जैन, सिक्ख आदि कई उप – संस्कृतियों ने जन्म लिया। इस्लाम और ईसाई संस्कृतियाँ यद्यपि बाहर से आईं, पर अब इनको मानने वाले अपने – आपको भारतीय संस्कृति का अंग मानकर ही इस देश में यहाँ के मूल निवासियों के समान ही सभी प्रकार के अधिकार पाकर अपने – अपने कर्तव्यों का पालन भी कर रहे हैं। इस प्रकार भारत को अनेक धर्मों को जन्म और आश्रय देने वाली भूमि भी माना गया है। वेदों में प्रतिपादित आर्य (हिन्दू) धर्म यहाँ का मूल एवं मुख्य धर्म है। इसकी अनेक शाखाएँ प्रशाखाएँ यहाँ पर अपने – अपने विश्वासों के अनुसार क्रियाशील हैं। इस्लाम और ईसाई धर्म, पारसी एवं अन्य प्रकार के कई धर्म भी स्वतन्त्र रूप से अपने विश्वासों का पालन करते हुए यहाँ निवास करते रहते हैं। कई प्रकार के धार्मिक – आध्यात्मिक सम्प्रदाय भी इस भारत भूमि पर सद्भाव के साथ, स्वतन्त्रतापूर्वक निवास कर रहे हैं। संसार के अन्य देशों में अपनी मुख्य भाषा भी एक ही स्वीकार की गई है, यों बोलियाँ वहाँ भी कई हैं; पर भारत ने अपने संविधान में बाईस भाषाओं को राष्ट्रभाषा या राष्ट्रीय भाषाओं का ‘नाम और महत्त्व प्रदान कर रखा है। हर भाषा की कई बोलियाँ – उपबोलियाँ आदि भी हैं। भारतभूमि की महानता तीर्थस्थानों, मन्दिरों, ऐतिहासिक किलों तथा अन्य प्रकार के भवनों के कारण भी है। भारत का अतीत अनेक प्रकार के त्याग और बलिदान के इतिहासों से भरा हुआ है। भारत की नीतियाँ भी हमेशा से सबका भला चाहने वाली रही हैं। सबके सुखों और निरोगता की कामना करने वाले वेदों जैसे महान ग्रन्थ, रामायण – महाभारत जैसे महान काव्य इसी देश में रचे गये। चारों कोनों पर स्थापित चार धाम और ज्योतिपिण्ड इसकी सभ्यता – संस्कृति की एकता और महानता को, आत्मिक उच्चता के भावों को प्रकट करने वाले हैं। सत्य, अहिंसा, प्रेम, भाईचारा, का उपदेश एवं सन्देश देने वाले अपने प्यारे भारतवर्ष की महानता के सामने मेरा मस्तक अपने – आप ही झुक जाता है। |
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प्रदूषण की समस्या पर निबंध लिखिए : |
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Answer» ‘पर्यावरण’ का शाब्दिक अर्थ है – हमारे चारों ओर का प्राकृतिक आवरण। जो कुछ भी हमारे चारों ओर विद्यमान है, हमें ढके – लपेटे हुए है उसे पर्यावरण कह सकते हैं। प्रकृति ने मानव के लिए एक सुखद आवरण बनाया था। साँस लेने के लिए स्वच्छ हवा, पीने के लिए साफ़ पानी, कोलाहल रहित शांत प्रकृति, हरे – भरे वन, उनमें बसने वाले पशु पक्षी। इन सबके रूप में प्रकृति ने मानव को कितना कुछ दिया, किंतु मानव ने अपने स्वार्थ में एक ओर तो प्रकृति की सुविधाओं का अंधाधुंध लाभ उठाकर उसका शोषण किया और दूसरी ओर प्रगति के नाम पर शोरगुल, धुआँ, जहरीली गैसें वायुमंडल में भर दिया, यही नहीं समुद्र आदि के जल को भी विषाक्त कर दिया। वायु हमारे प्राणों का आधार है। किंतु आजकल, विशेषकर शहरों में हम जिस वायु में साँस ले रहे हैं वह प्राणों के लिए हानिकारक है। उसमें धूल, धुआँ, राख जैसे पदार्थ हैं जिनमें कार्बन मोनो – ऑक्साइड जैसे हानिकारक रसायन होते हैं। यही वायु प्रदूषण है। इसी प्रदूषण के कारण आँख, गले, फेफड़े के रोगों का प्रकोप बढ़ता जा रहा है। बढ़ता हुआ शोर भी प्रदूषण का एक प्रमुख कारण है। इसे ध्वनि प्रदूषण कहा जाता है। वाहनों, कारखानों का शोर कान फाड़ने वाला होता है। घरों में ऊँचे स्वर से रेडियो – टी.वी. सुनना, लाउडस्पीकरों का मनमाना प्रयोग, जोरों से चीखना – चिल्लाना सब शोर के ही उदाहरण हैं। ध्वनि प्रदषण से न केवल सनने की शक्ति पर कप्रभाव पडता है. इससे सिर दर्द, रक्तचाप, अनिद्रा जैसे रोग भी हो जाते हैं। जल का दूसरा नाम जीवन है। प्राणी जल के बिना जीवित नहीं रह सकता। आज स्वच्छ जल मिलना दूभर हो गया है, क्योंकि जल – स्रोतों को ही प्रदूषित कर दिया गया है। नगरों और शहरों की गंदगी तथा कारखानों के जहरीले रसायन नदियों और तालाबों में छोड़े जाते हैं। अज्ञान और सुविधाओं के अभाव के कारण मलमूत्र त्याग, पशुओं को नहलाने, वस्त्र धोने, कूड़ा – कचरा पानी में गिराने से भी जल प्रदूषित हो जाता है। ऐसा प्रदूषित जल पीने से हैजा, अतिसार, पीलिया, टाइफाइड जैसे रोग फैलते हैं। वायु, जल और ध्वनि प्रदूषण के बढ़ने के साथ – साथ मृदा प्रदूषण का खतरा भी उत्पन्न हो गया है। रासायनिक खादों के अतिशय प्रयोग से मिट्टी का स्वाभाविक रूप विकृत होता जा रहा है। परिणामस्वरूप, उत्पादित वस्तुओं का पौष्टिक तत्व नष्ट होता जा रहा है। साग – सब्जी और फल स्वादहीन होते जा रहे हैं। दुख की बात है कि सभ्यता और विकास के नाम पर हम प्रकृति की धरोहर को नष्ट कर रहे हैं और अपने पैरों पर स्वयं कुल्हाड़ी मार रहे हैं। यदि पर्यावरण का संरक्षण नहीं किया गया तो मानवजाति का अस्तित्व ही संकट में पड़ जाएगा। वायु प्रदूषण रोकने के लिए अधिक वृक्ष लगाने होंगे और कल – कारखानों को वायुमंडल में विषैले तत्व छोड़ने से रोकना होगा। वाहनों की भी जाँच करनी होगी और ऐसे ईंधनों का प्रयोग करना होगा जो प्रदूषण न फैलाएँ। कारखानों को नदी – तालाबों में हानिकारक रसायन छोड़ने से रोकना होगा। जल स्रोतों की सफाई करते रहनी होगी। ध्वनि प्रदूषण रोकने के भी उपाय करने होंगे। वाहनों की बनावट ऐसी हो कि वे शोर न करें। व्यर्थ हॉर्न बजाने से लोगों को रोकना होगा। भूमि प्रदूषण को रोकने के लिए प्राकृतिक उर्वरकों के प्रयोग पर बल देना होगा। सभी प्रकार के प्रदूषण पर नियंत्रण करने के लिए आवश्यक है कि लोगों के सोचने के ढंग में बदलाव लाया जाए। जैसे हमारी एक निश्चित आयु है, उसी प्रकार प्राकृतिक संसाधनों को भो। यदि हम उनको बिगाड़ेंगे या उनसे छेड़छाड़ करेंगे तो हमारा अपना अस्तित्व संकट में पड़ जाएगा। इसलिए भलाई इसी में है कि हम पर्यावरण का संरक्षण करें, ताकि हमारा अस्तित्व बना रहे। |
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दूरदर्शन पर निबंध लिखिए : |
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Answer» आधुनिक युग विज्ञान का युग कहलाता है। इस युग में मानव की सुविधा के लिए विज्ञान ने अनेक चीजें दी है। मनोरंजन के नये – नये साधन दिये है। उनमें एक है दूरदर्शन। दूरदर्शन का स्थान आज बहुत ऊँचा और महत्त्वपूर्ण है। आज शहरों से लेकर गाँव तक के लोग दूरदर्शन की प्राप्ति के लिए उत्सुक हैं। सरकार ने बहुत से शहरों में दूरदर्शन की सुविधा प्रदान की है। सभी गावों को भी दूरदर्शन की व्याप्ति में लाने का प्रयत्न हो रहा है। जिस प्रकार रेडियों के द्वारा हम दूर की बातों को सुन सकते हैं उसी तरह दूरदर्शन से दूर की घटनाओं को हम घर बैठे देख सकते हैं। अमेरिका में जो कुछ हो रहा है उसको हम उसी समय अपने घर में बैठकर देख सकते हैं। संसार के किसी भी कोने में हुईं घटनाओं को, चाहे वे सुखदायी हो या दुखदायी, यथावत् लोगों के सामने रखने का काम दूरदर्शन करता है। दूरदर्शन का उपयोग आजकल उच्च शिक्षा में भी किया जाता है। बड़े – बड़े वैज्ञानिक प्रयोग, शोध आदि का परिचय दूरदर्शन द्वारा सारे विश्व को कराया जाता है। लोगों को शिक्षित करने में दूरदर्शन का महत्त्वपूर्ण स्थान है। भारत जैसे अर्धविकसित देश में छब्बीस प्रतिशत लोग अनपढ़ हैं। अनपढ़ों को पढ़ाई, स्वास्थ्य, नागरिक शिक्षा आदि विषयों के बारे में जानकारी देने में दूरदर्शन के द्वारा अत्यधिक सहायता प्राप्त होती है। दूरदर्शन मनोरंजन का प्रमुख साधन है। यह हमें मनोरंजन प्रदान करता है। दूरदर्शन सस्ते दामों पर विज्ञान और मनोरंजन को प्रदान करने में सफल हुआ है। लोग घर बैठे – बैठे बिना कष्ट के अपना मनोविकास और मनोरंजन कर सकते हैं। इस प्रकार दूरदर्शन आजकल एक सफल लोकप्रिय प्रचार – माध्यम साबित हुआ है। दूरदर्शन से कुछ हानियाँ भी है। दूरदर्शन के प्रचार से सिनेमा उद्योग को कुछ धक्का लगा है। लोग अब घर में ही बैठ कर अपने पसंद की फिल्में देख सकते हैं। बड़े – बड़े राष्ट्रीय खेल, प्रतियोगिताएँ बिना पैसे दिये घर बैठ कर हम देख सकते हैं। इससे खेलों के मैदान में भीड़ कम हो गयी है। दूरदर्शन का उपयोग अधिक करने के कारण लोगों की दृष्टि भी कमजोर हो जाती है। दूरदर्शन में आज बच्चों की रुचि अधिक हो गयी है। इससे इसका असर उनकी पढ़ाई पर पड़ गया है। बच्चे अपनी पढ़ाई की ओर कम ध्यान दे रहे हैं। – दूरदर्शन के सभी कार्यक्रम नियंत्रित होने के कारण इसमें हानियों की अपेक्षा लाभ अधिक है। दूरदर्शन में उत्तम कार्यक्रम का प्रसार करना चाहिए। |
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विज्ञान का चमत्कार पर निबंध लिखे 200 words ka |
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Answer» संक्षेप में प्राकृतिक के क्रमबद्ध अध्ययन ज्ञान को विज्ञान कहते हैं। विज्ञान के विभिन्न प्रकार है जैसे- प्राकृतिक विज्ञान, जीवन विज्ञान, तथा इन प्रकारों के विभिन्न शाखाएं हैं जैसे- भौतिक विज्ञान, रसायन विज्ञान, जीव विज्ञान आदि। यह हमें घटना के पीछे के कारण तथा परिणामों से अवगत कराते हैं। मानव जाति को विज्ञान के कुछ शानदार उपहार बिजली - विज्ञान का मानव जाति को बिजली (Electricity) एक शानदार उपहार है। बिजली के माध्यम से घर ही रौशन नहीं हैं अपितु आज हम जितने भी उपकरण अपने दैनिक जीवन में उपयोग करते हैं, उसमें से ज्यादातर बिजली की सहायता से चलती हैं। इसके अतिरिक्त अस्पताल, अद्यौगिक क्षेत्र, कार्पोरेट सेक्टर आदि में बिजली का महत्वपूर्ण योगदान है। विज्ञान हमारे जीवन में मुख्य भूमिका अदा करता है। तथा मानव जाति को विज्ञान के उपहार के रूप में अनेक सुविधाएं प्राप्त हैं, जिनका उपयोग वह अपने दैनिक जीवन के कार्यों को पूरा करने से लेकर प्रकृति के प्रकोप से स्वयं को बचाने तक करता है। |
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पाठ का शीर्षक ‘अब कहाँ दूसरे के दुख से दुखी होने वाले’ का क्या अर्थ है ? |
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Answer» ‘अब कहाँ दूसरे के दुख से दुखी होने वाले’ नामक पाठ ‘निदा फ़ाज़ली’ द्वारा लिखा गया है। इस पाठ का प्रतिपाद्य है-मनुष्य द्वारा प्रकृति के साथ निरंतर की जा रही छेड़छाड़ की ओर ध्यानाकर्षित कराना, प्रकृति के क्रोध का परिणाम दर्शाना तथा प्रकृति के गुस्से का परिणाम बताते हुए प्रकृति, सभी प्राणियों, पशु-पक्षियों समुद्र पहाड़ तथा पेड़ों के प्रति सम्मान एवं आदर का भाव प्रकट करना। इतना ही नहीं इस धरती पर अन्य जीवों की हिस्सेदारी समझते हुए इसे केवल मनुष्य की ही जागीर न समझना। लेखक यह बताना चाहता है कि मनुष्य नदी, समुद्र, पहाड़, पेड़-पौधों आदि को अपनी जागीर समझकर उनका मनचाहा उपभोग करता है। इससे प्राकृतिक असंतुलन पैदा होता है। इसके अलावा सभी जीव चाहे मनुष्य हों या कुत्ता उसी एक ईश्वर की रचनाएँ हैं। हमें इनके साथ उदार व्यवहार करना चाहिए। |
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विद्यार्थी और अनुशासन पर निबंध लिखिए : |
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Answer» अनुशासन का मानव जीवन में महत्वपूर्ण स्थान है। शिक्षा – क्षेत्र में ही नहीं बल्कि सांस्कृतिक क्षेत्र में भी अनुशासन का बोलबाला है। इसके बिना जीवन में एक क्षण भी कार्य नहीं चल सकता। गृह, पाठशाला, कक्षा, सेना, कार्यालय, सभा इत्यादि में अनुशासन के बिना एक क्षण भी कार्य नहीं चल सकता। अतः अनुशासन का अर्थ नियंत्रण में रहना, नियम बद्ध कार्य करना है। इसका वास्तविक अर्थ है, बुद्धि एवं चरित्र को सुसंस्कृत बनाना। अनुशासन का महत्व जीवन में उसी प्रकार व्याप्त है जिस प्रकार कि भोजन एवं पानी। अनुशासन मानव जीवन का आभूषण है, श्रृंगार है। मनुष्य के चरित्र का यह सबसे शुभ लक्षण है। विद्यार्थी जीवन के लिए तो यह नितांत आवश्यक है। विद्यार्थी जीवन का परम लक्ष्य विद्या प्राप्ति है और विद्या – प्राप्ति के लिए अनुशासन का पालन बहुत आवश्यक है। अनुशासन न केवल व्यक्तिगत व सामाजिक जीवन के लिए आवश्यक है, बल्कि राष्ट्रीय जीवन का आधार भी है। विद्यार्थी जीवन भावी जीवन का नींव है। इस जीवन में यदि अनुशासन में रहने की आदत पड़ जाए तो भविष्य में प्रगति के द्वार खुल जाते हैं। एक ओर तो हम कहते हैं कि ‘आज का विद्यार्थी कल का नागरिक है’ और दूसरी ओर वही विद्यार्थी अनुशासन भंग करके आज राष्ट्र के आधार – स्तंभों को गिरा रहे हैं। विद्यार्थी जीवन में अनुशासन हीनता अत्यंत हानिकारक है। इससे माता – पिता का मेहनत से कमाया हुआ धन व्यर्थ चला जाता है। देश और समाज को अनुशासन हीनता से क्षति पहुँचती है। जो विद्यार्थी अनुशासन भंग करता है वह स्वयं अपने हाथों से अपने भविष्य को बिगाड़ता है। बसों को आग लगाना, सरकारी संपत्ति को नष्ट करना, अध्यापकों और प्रोफेसरों का अपमान करना, स्कूल और कालेज के नियमों का उल्लंघन करना और पढ़ाई के समय में राजनीतिक गतिविधियों में समय नष्ट करना इत्यादि कुछ अनुशासनहीनता के रूप हैं। इस अनुशासनहीनता के व्यक्तिगत, सामाजिक, नैतिक, आर्थिक तथा कुछ अन्य कारण हो सकते हैं। आज स्कूल और कालेज राजनीति के केंद्र बन गए हैं। आज विद्यार्थियों में परस्पर फूट पैदा की जाती है। ये राजनीतिक दल ऐसा करके न केवल विद्यार्थी – जीवन की पवित्रता को भंग करते है बल्कि देश में अशांति, हिंसा, विघटन की भावना उत्पन्न करते हैं। स्कूल और कालेज के जीवन में राजनीति के प्रवेश पर प्रतिबंध लगाना चाहिए। आज नवयुवकों को अपने चारों ओर अंधकार ही अंधकार दिखाई देता है। शिक्षा में कुछ ऐसे आधारभूत परिवर्तन होने चाहिए जिसमें विद्यार्थी को अपने जीवन के प्रति निष्ठा, वर्तमान के प्रति प्रेम और अतीत के प्रति श्रद्धा बढ़े। चरित्र और नैतिक पतन की जो प्रतिष्ठा हो चुकी है उसके भी कारण खोजे जाएँ और ऐसी आचार – संहिता बनाई जाए जिसका विद्यार्थी श्रद्धापूर्वक पालन कर सके। विद्यार्थियों में शक्ति का अपार भंडार होता है। उसका सही प्रयोग होना चाहिए। स्कूल और कालेजों में खाली समय में खेलने के लिए सुविधाएँ प्राप्त की जानी चाहिए। विद्यार्थियों की रूचि का परिष्कार करके उन्हें सामाजिक और सामूहिक विकास योजनाओं में भाग लेने के लिए प्रेरित किया जाए। नैतिक गिरावट के कारण और परिणाम उन्हें बताए जाए जिससे वे आत्मनिरीक्षण करके अपने जीवन के स्वयं निर्माता बन सकें। शिक्षितों की बेकारी दूर करने की कोशिश की जानी चाहिए। अनुशासनहीनता से बचकर विद्यार्थी जब अपने कल्याण की भावना के विषय में सोचेंगे तभी उनका जीवन प्रगति – पथ पर बढ़ सकेगा। अनुशासन में बँधकर रहने पर ही वह देश एवं समाज का योग्य नागरिक बन सकता है। इसी में देश, जाति, समाज एवं विश्व का कल्याणं निहित हैं। |
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सहशिक्षा पर निबंध लिखिए : |
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Answer» सहशिक्षा का अर्थ है एक कक्षा में, एक कमरे में छात्रों और छात्राओं की एक साथ पढ़ाई। भारत में सदा इसका विरोध किया जाता था और यह व्यवस्था थी कि बालक और बालिकाओं के गुरुकुल अलग – अलग और एक दूसरे से दूर हों। आजकल सहशिक्षा का विरोध क्रमशः शिथिल होता जा रहा है। सहशिक्षा के समर्थक बहुत प्रकांड विद्वान, उन्नत और प्रगति – शील हैं। वे कहते हैं कि सह – शिक्षा से देश को अनेक लाभ हैं जिनकी उपेक्षा करना आज हानिकारक होगा। सह – शिक्षा से राष्ट्र के धन का अव्यय नहीं होगा। एक साथ लड़कों व लड़कियों के पढ़ने से अध्यापक वर्ग, भवन, फर्नीचर, पुस्तकालय तथा व्यवस्था आदि पर दोहरा व्यय नहीं करना होगा। आज जब कि योग्य शिक्षित अध्यपकों का अभाव है, और यह भी अत्यंत आवश्यक है कि दोनों एक योग्य अध्यापक से पढ़ लिया करें। इस तरह विद्यालयों की ईमारतें भी अलग – अलग नहीं बनानी पड़ेंगी। लड़कों व लड़कियों के एक साथ पढ़ने और अधिक परिचय से उनमें एक दूसरे के प्रति मिथ्या आकर्षण कम हो जाएगा। अपरिचित व अज्ञात रहस्य के प्रति आकर्षण अधिक होता है। एक दूसरे के साथ अधिक समय व्यतीत करने से नवीनता, कोतूहलता और रहस्यमयता कम हो जाएगी, वातावरण सहज नैतिक हो जाएगा। दोनों के एक साथ रहने से लड़कों की उच्छंखलता कम हो जाएगी। वे लडकियों से शालीनता, नम्रता आदि गुण सीखेंगे। लड़कियाँ लड़कों से पौरुष व साहस आदि गुण सीखेंगी। आज नारी भी राष्ट्र की समान नागरिक है। नागरिकता के सब गुणों का विकास सह – शिक्षा से ही नारी में हो सकेगा। शिक्षा का संबंध मानव जीवन से है। यदि शिक्षा जीवन के उपयोग में नहीं आई तो वह व्यर्थ है। शिक्षण काल में विद्यार्थी या विद्यार्थिनी को इन गुणों का विकास करना चाहिए जो उसके भावी जीवन में उपयोगी हों। यदि स्त्री और पुरुषों का कार्यक्षेत्र एक है, उन दोनों को एक समान सार्वजनिक कार्य करने हैं, एक समान सरकारी या व्यापारिक दफ्तरों में नौकरी करनी है, एक समान धन उपार्जन करना है तब सहशिक्षा का विरोध नहीं किया जा सकता। अगर नर और नारी को अलग – अलग क्षेत्रों में काम करना है दोनों के लिए भिन्न गुणों की आवश्यकता है। सहशिक्षा अपने में ही सुंदर प्रणाली है। इसका वातावरण बुरा या अच्छा हमारे छात्र – छात्रायें ही बनाते हैं। यदि हमारे छात्र – छात्राओं में परस्पर सद्भावना होगी तो निश्चय ही सहशिक्षा सफलता की चरम सीमा को प्राप्त कर सकती है। यह तो विद्यार्थियों का विषय है। अच्छा वातावरण उन्हीं के लिए लाभदायक है। शिक्षा का उद्देश्य मनुष्य की मानसिक और नैतिक शक्तियों का विकास है। सहशिक्षा इसकी कसौटी है। छात्र और छात्राओं की विजय इसी में है कि वे इस कसौटी पर खरे उतरें। |
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इंटरनेट की दुनिया पर निबंध लिखिए : |
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Answer» इंटरनेट दुनिया भर में फैले कम्प्यूटरों का एक विशाल संजाल है जिसमें ज्ञान एवं सूचनाएं भौगोलिक एवं राजनीतिक सीमाओं का अतिक्रमण करते हुए अनवरत प्रवाहित होती रहती हैं। कैलिफोर्निया विश्वविद्यालय के प्रोफेसर सियोनार्ड क्लिनरॉक को इन्टरनेट का जन्मदाता माना जाता है। इन्टरनेट की स्थापना के पीछे उद्देश्य यह था कि परमाणु हमले की स्थिति में संचार के एक जीवंत नेटवर्क को बनाए रखा जाए। लेकिन जल्द ही रक्षा अनुसंधान प्रयोगशाला से हटकर इसका प्रयोग व्यावसायिक आधार पर होने लगा। फिर इन्टरनेट के व्यापक स्तर पर उपयोग की संभावनाओं का मार्ग प्रशस्त हुआ और अपना धन लगाना प्रारम्भ कर दिया। 1992 ई. के बाद इन्टरनेट पर ध्वनि एवं वीडियो का आदान – प्रदान संभव हो गया। अपनी कुछ दशकों की यात्रा में ही इन्टरनेट ने आज विकास की कल्पनातीत दूरी तय कर ली है। आज के इन्टरनेट के संजाल में छोटे – छोटे व्यक्तिगत कम्प्यूटरों से लेकर मेनफ्रेम और सुपर कम्प्यूटर तक परस्पर सूचनाओं का आदान – प्रदान कर रहे हैं। आज जिसके पास भी अपना व्यक्तिगत कम्प्यूटर है वह इंटरनेट से जुड़ने की आकांक्षा रखता है। इन्टरनेट आधुनिक विश्व के सूचना विस्फोट की क्रांति का आधार है। इन्टरनेट के ताने – बाने में आज पूरी दुनिया है। दुनिया में जो कुछ भी घटित होता है और नया होता है वह हर शहर में तत्काल पहँच जाता है। इन्टरनेट आधुनिक सदी का ऐसा ताना – बना है, जो अपनी स्वच्छन्द गति से पूरी दुनिया को अपने आगोश में लेता जा रहा है। कोई सीमा इसे रोक नहीं सकती। यह एक ऐसा तंत्र है, जिस पर किसी एक संस्था या व्यक्ति या देश का अधिकार नहीं है बल्कि सेवा प्रदाताओं और उपभोक्ताओं की सामूहिक सम्पत्ति है। इन्टरनेट सभी संचार माध्यमों का समन्वित एक नया रूप है। पत्र – पत्रिका, रेडियो और टेलीविजन ने सूचनाओं के आदान – प्रदान के रूप में जिस सूचना क्रांति का प्रवर्तन किया था, आज इन्टरनेट के विकास के कारण वह विस्फोट की स्थिति में है। इन्टरनेट के माध्यम से सूचनाओं का आदान – प्रदान एवं संवाद आज दुनिया के एक कोने से दूसरे कोने तक पलक झपकते संभव हो चुका है। इन्टरनेट पर आज पत्र – पत्रिकाएं प्रकाशित हो रही हैं, रेडियों के चैनल उपलब्ध हैं और टेलीविजन के लगभग सभी चैनल भी मौजूद हैं। इन्टरनेट से हमें व्यक्ति, संस्था, उत्पादों, शोध आंकड़ों आदि के बारे में जानकारी मिल सकती है। इन्टरनेट के विश्वव्यापी जाल (www) पर सुगमता से अधिकतम सूचनाएं प्राप्त की जा सकती हैं। इसके अतिरिक्त यदि अपने पास ऐसी कोई सूचना है जिसे हम सम्पूर्ण दुनिया में प्रसारित करना चाहें तो उसका हम घर बैठे इन्टरनेट के माध्यम से वैश्विक स्तर पर विज्ञापन कर सकते हैं। हम अपने और अपनी संस्था तथा उसकी गतिविधियों, विशेषताओं आदि के बारे में इन्टरनेट पर अपना होमपेज बनाकर छोड़ सकते हैं। इन्टरनेट पर पाठ्य सामग्री, प्रतिवेदन, लेख, कम्प्यूटर कार्यक्रम और प्रदर्शन आदि सभी कुछ कर सकते हैं। दूरवर्ती शिक्षा की इन्टरनेट पर असीम संभावनाएं हैं। इन्टरनेट की लोकतांत्रिक प्रक्रिया में भी अहम् भूमिका है। विभिन्न प्रकार के सर्वेक्षण एवं जनमत संग्रह इन्टरनेट के द्वारा भली – भांति हो सकते हैं। आज सरकार को जन – जन तक पहुंचने के लिए ई – गवर्नेस की चर्चा हो रही है। व्यापार के क्षेत्र में इन्टरनेट के कारण नई संभावनाओं के द्वार खुले हैं। आज दुनिया भर में अपने उत्पादों और सेवाओं का विज्ञापन एवं संचालन अत्यंत कम मूल्य पर इन्टरनेट द्वारा संभव हुआ है। आज इसी संदर्भ में वाणिज्य के एक नए आयाम ई – कॉमर्स की चर्चा चल रही है। इन्टरनेट सूचना, शिक्षा और मनोरंजन की त्रिवेणी है। यह एक अन्तःक्रिया का बेहतर और सर्वाधिक सस्ता माध्यम है। आज इन्टरनेट कल्पना से परे के संसार को धरती पर साकार करने में सक्षम हो रहा है। जो बातें हम पुराण और मिथकों में सुनते थे और उसे .. अविश्वसनीय और हास्यास्पद समझते थे वे सभी आज इन्टरनेट की दुनिया में सच होते दिख रहे हैं। टेली मेडिसीन एवं टेली ऑपरेशन आदि इन्टरनेट के द्वारा ही संभव हो सके हैं। |
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इंटरनेट क्रांति पर निबंध लिखें | |
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Answer» इंटरनेट क्रांति विज्ञानं के सबसे सफल आविष्कारों में इंटरनेट एक है। इंटरनेट के आविष्कार ने मानव जीवन को अभूतपूर्व गति प्रदान की है। आज जरूरत के सभी सामान कंप्यूटर माउस की एक क्लिक पर उपलब्ध हैं। इसमें हम देश-दुनिया, मनोरंजन, खेल, मौसम सभी की जानकरी आसानी से प्राप्त कर सकते हैं। संसार के किसी भी कोने में बैठे व्यक्ति से देखकर बात कर सकते हैं। इसके माध्यम से लोग घर बैठे खरीददारी कर सकते हैं। बस, रेल, हवाईजहाज़, होटल आदि की बुकिंग कर सकते हैं। सरल शब्दों में इसने मानव जीवन को बेहद आसान कर दिया है। हालांकि हर चीज़ के दो पहलू होते हैं। इसके भी कई दुरूपयोग किये जा रहे हैं। कई लोग इसका गलत उपयोग दूसरे को परेशान करने के लिए कर रहे हैं। अपराध और आतंकवाद का प्रसार भी इसकी वजह से तेज हुआ है। अगर हम इंटरनेट का प्रयोग सही ढंग से करें तो मानव जीवन यह एक अनोखा वरदान है। |
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The most general meaningA) cabin B) palace C) house D) hut E) building |
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Answer» Correct option is E) building |
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Well begun is half _____. A) gone B) done C) undone D) a way E) come |
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Answer» Correct option is B) done |
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A bird in the hand _____. A) is worth two in the bush B) makes even a cat laugh C) has brought forth a mouse D) speaks louder than words E) changes his spots |
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Answer» Correct option is A) is worth two in the bush |
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What is the author's attitude towards one should behave with other people?Do you agree with his reasoning?Give reasons for your answer |
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Answer» Explanation: You are now going to settle at school, and may consider this as your first entrance into the world. As my health is so indifferent, and I may not be with you long, I wish to leave you some advice (the best I can) for your conduct in life, both that it may be of use to you, and as something to remember me by. I may at least be able to caution you against my own errors, if nothing else. As we went along to your new place of destination, youot like it. Never anticipate evils, or, because you cannot have everything exactly as you wish, make them out worse than they are, through more spite and wilfulness. You seemed at first to take no notice of your school-fellows, or rather to set yourself against them, because they were strangers to you. They knew as little of you as you did of them; so that this would have been a reason for their keeping aloof from you as well, which you would have felt as a hardship. Learn never to conceive a prejudice against others, because you know nothing of them. It is bad reasoning, and makes enemies of half the world. Do not think ill of them, till they behave ill to you; and then strive to avoid the faults which you see in them. This will disarm their hostility sooner than pique or resentment or complaint. I though you were disposed to criticize the dress of some of the boys as not so good as your own. Never despise any one for anything that he cannot help -- least of all, for his poverty. I would wish you to keep up appearances yourself as a defence against the idle sneers of the world, but I would not have you value yourself upon them. I hope you will neither be the dupe nor victim of vulgar prejudices. Instead of saying above -- "Never despise any one for anything that he cannot help" -- I might have said, "Never despise any one at all"; for contempt implies a triumph over and pleasure in the ill of another. It means that you are glad and congratulate yourself on their failings or misfortunes. The sense of inferiority in others, without this indirect appeal to our self-love, is a painful feeling, and not an exulting one |
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Why did the man accept the suggestion of building a new hut? |
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Answer» Because he did not have any option left with him,and if he would have gone against the commission of enquiry,he may be harmed by the animals. |
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"While there is _____ there is hope." A) will B) wish C) love D) life E) water |
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Answer» Correct option is D) life |
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| 47. |
Jessica’s as tall _____ her mother. A) than B) like C) more D) as |
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Answer» Correct option is D) as |
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| 48. |
Early A) now B) quickly C) before D) late |
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Answer» Correct option is D) late |
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| 49. |
So _____ so done. A) thought B) done C) had D) saw E) said |
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Answer» Correct option is E) said |
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| 50. |
Child A) girl B) infant C) boy D) adult |
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Answer» Correct option is D) adult |
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